आलस्य अथवा अकर्मण्यता की कोई सीमा नहीं होती !

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।

नास्ति उद्यमसमो बन्धुः कर्माणो नावसीदति ।।

(भर्तृहरिरचित नीतिशतकम्, 86)

अर्थात मनुष्य के शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु आलस्य ही है । उद्यम (किसी न किसी कर्म में संलग्नता) के समान बन्धु (मित्र, सहायक) कोई नहीं जिसे करने पर दुःखानुभूति नहीं होती है ।

मेरा एक मित्र है अनंत खन्ना मेरा हमउम्र, जिसे संगी-साथी खन्ना सा’ब कहकर पुकारते हैं । मेरे ही नगर में रहता है लेकिन मेरे घर से दूर, नगर के एक छोर पर मैं और दूसरे छोर पर वह । इसलिए उससे मुलाकातें कम ही हो पाती हैं, बमुश्किल 2-3 बार वर्ष भर में । टेलीफोन पर कभी-कभार बात हो जाती है । फिलहाल बीते कुछ महीनों से उससे भेंट नहीं हो सकी है । इसलिए दो रोज पहले मन में आया कि क्यों न उससे मिलने चला जाऊं । बरसात का मौसम होने के बावजूद उस दिन पानी बरसने की आसार न के बराबर थे । आसमान पर बादलों की हलकी-सी चादर बिछी थी और मौसम कमोबेश सुहावना था । उस दिन मेरे उपवास का भी दिन था इसलिए खाने-पीने का भी झंझट नहीं था । अतः पूर्वाह्न ही में जाने का कार्यक्रम बना लिया, ताकि दो-तीन घंटे उसके साथ बिताया जा सके । हम दोनों ही सेवानिवृत्त हैं इसलिए समय की कमी नहीं रहती । बस दूरी की वजह से मिलना नहीं हो पाता है । अनंत खन्ना को फोन से अपने आने की खबर दे दी थी ।

          अपने नगर वाराणसी में यातयात की ढंग की सुविधा है नहीं । इस उम्र में अब स्कूटर जैसा वाहन चलाने की मेरी हिम्मत नहीं होती है विशेषतः नगर के अंदरूनी क्षेत्र में । अपने पास कार नहीं है, अगर होती भी तो उसे चलाने का भी जोखिम मैं न उठा पाता । बेतरतीब अनियंत्रित यातयात, न जाने कब कहां जाम लगा हो । और आज के युवा बाइक-चालकों का भी तो कोई भरोसा नहीं कि कब भीड़भाड में रफ्तार के साथ आपके दायें-बांये घुस जायें और आपको टक्कर मारकर चल दें । आटोरिक्शा से जाना ही एकमेव विकल्प है मेरे पास ।

          सवा-डेड़ घंटे में मैं मित्र के घर पहुंच गया । देखा कि उसके मकान के बाहर जो थोड़ी-सी खुली जगह है उसी में वह कुर्सी डालकर बैठा है । उसके सामने ही एक और कुर्सा पड़ी थी खाली; उसका इंतिजाम शायद मेरे बैठने के लिए ही किया था । मैं उसी पर बैठ गया । लग रहा था कि घर पर वह अकेला ही है । मुझे मालूम था कि उसकी पत्नी मायके गई हैं । अब तक लौटीं कि नहीं यह जानने के लिए मैंने पूछा, “लगता है अभी अकेले ही हो, भाभीजी लौटीं नहीं क्या ?”

खन्ना बोला, “कहां लौटीं ? फिलहाल लौटने की संभावना कम ही है । गईं थीं अपने बीमार माता-पिता से मिलने । लेकिन इस बीच उनके पिताजी की तबियत कुछ अधिक ही खराब हो गई । हैं भी तो करीब 85 वर्ष के । घर में कोई और है नहीं । छोटा भाई और उसकी पत्नी नौकरी-पेशे वाले हैं, और वह भी दूसरे शहर में । इसलिए वह वहीं रुक गई हैं पिताजी की सेवा-शुश्रूषा करने । समझ लो कि 2-3 महीनों की छुट्टी तो हो ही गई ।”

“अच्छा ? तब तो भोजन-पानी की दिक्कत हो रही होगी । क्या प्रबंध किए हो ?” मैंने पूछा ।

“उसकी दिक्कत है नहीं । इसका इंतिजाम वह पहले ही कर चुकी थीं । दरअसल पिछले कई महीनों से उन्होंने खाना बनाने वाली को रख लिया था । झाड़ू-पोंछा वाली तो वर्षों से ही काम कर रही है । … चाय पियोगे न ? साथ में मीठा-नमकीन ?” इतना कहते हुए वह उठा और खिड़की पर जाकर अंदर आवाज देने लगा, “अरे चंदा, जरा दो कप चाय बनाकर ले आना तो ।”

फिर लौटकर कुर्सी पर बैठते हुए मुझसे बोला, “चंदा खाना बनाने वाली का नाम है । अभी खाना बनाकर रख जाएगी; बाद में जब झाड़ू-पोंछे वाली आएगी तो वह गर्म करके मुझे खिला देगी ।”

उसके खिला देगी कहने पर मुझे कुछ ऐसा लगा कि जैसे कोई मां अपने बच्चे को खिलाने लगेगी । मन में सोचने लगा कि वह खुद ही खाना गर्म करके खा सकता था । इतना भी नहीं कर सकता ! परंतु मैंने उससे यह सब नहीं कहा और सहजता से पूछा, “चलो अच्छा है कि भोजन-पानी आदि की कोई समस्या नहीं है । लेकिन भाभीजी की गैरमौजूदगी में अकेलापन थोड़ा खलता होगा, है न ? … और साग-सब्जी, राशन-पानी की भी व्यवस्था करनी पड़ती होगी ? उसकी आदत तो होगी ही पहले से ।”

“अरे नहीं, वह तो मैं पहले भी नहीं करता था । किचन से जुड़े सभी काम वही किया करती थीं ।”

“राशन-पानी तो घर में भर गई होंगी, मान लेता हूं । लेकिन साग-सब्जी का तो कुछ इंतिजाम होना ही चाहिए । क्या किए हो ?” मैंने सवाल किया ।

“खाना बनाने वाली ही कर लेती हैं सब काम ।”

“अच्छी किस्म्त है यार तुम्हारी । फिर भी कभी-कभार   वह न आ पाए तो कुछ तो करना ही पड़ता होगा ।” मैंने टिप्पणी की

“ऐसी नौबत अभी तक नहीं आई है । दरअसल खाना बनाने वाली और झाड़ू-पोंछा वाली के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग (समझ) है । उनमें से कोई एक जब दो-तीन दिन नहीं आ पाती है तो दूसरी उसके हिस्से का जरूरी काम कर जाती है ।”

“मतलब यह है कि जिंदगी आराम से कट रही है । लत्ते-कपड़े धोना धोबी का काम । तब बचता ही क्या है ? हां एक काम रह जाता होगा तुम्हारे जिम्मे – नहाने के बाद पहने हुए अंतर्वस्त्र (अंडरवियर-बनियान) धोने का काम ।”

“उसकी भी कोई समस्या नहीं है । दरअसल झाड़ू-पोंछे वाली ही कपड़े धोने का काम कर जाती है । घर में 6-7 जोड़ी अंडरवियर-बनियान रखे रहता हूं । जब वह छुट्टी पर रहती है, पहनेे हुए धोने के लिए रख देता हूं । बाद में धुल जाते हैं ।”

मन हुआ पूछूं कि अंडरबनियान जैसे अंतर्वस्त्र किसी अन्य से और वह भी किसी गैर-महिला से धुलवाने में कुछ अटपटा-सा या अजीब-सा या ऐसा ही कुछ नहीं लगता क्या ? पर सवाल नहीं उठाता; पता नहीं क्या प्रतिक्रिया होगी । घर-परिवार से जुड़ी कई बातें मैं पूछ सकता था लेकिन पूछा नहीं, और बातों का सिलसिला मैंने किसी और दिशा में मोड़ दिया । तब तक चंदा चाय-नाश्ता ले आई । मैंने खन्ना  बताया कि मेरा उपवास है इसलिए सिर्फ चाय पीयूंगा, कुछ खाऊंगा नही ।

मैंने उसके साथ डेड़-दो घंटे बिताए । घर लौटते समय सोचने लगा कि क्या खन्ना अपने अंडरबियर-अनियान भी नहीं धो सकता । मैं अपने अंतर्वस्त्र किसी से नहीं धुलवाता अपनी पत्नी से भी नहीं, जब तक कि कोई आकस्मिकता न आन पड़े । मुझे अजीब-सा लगता है । मेरी नजर में ये कपड़े एक प्रकार से निजता (प्राइवेसी) के द्योतक मालूम देते हैं । मैंने कुछ घरों में देखा है कि परिवार के पुरुष सदस्य नहाते समय उतरे कपड़े स्नानागार में ही छोड़ आते हैं जिन्हें बाद में घर की महिलाएं धोती हैं ।

खन्ना इतना आरामतलब होगा इसका अंदाजा मुझे नहीं था । मैं समझ नहीं पाता क्योंकर कोई धेले भर का भी शारीरिक श्रम नहीं करना चाहता । इसे आलस्य कहूं या अकर्मण्यता ? – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

2 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories

2 responses to “आलस्य अथवा अकर्मण्यता की कोई सीमा नहीं होती !

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  2. सच है कि जिन्होंने कभी कुछ नहीं किया उन्हें इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लगता

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