पैसे की अहमियत – एक आवश्यकता, और उसके आगे एक नशा

मनुष्य के ऐहिक जीवन में धनसंपदा की अहमियत सदा से ही स्वीकारी जाती रही है । जीवन की प्रायः तमाम आवश्यकताओं की पूर्ति उसके माध्यम से ही संभव हो पाती है । आवश्यकताएं क्या होती हैं यह अपने आप में सुपरिभाषित नहीं होती हैं । किसी चीज को एक व्यक्ति आवश्यक कहता है, तो कोई दूसरा उसे अनावश्यक घोषित करता है । मेरी दृष्टि में उसी को आवश्यक माना जा सकता है, जिसकी अहमियत व्यापक स्तर पर समाज में स्वीकारी जाती हो । मैं इस बात को और स्पष्ट करता हूं ।

जब किसी चीज को कुछ गिने-चुने लोग ही हर हाल में पाना चाहें, किंतु अधिकांश जन उसे बेमतलब, फिजूलखर्ची का मामला, या एक शौक कहें तो उसे आवश्यकता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है । भोजन-पानी, लत्ता-कपड़ा आदि जैसी चीजों को हर कोई आवश्यकताओं में शामिल करता है । जो संपन्न हो वह इन चीजों को बेहतर और पर्याप्त मात्रा में भोगेगा; उन पर अधिक खर्च करेगा; और उनकी गुणवत्ता को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ेगा । लेकिन कुछ चीजें हैं जिन्हें अतिसंपन्न लोग भी नहीं चुनेंगे । दृष्टांत के तौर पर मैं दुनिया की सबसे कीमती आवासीय भवन की बात करता हूं, जिसे अपने देश के एक धनाढ्य व्यवसायी ने अभी हाल में बनवाया है । दुनिया में उनकी टक्कर के सैकड़ों अन्य धनिक हैं, किंतु उनमें से किसी ने वैसा भवन बनाने की आवश्यकता शायद नहीं समझी । मैं इसी प्रकार के तार्किक विचार-मंथन द्वारा ‘क्या आवश्यक है’ इसका उत्तर खोजता आया हूं । अपने इसी चिंतन को परिप्रेक्ष में रखकर मैं एक युवक के साथ संपन्न अपनी वार्ता की चर्चा करता हूं ।

एक बार मैं दिल्ली से पुणे तक की रेलयात्रा कर रहा था । घटना तीन-चार साल पहले की होगी । रेलगाड़ी के डिब्बे की खिड़की के पास की शायिका (बर्थ) की एक ओर मेरी सीट थी तो दूसरी ओर एक नवयुवक की । यात्राओं के दौरान मैं अपने साथ सदैव पाठ्य सामग्री लेकर चलता हूं । उस यात्रा में भी दो-एक वैज्ञानिक पत्रिकाएं/पुस्तकें तथा अन्य पठनीय सामग्री मेरे साथ रहीं । इस प्रकार की सामग्री पढ़ते देख उस युवक के मन में मेरे प्रति शायद जिज्ञासा जाग गयी । कुछ समय तक देखते रहने के बाद वह मुझसे बोला, “अंकल, आप कहीं पढ़ाते हैं क्या?”

मेरा खयाल है कि आम तौर पर लोग वैज्ञानिक पत्रिकाएं/पुस्तकें नहीं पढ़ते हैं । कदाचित् विज्ञान के अध्यापक, विशेषतः विश्वविद्यालय स्तर के, ही ऐसी पठनीय सामग्री के साथ समय-यापन करते होंगे । या फिर विज्ञान में विशेष रुचि रखने वाले गिने-चुने लेखक/पत्रकार ऐसी पाठ्य सामग्री पढ़ते होंगे । उस युवक को लगा होगा कि मैं अवश्य ही अध्यापक रहा हूंगा । मैंने उसके प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, “हां, मैं एक अध्यापक हुआ करता था, किंतु अब मैं रिटायर्ड (सेवानिवृत्त) हूं ।”

उसकी जिज्ञासा शांत करने के इरादे से मैंने उसे अपने विषय (भौतिकी) के बारे में बताया और साथ ही अपने उस केंद्रीय विश्वविद्यालय की जानकारी भी दी जहां मैं कार्यरत था ।

“मैंने सुना है कि अब केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिटायरमेंट एज पैंसठ साल है । लेकिन आपकी उम्र अभी इतनी लगती नहीं । क्या मैं जान सकता हूं आपका रिटायरमेंट कब हुआ?”

“मैं रिटायर हुआ नहीं, मैंने रिटायरमेंट ले लिया था, समय से कुछएक वर्ष पहले ही – ‘वॉलेंटरी रिटायरमेंट’ ।” मैंने किंचित् हंसते हुए जवाब दिया, गोया कि सेवानिवृत्ति लेना उतना ही सरल, सहज और सामान्य हो जितना किसी पर्वतीय स्थान पर ग्रीष्मावकाश बिताने के बाद घर लौटना । मैंने उसे अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि भी बता दी ।

“और बेटा, तुम ‘क्यों’ यह भी जानना चाहोगे । सो वह भी बता देता हूं । संक्षेप में यही कह सकता हूं कि मेरा मन हुआ नौकरी-पेशे से मुक्त होकर नये किस्म की जीवनचर्या अपनाऊं । बच्चे व्यवस्थित हो ही चुके । अपने को लगा कि मात्र रोजी के लिए अब नौकरी क्या करनी, जब दैनिक आवश्यकताएं पेंशन से पूरी हो सकती हों ।” मैंने उसे बेटा संबोधित करते हुए जवाब दिया । बेटा-बेटी का संबोधन मैं उन अजनबी युवाओं के लिए भी इस्तेमाल कर लेता हूं, जो मुझे मेरे बच्चों की उम्र के आसपास नजर आते हैं । वे अक्सर ‘अंकल’ कहकर पुकारते हैं । मुझे इस आजतक नहीं ‘अंकल’ के अनुरूप कोई ‘अंग्रेजी संबोधन’ सूझा । ‘बेटा-बेटी’ ही ठीक लगता है, और साथ में तुम कहकर पुकारना भी । मेरे ये संबोधन उन्हें खलते नहीं होंगे यही मानकर चलता हूं ।

“आपका मतलब यह है कि भविष्य में आपकी जो फाइनेंसियल अर्निंग्ज होतीं उनके घाटे को आपने जानबूझकर नजरअंदाज किया । मैं समझता हूं कम ही लोग ऐसे नौकरी छोड़ने की सोचते होंगे ।” उसने मेरी बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

“हां, तुम ठीक कह रहे हो ।” मैंने सहमति जताई और फिर तनिक रुककर उससे पूछा, “और ये बताओ तुम खुद क्या करते हो, और कहां जा रहे हो ।”

“मैं पुणे के सिम्बायोसिस इंस्टिट्यूट से एमबीए का कोर्स कर रहा हूं । तीन-चार दिन की छुट्टी में घर आया था, अब लौट रहा हूं ।” उसका जवाब था ।

“एम-बी-ए!” ‘एमबीए’ के एक-एक अक्षर पर जोर डालते हुए मैंने उसका उच्चारण किया और कहा, “यह कोर्स तो आजकल काफी पॉप्युलर है । सुनते हैं कि टॉप-रैंकिग इंस्टिट्यूट से मैनेजमेंट कोर्स करने पर कइयों को भारी-भरकम पे-पैकेज मिल जाता है ।”

“हां, बहुतों को कैम्पस इंटरव्यू में मोटी तनख्वाह का ऑफर मिल जाता है ।” उत्तर था ।

“अच्छा, एक बात पूछता हूं । शायद तुम्हारे पास जवाब हो । एमबीए या ऐसे ही किसी और प्रोफेशनल कोर्स को लड़के-लड़कियां क्या इसलिए चुनते हैं कि ये कोर्स उनको मोटी तनख्वाह वाली नौकरियां दिला सकते हैं ? या इसलिए चुनते हैं कि उन विषयों में उनकी खास दिलचस्पी होती है ? मैंने यह देखा है कि जो छात्र अन्य विषयों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं वे भी एमबीए में प्रवेश के लिए किस्मत आजमाते हैं । छात्रों को अक्सर पे-पैकेज की चर्चा करते भी देखता हूं ।” अनायास ही अटपटा-सा सवाल मैंने उसके सामने रख दिया ।

पैसा तो मेन कंसिडरेशन (प्रमुख विचार) रहता ही है । पैसे की अहमियत तो सारी दुनिया कबूलती है । जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसा ही तो चाहिए । …”

वह कुछ और भी कहता इससे पहले ही मैं बोल पड़ा, “बस केवल जरूरतें पूरा करने के लिए ? या उसके आगे कुछ और … ?” अपनी बात कैसे रखूं इसे मैं ठीक-से नहीं सोच पा रहा था ।

“आपका मतलब ? … मैं समझा नहीं ।”

“दरअसल मैं कहना चाहता हूं कि मनुष्य की जरूरतें सीमित होती हैं । आदमी बढ़िया खाएगा-पीएगा, बढ़िया पहनेगा-ओढ़ेगा, ऐशोआराम से रहेगा । लेकिन इस सब की भी एक सीमा होती है, उसके आगे नहीं जाया जा सकता । मानता हूं आदमी को धन चाहिए, पर कितना ? और किस कीमत पर ? जिंदगी के दूसरे पहलुओं को नजरअंदाज करते हुए ? अपने चौबीस घंटे का समय गिरवी रखते हुए, ताकि स्वयं तथा दूसरों के लिए भी फुरसत न रहे ? अभी और कमा लूं की भावना ताउम्र पाले हुए ? बस चले तो मरते दम तक धनोपार्जन करते हुए ? मुझे ऐसे भी लोग नजर आते हैं जिनके पास कोई कमी नहीं, फिर भी सही-गलत किसी भी तरीके से अधिकाधिक कमाई कर लेने का जुनून जैसे उनके सिर पर चढ़ा हो ऐसा लगता है । वे कौन-सी जरूरतें हैं जिनके लिए आदमी सब कुछ भुलाकर बस पैसे के पीछे भागता है ? लगता है कि धन-संपदा की उसकी भूख शांत नहीं हो सकती । ऐसा अतिरिक्त धन जिसे आदमी भोग न सके, दूसरे को दे न सके, उसकी क्या अहमियत हो सकती है ? यही न कि आदमी उसे कहीं इंवेस्ट (निवेश) करे । उस इंवेस्टमेंट से मिले रिटर्न (लाभ) का क्या करेगा वह ? उसे भी इंवेस्ट करे । और यह सिलसिला चलता रहे । पैसे को लेकर मेरे मन में ऐसे सवाल उठते रहे हैं । इसीलिए पूछ बैठा । क्या मैं गलत कह रहा हूं ?”

वह कुछ देर तक चुप रहा; फिर बोला, “कह नहीं सकता कि क्या जवाब दूं । … शायद कुछ हद तक आप सही हों ।”

“वर्तमान और भविष्य की संभावित आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर धनोपार्जन की मैं आलोचना नहीं कर रहा हूं । परंतु जब ‘हाय रे पैसा’ की धुन के साथ सब कुछ भुलाकर येनकेन प्रकारेण धनसंग्रह में ही कोई लगा रह जाए तो मैं उसे एक नशा मानता हूं । … खैर, छोड़ो इस बहस को । ऐसे खयाल, जिन्हें लोग बेतुके कहेंगे, मेरे मन में कभी-कभी आ जाते हैं, इसलिए इतना सब कुछ कह गया, जानने के लिए कि तुम क्या सोचते हो । ऐसी बातें में लोगों के सामने अक्सर छेड़ देता हूं उनकी प्रतिक्रियाएं पाने के लिए । माफ करना मैं तुम्हें हतोत्साहित करने के लिए ये बातें नहीं कह रहा । जीवन के लंबे अनुभव से जो समझ में आया वह कह गया । मेरी बातों पर गौर करना जरूर । लेकिन अभी नहीं, पर तब जब जिंदगी के उस रास्ते में कदम रखो जिसकी तैयारी आज कर रहे हो । मैंने कहा और उस बहस को बंद करते हुए बातचीत की दिशा मोड़ दी । – योगेन्द्र जोशी

4 टिप्पणियाँ

Filed under कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories

4 responses to “पैसे की अहमियत – एक आवश्यकता, और उसके आगे एक नशा

  1. मुझे लगता है कि हमारे (मेरे और आपके) बीच सिर्फ उम्र का ही फर्क है.

  2. आपने पोस्ट में शेयरिंग विकल्पों को able नहीं किया है.

  3. सच है नशा है और वो भी लाइलाज… बहुत सार्थक पोस्ट…🙂

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