“भैयाजी, आप साइकिल से चलते हैं ये अच्छा नहीं लगता है!”

मेरे पड़ोस में मेरे हमउम्र एक सज्जन रहते हैं । वे समाज के तथाकथित पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं । वे निरक्षर हैं और उनकी मान्यताएं निहायत रुढ़िवादी हैं ऐसा मैं अनुभव करता आया हूं । वे यह सोचते हैं कि आर्थिक रूप से अपेक्षया संपन्न होने के कारण मुझे साइकिल जैसी ‘घटिया’ सवारी से नहीं चलना-फिरना चाहिए । यहां मैं उनकी उस प्रतिक्रिया का जिक्र कर रहा हूं जो एक दिन मेरे साइकिल चलाने पर उन्होंने व्यक्त की थी ।

आगे बढ़ने से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि मेरे पास ‘सामाजिक प्रतिष्ठा का द्योतक’ चौपहिया वाहन नहीं हैं । मैं स्वयं को धनाड्य नहीं मान सकता हूं, किंतु मैं इतना संपन्न तो हूं ही कि चार-पांच लाख मूल्य की एक कार खरीद सकूं । फिर भी कार खरीदने का विचार मेरे मन मैं कभी नहीं आया । इसके दो प्रमुख कारण रहे हैं । एक कारण तो यही रहा है कि बनारस जैसे दुर्व्यवस्थित शहर में कार की वास्तविक उपयोगिता नाममात्र की है । मेरे उक्त विचार से कई नगरवासी अवश्य सहमत होंगे ऐसा मेरा विश्वास है । किंतु ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण वे कार को ‘बेकार’ कहने में हिचकिचाएंगे इस बात को भी मैं महसूस करता हूं । जहां तक मेरा सवाल है मुझे तो कार चलानी भी नहीं आती है । परंतु अपने पास कार न होने का इससे भी बड़ा कारण यह रहा है कि मैं ‘कार-कल्चर’ का विरोधी नहीं तो पक्षधर तो नहीं ही हूं । मेरे विचार में निजी कारों के बदले सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे यथासंभव पैदल चलें अथवा साइकिल प्रयोग में लें । मुझे तो पैदल चलना पसंद है, अथवा आवश्यकतानुसार साइकिल का प्रयोग मुझे अच्छा लगता है । मेरे पास एक स्कूटर है अवश्य, किंतु उसे चलाने की नौबत आठ-दश दिन में एक बार आती है । मुझ जैसे सेवानिवृत्त व्यक्ति का कहीं आना-जाना बहुत नहीं होता है ।

उक्त बातें मैंने इसलिए बता दी कि पड़ोसी के साथ संपन्न मेरी बातें समुचित परिप्रेक्ष में समझी जा सकें । हां तो हुआ यह कि मैं अपने घर से बाहर निकला साइकिल के साथ, और गेट के बाहर सड़क पर उस सवारी पर चढ़ने के लिए तैयार हुआ । तभी पास ही अपने घर के बाहर बैठे उन पड़ोसी सज्जन ने आवाज दी, “भैयाजी!”

मैंने उनकी आवाज सुनी, मैं ठिठककर रुका और उनकी ओर मुखातिब होकर पूछने लगा, “कहिए, क्या बात है ?”

“भैयाजी, आप साइकिल से चलते हैं ये अच्छा नहीं लगता है!”

उनकी बात पर मुझे किंचित् आश्चर्य हुआ । मेरा साइकिल से चलना कोई नई बात नहीं थी । साइकिल की सवारी तो मैं अक्सर करता ही आ रहा था; कभी साइकिल तो कभी स्कूटर । आज क्या कुछ नया घट गया कि उन्होंने मुझे यों टोक दिया ? मैं समझ नहीं पा रहा था । बदले में मैंने पूछा, “साइकिल से तो मैं अक्सर निकलता रहा हूं भाई; आज कौन-सी नई बात हो गयी है कि आपने यह सवाल उठाया ?”

“भैयाजी, यह सवाल तो मेरे मन में कोई नया नहीं है; बस आज पूछ लिया ।”

“लेकिन सवाल आपने पूछा ही क्यों? साइकिल चलाना कोई बुरी बात तो नहीं ।”

“दरअसल साइकिल चलाना आप जैसों को शोभा नहीं देता । आपको तो कार रखनी चाहिए । साइकिल तो हम जैसे लोगों के लिए ही ठीक है । जिसकी अच्छी हैसियत हो उसका साइकिल से चलना शोभा नहीं देता ।”

“लेकिन मुझे तो साइकिल चलाना अच्छा लगता है । इसमें बुराई क्या है?”

“भैयाजी, सवाल इज्जत का भी तो है । कार से चलने वाले की इज्जत बढ़ती है; साइकिल से चलने पर वह इज्जत कहां?”

“कोई बात नहीं । इज्जत कम होगी, लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता ।” ऐसा कहते हुए मैं आगे बढ़ गया । मुझे झूठी प्रतिष्ठा का कोई शौक नहीं यह बात अपने उन ‘भैयाजी’ को नहीं समझा सकता था । मैं यह भी भलीभांति जानता हूं कि समाज में प्रतिष्ठा के अपने मापदंड होते हैं, जो मुझे मान्य नहीं । समाज में संपन्नता के साथ उसका प्रदर्शन भी जरूरी समझा जाता है । मेरी मान्यताएं भिन्न हैं । किंतु अपनी मान्यताओं को लेकर बहस में न पड़ना ही मैंने ठीक समझा । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ

Filed under आपबीती, कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories

3 responses to ““भैयाजी, आप साइकिल से चलते हैं ये अच्छा नहीं लगता है!”

  1. आपकी बात से सहमत!साईकिल तो सबकी सवारी होनी चाहिये।

  2. yahi mansikta pariwahan yojanaon mein bhi dekhi ja sakti hai. cycle walo ki suraksha k liye alag vyavastha honi chahiye, lekin yojana nirdharit karne wale kyonki swayam cycle ka prayog nahi karte isliye upyogita samajhne mein nakaam hain.

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