“आप जैसा फिजूल आदमी मैंने नहीं देखा।”

कुछएक दिनों पहले मैं अपने एक रिश्तेदार से मिला । सामान्य कुशल-क्षेम की चर्चा के बाद बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि कैसे ऊटपटांग की टेलीफोन कॉलें उन्हें कभी-कभी मिल जाती हैं । अपने हालिया अनुभव का जिक्र करते हुए वे बोले कि अभी दो-चार दिन पूर्व उन्हें एक आदमी से फोन आया जिसने खुद को बीमा कंपनियों से जुड़ा कर्मचारी बताया । उसने कहा, “देखिए, आपके किसी पुराने बीमा के बोनस का भुगतान किया जाना है ।”

इस तरफ से जवाब गया, “मुझे तो रुके पड़े किसी ऐसे भुगतान का ख्याल नहीं है । फिर भी कोई हो तो भेज दीजिए । इसमें पूछने की क्या बात है ?”

दूसरी तरफ से सलाह मिली, “बोनस की राशि लाखों में है । उसमें सिक्योरिटी और प्रॉसेसिंग आदि की कुछ फीस लगेगी । आपको इतना (याद नहीं कितना) पैसा जमा करना होगा । कहां और कैसे यह हम आपको बताते हैं ।”

मेरे मित्र ने बीच में टोकते हुए फोनकर्ता से कहा, “देखिए यह सब तो नहीं चलेगा । आप बोनस से उतना पैसा काटकर शेष भेज दीजिए । बात सीधी-सी है ।”

इतना कहे जाने पर फोन कट गया । उसके बाद रिश्तेदार के पास से लौटने के दो-तीन दिन बाद कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे भी हुआ । मेरे पास भी एक फोन-कॉल आई । फोनकर्ता बीमा संबंधी बोनस की उपलब्धता की बात करने लगा । मुझे मालूम था कि यह सब लोगों को बेवकूफ बनाने की एक कोशिश है । मैंने पूछा, “आप किस संस्था की ओर से बात कर रहे हैं ?”

उसने कहा,आई.आर.डी.ए.

“आई.आर.डी.ए.? मैंने इस संस्था का नाम कभी नहीं सुना है ।” मैं इस संस्था से वाकई अनभिज्ञ रहा हूं ।

“नाम नहीं सुना ? अजीब बात है । यह भारत सरकार की एक संस्था हैः बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डिवलपमेंट ऑथोरिटी), जो देश की सभी बीमा कंपनियों के कामकाज पर नजर रखती है ।”

मुझे अंदाजा है कि इस प्रकार के फोन लोगों को पैसे का लालच देकर बेवकूफ बनाने और उनसे खुद ही पैसा ऐंठने के लिए किए जाते हैं । सरकारी तंत्र के कर्मचारियों से यह उम्मीद भला कोई कैसे कर सकता है कि वह आपके वाजिब बकाए को लौटाने की बात खुदबखुद करें । उनसे पैसा पाने के लिए तो कागजी लिखापड़ी के साथ कार्यालयों के दसियों चक्कर हर किसी को लगाने पड़ते हैं । और यहां आपके बकाए के लिए चिंता जताने वाला कोई फोन कर रहा है ! भला कैसे कोई विश्वास कर सकता है ! लिहाजा मुझे उस व्यक्ति की बोनस संबंधी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी । फिर भी मेरा मन हुआ कि उससे इधर-उधर के सवाल पूछ डालूं । मैंने कहा, “कौन-कौन सी हैं ये बीमा कंपनियां जिनकी आप बात कर रहे हैं, जानना चाहता हूं ।”

         “आपको बोनस से मतलब है या बीमा कंपनियों की लिस्ट से ?” उसने अपनी नाखुशी जाहिर की ।

         “अरे भई, मामला ठीक से समझ लेना चाहिए । इसलिए कुछएक सवाल-जवाब करना जरूरी है ।” मैंने अपनी सफाई पेश की ।

वह व्यक्ति समझ गया कि उसे कुछ हासिल होना नहीं है । अपना गुस्सा उतारते हुए उसने झल्लाकर कहा, “आप जैसा फिजूल आदमी मैंने नहीं देखा ।”

मैंने चाहा कि उसके इन शब्दों को मैं स्वयं उसके प्रति दोहराऊं, किंतु तब तक उसने फोन काट दिया । – योगेन्द्र जोशी

 

5 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, किस्सा, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories

5 responses to ““आप जैसा फिजूल आदमी मैंने नहीं देखा।”

  1. mahendra gupta

    आजकल बेवकूफ बनाने का यह खेल खूब चल रहा है,फोन ,इन्टरनेट के जहाँ लाभ हैं ,ऐसे नुकसान भी हैं,अतः बहुत संभल कर इनका प्रयोग करना जरूरी है.

  2. मजे की बात ये है कि लोग फ़ँसते भी हैं।
    हम भी फ़िज़ूल आदमी वाले ब्रांड ही हैं🙂

  3. अभी तक तो नाईजीरियाई लोग ईमेल से फांसते थे, अब उनके भारतीय बंधु सीधे फ़ोन लगा कर फांसने लगे हैं. बहुत प्रगति पर है ठगों का धंधा!

  4. ठगी वर्शन 2.x – हमारा लोकतन्त्र जितना उम्रदराज होता जा रहा है, डाकुओं की हिम्मत उतनी ही बढ़ती जा रही है।

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