जहां चाह वहां राह : वे अंत में वाइस-चांसलर बन ही गये!

अपने देश में उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों का नियुक्तियां अभी तक ‘कॉलेजियम’ नाम की चयन समिति की संस्तुति के आधार पर होती आ रही थीं । इस समिति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उनके चार वरिष्टतम सहयोगी भाग लेते थे । पिछले कुछ समय से यह बहस छिड़ी हुई थी कि इस पद्धति में सही चयन अक्सर नहीं होते हैं और अपेक्षया बेहतर योग्यता वाले व्यक्तियों के छूट जाने की संभावना अधिक रहती है । मौजूदा शासन इस पद्धति को समाप्त करके उसके बदले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (नैशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमिशन) का गठन करने जा रही है, जिसमें शासन की ओर से भी कुछ सदस्य होंगे ।

कॉलेजियम पद्धति के विरुद्ध ये तर्क दिया जा रहा था कि इसमें समिति के सदस्य अपने मित्रों-परिचितों-संबंधियों के प्रति झुकाव रखते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपना लेते हों इस बात की संभावना रहती है । मैं इस पद्धति का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन यह विश्वास भी नहीं कर पाता कि नये आयोग के साथ ऐसी संभावना नहीं हो सकती । मैंने अपने अध्यापन-काल में यह अनुभव किया है कि विश्वविद्यालय जैसी संस्था में जहां चयन-प्रक्रिया प्रमुखतया साक्षात्कार पर आधारित रहती है ईमानदारी से कार्य होता हो ऐसा सामान्यतः नहीं होता । इन समितियों में प्रायः पांच या अधिक सदस्य रहते हैं, जिसके सदस्यगण आम तौर पर अभ्यर्थियों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जानते हैं अथवा उनकी सिफारिशें लिए रहते हैं । उनकी पूरी कोशिश रहती है कि जिनके प्रति वे झुकाव रखते हैं उनका चयन हो ।

वाइस-चासंलरों, जिन्हें कुछ संस्थाओं में कुलपति कहा जाता है तो अन्यत्र उपकुलपति, की नियुक्ति तो अधिक निष्ठा से होनी चाहिए, किंतु उसमें भी ‘अपनों’ को उपकृत करने की परंपरा रही है । इस अहम पद के लिए कदाचित सभी जगह केन्द्र अथवा राज्य सरकार प्रायः तीन सदस्यों की एक ‘खोज समिति’ (सर्च कमेटी) का गठन करती है, जिसके द्वारा संस्तुति-प्राप्त प्रत्याशियों में से किसी एक की नियुक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल (जो भी इस कार्य के लिए अधिकार-संपन्न हो) द्वारा की जाती है ।  मेरा उद्येश्य इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करना नहीं है । कॉलेजियम के गुणदोषों पर टीवी बहसों को देखते और तत्संबंधित लेखों को पढ़ते समय मुझे एक घटना याद आती रही कि किस प्रकार मेरे एक परिचित ने वाइस-चांसलर (वीसी) पद के लिए जी-जोड़ प्रयास किया और सफल भी हुए । उनकी नियुक्ति में संबंधित जनों ने पर्याप्त ईमानदारी बरती होगी ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जिस समाज में भ्रष्ट आचरण का मतलब केवल अवैध तरीके से धन कमाना लिया जाता हो, लेकिन जाति-धर्म आदि के आधार पर किसी के पक्ष में निर्णय लेना सामान्य परंपरा बन चुकी हो, परिचितों-मित्रों के भाई-भतीजों को अहमियत दी जाती हो, व्यक्ति के विवेकाधीन का अर्थ उसकी मनमर्जी माना जाता हो, सिफारिशें करना/मानना आम चलन में हो, उस समाज में कोई भी पद्धति अपनाई जाये सही कार्य होगा इस पर कम से कम मैं भरोसा नहीं कर पाता ।

अस्तु, मैं उन सज्जन के वीसी बनने की कहानी पर लौटता हूं । संबंधित व्यक्तियों/स्थानों को संदर्भ हेतु मैं काल्पनिक नामों से संबोधित कर रहा हूं । कोई दस-बारह वर्ष पुरानी घटना होगी जब मैं अपने दो सहशिक्षकों के साथ सांध्यकालीन चाय पीने हेतु विश्वविद्यालय (वि.वि.) परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर जा रहा था । मंदिर से किंचित दूरी पर ही उन सज्जन से भेंट हो गई जो रास्ते के दूसरी ओर से आ रहे थे । शिष्टाचार के नाते हम कुछ देर के लिए रुक गये और उनसे सामान्य बातचीत करने लगे । लगे हाथ हम में से किसी ने उन्हें छेड़ दिया, “अरे भई सक्सेना साहब, हमने सुना है कि आप जल्दी ही कौशाम्बी वि.वि. के वीसी बनने वाले हैं । कब जा रहे हैं अपने नये दायित्व पर ?”

“अरे यार क्या बताएं सब गड़बड़ हो गया । सब कुछ लगभग तय हो चुका था । चयन समिति में अपने भी परिचित थे, अतः अपना नाम तो आगे बढ़ा ही था । मैं पिछले कुछ समय से गर्वनर महोदय के पीए से भी मिलता आ रहा था । हाल ही में उन्होंने बताया भी था कि आप अपनी नियुक्ति हुई ही समझो, बस फाइनल सिग्नेचर होने की देरी है । मैं तो पूरी तरह आश्वस्त था, लेकिन क्या बताएं ! …” फिर मेरे सहयोगी की ओर मुखातिब होकर कहने लगे, “अरे, आपके वे प्रोफेसर शर्मा हैं न,  … आप तो उन्हें जानते ही हैं । पता नहीं वे कहां से टपक पड़े । बस, हमारा पत्ता काट दिया उन्होंने । धोखा खा गए ।”

हम लोगों ने चुटकी ली, “ये सब तो चलता रहता है । अभी खेल खत्म थोड़े ही हो गया है । कोशिशें जारी रखेंगे तो फिर मौका मिलेगा । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं ।”

इतना कहते हुए हमने उनसे विदाई ली और चल दिए मंदिर की ओर चाय पीने । अपनी मंजिल तो मंदिर के पास का टी-स्टाल था न कि प्रदेश का राजभवन ।

सक्सेना साहब के प्रयास चलते रहे और एक दिन खबर मिली कि वे राज्य के किसी अन्य वि.वि. के वीसी नियुक्त हो गये हैं । उनकी पहुंच ने अंततः उन्हें मंजिल तक पहुचा ही दिया । यह कोर्ई माने नहीं रखता कि बाद में उन पर लगे आरोपों की चर्चा भी प्रादेशिक अखबारों में छपी थीं । अहम बात तो यह है कि पूर्व-कुलपति रह चुकने का तमगा तो उन्हें मिल ही गया । ऐसे तमगों का भी अपना आनन्द होता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

1 टिप्पणी

Filed under कहानी, किस्सा, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories, society

One response to “जहां चाह वहां राह : वे अंत में वाइस-चांसलर बन ही गये!

  1. सब जगह तिकड़म का कमाल है , अब योग्यता कोई मायने नहीं रखती

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