आदमी जीता चला जाता है, आखिर क्यों ? – एक प्रश्न

मैं अपने घर से निकल कर सामने के मुख्य मार्ग पर प्रातःकाल सजने वाली सब्जी-विक्रताओं की दुकानों की ओर चल पड़ता हूं । ये दुकानें घर से बहुत दूर नहीं हैं, फिर भी मैं साग-सब्जी प्रतिदिन नहीं खरीदता, बल्कि एक बार में 2-3 दिनों के लिए खरीद लेता हूं ।

रास्ते में मुझे एक मिनीट्रक खड़ी दिखती है जिसका पिछला हिस्सा मेरे सामने है । उसका पिछला दाहिना चक्का सड़क के पक्के हिस्से में है तो दूसरा किनारे की कच्ची जमीन पर । किंचित दूर से मुझे उसके एक कोने पर एक वृद्ध महोदय खड़े दिखते हैं । आगे बढ़ते हुए मैं उनके निकट पहुंचता हूं और देखता हूं कि वे थोड़ा झुकते हुए जमीन पर पड़ी अपने सहारे की छड़ी उठाने का असफल प्रयास कर रहे हैं । उनके कपड़ों को देख मुझे नहीं लगता कि वे किसी खाते-पीते परिवार से होंगे । वे शायद वृद्धावस्था के चलते अशक्त हो चुके होंगे, अथवा यह भी संभव है कि वे शारीरिक अस्वस्थता के शिकार हों । मुझे लगता है कि उन्होंने छड़ी को ट्रक के सहारे खड़ा किया होगा, लेकिन वह सरककर जमीन पर गिर पड़ी होगी । अस्तु, मैं छड़ी उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं और आगे बढ़ जाता हूं ।

ट्रक के आगे पहुंचने पर मुझे लगता है कि उनका कोई और सामान भी शायद जमीन में पड़ा है । मैं मुड़कर देखता हूं कि सड़क पर उनके पैरों के निकट धूसर-सलेटी रंग का थैला पड़ा है जिसे वे उठाने का यत्न कर रहे हैं । मैं लौटकर उनके पास आता हूं और जमीन से थैला उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं । वे उसे कंधे पर लेने की कोशिश करते हैं । मैं उनकी मदद करता हूं किंतु थैला कंधे पर टिकता नही और हाथ पर कलाई तक सरक जाता है । मैं दो-एक बार प्रयास करता हूं परंतु सफलता नहीं मिलती है । अंत में झोले को कलाई के सहारे लटकाते हुए उसके उपरी हिस्से को मुट्ठी में पकड़े रहने की सलाह देता हूं । वे मुश्किल-से सुनाई दे सकने वाली धीमी आवाज में मुझे धन्यवाद देते हैं । और मैं आगे बढ़ जाता हूं ।

आगे बढ़ते हुए और वांछित सामग्री खरीदने के बाद लौटते हुए मैं एक वैचारिक द्वंद्व से घिर जाता हूं । मन में एक प्रश्न उठता है, ऐसा प्रश्न जो पहले भी कई बार मेरे मन में उठ चुका है । मैं हर बार उसका उत्तर खोजने की चेष्टा करता हूं, कभी खुद चिंतन-मनन की प्रक्रिया अपनाकर तो कभी चित-परिचितों से साथ विचार-मंथन करके । मेरा प्रश्न अपने स्थान पर आज भी यथावत है । प्रश्न है कि मनुष्य क्यों जीता चला जाता है ? क्यों कभी यह नहीं सोचता कि काफी हो चुका है, अब मुझे इस धरती को अपने संसाधनों के साथ दूसरों के लिए छोड़ देना है । मृत्यु को हम भयावह, घृणास्पद, सर्वथा त्याज्य इत्यादि नकारात्मक विशेषणों से क्यों जोड़ते हैं ? मैं उन लोगों के मामलों से परिचित हूं जो हताश-निराश हो चुकते हैं, जिन्हें यह लगने लगता है कि उनकी मनोकामनाएं पूरा नहीं हो सकती हैं, और उस स्थिति से फलीभूत जीवन की कटुता का सामना करने का साहस खो बैठते हैं और अपनी इहलीला समाप्त कर देते हैं । जीवन के प्रति उनका मोह समाप्त नहीं होता है अपितु वे वस्तुस्थिति झेलने की सामर्थ्य खो बैठते हैं । मैं दूसरी श्रेणी के उन लोगों की बात करना चाहता हूं जिनके सामने ऐसी समस्या न हो, फिर भी जो सोचते हों कि जीवन के प्रति कभी न समाप्य मोह क्यों हो ? हम कभी हंसते हुए लेकिन पूर्ण गंभीरता के साथ अपने निकटस्थों ये यह क्यों नहीं कह पाते हैं, “क्यों भई कब तक हमसे जीते रहने को कहोगे ? इतना कम है क्या ? बताओ, एक दिन हमने यह इच्छा नहीं व्यक्त करनी चाहिए कि अब चलना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कि कोई मुलाकाती कहे अब चलना चाहिए, काफी देर हो चुकी है ।”

मैं उपर्युल्लिखित शरीरतः अशक्त सज्जन के बारे में कह नहीं सकता कि उनकी पारिवारिक स्थिति कैसी है, आर्थिक दशा के क्या हाल हैं, जीवन को लेकर उनके मन में कोई विचार उठते भी हैं या नहीं, अगर मन में विचार आते हैं तो वे क्या रहते हैं, इत्यादि । परंतु मैं जब उन लोगों को देखता हूं जिनके जीवन में न कुछ करने को रह जाता है और न कुछ भोगने को तब सोचता हूं कि क्या अब भी जिजीविषा बनी रहनी चाहिए । जब जीवन अपनी अर्थवत्ता खो चुका हो तो उस व्यक्ति को मृत्यु के साक्षात्कार की इच्छा नहीं हो जानी चाहिए ? उससे जुड़े सुहृदों को भी मुक्ति की कामना नहीं करनी चाहिए क्या ? इस प्रकार के तमाम प्रश्न मन में आज तक अनुत्तरित रहे हैं और कदाचित आगे भी अनुत्तरित रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

10 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories, society

10 responses to “आदमी जीता चला जाता है, आखिर क्यों ? – एक प्रश्न

  1. क्योंकि उसे जीने की आदत होती है। समस्याएँ पहले भी आई होती हैं परंतु जिजीविषा ने उन्हें हराया होता है। आशा बड़ी शक्ति है। आप जीने की बात करते हैं,मैं तो कई बार यह भी सोचता हूँ कि मैं खाना या स्नैक आदि भी मात्र आदत की वजह से और कई बार दूसरे कामों से ब्रेक लेने के लिए खाता हूँ। ईश्वर, सभी की आशा जीवित रखें।

  2. यों तो लाचार हो जाने पर मुँह से भले ही कहे रहें ‘अब मौत आ जाय तो अच्छा ‘ लेकिन यही बात गंभीरता से सोचने की ज़रूर नहीं समझते लोग .
    हमारे यहाँ वानप्रस्थ का विधान इसीलिये था ( दायित्वों और व्यवहारों से निवृत्त होने के बाद व्यर्थ में सांसारिक जीवन से चिपका रहना उचित नहीं समझा जाता था).महाभारत काल तक में अंधे धृतराष्ट्र, कुन्ती ,विदुर आदि ने यही किया था – पर अब दवाओं के बल पर ही हो चाहे-असमर्थ शरीर की भी साँसे बढ़ाते जाना तारीफ़ का काम समझा जाता है .

  3. nitesh

    aap ka ye blog sch me jiwan ke sach ki or dhyan aakrsit krta h

  4. योगेन्द्र जोशी

    ये लघुकथाएंं रोजमर्रा के अनुभवों पर आधारित हैं। अनुभवों को हूबहू न प्रस्तुत करके कथा के रूप में लिखना पात्रों एवं देश-काल की पहचान बचाने के लिए आवश्यक होता है।

  5. hempandey

    मैं आपके विचारों से सहमत हूँ।एक निश्चित आयु के बाद,अपने दायित्वों से मुक्त होकर यदि कोई व्यक्ति मृत्यु की कामना करता है तो इस कामना का सम्मान किया जाना चाहिए।इस प्रकार की बात जब एक बार मैं अपने परिवार में कर बैठा तो किसी ने मुझे अवसादग्रस्त घोषित किया और किसी अन्य ने मेरे द्वारा आत्महत्या किए जाने की आशंका ही प्रकट कर दी।

  6. hempandey

    अपनी उपरोक्त टिप्पणी के संदर्भ में यह भी कहना चाहूंगा कि यदि कोई स्वस्थ समर्थ व्यक्ति अपने दायित्वों से निवृत्त होकर अपने परिवार की सहमति के बिना स्वेच्छा से मृत्यु प्राप्त कर लेता है तो क्या यह नहीं माना जाना चाहिये कि वह अपने परिवार की भावनाओं के सम्मान करने का दायित्व नहीं निभा पाया?

  7. योगेन्द्र जोशी

    पाश्चात्य देशों में स्वैच्छिक अथवा कारुणिक म्रुत्यु (euthanasia, mercy killing) के पक्षधरों की काफ़ी तादाद है। किंतु ऐसी मृत्यु की अनुमति ठोकबजा कर देने की परंपरा कुछ देशों में काफ़ी समय से है। आपने स्वस्थ व्यक्ति की भावावेश में आने पर मृत्युवरण करने की जिस शंका की बात की उस पर उन समाजों ने ध्यान दिया है। धीरे-धीरे कई वैश्विक समाज उसके पक्ष में आते जा रहे हैं। अपने देश में उक्त मृत्यु-प्रकार अभी कानूनी तौर पर वर्जित और सामाजिक स्तर पर गर्हित ही माना जाता है। तथापि धार्मिक परंपरा के रूप में यह प्रचलन में अवश्य है जैसे संथारा अथवा समाधि। जो स्वभाव से चिंतनशील होते हैंं उनके लिए यह प्रश्न विचारणीय होता है। किंतु समाज में औसत लोग, भले ही वे एम.ए.-पीएच.डी.क्यों न हों, अधिक सोचते नहीं हैं। उनके लिए जीते रहना खुद में जीवन का उद्देश्य होता है, उसके परे भी कुछ हो सकता है यह विचार उनके पास भटकना भी नहीं।

  8. vaishali patel

    Jivan ka moh hi itna gahra hota hai ki insan marna hi nahi chahta

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