आरोपियों को खोजने के लिए पुलिस के पास तरह-तरह के चश्में होते हैं !!

आजकल टीवी चैनलों पर एक समाचार चर्चा में है । हरियाणा राज्य के एक मंत्री (अब पूर्वमंत्री) पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने एक युवती, जो उनकी विमानन कंपनी की कर्मचारी हुआ करती थी, को आत्महत्या के लिए विवश किया था । तीन दिनों की निष्क्रियता के बाद दिल्ली पुलिस ने उनको हिरासत में लेने के प्रयास आरंभ किए । बारह दिन बीत गये, किंतु पुलिस उनका पता नहीं लगा सकी । अब ‘माननीय’ जनप्रतिनिधि ने खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया है । आरंभ के तीन दिन तक दिल्ली पुलिस ने उनको पकड़ा क्यों नहीं ? क्या उसके प्रयास अभी तक महज दिखावा थे ? ये प्रश्न सहज रूप से मन मैं उठ सकते हैं । इस वाकये को सुनकर मुझे पैंतीस-चालीस साल पहले की एक घटना का स्मरण हो आता है ।

बात तब की है जब पिछली शताब्दि के आठवें दशक के मध्य में (1975 के आसपास) लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आंदोलन चला था और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपात्काल घोषित कर दिया था । तब अनेकों विरोधी राजनेताओं एवं सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ हुई थी और उन्हें जेल में ठूंस दिया गया था । कई जन बचते-बचाते भूमिगत हो गये, जिनमें से एक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैय्या भी थे, जो उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी थे ।

संक्षेप में बताता चलूं कि रज्जू भैय्या (अविवाहित) इलाहाबाद विश्वविद्यालय के फिजिक्स (भौतिकी) विभाग में अध्यापक हुआ करते थे । सन् 1966 के अंत (या 1967 के आरंभ) में सेवानिवृत्ति लेकर वे रा.स्व.से.संघ के पूर्णकालिक पदाधिकारी हो गये । उन दिनों मैं एम.एससी. प्रीवियस (पूर्वार्ध) में पढ़ता था । आरंभिक कुछ महीने उन्होंने हम छात्रों को भी पढ़ाया था, इसलिए उनका अल्पकालिक सान्निध्य हम लोगों को भी मिला था । आपात्काल के दौरान वे कैसे भूमिगत हुए थे इसका विवरण संध से संबद्ध मेरे एक मित्र ने मुझे कालांतर में बताया था । उसी का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं ।

अपने अध्यापन-काल में रज्जू भैय्या ने बहुत से छात्रों को पढ़ाया था । उनमें से अनेकों आइ.ए.एस., आइ.पी.एस. स्तर के अधिकारी बनकर प्रशासनिक तंत्र में शामिल हो चुके थे । वे सभी रज्जू भैय्या का सम्मान करते थे । आपात्काल के दौरान जब रज्जू भैय्या भी उस जमात में सम्मिलित थे जो ‘इंदिरा-राज’ की खिलाफत कर रहा था, तो उनको भी सलाखों के पीछे भेजने की कोशिश होने लगी । पुलिस को अपना फर्ज निभाना था । परंतु उसी पुलिस बल में एक उच्च अधिकारी भी थे जो उनको बचाना चाहते थे, एक पूर्व-छात्र होने के नाते । वे उन्हें चुपचाप अपने आवास पर लिवा लाये, ताकि वे वहां सुरक्षित रह सकें । जो पुलिस बल रसूखदार नागरिकों के घर खंगालने की हिम्मत नहीं करती वह भला अपने ही उच्च अधिकारी के यहां छापा कैसे मार सकती है ? लिहाजा रज्जू भैय्या ने आपात्काल के दिन चैन से वहां बिताए ।

मेरे मित्र के द्वारा बताए गए इस वाकये में कितनी सत्यता है इस बारे में मैं दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता । वे संघ के कार्यकर्ता थे और उन्हें वहां की जानकारी रहा करती थी । उनके कहे शब्दों में विश्वास करने का यही मेरा कारण है । ऐसी घटनाएं अक्सर सुनने में आ जाती हैं जिनमें रसूखदार व्यक्ति पुलिस की पकड़ से बचा रहता है । क्या वे पकड़े ही नहीं जा सकते हैं, या जानबूझकर उन्हें पकड़ा नहीं जाता है, यह कहते हुए कि उनका पता नहीं चल पा रहा है ?

पुलिस की कार्यप्रणाली देख मुझे यही लगता है कि आरोपियों को खोजने के लिए पुलिस के पास तरह-तरह के चश्में रहा करते हैं । एक चश्मा ऐसा होता है जिसे पहन लेने पर निरपराध भी अपराधी नजर आने लगता है, और ऐसा ‘अपराधी’ जेल की हवा खाने को मजबूर हो जाता है । दूसरी तरफ ऐसा चश्मा भी होता है जिसे पहनने पर सभी नजर आते हैं, सामने खड़े आरोपी को छोड़कर । कुछ चश्मों से बहुत धुंधला दिखता है तो किसी से बहुत देर बाद । पुलिस मौके की नजाकत के हिसाब से ‘सही’ चश्मा पहनने की आदी होती है ।

तरह-तरह के चश्में पुलिस बल के !! – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ

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3 responses to “आरोपियों को खोजने के लिए पुलिस के पास तरह-तरह के चश्में होते हैं !!

  1. Mahendra gupta

    Kanda ke sath bhi kuch aisa sa hi hua hoga.Uski kendra aur rajya ki rajniti men achhi panuch rahi hae,jab sab kuch saboot mita diye gaye,ya kamjor kar diye gaye,phir uska surrendor kara diya gaya.

  2. अखबारों के माध्यम से ऐसा ही एक किस्सा मेरी आंखों के सामने गुजरा था, शायद औरों ने भी गौर किया हो| कल्याण सिंह जब उ.प्र. के मुख्यमंत्री बने तो ऐसी चर्चा थी कि उ.प्र. के एक मोस्ट वांटेड ‘श्रीप्रकाश शुक्ला’ को उनकी ह्त्या की सुपारी दी गई है| अखबार में कल्याण सिंह का इस बारे में इंटरव्यू भी छपा था जिसमें उन्होंने जाको राखे राम, मार सके न कोय का उद्घोष किया था| शायद अगले ही दिन वो मोस्ट वांटेड जो कई साल से पुलिस की गिरफ्त से बाहर था, एक एनकाऊंटर में मरा गया| आपके शब्दों में कहा जाए तो मुख्यमंत्री के हिटलिस्ट में आते ही पुलिस का धुंधला वाला चश्मा बदल गया और साफ़ दिखने वाला चश्मा आ गया होगा|

  3. शिवेंद्र मोहन सिंह

    बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप,


    सादर,

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