सौ मीटर दूर चलना भी गवारा नहीं

          आज के औद्योगिक युग में मनुष्य बेहद आराम-तलब हो चुका है । मुझे लगता है कि कभी-कभी यह आराम-तलबी हास्यास्पद सीमा पार कर जाती है । चंद रोज पहले एक दिलचस्प और अपने किस्म का वाकया मेरे अनुभव में आया – दिलचस्प मेरी नजर में । हो सकता है लोग ऐसा न मानें ।

          इससे पहले कि वाकये का ब्योरा पेश करूं, मैं बताना चाहूंगा कि मेरे शहर बनारस (वाराणसी) की जो भी तारीफें आपने सुनी हों वे किस हद तक सही होंगी इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता; बस, मेरी अपनी नजर में यह शहर दुर्व्यव्यवस्था के मामले मैं अद्वितीय है । इस शहर में कौन-सी सड़क ठीक-ठाक हालत में है इसे आपको खोजना पड़ेगा । कोई भी सड़क बनने के बाद पहली बरसात झेल जाए तो आश्चर्य होता है । सड़कों पर वाहनों के बेतरतीब आवागमन को देख आपके मन में सहज शंका उठेगी कि यहां यातायात के कोई नियम हैं भी कि नहीं । पुराना शहर होने के कारण सड़कें सब जगह इतनी चौड़ी नहीं हैं कि निरंतर बढ़ते निजी मोटर-वाहनों का बोझ झेल सकें । परिणाम साफ जाहिर है, ट्रैफिक जाम । और कोढ़ में खाज की नौबत आ जाती है जब इन सड़कों पर पाइप-लाइनें बिझाने के लिए खोदाई होने लगती है, जैसा कि आजकल चल रहा है ।

          ‘लंका’ इस शहर के प्रमुख स्थानों में से एक है, जहां बी.एच.यू. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) का प्रवेश द्वार है और उसके परिसर में अवस्थित चिकित्सा संस्थान के अस्पताल पहुंचने का मार्ग है । इसके आसपास रिहायशी मकान और बहुमंजिली इमारतें हैं, तथा स्थानीय लोगों की जरूरतों की पूर्ति करने वाला बाजार है । शहर के अन्य स्थानों के लिए पैडल-रिक्शे, आटोरिक्शे जैसे साधन भी यहां पर रात-दिन मिलते हैं ।

          वाकत तब का है जब एक दिन मुझे अपनी धर्मपत्नी जी के साथ कार्यवशात् यहां आना पड़ा था । हम घर के पास स्थित सुंदरपुर चौराहे से सवारी आधार पर चलने वाले आटोरिक्शा से लंका के लिए चल दिये । बताता चलूं कि वाराणसी में आटोरिक्शे पांच सवारियां बिठाकर चलते हैं । लंका के निकट पहुंचने पर देखने को मिला कि वहां तो जाम लगा है । हमारे आटोरिक्शे को गंतव्य स्थल, चौराहे, पर पहुंचने के लिए अभी कोई डेड़ सौ या उससे भी कम दूरी तय करनी थी, लेकिन उस जाम को देखते हुए उसने वाहन रोक दिया और सामने के वाहनों के आगे बढ़ने का इंतजार करने लगा । हमने देख रहे थे कि दूर तक खड़े वाहनों में कोई गति नहीं है । स्थिति खराब देख मैंने अपनी सहधर्मिणी से कहा, “क्यों न हम उतर जायें और पैदल चल दें । मुझे तो लगता है जितनी देर में यह आटो चौराहे पर पहुंचेगा उससे कहीं कम समय में हम पैदल वहां पहुंच जाऐंगे ।”

उन्होंने सहमति जताई, और भाड़ा अदा करते हुए हम उतरने लगे । इतने में एक महिला, उम्र से अंदाजन तीस-पैंतीस वर्ष की, आटोरिक्शे के पास पहुंची और बोली, “चौराहे तक ले चलिए तो ।”

          “अरे बहन जी, सामने ही तो चौराहा है, पैदल चले जाइए ।”

          “कौन चले वहां तक पैदल ! आप छोड़ दीजिए ।”

          तब तक हम दोनों उतर चुके थे । वाहन चालक और उस महिला के बीच आगे क्या बातें हुई होंगी मैं बता नहीं सकता, क्योंकि हम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए बगल की एक गली के रास्ते चौराहे की तरफ चल दिए । बगल की गली का रास्ता हमने इसलिए चुना कि उस जाम में घुसकर पैदल भी आगे निकल पाना नामुमकिन-सा लग रहा था ।

गली से गुजरते हुए पत्नी महोदया बोलीं, “पता नहीं कैसी खबती महिला थी वह कि दस कदम पैदल चलने से भी कतरा रही थी ।”

पर्वतीय क्षेत्र का मूल बाशिंदा होने के कारण मुझे मीलों पैदल चलने की आदत रही है । पहाड़ों पर तो पैदल चलने के अलावा कोई अन्य साधन आम तौर पर उपलब्ध भी नहीं रहता है । लेकिन मैदानी इलाकों में स्थिति कुछ अलग रहती है । तथापि यहां भी लोग पैदल चलते ही हैं या साइकिल चलाते हैं । पता नहीं क्यों अब कुछ लोग कुछ कदम भी पैदल चलने से बचते हैं । ऐसा नहीं कि वह महिला अस्वस्थ हो । अधिकतर लोग उस महिला की तरह बर्ताव करते भी नहीं होंगे । मैं समझता हूं वह अपवाद रही होगी । लेकिन यह दिलचस्प तो है ही कि उस सरीखे लोग भी दुनिया में मिल जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, human behaviour, Short Stories

One response to “सौ मीटर दूर चलना भी गवारा नहीं

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s