जेब में पैसा लेकर न चलने का खामियाजा

किसी व्यक्ति के अनुभवों को मैं मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटकर देखता हूं । पहले में वे हैं जो उन घटनाओं से जुड़े होते हैं जिनका व्यक्ति स्वयं भोक्ता के रूप में अनुभव करता है, और जो कभी-कभी उसके स्मृति-पटल पर लंबे अर्से के लिए अंकित हो जाते हैं, सुस्वप्न अथवा दुःस्वप्न के तौर पर । दूसरी श्रेणी के अनुभवों का साक्षात्कार व्यक्ति तब करता है जब वह संबंधित घटनाओं को निष्पक्ष दर्शक के तौर पर अपने समक्ष घटित होते देखता है । आम तौर पर ये घटनाएं भुला दी जाती हैं क्योंकि उनका कोई प्रभाव उसके जीवन पर नहीं पड़ता है । फिर भी तात्कालिक स्तर पर वे दिलचस्प हो सकते हैं और उनमें सार्थक संदेश निहित पाया जा सकता है । ऐसे ही एक वाकये का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं ।

आजकल मैं अपने शहर वाराणसी से दूर अपेक्षया अपरिचित एक महानगर में हूं चार-छः सप्ताह के लिए । आज मुझे कुछ फल खरीदने थे जिसके लिए मैं प्रातःकाल अपने स्थानीय आवास से निकल पड़ा । यहां बाजार में फलों की सभी दूकानें अगल-बगल एक ही जगह पर हों ऐसा नहीं है । केले बेचने वाले ठेले पर उन्हें सजाए हुए रास्तों पर कुछ-कुछ दूरी पर यत्रतत्र मिल जाते हैं । मेरा सोचना हैं कि ऐसा वे सकारण करते हैं । मैंने देखा है कि राह चलते कई लोग दो-चार केले खरीदकर वहीं पर खा लेते हैं । ऐसा अन्य फलों के साथ आम तौर पर नहीं होता है, जिन्हें लोग घर या आवास पर खाने के लिए साथ लिए जाते हैं । इसलिए ठेलों पर केलों को सजाकर बेचते हुए विक्रेता उन जगहों पर भी मिल जाते हैं जहां अन्य फल न बेचे जा रहे हों ।

अनार-अमरूद आदि फलों को खरीदने के बाद मैं केलों वाले एक ठेले पर रुक गया । केला-विक्रेता एक युवक से उलझ रहा था । मैं रुक गया यह सोचते हुए कि पैसे के लेन-देन की बात चल रही होगी । मैंने देखा कि उनके बीच बहस कुछ लंबी ही खिंच रही है । मुझे भी जिज्ञासा हुई मामले को समझने की, इसलिए इंतिजार करने लगा । अंत में जब वह युवक पैसा चुकता करके चल दिया तो मैंने विक्रेता से केले लिए और उसकी कीमत अदा करने लगा । लगे हाथ मैंने उससे पूछ लिया, “क्यों भई, क्या बात थी जो काफी देर तक आप दोनों बहस में उलझे हुए थे ?”

“अरे सा’ब, आपको क्या बताएं । वे जनाब घंटा भर पहले मुझसे केला लेकर खा गये, और जब पेमेंट की बात आई तो बोले कि अभी मेरे पास पैसा नहीं, बटुआ घर पर छूट गया है । कहने लगे शाम को जब कंपनी से लौटूंगा तो पैसा दे दूंगा ।” केला विक्रेता का जवाब था ।

वह आगे बोला, “मैंने उनसे कहा कि जब आपके पास पैसा ही नहीं था तो केला खाने की क्या जरूरत थी । पहले अपनी जेब टटोल लेनी चाहिए थी । मैं न आपको जानता हूं और न ही आपको इधर से आते-जाते कभी ही देखा है । तो फिर उधारी कैसे दे दूं ? ऐसे तो मेरा बिजनेस चल चुका । अगल-बगल का कोई दुकानदार कहे तो भी कुछ भरोसा कर सकता । जब तक पेमेंट नहीं होगा आप नहीं जाएंगे ।”

विक्रेता के कथनानुसार जब उस युवक ने देखा कि उसका अनुरोध कारगर नहीं हो पा रहा है तो वह अपना मोबाइल धरोहर के तौर पर वहां छोड़ गया और चला गया अपनी कंपनी या अन्यत्र पैसे का प्रबंध करने । मैं जब केला खरीदने जा रहा था तभी वह लौटा था पैसा चुकता करने और मोबाइल वापस लेने । अपनी नाखुशी व्यक्त करने के लिए ही वह उस समय विक्रेता से उलझा हुआ था ।

इस घटना में एक संदेश छिपा है । महानगरीय जीवन की खासियत यह है कि लोगों की भीड़ में प्रायः सभी अजनबी होते हैं । जिंदगी की भागदौड़ में पड़ोसी तक पड़ोसी से अपरिचित बना रहता है । राह चलते कोई किसी में दिलचस्पी नहीं लेता । ऐसे में किसी से मौके-बेमौके मदद की उम्मीद नहीं की जा सकती । गंभीर दुर्घटना के समय तक विरले ही मदद के लिए आगे बढ़ते हैं । ऐसी स्थिति में आदमी को जेब में बिना पैसे के चलना ही नहीं चाहिए । पैसा ही मित्र सिद्ध होता है ! – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “जेब में पैसा लेकर न चलने का खामियाजा

  1. सब कुछ भौतिकता से जुड़ गया है,व्यक्ति ने स्वार्थी भावना वश एक दूसरे पर विश्वास करना भी छोड़ दिया है

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