निरर्थक बहस का अंत

घटना सन् २०१४ के मार्च की है। होली का दिन था। कुछ ही दिनों के बाद संसद के आम चुनाव होने थे। मेरे पड़ोसी-जन सात-आठ की संख्या में मुझसे एवं मेरी अर्धांगिनी से मिलने आये, अबीर-गुलाल के साथ। वे सभी उम्र में मुझसे कुछ छोटे ही रहे हैं, अतः वे ही होली मिलने हमारे पास आते हैं। उनमें से उत्साही एक सज्जन ने घर के बाहर गेट के पास लगे पानी के नल के नीचे रखी बाल्टी में रंग घोलकर मेरे ऊपर उड़ेल भी दिया। यह सब तो होली मनाने का पारंपरिक तरीका ही है। हमने गुझिया, मिठाई एवं नमकीन आदि से उन सभी का स्वागत किया। साथ में पेश किया कांच के गिलासों में शरबत।  होली के अवसर पर मिलने वालों की इस तरीके से आवभगत की अपेक्षा तो रहती ही है।

अस्तु, यह सब घटना का अहम पहलू नहीं है। असल बात जिसका उल्लेख मैं यहां करने जा रहा हूं वह है होली के कुछ काल के बाद होने वाले आम चुनावों पर बहस। हमारे अड़ोस-पड़ोस में भाजपा का कोई कार्यकर्ता नही रहता, किंतु उस दल के प्रति झुकाव रखने वाले ही अधिक हैं, या यों कहूं कि प्रायः सभी हैं। इसलिए मुझसे भी उम्मीद की जाती है कि मैं भी तब के भाजपा उम्मीदवार यानी श्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में अपना मत डालूं। बता दूं कि मोदी जी मेरे शहर वाराणसी के संसदीय क्षेत्र के ही प्रत्याशी थे। उस आम चुनाव में यदि मुझे किसी के पक्ष में मत डालना होता तो संभवतः मोदीजी के ही पक्ष में डालता

किंतु मेरे अपने कारण रहे हैं जिनके तहत मैं किसी को भी अपना मत नहीं देता हूं। ऐसा मैं पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से कर रहा हूं। मतदान हर चुनाव में किया है, लेकिन किसी के पक्ष में नहीं। आरंभ में मतपत्र पर अमान्य मुहर लगाता था। बाद में जब निर्वाचन आयोग के नियम 49-ओ (49-O) के अंतर्गत फॉर्म 17-ए (17-A) के बारे में जानकारी हुई तो उसका उपयोग करने लगा। और जब आयोग ने “नोटा” का विकल्प जनता को दिया तो मैं उसका उपयोग करने लगा।

हां तो बात करता हूं होली के उस मौके की। तब घूम-फिरकर बात देश के आम चुनाव पर आके टिक गयी। केंद्र एवं प्रदेश की सरकारों से कम ही लोग संतुष्ट थे यह बात कही जा रही थी। देश भर में मोदी से उम्मीदें पाले हुए लोग काफी थे। बदलाव होना ही चाहिए इस बात की हिमायत अधिकांश लोग कर रहे थे। इसलिए मेरे वे सभी आगंतुकगण मोदीजी के पक्ष में मतदान करने पर जोर डालने लगे। मुझे उनके प्रस्ताव में खास दिलचस्पी न लेते देख किसी एक ने पूछा, “आप तो चुप खड़े हैं। … बताइए, मोदीजी को ही वोट डाल रहे हैं न?”

मैंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया, “मैं तो नोटा बटन दबाने के पक्ष में हूं।”

मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर दूसरे ने कहा, “भाभीजी, आप भी नोटा की बात करती हैं क्या?”

वे बोली, “नहीं, ऐसा नहीं। मैं तो मोदीजी की समर्थक हूं, लेकिन ये नोटा की बात करते हैं। पिछले कई चुनावों से ये किसी को भी वोट न देने की नीति अपनाए हुए हैं।”

फिर वे लोग मुझसे बोले, “अरे भाई सा’ब, क्यों अपना वोट बरबाद करते हैं। नोटा बटन दबाने से कुछ लाभ तो होने से रहा। नोटा के बावजूद जन-प्रतिनिधि चुने ही जायेंगे और कोई न कोई दल सरकार बनायेगा ही।”

मैंने कहा, “दरअसल मैं अपने देश के मौजूदा लोकतांत्रिक मॉडल का विरोधी हूं, और अपना विरोध दर्ज कराने का मेरे पास नोटा ही विकल्प है।”

राजनैतिक दलों, उनके नेताओं, और आम निर्वाचकों के बारे में उनके अपने विचार थे और मेरे अपने असहमति वाले। वे नोटा का विचार त्यागने के लिए तरह के तर्क देते रहे और मैं नोटा के पक्ष में अपनी दलीलें पेश करते रहा। बहस लंबी खिंचने लगी। वे मेरे तर्कों से संतुष्ट नहीं थे और मैं उनकी बात मानने को तैयार न था। मुझे बहस निरर्थक लग रही थी। मुझे इस बात का शौक कतई नहीं रहा है कि दूसरे मेरी बात मानें ही। लेकिन अपने स्वतंत्र विचारों का अधिकार मुझे है इस पर मैं सदा ही जोर डालता हूं।

मुझे लगा कि बहस का समापन किया जाना चाहिए। अतः मैंने कहा “आप सब इतना कुछ समझा रहे तो आपकी बात मान लेता हूं। चलिए एक वोट मेरी तरफ से भी मोदीजी को।”

“आप सीरियस नहीं हैं। हमें टरका रहे हैं। …” कोई एक बोला।

“अरे भई, कह रहा हूं न कि मोदीजी को वोट दे दूंगा। अभी इसी समय वोट तो डालना नहीं है। तब इससे अधिक मैं क्या कह सकता, क्या कर सकता हूं।” मैंने उत्तर दिया।

मेरी बात पर उनको विश्वास हुआ कि नहीं मैं नहीं जानता। किंतु अब उस बहस के बाद विसर्जित होने का मौका तो सभी को मिल ही गया। वे चले गये।

मैंने जो करना था वही किया। बाद में किसको वोट दिया यह सिवाय मेरे कौन जान सकता था? और कोई जान भी लेता तो क्या करता?

मैं यहां विस्तार से यह नहीं समझा सकता कि मैं क्यों मौजूदा लोकत्रांतिक मॉडल का विरोध करता हूं। यह एक लंबी बहस का विषय है। अति संक्षेप में यही बता सकता हूं कि यहां चुनावों में भागीदारी निभाने वाले दल बात तो लोकतंत्र की करते हैं लेकिन खुद अपने दल के भीतर लोकतंत्र पनपने ही देते हैं। अपवादों को छोड़ दें। प्रायः सभी दल एक व्यक्ति अथवा परिवार की बपौती के तौर पर अस्तित्व में हैं। उनके कार्यकर्ता बंधुआ मजदूरों की भांति बंधुआ कार्यकर्ता के माफिक लगते हैं। वे सब मुखिया के निर्णयों से बंधे रहते हैं। हर पार्टी में बीस-बीस प्रतिशत आपराधिक छवि के लोग भरे हुए हैं। नेताओं के कोई सिद्धांत नहीं। कौन कब किस पार्टी में चला जाये इसका कोई हिसाब ही नहीं। राजनीति जातीयता एवं धार्मिकता से मुक्त होने के बजाय उस पर अधिकाधिक निर्भर होती जा रही है। राजनेता खुले आम कायदे-कानूनों का उल्लंघन करते हैं। कितने नेता हैं जो जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, उनको उचित मार्ग पर ले जा रहे हैं? उच्छृंखता, अपशब्दों का बोला जाना, बातबात में मारपीट पर उतर जाना, अपराधियों को बचाना और निरपराधों को फंसाना, आदि इनके चरित्र में देखने को मिलता है। मैं ऐसे नेताओं को अपना मत नहीं दे सकता। लेकिन अपना मताधिकार भी नहीं छोड़ सकता। अतः नोटा मेरा चुना हुआ विकल्प है। – योगेन्द्र जोशी

 

 

Advertisements

टिप्पणी करे

Filed under Uncategorized

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s