‘वीजा’ का ‘खेल’ बनाम आस्था का सवाल

‘वीजा (Ouija) खेल’ से कितने लोग परिचित होंगे मैं कह नहीं सकता । इसलिए इसका संक्षिप्त परिचय देना उपयोगी समझता हूं । इस खेल का प्रबंधक, जिसे माध्यम कहा जाता है, प्रेतात्माओं से संपर्क साधने और उनसे समस्याओं के समाधान की जानकारी पाने का दावा करता है । व्यक्तिगत तौर पर मैं इसमें रत्ती भर भी विश्वास नहीं करता, और इसी कारण इसे एक खेल कहता हूं । कुछ लोग इस खेल को प्लांचेट (प्लांशेट, Planchette) रीडिंग के नाम से भी पुकारते हैं ।

इसमें लकड़ी या गत्ते का एक समतल बोर्ड, आम तौर पर गोलाकार, प्रयोग में लिया जाता है, जिसके चारों ओर अक्षर (अंग्रेजी?) एवं अन्य लिपिचिह्न लिखे रहते हैं । बोर्ड पर लकड़ी से बनी एक छोटी तिपाई रखी रहती है । प्रेतात्माओं का आवाहन करने वाला माध्यम दो-तीन अन्य व्यक्तियों के साथ इस त्रिपाई को अपनी-अपनी एक अंगुली से स्पर्श करते हैं । जब माध्यम का प्रेतात्मा से संपर्क स्थापित हो जाता है, तो उससे मनोवांछित प्रश्न पूछा जाता है । उक्त तिपाई बोर्ड पर लिखित अक्षरों पर बारी-बारी से भ्रमण करने लगती है । इन अक्षरों से सार्थक शब्द अथवा वाक्य बनते हैं जिनकी व्याख्या पूछे गए प्रश्न के उत्तर के तौर पर की जाती है । मेरा खयाल है कि प्रेतविद्या में दिलचस्पी रखने वालों ने इसके अपने-अपने संस्करण ईजाद किए हैं । आस्थावानों के अनुसार आहूत प्रेतात्मा तिपाई की गति का कारण होती है ।

इस स्थल पर मैं वीजा के खेल से जुड़े अपने एक अनुभव का ब्योरा पेश कर रहा हूं । घटना बहुत पुरानी है; उसे घटे करीब तीस साल बीत चुके होंगे । मैं सपत्नीक अपने एक रिश्तेदार से मिलने उनके घर गया था । वहां बीसएक वर्षीय उनका युवा भतीजा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ वीजा के खेल में व्यस्त था । घर के सदस्यों की बातों से मुझे प्रतीत हो रहा था कि वे उसकी इस विद्या और उसकी सफलता के कायल थे । उसने वीजा के लिए दफ्ती के बोर्ड और उसके साथ एक उलटी रखी गई छोटी कटोरी का प्रबंध कर रखा था । कुछ देर तक मैं उसके ‘तमाशे’ को देखता रहा । उसका दावा था कि वह ‘लॉर्ड राम’ का आवाहन करता है ।

किंचित् काल देखते रहने के बाद मुझे भी कुछ जिज्ञासा हुई । दरअसल एक सवाल मेरे दिमाग में भी घूम रहा था । उन दिनों टेलीफोन की सुविधा आम आदमी के पहुंच से बाहर थी । गांव-देहात के लोगों से संपर्क का साधन चिट्ठीपत्री ही हुआ करती थी । तब मेरे वृद्ध पिताजी उत्तराखंड (उस समय उत्तर प्रदेश) के पुस्तैनी गांव में रहते थे । एक लंबे अर्से से मुझे उनके कुशल-क्षेम का पत्र नहीं मिला था । मेरे मन में विचार उठा कि देखूं यह युवक क्या जवाब देता है । मैंने पूछा, “प्रेतात्मा से संपर्क साधने के तुम्हारे इस कार्य में कम से कम कितने लोगों की जरूरत पड़ती है ?”

“कम से कम दो जने तो होने ही चाहिए ।” जवाब मिला ।

“केवल तुम और मैं मिलकर प्लांचेट रीडिंग करें तो क्या मेरे सवाल का जवाब मिल सकता है ?”

“हां, बिल्कुल मिलेगा ।”

मैंने उसे अपनी समस्या बताई और हम दोनों जुट गये वांछित कार्य में । विज्ञान (फिजिक्स) का अध्येता होने के कारण मैंने सोचा कि मैं कटोरी को तो छुऊंगा, लेकिन उस पर किसी प्रकार से अपना बल नहीं लगाऊंगा । अपनी एक अंगुली मैंने कटोरी पर ऊपर से नीचे की ओर हलके-से छुआ दी । इसके बाद वह अपने इष्टदेव लॉर्ड राम का आवाहन करने लगा । काफी प्रयास के बावजूद कटोरी बोर्ड पर इधर-उधर नहीं घूम सकी और मुझे मेरे सवाल का जवाब नहीं मिल सका

इस असफलता पर वह युवक काफी व्यथित लग रहा था । संभव कारण क्या हो सकते हैं यह पूछने पर उसने कहा, “मैं यह सवाल लॉर्ड राम से ही पूछ लेता हूं ।”

और उसने मुझे छोड़ वहां मौजूद अन्य जनों के साथ पुनः प्लांशेट रीडिंग का कार्य संपन्न किया । उसे जो उत्तर मिला वह मेरे लिए दिलचस्प था । उसके कथनानुसार लॉर्ड राम ने उसे बताया चूंकि मैं ‘आस्थाहीन’ व्यक्ति हूं, अतः मेरे भाग लेने पर प्लैंशेट रीडिंग से संबंधित आवाहन वे स्वीकार नहीं कर सकते ।

“आपको प्लांचेट रीडिंग में आस्था नहीं है, इसलिए यह सफल नहीं हो सका ।” उसने असफलता का कारण समझाया ।

“हां, बात तो सही है, मुझे इन बातों मैं विश्वास नहीं है । ऐसा कोई अनुभव आज तक हुआ भी नहीं जो विश्वास जगा सके ।” मेरा प्रत्युत्तर था ।

“लेकिन बिना विश्वास के तो यह सफल नहीं हो सकता है ।”

“ठीक है; लेकिन बिना समुचित कारण एवं अनुभव के विश्वास भी तो नहीं जग सकता है न ? विश्वास ऐसी चीज तो है नहीं कि किसी ने कहा हम मान गये । कम से कम मेरे जैसे वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति के लिए ऐसी बातें आसानी से स्वीकार कर पाना संभव नहीं । दरअसल यह पूरा मामला ‘पहले अंडा कि पहले मुर्गी’ का है । ठीक ?”

और बात वहीं खत्म हो गयी । अधिक बहस की मुझे गुंजाइस लगी भी नहीं । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, experience, Hindi literature, Short Stories

One response to “‘वीजा’ का ‘खेल’ बनाम आस्था का सवाल

  1. ओह हमने तो इसके बारे में पहली बार सुना है ।

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