नेताजी की नींद में खलल और टूटना सपने का

          नेताजी की पार्टी के मुखिया और सर्वेसर्वा का जन्मदिन था । शहर में बड़े धूमधाम से जन्मदिन बनाया गया । मुखिया के वजन के बराबर का केक बनवाया गया । ऐसा करना जरूरी जो था, अपनी प्रतिष्ठा के लिए और मुखिया तक संदेश पहुचाने के लिए कि वे कितने बफादार और समर्पित तोताछाप स्नेहपात्र हैं । वे थे तोताछाप ही क्योंकि मुखिया के मुंह से जो भी सही-गलत निकलता था उसे वे शब्दशः रट लेते थे और गाहे-बगाहे कहीं भी उगलकर अपनी स्वामीभक्ति प्रकट कर लेते थे । वैसे तो पूरी पार्टी तोताछाप बधुंवा कार्यकर्ताओं का एक जमावड़ा था, फिर भी उनकी जैसी खूबी और लोगों में नहीं थी । मुखिया ने भी खुश होकर उन्हें प्रदेश का अध्यक्ष चुना था । वे आश्वस्त थे कि मुखिया कभी न कभी उन्हें राष्ट्रीय स्तर की बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपेंगे और पार्टी में उनका कद बढ़ाएंगे । इसी उम्मीद के साथ उन्होंने जन्मदिन की इतनी तैयारी की थी । शहर में जगह-जगह मुखिया और उनके ‘सम्मानित’ परिवार के पोस्टर लगवाए थे जिसमें अपनी फोटो भी शामिल करना वे नहीं भूले । समारोह स्थल पर रंगबिरंगा तथा लंबा-चौड़ा बैनर भी लगवाया था । समारोह भी काफी देर तक चला जिसमें नेताजी ने अपने वफादारों को भी भरपूर बोलने का मौका दिया । मुखिया और उनके परिवार की जितनी तारीफ हो सकती थी वह उन्होंने की ।

समारोह समाप्त होते-होते काफी समय बीत गया, रात के ग्यारह बीत गये । वे काफी थक चुके थे । समारोह के दौरान चले नाश्ते-पानी से ही उनका पेट भर चुका था । घर पहुंचते-पहुंचते रात के 12 बज चुके थे । आते ही उन्होंने प्रतीक्षारत पत्नी को अपनी थकान के बारे में बताया तो पत्नी ने एक सांस में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी, “किसने कहा इतनी मेहनत करने के लिए ? इतने दिनों से जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहे थे तड़के सुबह से लेकर रात देर तक, थकान नहीं होगी तो क्या होगी । इतनी मेहनत से बफादारी दिखाने से मिलेगा क्या ? अरे कुछ अपनी तंदुरुस्ती और उम्र का भी खयाल रखो । मुझे नहीं पसंद तुम्हारा इतना काम करना ।”

“अरे भागवान, तुम समझोगी नहीं । मुखियाजी खुश हो गये तो कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल सकती है, वह नहीं तो कम से कम एक अदद अहम मंत्री पद तो मिल ही जाएगा ।” नेताजी ने तपाक से अपना वही घिसा-पिटा पुराना जवाब दिया जिसे वे वर्षों से देते आ रहे थे ।

“अच्छा ? ऐसी बात कर रहे हो कि जैसे उनके परिवार, रिश्तेदारी और जात-बिरादरी में कोई मिलेगा नहीं ! फिर भी मेरे जीते-जी ऐसा हुआ तो मैं भी देख लूंगी । ख्वाब देखने में क्या जाता है ? इस पर बहस करना फिजूल है, इस समय थके हो, सो जाओ ।”

नेताजी तुरंत गहरी नींद के आगोश में चले गये । पता नहीं रात भर कैसे-कैसे सपने देखे यह उन्हें भी याद नहीं, लेकिन सुबह के सपने में जो खलल पड़ा वह जरूर उन्हें खला । सपने में देखा कि मुखिया जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गये । यों तो यह अच्छी खबर नहीं थी, लेकिन इसकी वजह से उन्होंने नेताजी को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया ताकि पार्टी का राज्य में कामकाज विश्वस्त हाथों में सुरक्षित रहे । नेताजी खुश थे, बेहद खुश, जिंदगी की मुराद पूरी जो हो रही थी । शपथ ग्रहण की पूरी तैयारी उनकी अपनी देखरेख में हुई । मंत्रीमंडल में शामिल करके किसे उपकृत करना है और किसे नहीं इसकी सूची भी उन्होंने तैयार कर ली । घर के भीतर और बाहर जश्न का माहौल था । चाटुकारों और चहेतों की फौज उन्हें घेरे थी । लेकिन …

  “अजी, उठोगे कि नहीं ? आठ बज चुके हैं । लो अपनी बेड-टी ले लो ।”

पत्नी ने मुर्गे की नाईं बांग लगाई तो नेताजी हड़बड़ाकर उठ बैठे । बोले, “अरे भागवान, तुमने सब गड़बड़ कर दिया । क्या खूबसूरत सपना देख रहा था । जानती हो, मुख्यमंत्री की शपथ लेने जा रहा था, सपना तो पूरा देखने देतीं ।”

“ऐसे बोल रहे हो जैसे कि सच में ही मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे । अरे सपना ही तो था न, फिर देख लेना आज रात । सपना ही तो था, दुबारा-तिबारा देख सकते हो । … मगर हां, उसका जिक्र किसी के सामने मत कर देना, अपने विश्वस्तों के सामने भी नहीं । कहीं तुम्हारे मुखिया के कान में बात पड़ गई तो वे दल से ही निकाल देंगे । कहेंगे इसकी ये हिम्मत कि मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देखता है ।” पत्नी ने नेताजी को आगाह किया ।

“सच कहती हो, लेने के देने पड़ सकते हैं । ऐसे सपनों से बच कर ही रहना चाहिए ।” नेताजी ने नैराश्य भाव के साथ हामी भरी । (काल्पनिक) – योगेन्द्र जोशी

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