आल्हादित होना उन बच्चों का कुछ पलों के लिए

मैं यदाकदा अपने शहर से बाहर अन्यत्र मित्र-परिचितों से मिलने अथवा पर्यटन हेतु निकल जाता हूं । इन अवसरों पर प्रातः-सायं टहलने निकलने पर मैं अपनी जेब में कभी-कभार एक कैमरा भी रख लेता हूं, यह सोचकर कि कहीं कोई दृश्य कैमरे में कैद करने का मन हो जाय तो वह साथ रहे । आवश्यक नहीं कि मैं दर्शनीय स्थलों की ही तस्वीरें खींचूं, जैसा कि आम पर्यटक करता होगा । मुझे कुछ नया, अवांछित, घृणास्पद ही सही, या अन्यथा, कुछ भी दिखे वह मेरे लिए तस्वीर का विषय बन सकता है ।

कुछ समय पहले मैं मुंबई गया था अपने बेटे के पास जो पश्चिम भांडुप में रहता है । उसका आवास एलबीएस रोड (लाल बहादुर शास्त्री मार्ग) के निकट एक बहुमंजिली इमारत में है । मैं अधिकांश दिनों उस इमारत के परिसर में ही टहला करता था, किंतु कभी-कभी उक्त सड़क पर भी निकल जाता था । एक प्रात मैं कैमरा साथ ले गया था । मैंने देखा कि सड़क के किनारे फुटपाथ पर कुछ लोग (खानाबदोश) अपने रहने का ठिकाना बनाए हुए हैं । मैंने एक तस्वीर खींच ली जो यहां प्रस्तुत है । तीन खंडों की इस तस्वीर के आरंभ में वही है ।

तस्वीर  खींचकर मैं आगे बढ़ गया । दो-चार कदम बढ़ा था कि मैंने दो बच्चों – कदाचित् उन्हीं खानाबदोशों के – को अपने आगे जाते हुए देखा । वे अपने हाथों में पारदर्शी प्लास्टिक की बोतलें तथा एक ‘गैलन’(करीब एक गैलन की क्षमता वाला प्लास्टिक का बर्तन या कनस्तर) लिए हुए थे और उन्हें हाथों से ढोल-नगाड़े के माफिक पीटकर आवाज निकाल रहे थे । मैंने पीछे से उनकी तस्वीर खींच ली (दी गयी तस्वीर में दूसरा खंड) । मेरा मन हुआ कि आगे बढ़कर उनकी सामने से भी तस्वीर ले लूं ।

जैसे ही मैं उनके सामने पहुचा जिज्ञासु बच्चों की भांति उनकी नजर मेरे कैमरे पर पड़ी । लालायित-से वे बोल पड़े, “हमारी भी एक फोटो खींच दो न” । और मैंने फोटो खींची और उन्हें दिखा दी (तीसरे खंड की तस्वीर)। वे खुशी के मारे एक-दूसरे को और फिर मुझे देखकर खिलखिलाने लगे । वे प्रसन्न थे, आल्हादित थे, गोया कि उन्हें कुछ कीमती चीज देखने को मिल गई हो । मैंने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ हाथ हिलाया और आगे बढ़ गया ।

रास्ते में मैं सोचने लगा कि आजकल तो मध्यवर्गीय और उसके ऊपर के परिवारों में कैमरे की उपलब्धता आम बात है । उन परिवारों में गाहे-बगाहे तस्वीरें खिंचती ही रहती हैं । लेकिन इन बच्चों के लिए किसी अपरिचित व्यक्ति के द्वारा उनकी फोटो खींची जाना ही खुशी की बात थी, भले ही वह फोटो उन्हें दुबारा देखने को ही न मिले । अवश्य ही यह खुशी तात्कालिक एवं अस्थाई होती है, मात्र कुछ मिनटों की, लेकिन होती जरूर है । अथवा खुशी कुछ घंटों तक रह सकती है, जब तक कि वे अपने लोगों के बीच जाकर उसकी चर्चा न कर लें । मेरे लिए उनका खुश हो जाना अपने किस्म का एक अनुभव था ।  जीवन में खुशियां क्षणिक, अल्पकालिक या अपेक्षया दीर्घकालिक होती हैं किंतु शाश्वत नहीं । – योगेन्द्र जोशी

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