पारिवारिक रिश्तों के गायब होते संबोधन

हाल ही में मैं अपनी पत्नी के साथ नवी मुंबई गया था अपने बेटे के पास । मैं नवी मुंबई को बृहन्मुंबई का ही हिस्सा समझता था । वहां जाने पर पता चला कि यह एक अलग और नया शहर है, जिसकी अपनी स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था है । इस शहर में मैंने पहली बार कदम रखे । अस्तु, इस शहर की चर्चा करना मेरे द्वारा प्रस्तुत विषय का हिस्सा नहीं है । इसका जिक्र तो मैंने यों ही कर दिया चलते-चलाते । असल बात जो मुझे बतानी है वह यह है कि नवी मुंबई में ही मेरा मौसेरा भाई भी रहता है, जिससे मिलना वहां के मेरे प्रवास की कार्यसूची में था ।

मेरा मौसेरा भाई मुझसे 10-12 साल छोटा होगा । उसके तीन बच्चे हैं जिनमें सबसे बड़ा 20-21 साल का होगा । उन बच्चों से मैं पहले कभी मिला था या नहीं मुझे याद नहीं । जब वे बहुत छोटे रहे हों तब हो सकता है उन्हें देखा हो । इतना जरूर है कि हाल के कई सालों से अपने उस भाई के परिवार से मेरा मिलना नहीं हुआ । इसलिए उसके बच्चों को पहचान सकना मेरे लिए संभव नहीं था, और न ही मुझे पहचान पाना उन बच्चों के लिए मुमकिन । दरअसल आज की हकीकत यह है कि कई लोग अपने गांव-घरों को छोड़कर शहरों में जा बसे हैं और उनमें से कुछ तो एक-दूसरे से छिटककर दूरदराज तक जा पहुंचे हैं । ऐसे में उनके परस्पर मिलने-जुलने की संभावना आज की व्यस्त जिंदगी के मद्देनजर बहुत कम हो जाती है ।

एक दिन हम लोग मौसेरे भाई और उसके परिवार से मिलने पहुंच गये । हम अंदाजन डेड़-दो घंटे उसके घर ठहरे होंगे । कुशलक्षेम के अलावा अन्य तमाम बातें इस बीच परस्पर होती रहीं । साथ में चायपानी का भी दौर चला । भाई के दो बच्चे तो हम लोगों से मिलने आ गये, किंतु बड़ा बेटा बगल के कमरे में किसी काम में व्यस्त रहा । बाद में मैं खुद ही उसके पास चला गया । बातचीत के दौरान उसने कहा, “अंकल, आप बी.एच.यू. में पढ़ाते थे न ? क्या पढ़ाते थे आप वहां ?”

अंकल ! अंकल और आंटी संबोधनों को सुनना मुझे अच्छा नहीं लगता, लेकिन भारतीय समाज में ये इतना प्रचलित हो चुके हैं कि न चाहते हुए भी सुनना ही पड़ता है । ये संबोधन अब उन व्यक्तियों के लिये प्रायः प्रयुक्त होते हैं जिनकी उम्र वक्ता से पर्याप्त अधिक हो । लेकिन जब परिवार से निकटता से जुड़े व्यक्तियों के लिए भी अंकल-आंटी के संबोधन इस्तेमाल होते हैं तो मुझे अटपटा ही नहीं लगता बल्कि अनभिव्यक्त रोष मेरे मन में उपजता है । खैर, मैंने टोकने के अंदाज में उससे कहा, “मैं तुम्हारा अंकल नहीं, ताऊ हूं ताऊ । … ताऊ, समझे ?”

मेरी बात सुनने पर उसके चेहरे पर आश्चर्य-मिश्रित जिज्ञासा के भाव उभर आए । शायद वह समझना चाहता था कि मैं उसका ताऊ कैसे हो गया । वह कदाचित् सोच रहा था कि उसके पिता तो केवल दो भाई हैं, जिनमें बड़े उत्तराखंड के अपने पैतृक घर में ही रहते हैं । यानी उसके ताऊ तो वह हैं फिर यह ताऊ कहां से आ गए ।

मैं उसकी दुविधा समझ गया । मैंने उससे कहा, “देखो तुम्हारे पिता, यानी पापा, मेरे मौसेरे भाई हैं । या यों कहो कि मेरी मां तुम्हारी दादी की बड़ी बहन थीं । उस नाते उनके और मेरे बीच छोटे-बड़े भाइयों का रिश्ता बनता है; मैं उनसे 10-12 साल बड़ा हूं । … समझ में आया ?”

मैंने महसूस किया कि दादी की बड़ी बहन की संतानों से रिश्ता जोड़ पाने में उसे परेशानी हो रही थी । मैंने स्पष्ट करने के मकसद से उससे कहा, “देखो, तुम्हारी दो मौसियां हैं, हैं न ? दोनों तुम्हारी मां से छोटी हैं, ठीक ? बताओ, उनके बच्चे जो तुमसे छोटे हैं तुम्हें, दद्दा या दाज्यू (बड़ा भाई, कुमाउंनी बोली में) कहते हैं न ? क्यों कहते हैं ? तुम्हारी मां और उसकी बहनों के बच्चों के बीच जो रिश्ता है वही मेरे और तुम्हारे पापा के बीच है । … समझ में आया ?

उसने अपना सिर हिलाकर हां का भाव व्यक्त तो कर दिया, किंतु मैं निश्चित तौर पर कह नहीं सकता कि वह वास्तव में वस्तुस्थिति को समझ ही गया होगा । यह अनुभव मेरे लिए नितांत नया नहीं था । कुछएक अन्य मौकों पर भी मुझे इसी प्रकार अनुभव हुआ है । आज के समय में कई परिवार अपने कुटुंब के अन्य परिवारों से इस हद तक कट चुके हैं कि उन परिवारों के बच्चों के लिए रिश्तों को समझ पाना कठिन होता है । सगे चाचा-मामा बुआ-मौसी तक के रिश्ते तो वे समझ लेते हैं, क्योंकि वे कभी-कभार उनके संपर्क में आ जाते हैं । किंतु दो-तीन पीढ़ी पहले या उससे भी पहले के, जैसे दादा-दादी या नाना-नानी के स्तर के, पूर्वजों से विरासत में मिले रिश्तों को वे समझ नहीं पाते । इस समय कई युवा एकल-संतान की नीति अपनाकर चल रहे हैं । मुझे लगता है कि उनकी आने वाली पीढ़ियां मामा-बुआ क्या होते हैं यह नहीं जान पाएंगे ।

बचपन में मैं अपने छोटे-से गांव में रहता था । उस काल में दूर अथवा निकट के नाते-रिश्तेदार जब गांव में आते थे तब वे प्रायः प्रत्येक परिवार से मिल लेते थे । मेरी मां या भाई-बहन मुझे समझाते थे कि फ़लां व्यक्ति तुम्हारे मामा लगते हैं, और अमुक महिला तुम्हारी बुआ, इत्यादि । शादी-ब्याह जैसे मौके पर ऐसे संबंधियों का आना सामान्य बात हुआ करती थी । परस्पर मिलना-जुलना इतना हो जाता था कि संबंधों को समझना और उनसे जुड़े संबोधनों से परिचित होना कठिन नहीं होता था । हमारे लिए यह सब इतना सहज और स्वाभाविक होता था कि जिससे कभी न मिले हों उसके साथ हमारा क्या रिश्ता होगा यह खोज लेते थे । वह समय था जब पारिवारिक रिश्तों में पर्याप्त प्रगाढ़ता होती थी । किंतु अब वह सब गायब होता जा रहा है ।

समाज में कितना परिवर्तन हो चुका है मेरे ही जीवनकाल में ! – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, किस्सा, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories, society

3 responses to “पारिवारिक रिश्तों के गायब होते संबोधन

  1. शकुन्तला शर्मा

    यह बात सही है कि हम अपने रिश्तों और सम्बोधनों को भूलते जा रहे हैं इसका सबसे बडा कारण है हमारा स्वार्थ । जो सम्बन्ध हमारे लिए उपयोगी नहीं है हम उनसे मिलना भी नहीं चाहते, बात करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता । कहने में बुरा लगता है पर यही सत्य है कि आज हमें अपने माता-पिता ही भारी लगने लगे हैं । हम उन्हें प्यार नहीं करते, उन्हें बोझ समझते हैं ।

  2. Norang sharma

    joint families tutkr seperate family banti ja rhi hain ye bhi ak reason ho skta hai aaj ke daur me.

  3. पिंगबैक: रिश्तों के गायब होते संबोधन: जिंदगी बस यही है - Blogs In Media

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