प्लास्टिक थैलियां इस्तेमाल न करने की बात और पहले आप पहले आप की चिरस्थायी नीति!

चंद रोज पहले की ही बात है । मैं अपने किराने-परचून की दुकान पर गया था घरेलू इस्तेमाल की दो-चार चीजें खरीदने के लिए । मैं अपने साथ सदा ही कपड़े का थैला ले जाया करता हूं उसमें सामान भरकर लाने के लिए । मेरा दुकानदार जानता है कि मैं पतले प्लास्टिक के थैलों के इस्तेमाल का धुर विरोधी हूं । जब कभी उसका सहायक प्लास्टिक के थैले में कोई चीज लाकर देने लगता है तो वह उसे टोक देता है, “देखते नहीं आप थैला लेकर आये हैं ? यह देखना भूल जाते हो कि कौन ग्राहक थैला लेकर आया है और कौन नहीं।”

मैं खुद भी उसके सहायक को अक्सर टोक देता हूं, अरे भई तपाक-से प्लास्टिक में सामान भर के मत थमा दिया करो । खुद भी कभी-कभार अपनी तरफ से ग्राहकों से कह दिया करो कि बाबूजी, थैला लेकर आते तो ज्यादा अच्छा होता । कोई तुम्हें मारने थोड़े ही आएगा । अगर कोई प्लास्टिक की मांग पर अड़ जाए तो दे दिया करो । लेकिन एक बार कह तो सकते हो न ।”

अपने शहर वाराणसी में प्लास्टिक की बहुत पतली थैलियों का दुकानदारी में बेरोक-टोक इस्तेमाल होता है । मेरी जानकारी में ऐसी थैलियों पर काननूी रोक है । लेकिन कानून बेचारा क्या करें ? उसके अपने हाथ-पांव तो होते नहीं कि खुद चलकर कानून के उल्लंघन को रोके । और प्रशासनिक तंत्र के पास काम का इतना बोझ रहता है कि वह हाथ पर हाथ रखकर सब कुछ होते हुए देखने में ही अपनी भलाई पाता है । अतः कानून तो बन जाते हैं, लेकिन उससे वस्तुस्थिति नहीं बदलती । जो अनर्थ लोग करने लगते हैं वह बदस्तूर चलता रहता है । हर कोई इस बात का इंतिजार करता है कि कानून डंडा लेकर दौड़ते हुए उसके पास आये और उसे रोके । कोई मुझे टोके इसका इंतिजार किए बिना ही मैं खुदबखुद कानून का पालन करूंगा ऐसी सोच ऊपर वाले ने उसे शायद दे ही नहीं रखी है ।

मेरे दुकानदार ने एक-दो बार अपने ग्राहकों को कपड़े की थैलियां बांटकर उनसे आग्रह किया था कि वे उन थैलियों को लेकर आएं । लेकिन जब लोगों ने कसम खा रखी हो कि जब तक उनका वश चलेगा वे कोई भला काम नहीं करेंगे, तो भला चीजें कहां सुधरने वाली । लिहाजा दुकानदार ने ही अपनी गलती सुधार ली । यों उसने मुझे बताया था कि प्लास्टिक का इस्तेमाल कुल मिलाकर उसे महंगा ही पड़ता है । लेकिन करे क्या ग्राहकों को नाखुश भी तो नहीं कर सकते !

उस दिन की घटना पर वापस लौटता हूं । मूल्य चुकता करके जब मैं अपना सामान साथ लाए कपड़े के झोले में संभाल रहा था तब दुकानदार का सहायक प्लास्टिक के एक बड़े-से थैले में अन्य ग्राहक का सामान भरकर ले आया । ग्राहक महोदय मेरे ही बगल में खड़े थे । अपरिचित होते हुए भी मैंने विनम्र भाव के साथ मुस्कराते हुए उनसे कहा, “झोला साथ लेकर अगर  आप भी सामान खरीद ले जाया करें तो अच्छा होगा । देखते ही होंगे कितना प्लास्टिक सड़कों-नालियों में पड़ा रहता है । अपने शहर में इसके निस्तारण का कोई प्रबंध तो है नहीं । अपनी तरफ से हम लोग इतना भी कर लें तो कुछ अंतर तो पड़ेगा ही ।”

मैं जब भी खरीद-फरोख्त करता हूं तो प्लास्टिक की थैली के लिए यथासंभव मना कर देता हूं । मेरी पत्नी एवं मैं आम तौर पर अपने साथ थैला आदि लेकर चलते हैं । कभी-कभार दुकानदार भी कपड़े के थैले में सामान भरके दे देता है । मैं अक्सर दुकानदार तथा अगल-बगल खड़े ग्राहकों को भी बिन मांगी सलाह दे बैठता हूं । ऐसी धृष्टता के साथ पेश आना मेरे स्वभाव का हिस्सा बन चुका है । और यही धृष्टता मैं इस बार भी कर बैठा । उक्त ग्राहक मेरी बात पर नाखुशी व्यक्त कर सकते थे, परंतु ऐसा हुआ नहीं । मेरी भावना को स्वीकार करते हुए बोले, “हां, आप ठीक कहते हैं, लेकिन झोला लेकर चलने की आदत ही नहीं बनी । दुकानदार प्लास्टिक के थैले में सामान दे देता है, तो उसी में सुविधा लगती है । दुकानदार ऐसे थैले देना बंद कर दे तो झोला साथ लाना शुरू हो जाए ।”

“लेकिन दुकानदार कहता है कि अनुरोध करने के बावजूद लोग अपने साथ थैला लाते ही नहीं । वे तो प्लास्टिक की थैली में ही सामान मांगते हैं । आप कहते हैं कि दुकानदार बंद करे ऐसी थैली देना, और दुकानदार कहता है कि ग्राहक मांगना बंद करें । पहले अंडा या मुर्गी वाला सवाल यहां खड़ा हो जाता है । इसलिए कुछ हो नहीं पाता ।” मैंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

वे बोले, “आप सही कह रहे हैं, मुझे कोशिश करनी चाहिए ।”

उनके इस कथन को सुनने के बाद मैंने उनसे विदाई ली और घर की राह चल पड़ा । – योगेन्द्र जोशी

 

3 टिप्पणियाँ

Filed under आपबीती, कहानी, प्रदूषण, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Pollution, Short Stories, society

3 responses to “प्लास्टिक थैलियां इस्तेमाल न करने की बात और पहले आप पहले आप की चिरस्थायी नीति!

  1. जब तक हम स्वयं एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बनेंगे तब तक कानून कुछ भी नहीं कर सकता यदि कानून से हमारी रक्षा हमारा हक़ है तो उसे सहयोग करना हमारा कर्तव्य भी है , अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ साथ चलते हैं , पॉलीथिन विश्व को नष्ट करने के लिए एक जबरदस्त कारण होगा जिसे हम आज महसूस नहीं कर रहे हैं

  2. समदर्शी

    एक उपाय और है। यहाँ भोपाल में कई किराना दुकानदारों और मॉल वालों ने प्लास्टिक थैलियों के लिए अलग से पैसे लेने शुरू कर दिए है- दो रुपये से लेकर पाँच रुपये तक। इससे ग्राहक को कपड़े या जूट का थैला लाना याद रहता है।

  3. विपिन कुमार

    बिहार मे भारत नेपाल बार्डर पर एक छोटा सा कस्बा है ।।जोगबनी।। मै वही कार्यरत हू। रोज सुबह सडक पर पडी पालीथीन को जलाना जैसे यहा फैशन सा है। इसे दुष्परिणाम के बारे में अनभिज्ञता कहे या असंवेदनशीलता क्योकि जलाने वाले शायद पढे लिखे ना हो पर सडक पर दुकानो से निकालकर फैकने वाले पढे लिखे व्यापारी ही है। लेकिन मै पिछले चार सालो से यहाॅ हू और ना जाने कितनी बार लोगो को टोकति रहता हू और इसके जहरीले धुए के भयानक दुष्प्रभाव के बारे मे बताता रहता हू। इसी क्रम मे कुछ दिलचस्प घटनाए मेरे साथ घटी। एक दिन एक वयोवृद्द पान दुकान वाले को पन्नी जलाते वक्त मैने टोका और कहा कि ये धुआ दमे और कैसर जैसे रोगो का कारण बन सकता है तो उसने तुरन्त ही पानी लिया और आग बुझा दी साथ मे धन्यवाद दिया अतः यहा केवल अनभिज्ञता थी। जब एक दिन मैने एक मेडिकल वाले को ऐसा करने से यही सब कहकर रोकने की कोशिश की तो उन्होने कहा कै अपनी फिलाशीपी अपने पास रखो अतः यहा असंवेदनशीलता थी। एक दिन जब लोग ऐसा ही कर रहे थे तो मै एक बोतल मे गन्दा पानी लेकर उनके पस गया और अलग अलग से उसे पीने को बोला तो सब ने ये कह कर मना कर दी कि गन्दा है ।। तो मैने कहा कि ये धुआ भी तो हवा को गन्दा कर रहा है पर आप इसे तो ले रहे हो ,तो वे लोग थोडा शर्म महशूस किए और चले गए एव मै उस पानी से आग बुझाकर आया।। इसी क्रम मे कभी किसी ने कहा कि उपदेश मत दो, किसी ने कहा कि ये जगह सरकारी है कोई कुट भी करे।। लेकिन मेरा काम आज भी जारी है और जारी रहेगा।।।।।

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