समझ से परे अंकगणित

          मैं अपने छात्र-जीवन के एक अनुभव की चर्चा यहां पर करने जा रहा हूं । किंतु उसके पहले कुछ मननीय बिंदुओं की ओर पाठक का ध्यान खींचना समीचान समझता हूं । मेरे मन में अक्सर एक सवाल उठता हैः क्या प्रकृति ने सभी मनुष्यों को कमोवेश समान दिमागी क्षमता दे रखी है? ये सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि आजकल प्रायः सभी अभिभावकवृंद अपने पाल्यों को डाक्टरी, इंजिनियरिंग जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की ओर धकेलते हुए देखे जाते हैं, बिना इस पर ध्यान दिये हुए कि उन बच्चों की क्षमताएं इच्छित विषयों के अनुरूप नहीं हैं ।

अपने देश के एक प्रख्यात विश्वविद्याल में अध्यापन के दौरान मैंने छात्रों की शैक्षिक क्षमताओं में उल्लेखनीय अंतर देखा है । मेरी संस्था में देश के विविध हिस्सों से छात्र अध्ययन हेतु आते रहे हैं, और राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा परीक्षा उत्तीर्ण करके आने वाले उन छात्रों का स्तर औसत से बेहतर होने की आशा की जाती रही है । भौतिकी (फिजिक्स) मेरा विषय रहा है, और छात्र जीवन में गणित एवं भौतिकी मेरे लिए सरलतम विषय रहे हैं । मुझे यह समझ नहीं आता था कि ऐसे सरल विषयों को भी लोग दुरूह क्यों समझते हैं । अधिकतर छात्र इन विषयों से डरे-सहमे-से देखने-सुनने को मिलते हैं । जैसे-जैसे मेरा शैक्षणिक अनुभव बढ़ता गया, मुझे कप्यूटर विज्ञान का अध्ययन-अध्यापन करने का अवसर मिला, और कंप्यूटरों की कार्यप्रणाली को ध्यान में रखते हुए ‘न्यूरोसाइंस’ समझने की विश्व-वैज्ञानिकों के प्रयासों से अवगत होने लगा, मुझे विश्वास होने लगा कि लोगों के मस्तिष्क की क्षमता में परस्पर बहुत अंतर हो सकता है । हमारा मस्तिष्क गर्भावस्था से लगभग निरंतर विकसित होता रहता है । व्यक्ति की स्वयं की जैविक संरचना, उसको उपलब्ध भोजन की पोषकता, उसके परिवेश, औपचारिक/अनौपचारिक दिमागी प्रशिक्षण आदि का विकास की उक्त प्रक्रिया में कितना-कितना योगदान रहता है यह मैं नहीं जानता । इतना अवश्य मानता हूं कि इन सबका बहुत महत्व है ।

          मैं अपने छात्र जीवन के एक वाकये का जिक्र करता हूं । उन दिनों मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर (एम.एससी.) कक्षा में पढ़ता था, और वहां के ए.जे. (म्युअर) छात्रावास में रहता था । तब विश्वविद्यालय के किसी भी छात्रावास में सभी विषयों के छात्र रहते थे, यानी छात्रावास विषयवार बंटे हुए नहीं थे । छात्रावास में चूंकि छात्रों की संख्या सौ-सवासौ से अधिक नहीं थी, अतः सभी परस्पर एक-दूसरे को जानते थे । किसी के साथ निकटता का अधिक या कम होना स्वाभाविक था ।

हम लोगों के साथ एक छात्र एलएल.बी. में पढ़ता था । एक दिन विज्ञान विषय से संबंद्ध अन्य दो-तीन छात्रों के साथ मैं गपशप में मशगूल था । कुछ देर में वह भी हम लोगों में शरीक हो गया । गपशप का विषय क्या रहा होगा यह तो मैं अब बता नहीं सकता, किंतु इतना याद है कि बातचीत के दौरान उसने अपनी एक समस्या हमारे सामने रख दी । उसने कहा, “अरे यार, तुम लोग तो मैथ्स (गणित) पढ़ते आए हो । पढ़ने को तो हाईस्कूल तक मैंने भी पढ़ी है, लेकिन मैं आजतक गुणा-भाग, एच.सी.एफ-एल.सी.एम. जैसी चीजें बिल्कुल समझ नहीं सका हूं । …”

          हममें से किसी ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, “वाह, ग्रैजुएशन करके एलएल.बी. तक पहुंच गये और कहते हो बिल्कुल समझ में नहीं आता । हम नहीं मानते । …”

          “बस रटे-रटाये तरीके से सब कुछ करते आया हूं, और इम्तिहान भी पास करते रहा हूं । पर सच बताऊं तो यही कहूंगा कि मैथ्स समझ में आती नहीं । मैं किसी को खुद नहीं बता सकता क्यों और कैसे कोई चीज कैल्क्युलेट की जाती है । एच.सी.एफ. कैल्क्युलेट भले कर लूं, लेकिन बता नहीं सकता कि क्यों ऐसे या वैसे कैल्क्युलेट किया जाता है । …”

          मैं उसकी बात समझ रहा था । समझने से उसका तात्पर्य वाकई गंभीर था । मेरी समझ में उसकी दशा कुछ वैसे ही थी जैसे एक आम स्कूटर चलाने वाले की होती है जो स्कूटर चलाना तो बता सकता है, परंतु यह नहीं समझा सकता कि स्कूटर का टू-स्ट्रोक ‘इंटरनल कंबस्चन’इंजन कार्य कैसे करता है, या यह कि क्लच प्लेट्स अपनी भूमिका कैसे निभाते हैं, इत्यादि । मेरी दृष्टि में समझने का मतलब विषय को आत्मसात् करना होता है ।

          उस समय तो बात आई-गई हो गयी । मुझे मालूम नहीं कि किसी ने बाद में उसकी ‘समझ’ बढ़ाने का प्रयास किया या नहीं । बस यह याद रह गया कि गणित की सही समझ हर किसी को हो यह जरूरी है । अध्यापन के अपने व्यावसायिक जीवन में मैंने इस तथ्य को अधिक गहराई से अनुभव किया है ।

          दरअसल मनुष्यों की बौद्धिक क्षमता में बहुत फर्क देखने को मिलता है । मानव समाज में एक ओर कुशाग्रबुद्धि के गिने-चुने लोग होते हैं तो दूसरी ओर मंदबुद्धि के लोग भी मिल जाते हैं । इतना ही नहीं, कोई एक विधा में पारंगत होता है तो कोई दूसरा किसी अन्य विधा में । बिरले ही होते हैं जो कई विधाओं में महारत रखते हों । यह आवश्यक नहीं कि जो गणित के जटिल प्रश्न हल कर सकता हो वह अच्छाखासा उपन्यास भी लिख ले, या बढ़िया पेंटिग भी बना ले । कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे साथ के उस छात्र का मस्तिष्क गणित के अनुरूप नही ढला होगा जिसके कारण उसे गणित समझने में दिक्कत रहती होगी । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories

2 responses to “समझ से परे अंकगणित

  1. काफ़ी दिन बाद आपका लेख आया। पढ़ा , अच्छा लगा!

  2. पिंगबैक: समझ से परे अंकगणित: हिन्दुस्तान में 'जिंदगी बस यही है' - Blogs In Media

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