एक नहीं दो बार वोट, और वह भी एक को नहीं

इस बार मेरे शहर वाराणसी का लोकसभा चुनाव देश भर के लिए सर्वाधिक महत्व का रहा, क्योंकि यहां से बहुचर्चित प्रत्याशी थे नरेन्द्र मोदी और साथ में थे उनको चुनौती देने वाले नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल । यों इनके अलावा भी मैदान में ताल ठोंकने वाले थे अपने-अपने दलों के प्रत्याशी अजय राय, कैलाश चौरसिया एवं विजय जायसवाल, जिनका अपना-अपना जनाधार रहा है । इन पाचों को मिलाकर मैदान में थे कुल 42 प्रत्याशी जिनमें अधिकांश अज्ञात श्रेणी के थे । इतनी बड़ी संख्या के लिए तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था की गई थी प्रत्येक पोलिंग बूथ पर । इतने प्रत्याशी मैदान में क्यों उतरे होंगे यह वे ही बता सकते हैं, पर मतदान को पेचीदा बनाने में उनका योगदान अवश्य रहा ।

वस्तुतः वाराणसी इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र बन गया था । मेरे लिएयह चुनाव इसलिए माने रखता था कि मैं एवं मेरी पत्नी स्थायी बाशिंदे होने के कारण इस क्षेत्र के लंबे अर्से से मतदाता हैं । इस बार के चुनाव में मुझे कुछएक ऐसे अनुभव हुए जो मेरी दृष्टि में चुनाव आयोग की घटिया कार्यप्रणाली दर्शाते हैं ।

हमारी कालोनी के चुनाव स्थल पर दो अलग-अलग कमरों में अलग-अलग मतदाता सूची के अनुसार मतदान प्रक्रिया चली । पहले कमरे पर मतदाताओं की संख्या इतनी कम थी कि वहां लाइन लगााने की जरूरत ही नहीं थी, जब कि दूसरे पर मतदाताओं को लंबी लाइन में इंतिजार करना पड़ रहा था । एक दिलचस्प लेकिन आपत्तिजनक बात जो मैंने वहां देखी वह है कि कुछ मतदाताओं के नाम दोनों ही सूचियों में मौजूद थे । पोलिंग बूथ पर पहुंचने पर जब हम अपने को मिले मतदाता पर्ची के अनुसार उस लंबी लाइन में लगे तो एक युवक हमारे पास पहुंचा और बोला, “अंकलजी, आप दोनों का नाम तो पहली सूची में भी है । क्यों न वहीं वोट डाल दें । लंबी लाइन में लगने से बच जाएंगे ।”

लाइन में लगने से बच जाएं और तुरंत मतदान करके छुट्टी पा जाएं इससे भला और क्या हो सकता था । लाइन छोड़ हम वहीं पहुंच गए । उस कमरे के प्रभारी ने आरंभ में मेरी पहचान पर शंका जाहिर की लेकिन फिर मान लिया कि मैं सही मतदाता हूं । मतदान की शेष प्रक्रिया संपन्न की गई और मैंने मशीन का वांछित बटन दबाकर मत व्यक्त कर लिया । लेकिन समस्या मेरी पत्नी के साथ आई जब मतदान कर्मचारियों ने कहा कि उनका नाम सूची में “विलोपित”श्रेणी में है । यानी वे मतदाता हुआ करती थीं लेकिन अब नहीं रहीं । अजीब बात कि पति-पत्नी सालों से साथ-साथ अपने निजी मकान में रहते आए हैं और उनमें से एक का नाम गायब ! बहस करना निरर्थक रहा । इस विलोपित श्रेणी को मतदाता सूची में रखने का औचित्य हमारी समझ से परे था । हम बाहर निकले और मेरी पत्नी वापस उसी लाइन में फिर से लग गईं जिसे छोड़कर आईं थी । इस बीच लाइन में और लोग जुड़ चुके थे, जिसके कारण अतिरिक्त विलंब झेलना पड़ा । डेड़एक घंटे में वह अपना मत दे पाईं ।

मैंने मतदाताओं की परस्पर भिन्न दो-दो सूचियों की बात ऊपर कही है और बता चुका हूं कि कुछ व्यक्तियों के नाम दोनों में मौजूद थे । ऐसी सूचियों को मैं आयोग की अकुशल एवं दोषपूर्ण कार्य प्रणाली के प्रमाण के तौर पर देखता हूं । ऐसी सूची दोहरे मतदान की संभावना कैसे पैदा करती हैं इसे मैं एक अनुभव से स्पष्ट करना हूं ।

मतदान के दूसरे दिन प्रातः मैं अपने घर के पास की सब्जीसट्टी पर गया । वहां मैं एक परिचित युवक के पास पहुंचा जो ठेले पर सजाकर सब्जी बेच रहा था । खरीद-फरोख्त के दौरान उसने पूछा, “अंकल, कल वोट तो दिया ही होगा । किसको दिया वोट ?” 

मैंने अपने वोट के बारे में बताने के बजाय उल्टे उसी से पूछ डाला, “तुम बताओ तुमने किसको वोट दिया ?”

  “मैंने तो दो-दो वोट डाले कल, दोनों अलग-अलग जनों को ।”उसका उत्तर था ।

“सो कैसे ?” मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा ।

“हुआ यह कि मैं सुबह ही वोट डाल आया । घर लौटने पर मेरे पड़ोसी दोस्त ने कहा, ‘तुम्हारा नाम तो दोनों लिस्ट में है । क्यों न दुबारा वोट डाल आते हो ।’सो मैं दुबारा वोट डाल आया ।”

“दूसरी बार भी उसी प्रत्याशी को वोट दिया होगा ।” मैंने अनुमान लगाया ।

“नहीं अंकलजी, पहली बार मैंने मोदी को वोट दिया और दूसरी बार केजरीवाल को । असल में दोनों ही अच्छे हैं । इसलिए दोनों को ही एक-एक वोट दे दिया ।” उसका जवाब था ।

“लेकिन तुम्हारी अंगुली पर तो स्याही का निशान रहा होगा; दुबारा कैसे वोट डाल पाए ?” मैंने सवाल किया ।

“दरअसल मेरे दोस्त ने उसकी काट भी मुझे बताई । उसने कहा कि निशान ताजा है सो पपीते के सफेद चेप से साफ हो जाएगा । वही मैंने किया । यों टॉयलेट की सफाई में इस्तेमाल होने वाले एसिड से भी साफ हो जाता है ।”

“अच्छा ठीक है, अभी तुम अपने ग्राहकों को सब्जियां तौलो ।” कहते हुए मैं घर लौट आया ।

इतना बता दूं कि वह युवक किसी अन्य पोलिंग बूथ का मतदाता था । उसकी बातें सुनकर मैं सोचने लगा कि अगर मतदाताओं के नाम एकाधिक सूचियों में हों और वे अंगुली पर लगा निशान मिटाकर दुबारा-तिबारा मत प्रयोग करें तो चुनाव परिणाम विश्वसनीय नहीं रह सकते । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, निर्वाचन, राजनिति, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Election, experience, Hindi literature, politics, Short Stories

One response to “एक नहीं दो बार वोट, और वह भी एक को नहीं

  1. यह तो हद दर्जे की लापरवाही (निगलेक्ट) है। इतना ताम-झाम रखने के बाद भी चुनाव आयोग यदि अपने मूलाधार यानि मतदाता सूची को ही विश्वसनीय नहीं बना सकता तो चुनाव को ईमानदार कैसे कहा जाये। इंक अगर बेहतर हो भी जाये तो भी दोहरी सूची की स्थिति में कर्मचारियों की मिलीभगत से तो इस भूल का दुरुपयोग किया ही जा सकता है। अफसोस!

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