“अरे भई, ये खीरे क्या हिसाब दिये?”

प्रातःकाल का समय है । मैं झोले साथ लेकर घर के पास की संब्जीमंडी के लिए निकल पड़ता हूं । पिछले पंद्रह-बीस साल से हर दूसरे-तीसरे दिन दो-एक रोज के लिए सब्जियां एवं फल लाने का काम मैं निभाता आ रहा हूं । मेरे कुछेक चुने हुए सब्जी एवं फल वाले हैं, जिनसे मैं लगभग सदैव ये चीजें खरीदता हूं । उन लोगों के साथ मेरा विक्रेता-ग्राहक का एक संबंध स्थापित हो चुका है । उन्हें मालूम है कि मैं मोलभाव नहीं करूंगा, लेकिन छांटकर सामान खरीदूंगा । वे कभी-कभी खुद ही बोल देते हैं, “बाबूजी, फलां चीज आज आपके लायक नहीं है ।”

मैं इस भरोसे के साथ चलता हूं कि वे मुझसे ‘वाजिब’ दाम लेंगे । मुझे शायद ही कभी उनसे शिकायत रही हो ।

मैं ‘अपनी’ एक दुकान पर पहुंचता हूं । दुकान पर तीस-पैंतीस वर्ष की महिला सब्जी बेच रही है । दुकान पर कभी वह तो कभी उसका छोटा भाई बैठता है । पहले मैं कुछ खीरे खरीदता हूं और फिर एक तरफ लगी ढेरी में से अरवी (घुइयां) छांटने लगता हूं । तभी मुझे अपनी बगल से एक आवाज सुनाई देती है, “अरे भई, ये खीरे क्या हिसाब दिये?”

मुझे अहसास हो चुका है कि मेरे बगल में कोई खड़ा है और वह खीरों के दाम पूछ रहा है । सब्जी वाली के प्रत्युत्तर में बोले गए शब्द भी मेरे कान में पहुंचते हैं, “चालीस रुपये किलो ।”

मैं चौंकता हूं, ‘चालीस रुपये ?’ । वह व्यक्ति दाम सुनकर आगे बढ़ जाता है । मुझे खीरे का विक्रय दर मालूम है । सब्जी वाली पहले ही उसके बारे में बता चुकी है, शायद अपेक्षया महंगे होने के कारण । मैं उसकी ओर मुखातिब होकर पूछता हूं, “अभी तो तुमने मुझे बत्तीस रुपये बताया; फिर उससे चालीस क्यों कहा ?”

“तुम्हें कैसे मालूम कि उन्हें खरीदना नहीं है ?”

“आपने देखा नहीं होगा कि वे बगल की दुकान पर दाम पूछकर यहां पहुंचे । खरीदना होता तो वहीं न खरीद लेते ?”

“क्यों ?” मैं जिज्ञासा जाहिर करता हूं और पूछता हूं,“वहां क्या हिसाब बिक रहा है ?”

“बत्तीस रुपये !” वह क्षण भर रुककर बोलती है, “बाबूजी, यहां सभी ग्राहक आप लोगों की तरह नहीं आते कि न दाम पूछा और न मोलभाव किया; बस सामान खरीदा और चल दिये । कुछ हैं जो दाम पूछेंगे, मोलभाव करेंगे, हमारा समय खाएंगे, पर खरीदेंगे कुछ नहीं । हम च्हीनते (पहचानते) हैं न । उन्हें ऐसे ही टाल देते हैं ।”

मुझे लगता है कि उसके तर्क में दम है । खरीददारी के समय मोलभाव करना कोई नयी बात नहीं है । लेकिन सागसब्जी जैसी रोजमर्रा की चीजों, जिन्हें घूमफिर कर उन्हीं दुकानों से लगभग रोज ही खरीदना होता है, के मामले में मोलभाव की जरूरत मैं नहीं समझ पाता । हो सकता है कुछ लोग आदतन ऐसा करते हों । – योगेन्द्र जोशी

4 टिप्पणियाँ

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4 responses to ““अरे भई, ये खीरे क्या हिसाब दिये?”

  1. अब इतनी महँगाई हो चली है, तो आदमी मोलभाव तो करेगा ही, अब कुछ सठिया ही जायें तो क्या कहें ।

  2. खरीदारी के मामले में अपन भी काफी हद तक आप जैसे हैं, मोल भाव करना नहीं आता| गिनी चुनी दुकानों पर जाते हैं, चीज अच्छी मिलनी चाहिए वो दुकानदार की जिम्मेदारी| जिस दिन लगा कि ठगे जा रहे हैं, शिकायत कोई नहीं दूकान बदल लेते हैं बस|

  3. anupkidak

    दुकानदार भी समझदार होते हैं। ग्राहक देखकर बात करते हैं।

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