शिक्षक ने छात्र के सही उत्तर काट दिये

घटना बहुत पुरानी है । ठीक-ठीक याद नहीं कि वह घटना कब घटी होगी । शायद तब से पच्चीस-छब्बीस साल बीत चुके होंगे । उस घटना के शिक्षक-पात्र तो वर्षों पहले सेवानिवृत्त हो चुके । विश्वविद्यालय छोड़े स्वयं मुझे सात-आठ साल हो चुके हैं । हां, तो वाकया क्या था वह बताता हूं ।

मैं अपने विश्वविद्यालय की विज्ञान स्नातक यानी बी.एससी. कक्षा के किसी प्रश्नपत्र का परीक्षक था । परीक्षा के दूसरे-तीसरे दिन संबंधित उत्तरपुस्तिकाएं मेरे पास पहुंच गयीं । और लगभग तभी मुझे मेरे विभागाध्यक्ष महोदय का भी संदेश मिला कि मैं यथाशीघ्र उनसे मिल लूं । अगले दिन सर्वप्रथम मैं उनसे मिलने कार्यालय चला गया । उन्होंने जो बातें बताईं वे मेरे लिए अचंभित करने वाली एवं अकल्पनीय थीं । उन्होंने कहा, “याद है उस दिन तुम्हारे तैयार किए गए प्रश्नपत्र की परीक्षा थी ?”

“हां, याद तो है । उसकी कापियां भी मुझे मिल चुकी हैं । बताइए बात क्या है ?” मैंने जानना चाहा ।

विभाग के एक वरिष्ठ अध्यापक और उस परीक्षा के प्रधान कक्षनिरीक्षक (इंविजिलेटर) का हवाला देते हुए वे बोले, “सीएमपी साहब ने मुझे बताया कि उस दिन कुछ अप्रत्याशित घटा था । हुआ यह कि बीएनडी महोदय ने अपनी पंक्ति के परीक्षार्थियों की कापियां इकट्ठी कीं और उन्हें लेकर परीक्षा हॉल के एक कोने पर चले गये । (सीएमपी, बीएनडी शिक्षकद्वय के अंग्रेजी में संक्षिप्त नाम हैं । बीएनडी उस दिन कक्षनिरीक्षण के कार्य में शामिल थे ।) सीएमपी साहब को ऐसा लगा कि उस कोने पर उन्होंने आंसरबुक्स (उत्तरपुस्तिकाओं) में से एक को चुना और उसके उत्तरों को पेन से काट दिया । वे इस बारे में अपनी शंका व्यक्त कर रहे थे । इसलिए मैं चाहता हूं कि गौर से देख लेना कि कहीं ऐसी आंसरबुक वास्तव में है । यदि है तो मुझे बताना । देखेंगे आगे क्या करना है ।”

यहां पर यह बता दूं कि स्नातक की परीक्षा एक बड़े-से हॉल में हुआ करती थी (अभी भी होती होगी), जिसकी अलग-अलग कतारों के निरीक्षण की जिम्मेदारी अलग-अलग शिक्षकों को सौंपी जाती थी ।

सायंकाल घर पहुंचने पर विभागाध्यक्ष की सलाह के मद्देनजर मैंने उत्तरपुस्तिकाओं की जांच की, और ऊपर व्यक्त शंका के अनुरूप एक पुस्तिका मुझे मिल भी गयी, जिसके भीतर लिखित सभी प्रश्नोत्तर ऊपर से नीचे तिरछे कटे हुए था । सरसरी निगाह डालने पर लगा कि उत्तर कमोबेश ठीक हैं । उस क्षण मेरे मन में सवाल उठेः क्या उस परीक्षार्थी ने अपने हाथ से उत्तर काटे होंगे ? वह वैसा भला क्यों करेगा ? क्या बीएनडी महोदय ने ही कुछ गड़बड़ किया होगा ? मुझे लगा कि दाल में जरूर कुछ काला है ।

मैंने जब विभागाध्यक्ष को उस उत्तरपुस्तिका के बारे में बताया तो मुझे हिदायत दी गयी कि प्रश्नोत्तरों को ठीक-से जांचते हुए अंक दे दूं । विश्वविद्यालय परीक्षानियंता को भी जानकारी दे दी गयी । लेकिन होना क्या था ? अपने समाज में दोषियों को सांकेतिक दंड भी आम तौर पर नहीं दिया जाता है । संबंधित अध्यापक को चेतावनी दी गई कि नहीं यह मुझे पता नहीं चला । अलबत्ता उस छात्र को समुचित अंक मिल गये और उसके पाठ्यक्रम का वह वर्ष बरबाद होने से बच गया ।

मेरे उन पूर्व सहकर्मी ने वह निंद्य कार्य क्यों किया होगा मैं ठीक-ठीक बता नहीं सकता । हो सकता है उनके एवं छात्र के बीच कभी ऐसा कुछ घटा होगा जिससे वे खुंदक खाए बैठे हों और इस घटिया तरीके से उन्होंने सबक सिखाने की ठानी हो ।

अध्यापनकाल के अपने अनुभवों के आधार पर इतना जरूर कहूंगा कि अन्य क्षेत्रों की भांति इस क्षेत्र में भी सभी प्रकार के लोग देखने को मिल जाते हैं, सुबुद्धि वाले भी और कुबुद्धि वाले भी । – योगेन्द्र जोशी

5 टिप्पणियाँ

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5 responses to “शिक्षक ने छात्र के सही उत्तर काट दिये

  1. कोई व्यक्तिगत चिढ़ रही होगी… और क्या हो सकता है..

  2. Violence is part of human nature. Some people show dominance by such violence. No reason is needed for violence. Just provocation, howsoever slight, is enough.

  3. पर इससे छात्र का भविष्य तो बर्बाद हो सकता था ।

  4. manyavar, main kacha 8 ka vidhyarthi tha, padhne may acha nahi bus majboori may jana parta tha vidhyalaya, main us samay 8 wi may hi school cricket captain ban gaya tha,jisse meri achi rasukh thi,
    ganit ke sikchak ne mujhe 9 wi ke kareeb 15,16(yad nahi) uttar patra pakra diye, main 8wi ka tha, sikchak ne kaha beta uttar dusre pristha may hai, milan kar ke ank de do…..!
    maine sare uttar patra pe uchit ank (apne sujhbujh anusar) diye….
    ab aap hi bataye hamre sikcha ka star kaese upar uthega, pata nahi mere jaese kitne bachho ne uttar pustak pe galat/sahi ank diye ho aur chatro ka bhawisya andhkar may banaane may yogdan diya ho
    yaha apke post pe ye badmashi thi, par waha us samay wo aadat

    dhanyawad

    (प्रत्युत्तर में)
    विशालश्रेष्ठजी, टिप्पणी एवं अपने अनुभव को साझा करने के लिए धन्यवाद। शिक्षा का स्तर कैसे उठे यह सवाल आपने उठाया है। मैं तो यह पूछता हूं कि स्तर उठाना कौन चाहता है? इस तथ्य पर विचार करें कि समाज में दो प्रकार के लोग होते हैं: पहले वे जो चाहते हैं कि पूरा समाज ऊपर उठे, हर प्रकार से, खासकर शिक्षा के क्षेत्र में और आर्थिक संपन्नता में। इस सोच में राष्ट्र के प्रति कर्तव्यभाव निहित रहता है। और दूसरे वे जो नहीं चाहते हैं और ऐसा करके वे दूसरॊं को पिछड़ा देख प्रसन्न होते हैं। इस सोच में अपना वर्चस्व बनाये रखने, अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बनाये रखने, अर्थतः सुरक्षित अनुभव करने, केवल स्वार्थसिद्धि में लिप्त रहने का भाव या ध्येय रहता है। समाज में दोनों प्रकार के लोग होते हैं, किंतु भारतीय समाज में दूसरे प्रकार के लोगों के संख्या अत्यधिक है। इन लोगों में थोड़ी भी शर्मोहया होती, थोड़ा भी देशप्रेम होता तो अपने कर्तव्यों के प्रति इतने लापरवाह न होते। मैं नही समझता कि सुधार की कोई उम्मीद है। शुभकामना।

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