वरिष्ठ नागरिक होना भी माने रखता है

रेलगाड़ी एवं बसों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए बैठने के स्थान बहुधा आरक्षित रहते हैं । वरिष्ठ का मतलब उस व्यक्ति से है जो वयसा साठ साल या अधिक का हो चुका हो । बसों/रेलगाड़ियों के संदर्भ में तो यह परिभाषा काफी पहले से प्रचलन में रही है । इसके विपरीत आयकर विभाग कुछ वर्ष पहले तक पैंसठ अथवा उससे अधिक की उम्र ले चुके व्यक्ति को ही वरिष्ठ मानता था । परंतु अब उस विभाग में भी उक्त परिभाषा लागू हो चुकी है । वरिष्ठ नागरिकों को वहां भी आयकर की किंचित छूट प्राप्त हो जाती है । अन्य कई क्षेत्रों में भी वरिष्ठों को सिद्धांततः किसी न किसी प्रकार की रियायत देने के नियम हैं, जैसे अस्पतालों में । सभी वरिष्ठ नागरिकों को उन रियायतों की जानकारी हो ही यह आवश्यक नहीं है । जहां सुविधाएं आरक्षित हों वहां भी उसका लाभ मिल ही जाए जरूरी नहीं । संबंधित अन्य लोग इन प्रावधानों की परवाह करते ही हों यह आवश्यक नहीं ।

मेरी पत्नी एवं मैं वरिष्ठ नागरिक हैं । मुझे वरिष्ठ दिखना एवं कहलाना सम्मानजनक लगता है मैंने सुना है कि कुछ लोग उम्र छिपाने के इच्छुक होते हैं और वे उम्रदराज न लगें इसके लिए सिर के बालों को खिजाब से रंगते भी हैं । लेकिन मुझे उम्र के साथ बालों का सफेद होना स्वाभाविक लगता है । मेरे बालों में अभी सफेदी कम ही है, लेकिन मैं चाहता हूं कि वे हिमवत श्वेताभ हों । आखिर उम्र का सयानापन भी तो कहीं झलके । सयानापन न भी हो तो कम से कम उसका भ्रम तो पैदा हो । बुजुर्ग लगने वाले को लोग कुछ तो सम्मान देते ही हैं ऐसा मैं समझता हूं । कभी-कभी ऐसा स्पष्टतः अनुभव में आता भी है । इस संबंध में मुम्बई की एक हालिया घटना मेरे स्मरण में आती है, जिसका जिक्र मैं यहां पर करना चाहता हूं ।

हाल ही में कभी हम पति-पत्नी कुछ दिनों के प्रवास पर मुम्बई में थे । एक दिन हम उस महानगर के समुद्र तट पर स्थित ख्यातिप्राप्त “गेटवे-आफ-इंडिया” के आसपास भ्रमणार्थ निकले । वापसी के लिए हमने स्थानीय रेलगाड़ी यानी लोकल ट्रेन चुनी जो “चर्च-गेट रेलवे टर्मिनस” से लेनी थी । गेटवे-आफ-इंडिया से चर्च-गेट तक की दूरी हमने महानगर की स्थानीय बस सेवा से तय की । संबंधित नगरीय बस इन्हीं दो स्थानों के बीच चलती है । मेरे अनुमान में दोनों स्थानों के बीच की दूरी पांच-एक किलोमीटर से अधिक नहीं होगी ।

हमें जो बस मिली वह सवारियों से पहले ही भर चुकी थी, और तुरंत ही चलने को तैयार थी । अगली बस का इंतिजार करने के बजाय हमने उसी से गंतव्य तक जाने का विचार किया । बस के अंदर सभी सीटें भरी हुई थीं, अतः हम चालक के पास के प्रवेशद्वार के निकट खड़े हो लिए । उस भीड़ में हमारे लिए यह पता करना कठिन था कि कहीं आसपास की दो-एक सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित हैं या नहीं । दरअसल नगरीय बसों से चलने के आदी न होने के कारण हमें इस संभावना का ख्याल तक नहीं था । मेरा सोचना है कि अन्य सवारियां भी उस आरक्षण के प्रति सामान्यतः सचेत नहीं रहती होंगी । वरिष्ठ नागरिकों का आवागमन भी इन बसों के माध्यम से शायद कम ही होता होगा, जिसके कारण ये सीटें अक्सर खाली रहती होंगी और उन पर अन्य सवारियां बैठ जाती होंगी ।

बस के चल चुकने के एक-दो मिनट पश्चात एक युवती अपनी सीट से उठी और मेरी ओर मुखातिब होकर बोली, “आप इस सीट पर बैठ जाइए ।

मैंने पत्नी को इशारा किया कि वह अमुक सीट ग्रहण कर लें । उनके बैठ जाने पर बगल में बैठी पुरुष सवारी भी उठ खड़ी हुई, मुझे उस स्थान पर बैठने का संकेत करते हुए । शायद उसको भी लगा होगा कि बैठने का वह स्थान हम वरिष्ठों के लिए छोड़ देना चाहिए । इस प्रकार सौभाग्य से हमें बैठने की जगह मिल गई, वरिष्ठ नागरिक होने के नाते । हमने इस बात पर गौर नहीं किया कि वे सीटें वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित थीं अथवा नहीं । यह भी हो सकता है कि उन दो सवारियों ने मात्र सदाशयता के नाते हमारे लिए बैठने का स्थान छोड़ा हो । जो भी हुआ हो, ऐसे अवसरों पर एक प्रकार का संतोष-भाव मन में अवश्य उपजता है । – योगेन्द्र जोशी

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