मुफ्त में कुछ बांटने वाला भी अप्रत्याशित कभी मिल जाता है

मुझे आज तक राह चलते कोई ऐसा आदमी नहीं मिला है जो पास आकर कहे, “लीजिए, मैं आपको मुफ्त में अमुक चीज दे रहा हूं ।” लेकिन ऐसा हमारे साथ हुआ, और वह भी सड़क या चौराहे पर नहीं, बरन हमारे घर के गेट पर । बात कल ही की है ।

हमारे  गेट पर घंटी बजी । आवाज सुनकर मेरी अर्धांगिनी जी ने खिड़की से बाहर झांका और देखा कि गेट के बाहर कोई खड़ा है । हम लोग आम तौर पर खिड़की से झांककर आगंतुक को देख लेते हैं, और कौन है तथा क्या काम है जैसे सवाल भी पूछ लेते हैं । पूछे जाने पर उसने बताया कि वह किसी कंपनी की ओर से विज्ञापित करने हेतु उपभोक्ता सामग्री दिखाने के लिए आया है ।

आगंतुक के आग्रह पर पत्नी महोदया बाहर गई और उससे बात करने लगीं । इसी बीच मैं भी वहां पहुंच गया । उस व्यक्ति ने अपने झोले से एक पैकेट निकाला और उसमें रखी ‘नॉनस्टिकिंग’ कड़ाही (पैन) हम लोगों के हाथ में सोंपते हुए बोला, “कंपनी अपने इस उत्पाद को विज्ञापित करना चाहती है, इसीलिए मैं आपके मोहल्ले में घर-घर संपर्क कर रहा हूं ।”

उसने उस कड़ाही का बाजार भाव भी हमको बताया । पत्नी ने कहा, “लेकिन हमें तो इसकी जरूरत नहीं हैं, क्या करेंगे लेकर ? घर में इस सरीखे बर्तन तो पड़े ही हैं ।”

“अरे आप रख लीजिए न, कंपनी अपना उत्पाद प्रसारित करना चाहती है ।”

अभी तक हम समझ नहीं पाए थे वह व्यक्ति मुफ्त में ही कड़ाही देना चाहता है । हमने उसे न खरीदने का अपना इरादा स्पष्ट करते हुए कहा, “क्या करेंगे इसे खरीदकर जब इस्तेमाल ही नहीं कर सकेंगे ? दो जने हम, भला हमारी जरूरतें ही कितनी हैं ?”

“रख लीजिए न, इसकी कोई कीमत थोड़े ही मैं मांग रहा हूं । कंपनी फ्री में दे रही है ।”

“फ्री में ? ताज्जुब है, कंपनी भला क्योंकर फ्री में देने लगी ? और फिर हम ही को मुफ्त के लिए क्यों चुना उसने ?”

“कंपनी आपसे उम्मीद करती है कि आप अपने पड़ोसियों, दोस्तों और मेहमानों को इसके बारे में बताएंगे । इससे कंपनी के उत्पाद का प्रचार होगा ।”

हमें ही आपने क्यों चुना इस सवाल का संतोषप्रद उत्तर वह दरअसल नहीं दे सका । हम भी समझ नहीं पा रहा थे कि 100-150 रुपये के लायक वह बर्तन मुफ्त में क्यों बांटा जा रहा होगा । हमारा मन उसे स्वीकारने का नहीं हो रहा था । अतः हमने कहा, “अड़ोस-पड़ोस में किसी जरूरतमंद को दे दीजिए जो इसे काम में ले सके ।”

“आप ही रख लीजिए न, इसके कौन-से दाम देने पड़ रहे हैं ।”

“नहीं भई, हमारा मन इसे मुफ्त लेने का नहीं है । इसलिए नहीं ले सकते ।”

वह प्रश्न भरी निगाह से हमारी ओर देखने लगा । शायद सोच रहा हो, “कैसे आदमी हैं ये लोग ? फ्री में इन्हें दे रहा हूं, फिर भी लेने को तैयार नहीं ।”

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद अच्छा कहते हुए वह गेट से बाहर चला गया । घर में दाखिल होते हुए पत्नी बोलीं, “समझ में नहीं आया मामला । मैं कड़ाही ले लूं इस बात पर वह न जाने इतना जोर क्यों डाल रहा था ?”

हम दोनों के पास प्रश्न का उत्तर नही था । – योगेन्द्र जोशी

6 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, किस्सा, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories

6 responses to “मुफ्त में कुछ बांटने वाला भी अप्रत्याशित कभी मिल जाता है

  1. कुछ दिन में वह आयेगा, लेकर बर्तन ख़ास |
    लेगा रूपये पांच सौ, एहसान-ए-अहसास |
    एहसान-ए-अहसास, ख़ुशी से आप दीजिये |
    एक लाटरी टिकट, रसीदें साथ लीजिये |
    चीजे मिलती मुफ्त, समस्या भी लाती हैं |
    बेंचेगा सामान, कम्पनी सिखलाती है ||

  2. शिवेंद्र मोहन सिंह

    वर्तमान के वातावरण के आधार पर वो आपको कड़ाही लेने के लिए बोल रहा होगा साहब, जमाना ही है “माले मुफ्त दिले बेरहम” .

  3. anshumala

    इसमे कुछ भी खास नहीं है कंपनिया अपने उत्पाद के लिए ये करती ही है महंगे क्रीम साबुन डिटर्जेंट पाउडर ना जाने कितनी ही चीजे बाजार में उतारने से पहले लोगो को दी जाती है और कहा जाता है समाप्त होने से पहले नमूना पास रखे , जो वो आ कर ले जाते है और आप से उत्पाद के बारे में राय जानते है ताकि कोई चीज ग्राहकों को ना पसंद आये तो वो उसमे बदलाव कर सके , ये काम कई बार कंपनिया खुद नहीं करती किस और मार्केटिंग और रिसर्च करने वाली कंपनियों को देती है साथ में उत्पाद जैसा है उसी तरह के इमारतों शहरों और मोहल्लो का चयन किया जाता है |

  4. देने वाला लड़का रहा होगा . कंपनी गर्ल भेजती तो आप दोनों उसे नाश्ता पानी भी कराते और कडाही के साथ चम्मच भी क्रय करते.

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