कबाड़ की कीमत एक रुपया

मैं अपने घर के अहाते में टहल रहा हूं । सड़क पर भोंपू की आवाज आती है – भोंपू जो आजकल मुश्किल से ही कहीं प्रचलन में दिखाई देता है । मैं समझ जाता हूं कि एक कबाड़ी घर के सामने से गुजरने वाला है । कबाड़ खरीदकर ले जाने वाले इस धंधे में लगे अन्य लोग भी इधर से गुजरते हैं, लेकिन कोई दूसरा भोंपू बजाते हुए नहीं निकलता है । हां, “रद्दी अखबार वालाऽ…”, “रद्दी कागज अखबार बेचोऽ…”, “कागज लोहा पेपर प्लास्टीकऽ…” जैसे बोल जोर-जोर से बोलते हुए वे लोग गुजरते जरूर हैं । जब भी संयोग से मुझे भोंपू की आवाज सुनाई देती है तो मैं समझ जाता हूं कि वही कबाड़ वाला गुजर रहा होगा । वह रोज ही यहां से निकलता है या दो-तीन दिन में एक बार यह मैं बता नहीं सकता ।

मुझे याद नहीं कि भोंपू वाले इस “कारोबारी”को मैंने पहले कभी कबाड़ का सामान दिया हो । मेरा मन होता है कि आज इसी को कबाड़ सौंप दूं । मैं अखबार की रद्दी, प्लास्टिक की बोतलें, या इसी प्रकार की बेकार हो चुकी चीजें घर में अधिक जमा नहीं होने देता हूं । बीच-बीच में जब भी ध्यान आता है सड़क पर गुजरते किसी भी कबाड़ी को बुलाकर दे देता हूं । सोचता हूं आज इसी को चुना लिया जाए । मैं अपने अहाते का प्रवेशद्वार खोलता हूं और जैसे ही वह नजदीक आता है इशारे से उसे बुलाता हूं ।

मैं घर के अंदर से चार-पांच किलो पुराने अखबार उठा लाता हूं और उसे सौंप देता हूं । फिर दुबारा अंदर जाकर प्लास्टिक का एक थैला लेकर वापस बाहर आता हूं । मैंने इस थैले में कबाड़ की छोटी-मोटी चीजें जमा कर रखीं हैं । थैला उसे देते हुए कहता हूं, “ये पूरा थैला लेता जाइएगा । इसमें पड़ी कुछ चीजें अगर कबाड़ के काम की भी न हों तो कूड़े में डाल दीजिएगा ।”

“और भी कुछ है, बाबूजी ?” वह जानना चाहता है ।

“नहीं, कबाड़ का और सामान तो अभी नहीं । इतना ही इस समय है; आपकी आवाज सुनी तो सोचा आपको ही क्यों न सौंप दूं । असल में मैं घर में कबाड़ की चीजें अधिक जमा नहीं होने देता हूं । थोड़ा बहुत जो भी बीच-बीच में जमा हो जाता है ध्यान आने पर किसी न किसी को सौंप देता हूं । आज आप ही सही ।”

वह अपना तराजू-बटखरा बोरे से बाहर निकालने लगता है । मैं उसे रोकते हुए कहता हूं, “ये सब तौलने की जरूरत नहीं है; ऐसे ही रख लीजिए ।”

“ऐसे ही रख लीजिए” मेरे इन शब्दों के अर्थ वह कदाचित यह लेता है कि इतना कम तौलने की जरूरत ही क्या है, जो उचित लगे अंदाजे से दे दीजिए । परंतु मेरा मंतव्य दरअसल ऐसा है नहीं । मैं उसे बेचने का इरादा नहीं रखता, बल्कि उसे मुफ्त में दे देना चाहता हूं । मैं कहता हूं, “अरे भई, इसका कोई पैसा नहीं लेना है मुझे । आप यूं ही रख लीजिए ।”

“मुफ्त में लेना भीख मांगना जैसा होगा, बाबूजी । मैं अपने काम से निकला ही हूं । अभी बोहनी का वक्त है, इसलिए आपको कुछ तो लेना ही होगा ।” कहते हुए वह अपना बटुआ खोलकर मेरी ओर बढ़ा देता है ।

“ठीक है, आप कहते हैं तो कुछ ले लेता हूं । बोलिए कितना लूं ?” मैं उससे पूछता हूं ।

“जो आप ठीक समझें ।”

“ठीक है, एक रुपया ले रहा हूं । चलेगा ?”

“ठीक है, जैसा आप चाहें । … लेकिन आप ये अखबार, प्लास्टिक बगैरह मुफ्त में क्यों देना चाहते हैं ?” वह जिज्ञासा व्यक्त करता है ।

“मैंने पिछले कुछ सालों से बेकार हो चुकीं घर की चीजें कबाड़ के तौर पर बेचना बंद कर दिया । मैंने सोचा कि ये सब चीजें मेरे लिए तो बेकार हैं ही; मेरी आमदनी इन पर आधारित तो है नहीं । मैं किसी को दे दूं तो मुझे किसी प्रकार के नुकसान का एहसास होने वाला नहीं । लेकिन कबाड़ की खरीद-फरोख्त में लगे आदमी के लिए ये चीजें रोजीरोटी का आधार हैं । उन्हें तो सभी जगह से इन्हें इकट्ठा करना होता है । उनके लिए ये कीमती चीजें हैं । इसलिए मेरे मन में एक बार विचार आया कि घर में बेकार पड़ी चीजें किसी को क्यों न दे दूं जिसके लिए उसका महत्व हो । बस तब से यह चल रहा है ।”

“ विचार तो अच्छा है, बाबूजी, लेकिन ऐसा कहां कोई सोचता है । अच्छी माली हालत वाला भी कहीं से दो पैसा मिल रहा हो तो छोड़ना नहीं चाहता । … अच्छा बाबूजी, चलूं, नमस्ते ।” कहते हुए वह विदा हो लेता है । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, नीति, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Morals, Short Stories

3 responses to “कबाड़ की कीमत एक रुपया

  1. लेकिन ऐसा कहां कोई सोचता है
    सच ही कहा उसने अच्छा संस्मरण

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