निरीह मुर्गे पर गुस्सा उतारने की घटना

          जिस घटना का जिक्र मैं इस स्थल पर करने जा रहा हूं वह मुझसे सीधे तौर पर नहीं जुड़ी है, बल्कि वह दो-तीन रोज पहले के अखबार में प्रकाशित एक समाचार पर आधारित है । “मुर्गी से इश्क लड़ाने पर मुर्गे को मार दिया तीर” शीर्षक के साथ छपी घटना का विवरण हिंदी दैनिक जागरण के 26 दिसंबर के अंक में देखा जा सकता है । मामला अलीराजपुर का है । ये स्थान कहां है इसका अंदाजा मुझे नहीं, किंतु घटना के विवरण से यही लगता है यह किसी आदिवासी क्षेत्र में है, जहां तीर-कमान प्रचलन में हैं ।

अखबारों में तो तमाम प्रकार की घटनाएं छपती रहती हैं, जो प्रायः राजनैतिक उथल-पुथल, आरोप-प्रत्यारोप, और प्रशासनिक संवेदनहीनता एवं लापरवाही से लेकर हत्या-डकैती-दुष्कर्म आदि जैसी विचलित करने वाली खबरों से जुड़ी रहती हैं । खबरें सभी प्रकार की प्रकाशित होती हैं, जिनमें कुछएक का विशेष सामाजिक महत्व होता है तो अधिकांश अन्य पढ़कर आई-गई के तौर पर भुला दी जाती हैं । किंतु कभी-कभी कोई घटना ऊपरी तौर पर  महत्वहीन होते हुए भी अपने पीछे विचारणीय सवाल छोड़ जाती है । कम से कम मुझे तो अक्सर ऐसा लगता है । उक्त घटना की खबर पढ़ने पर मेरे मन में सवाल उठा कि कुछ मनुष्य गुस्से में विवेकशून्य होकर तुरंत ही आत्म-संयम क्यों खो बैठते हैं ? क्यों वे कुछ क्षण ठहरकर अपनी प्रतिक्रिया के घातक परिणामों पर विचार नहीं कर पाते हैं ? अस्तु, मैं घटना की बात करता हूं ।

खबर यह थी कि दो भाई – कदाचित सगे, जिसका स्पष्ट उल्लेख खबर में नहीं – पड़ोसी थे और हैं । एक के घर में मुर्गी पली थी तो दूसरे के घर में संयोग से मुर्गा । हो सकता है उनके पास और भी मुर्गे-मुर्गियां रही हों, लेकिन घटना में किरदार निभाने वाले एक मुर्गी ओर एक मुर्गा बताए गये हैं । ये दोनों रहे तो पक्षी जाति के, उन्हें क्या मालूम कि उनके मालिकों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं । उन्हें यह समझ नहीं रही कि उन्हें भी मालिकों की भांति आपस में दूरी रखनी चाहिए । उनमें से कोई एक दूसरे के पास पहुंच गया । बहुत संभव है कि मुर्गा ही मुर्गी के पास पहुंचा हो । अपनी प्रजाति का कोई सदस्य आसपास टहल रहा है यह देख दूसरे मन में उससे नजदीकी बढ़ाने की इच्छा स्वभावतः जगी हो । विपरीत लिंग के सदस्यों के बीच ऐसा आकर्षण खास तौर पर देखा जाता है । खबर के अनुसार मुर्गा मुर्गी से ‘इश्क लड़ाने’ पहुंचा था । इश्क का इजहार कैसे किया जा रहा होगा यह अनुमान लगाने की बात है ।

बहरहाल मुर्गी के मालिक को वह इश्कबाजी नागवार लगी । उसे गुस्सा आया और चल दिया घर के भीतर अपना तीर-कमान लेने । हो सकता है उसने मुर्गे को दो-एक बार भगाया हो, लेकिन ढीठ मुर्गा माना न हो जिससे तीरंदाज मुर्गी-मालिक का गुस्सा और भड़क गया हो । घर से बाहर आकर उसने मुर्गे पर निशाना साधा और उस पर तीर छोड़ दिया । बेचारे मुर्गे को अपनी हरकत की सजा मिल गयी; तीर उसके शरीर के आर से पार निकल गया । यह तो गनीमत रही कि उसके मालिक (दूसरा भाई) को पता चल गया और ले गया उसे पशु-चिकित्सक के पास जिसने संभव उपचार आरंभ कर दिया । उसकी जान बच गई और वह स्वास्थ्यलाभ करने लगा । उसके मालिक ने घटना के बाबत पुलिस में रिपोर्ट कर दी । उधर मुर्गी का मालिक गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो गया ।

मनुष्य को ऊपर वाले ने सोचने-विचारने की क्षमता दे रखी है । तब भी वह उल्टी-सीधी हरकतों से बाज नहीं आता है । लाख समझाया जाए तो भी कई मनुष्य गलत-सलत कार्य से बचने की कोशिश नहीं करते । बेचारे पशु-पक्षी तो ऐसी समझ पाये नहीं हैं । उन पर ‘सभ्य मानव समाज’ के नियम-कानून तो लागू होते नहीं हैं । तब उन पर क्या गुस्सा करें ? हां, यदि वे असुविधा पैदा कर रहे हों या किसी प्रकार की हानि पहुंचा रहे हों तो उन्हें डराया-भगाया जा सकता है । नियंत्रित रखने के लिए न्यूनाधिक ताड़ना भी की जा सकती है । लेकिन गुस्से में उनकी जान तक लेने का विचार विवेकहीनता का ही द्योतक कहलाएगा ।

तीर चलाने वाले उस व्यक्ति को यह तो मालूम रहा ही होगा कि वह जो कार्य करने जा रहा है वह अनुचित हैा । इसीलिए तो वह बाद में फरार हो गया । जाहिर है गुस्से के अधीन की गई करतूत की कीमत चुकानी ही पड़ी । दरअसल पूरी घटना की कुछ न कुछ कीमत दोनों ही पक्षों को चुकानी पड़ी । मिला क्या ? केवल तसल्ली इस बात की कि मैंने जो हुआ उसे सहा नहीं और मुर्गे को ‘सबक’ सिखा दिया, गोया कि मुर्गा यह समझ सकता हो कि उसे भविष्य में ऐसी नासमझी नहीं करनी चाहिए!

इस प्रकार की घटनाएं हमें अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं । मैंने महसूस किया है कि अनेकों मनुष्य बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं, अपना आपा खो बैठते हैं, और गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त कर बैठते हैं । अवांछित एवं हानिप्रद व्यवहार किसी एक व्यक्ति तक सीमित हो ऐसा नहीं होता, अपितु पूरा जनसमूह ऐसी हरकत पर उतर आता है । कहीं कोई नहीं रह जाता जो कहे कि जरा ठंडे दिमाग से घटना के बारे में सोचा जाना चाहिए और संयमित प्रतिक्रिया क्या हो इस पर विचार करना चाहिए । कहीं किसी वाहन से दुर्घटनावश किसी की जान निकल गयी तो वहां से गुजरने वाले वाहनों की तोड़फोड़ या उनकी आगजनी पर लोग उतर आते हैं । अस्पताल में गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु पर भी इसी प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है । ऐसी खबर भी सुनने को मिल जाती है जिसमें किसी बात पर गुस्सा होने पर परिवार का कोई सदस्य साल-छः महीने के बच्चे की पटककर जान ले लेता है, अथवा अपनी ही जान गंवा देता है ।

मुझे लगता है कि अनेक जन प्रतिकूल एवं खिन्न करने वाली परिस्थितियों में आत्मसंयम एवं विवेक खो बैठते हैं, और फलतः अनर्थ कर बैठते हैं । हम चाहें या न, यही इस जीवन का कटु एवं अपरिहार्य सत्य है । – योगेन्द्र जोशी

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Filed under कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, human behaviour, Short Stories

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