रेलगाड़ी से यात्रा और पर्स की निगरानी

          मैं सपत्नीक रेलगाड़ी से यात्रा पर हूं, भोपाल से मुंबई तक । मेरी बर्थ (शायिका) के सामने की बर्थ पर बीसएक साल की एक युवती यात्रा कर रही है । हम अपने साथ लाए गए अखवार-पत्रिकाओं के साथ समय बिता रहे हैं । यों तो मोबाइल फोन लेकर हम भी चलते हैं, किंतु उसका प्रयोग कम ही करते हैं, केवल जरूरी होने पर । किंतु देख रहा हूं कि वह युवती फोन पर जुट गई है । आजकल की युवा पीढ़ी का मोबाइल प्रेम देखने लायक है । वे कभी इस दोस्त के तो कभी उस दोस्त के साथ मोबाइल से वार्तालाप में जुट जाती है । मुझे नहीं लगता कि युवक-युवतियां सदैव सार्थक बातें करते होंगे । यात्रा के दौरान समय काटने के लिए ही शायद वे मोबाइल पर व्यस्त रहते होंगे । और जब मोबाइल पर उस युवती का काफी समय निकल चुकता है तो उसे बंद करके नींद लेने लेट जाती है । यात्रा के दौरान पत्र-पत्रिकाएं पढ़कर समय विताने का शौक कम ही लोगों को होता है ऐसा मेरा अनुभव रहा है ।

          रात्रि के साड़े-सात बज चुके हैं । वह युवती अपना खाना खत्म करके पर्स में रखी शीशी से एक तरल पदार्थ निकालती है और अपने हाथों पर चुपड़ती है । शायद ऐसा करना भोजन पश्चात् हाथ-मुंह धोने का आधुनिक विकल्प है । हम भी आठ बजते-बजते अपना खाना खा लेते हैं और हाथमुंह धोकर अपनी बर्थ पर बैठ जाते हैं । थोड़ी देर बाद वह युवती अपने वर्थ पर से उठती है और मेरी ओर मुखातिब होते हुए कहती है, “अंकल, जरा मेरा पर्स देखते रहिएगा ।” उसे शायद शौचालय (टॉयलेट) जाना है ।

          “अंकल …”, अपने समाज में यह शब्द आम संबोधन हो चुका है, अपनी तुलना में उम्रदराज लोगों को संबोधित करने के लिए । खैर, उसके “देखते रहिएगा” कहने पर मैं उसके पर्स की पर नजर डालते हुए कल्पना करने लगता हूं । एक निरर्थक कल्पना, लेकिन उसके लौटने तक उस कल्पना में मग्न हो जाता हूं । कल्पना करता हूं एक आदमी उस बर्थ के पास आता है । वह उस पर्स पर नजर डालता है और उसे हौले से उठा लेता है । फिर धीरे-से वहां से चल देता है और रेलगाड़ी के उस डिब्बे के दरवाजे पर पहुंच जाता है । अपनी कल्पना में मैं स्वयं भी उसके पीछे-पीछे चल देता हूं, उस पर्स पर नजर गढ़ाए हुए, उस युवती ने पर्स को देखते रहने का अनुरोध जो किया है । रेलगाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ती है और वह व्यक्ति उतर जाता है । मैं चिंतित् हो जाता हूं, क्योंकि वह मेरी आंखों से ओझल होने लगता है और उसके साथ ही वह पर्स भी । उस पर्स को देखते रहने का काम अब मैं नहीं कर पा रहा हूं ।

          तभी उस युवती की आवाज मेरे कानों में पड़ती है, “थैंक्यू, अंकल ।” मेरी कल्पना का तारतम्य टूट जाता है, और मैं देखता हूं कि पर्स अपने स्थान पर यथावत पड़ा है । युवती लौट आई है और अपनी बर्थ पर चादर बिछाकर निद्रामग्न होने का उपक्रम करने लगती है । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “रेलगाड़ी से यात्रा और पर्स की निगरानी

  1. एक बार दादाजी और पिताजी को कहीं बाहर जाना पड़ा और जाते समय मुझे कह गये कि गाय को पानी दिखा देना, जैसे आप पर्स देखते रहे वैसे ही हमारी गाय को उस दिन पानी देखना पड़ा🙂
    रोचक कल्पनायें हैं आपकी जोशीजी।

  2. Ajay

    aksar hai hota hai. aap kahi bethe hai aur kuch log aapse apne saman ki nigrani ka vinram aagrah hai aur aap bhi badi imandari se diya huva kaam pura karte hai. ho sakta hai isme aapko kushi milti hai lekin kabhi kabhi ye kaam musibat bhi ban jata hai.

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