मीटर से भाड़ा तय करने वाले ऑटोरिक्शा

मैं यदाकदा दिल्ली एवं मुम्बई जैसे महानगरों का चक्कर लगाता रहता हूं । अभी हाल ही में मैं कुछ दिनों के लिए मुम्बई रहा । तब मुझे अपने पौत्र के जन्म के समय अस्पताल के कई चक्कर लगाने पड़े थे । उस दौरान मेरे गमनागमन का साधन ऑटोरिक्शा ही रहा । जाहिर है कि मेरा सापका अलग-अलग ऑटारिक्शॉ वालों से पड़ा । तब मुझे पता चला कि मुम्बई मे ऑटोरिक्शे बिना मीटर के नहीं चलते । मेरा अनुभव दिल्ली में बिल्कुल उल्टा रहा है । मैंने पाया है कि ऑटोरिक्शों पर मीटर तो अवश्य लगे रहते हैं, लेकिन उनका प्रयोग यात्रियों का भाड़ा तय करने में होता है ऐसा मुझे कभी नहीं लगा । आम तौर पर ऑटारिक्शा वाले के साथ मोलभाव करके भाड़ा तय करना पड़ता है । मैंने अक्सर देखा है कि वे वाजिब से डेड़-दो गुना भाड़ा मांगते हैं और मोलभाव के बाद भी सही भाड़े पर वे तैयार हो गये होंगे इस बात को लेकर अश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जिसे भाड़े का अंदाजा न हो उसके लिए धोखा खा जाना स्वाभाविक है । ऐसे लोगों को ‘प्रिपेड’ऑटोरिक्शा की शरण में जाना पड़ता है ।

लेकिन इधर चार-छः दिनों के दिल्ली प्रवास के दौरान मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां भी कुछ ऑटोरिक्शा वाले मीटर के अनुसार भाड़ा लेने को तैयार होने लगे हैं । इस बात का प्रथम अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक दिन अपने गंतव्य पर ऑटोरिक्शा के माध्यम से गया । मैंने अधिकांश दूरी दिल्ली की मेट्रो रेलसेवा से तय की और शेष भाग के लिए ऑटोरिक्शा भाड़े पर लिया । मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद प्लेटफॉर्म से बाहर आकर मैंने एक ऑटोरिक्शा वाले से पूछा कि क्या वह अमुक स्थान को चलेगा । वह तैयार हुआ तो भाड़ा पूछा, “कितना पैसा लेंगे ?” उत्तर मिला, “सत्तर रुपया लगेगा ।”

मेरा अगला सवाल था, “इतना तो ज्यादा है । वहां तक का इतना होता नहीं । … अच्छा, आपके ऑटोरिक्शा पर मीटर लगा है क्या ? … और वह काम भी करता है क्या ?”

जवाब था, “मीटर है, सा’ब । मीटर से चलेंगे क्या ? मीटर से भी वही पड़ेगा ।”

मैंने कहा, “ठीक है, मीटर से ही चलिए । जितना भी लगे देखा जाएगा । दिल्ली में मीटर के हिसाब से भाड़ा तय करने का अनुभव भी तो ले लें । पहली बार देख रहा हूं कि कोई मीटर से भी चलने को तैयार है ।”

गंतव्य पर पहुंचने पर मीटर ने उनसठ रुपया – एक कम साठ रुपया! – भाड़े की रीडिंग दिखाई । मैंने ऑटोरिक्शा चालक को साठ रुपया देते हुए कहा, “यह तो साठ भी नहीं हुआ; आप तो सत्तर मांग रहे थे ।”

“इसी इलाके के फलां सिरे तक चले होते तो इतना हो जाता ।” उसने सफाई पेश की ।

बात खत्म हुई और मैं आगे बढ़ गया ।

अगले दिन मुझे कहीं अन्यत्र जाना था । मैं निकटतम चौराहे पर गया और वहां खड़े ऑटोरिक्शा चालकों से पूछा । उनमें से एक मुझे गंतव्य तक पहुंचाने को तैयार हो गया । बीते दिन के अनुभव को ध्यान में रखते हुए मैंने पूछा, “आपके वाहन पर मीटर लगा हुआ दिख रहा है; काम करता है क्या ? मैं मीटर के हिसाब से चलना चाहूंगा ।”

उसने जवाब दिया, “मीटर है और वह चलता भी है । मैं उसी के हिसाब से भाड़ा लूंगा । दरअसल मैं मीटर से ही चलता हूं । ऐसा करने पर पैसेंजर से झक-झक नहीं करनी पड़ती है ।”

“ताज्जुब है । मैं तो देखता आया हूं कि यहां ऑटोरिक्शों पर लगे मीटर अक्सर काम तक नहीं करते और जिनके काम करते भी हैं वे मीटर से चलने को तैयार नहीं होते ।” मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

उसने उत्तर दिया, “अब माहौल कुछ बदल रहा है । कई पैसेंजर अब मीटर से चलने की बात करते हैं और कई आटो-ड्राइवर उसके हिसाब से चलने भी लगे हैं । बारगेनिंग के मामले में पैसेंजर को शक बन रहता है कि आटो-भाड़ा कहीं अधिक तो नहीं लिया जा रहा है और कभी-कभी वे ड्राइवर से उलझ भी जाते हैं । मैं तो अब मीटर से ही चलता हूं ।”

उसकी बात सुन मुझे भरोसा होने लगा कि मुम्बई की भांति यहां भी देरसबेर ‘मीटर्ड’आटो चलने लगेंगे । – योगेन्द्र जोशी

Tags:  आटोरिक्शा, autorickshaw, आटोरिक्शा भाड़ा, autorickshaw charges, प्रिपेड वाहन, prepaid vehicle,  मोलभाव, bargaining

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s