चोरी और कमिशन का खेल

          गरमी का मौसम और दोपहर के करीब 2 बजे । चोर थानेदार साहब से मिलने पहुंचता है । इस समय बाहर और थाने में अपेक्षया सुनसानी है । साहब से मिलने का यही समय मुकर्रर हुआ है । साहब चोर को एक ओर आड़ में ले जाते हैं । चोर गुड़ी-मुड़ी हालत में कुछ नोट साहब की हथेली पर रखता है । साहब पूछते हैं, “कितना है ?” जवाब मिलता है, “पांच हजार हुजूर ।”

         “कहां और कितने पर हाथ साफ किया ?” साहब रौब से सवाल दागते हैं ।

जवाब में चोर मोहल्ले का नाम लेता है और उसके भीतर मकान की मोटामाटी स्थिति बताता है । लाखएक के करीब का माल रहा होगा यह भी कहता है ।

“इतने से कैसे काम चलेगा ?” सवाल पूछा जाता है ।

“हुजूर अभी देखना होगा बाजार में क्या मिलता है । और फिर रोज-रोज तो मौके मिलते नहीं । इसी में अपना और परिवार का पेट भी पालना होता है । हमारी मजबूरी भी थोड़ा समझिए, हुजूर !”

          “ठीक है, ठीक है”

          “हजूर तो मैं चलूं ?” कहते हुए वह बाहर आकर अपनी साइकिल  पकड़ता है और चल देता है ।

          एक-डेड़ घंटे के बाद एक महिला थाने में पहुंचती है । अपना परिचय देते हुए मोबाइल मिलाती है और कहती है, “सोनी सा’ब, जरा इनसे बात कर लिजिए ।”

          दूसरी ओर से बोले गए हलो और परिचयात्मक शब्दों को सुनने पर साहब बोलते हैं, “अरे लाल साहब, ठीक-ठाक हैं न ? कहां से बोल रहे हैं ?”

          लाल सा’ब फोन पर थानेदार साहब को वाकये के बारे में बताते हुए उनके पास पहुंची अपनी पत्नी की मदद के लिए निवेदन करते हैं । “ठीक है । मैं देख लूंगा, आप परेशान न हों ।”

          लाल साहब की पत्नी अपने घर में हुई चोरी की घटना के बारे में विस्तार से जानकारी देती हैं और तदनुसार एफआईआर दर्ज कराती हैं । मोहल्ले का नाम सुन साहब का माथा ठनकता है । ये तो वही मोहल्ला है जिसके बाबत अभी ‘वह’ आया था । वे आश्वासन देते हुए कहते हैं, “ठीक है हम तुरंत ही आगे की काररवाही करेंगे । आप निश्चिंत होकर लौटिए । चोर पकड़ में आ ही जाएगा ।”

          महिला वापस चली जाती है । थानेदार साहब सोचने लगते हैं, “लगता है यह मामला वही है जिसके लिए कुछ ही समय पहले उन्हें रकम मिली है । … ठीक है, चोरी का सामान तो उससे वापस दिलाना ही पड़ेगा । आखिर अपनी ही बिरादरी का मामला जो है । और पांच हजार की वह रकम ? हाथ में आ चुकी रकम तो लौटाई नहीं जा सकती है । … ठीक है, उससे अगली बार नहीं लेने का वादा करेंगे । … आखिर उसूल का सवाल है ।”

साहब अपने सिपाही को बुलाते हैं और आगे की काररवाही में जुट जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

(यह कथा वास्तविक घटना पर आधारित नहीं है । यह पूर्णतः काल्पनिक है और आज, 20 अप्रैल, के दैनिक जागरण में छपे ‘मडुवाडीह में दारोगा के मकान में चोरी’ शीर्षक वाले समाचार से प्रेरित होकर लिखी गयी है ।यदि कोई आहत महसूस करे तो उससे क्षमा की प्रार्थना है । क्षमा मांगने पर हर पाप धुल जाता है । अपने देश में आजकल माफी मांगने और माफ करने का कर्मकांड काफी लोकप्रिय हो चला है । – योगेन्द्र जोशी)

3 टिप्पणियाँ

Filed under कहानी, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, corruption, Hindi literature, Short Stories

3 responses to “चोरी और कमिशन का खेल

  1. mahendra gupta

    सच्ची घटना पर आधारित न हो पर लगती सच्ची ही है.माफ़ी मांगना तो करम कांड ही है,आखिर क्या फर्क पड़ता है इस से.सब का चरित्र गिर गया है.

  2. जहां झूठ ही काफी हो, वहाँ सच को तो माफी हो …

    प्रत्युत्तर में:
    अपने देश कब कौन आहत हो जाये कहना मुश्किल है। माफ़ी मांगने पर गुस्सा अक्सर उतर जाता है। …

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