शक-शुबहा की गुंजाइश हो तो?

घटना तब की है जब बीती गर्मियों में बैष्णवदेवी दर्शन के पश्चात् बेगमपुरा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से हम जम्मू-तवी से वाराणसी लौट रहे थे। जम्मू-तवी में मेरी शायिका (बर्थ) के सामने एक मध्यवयस्क यात्री बैठे थे। उनके साथ एक युवा यात्री भी बैठा था। दोनों की बातचीत से लग रहा था कि वे दोनों एक ही सरकारी संस्था में सेवारत हैं और वह युवक उन मध्यवयस्क यात्री के कनिष्ठ कर्मी के तौर पर कार्यरत है। यह भी पता चल रहा था कि वरिष्ठ यात्री को अंबाला कैंट पर उतरना है। उसके बाद वह शायिका किसी अन्य यात्री के लिए आरक्षित थी। उस युवा यात्री को आरक्षण नहीं मिल पाया था।

अंबाला कैंट पर उस युवक के वरिष्ठ सहकर्मी उतर गये और उस शायिका पर अन्य यात्री काबिज़ हो गया। अब उस युवा को रात्रिविश्राम के लिए उपयुक्त स्थान की चिंता सताने लगी। उसके पास एक अदद सामान – लाल बैग – था जिसे उसने शायिका के नीचे एक कोने पर सुरक्षित रख दिया था। फिर उसने मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा, “आंटी, आप जरा मेरा बैग देख दीजियेगा (यानी उसकी सुरक्षा का ध्यान रखियेगा); मैं देखने जा रहा हूं कि कहीं सीट मिल पाती है क्या?”

हमने उसका अनुरोध मानते हुए पूछा, “आपको जाना कहां है?”

उसने कहा, “मुझे लखनऊ उतरना है। वहां से कानपुर अपने घर जाऊंगा।”

उस रेलमार्ग पर लखनऊ वाराणसी से करीब तीन सौ कि.मी. पहले पड़ता है और हमारी गाड़ी का वहां पहुंचने का समय प्रातःकाल लगभग आठ बजे था।

वह युवक रात भर गायब रहा। उसे शायद कहीं बर्थ नहीं मिली होगी, अन्यथा वह अपना सामान लेने आया होता। उसने येनकेन प्रकारेण किसी डिब्बे में रात बिताई होगी।

प्रातःकाल गाड़ी लखनऊ से पहले भी एक-दो स्टेशनों पर रुकी थी। ग्रीष्मकाल में तो लखनऊ के आसपास छ: बजते-बजते अच्छी-खासी रोशनी हो चुकती है। इसलिए मैं यह उम्मींद कर रहा था कि वह युवक मौका पाते ही हम लोगों के डिब्बे में आ जायेगा। मैं समझता था कि उसे हमारे ही डिब्बे में आकर लखनऊ स्टेशन का इंतिजार करना चाहिए। उसे अपने बैग की सुध तो रखनी ही चाहिए।

मैं आश्वस्त होना चाहता था कि उस बैग में कुछ संदिग्ध सामग्री तो नहीं है। वह युवक और उसका वरिष्ठ सहकर्मी जम्मू से आ रहे थे इसलिए मेरे मन में यह शंका उठ रही थी कि वह व्यक्ति किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने के विचार से तो बैग नहीं छोड़ गया। मैंने अपनी पत्नी से अपनी शंका साझा की। उनका कहना था, “ऐसा कुछ नहीं होगा; वह आता ही होगा। देख नहीं रहे थे कि वे दोनों जने (वह युवक और उसका वरिष्ठ साथी जो अंबाला कैंट पर उतरा था) अपनी संस्था की जुड़ी कितनी बातें कर रहे थे? उनकी हिन्दी भी सामान्य थी। इसलिए ऐसा कुछ नहीं होगा। वह लड़का आता ही होगा।”

मैंने पत्नी के समक्ष अपना तर्क रखा, “देखो, अतिवादी-आतंकवादी भी अपनी पहचान और अपने इरादे छिपाने के लिए ऐसा नाटक खेल सकते हैं। वे भी सामान्य सहयात्री दिखने की कोशिश कर सकते हैं। कौन जाने जो बातें वे कर रहे थे वे सच थीं या झूठ। मैं उस बैग के बारे में आश्वस्त नहीं हूं। अवश्य ही रात भर मैं ऐसी कोई कल्पना नहीं कर रहा था। लेकिन लखनऊ आने वाला है और उसका अता-पता नहीं है। उसे अपने बैग की चिंता तो होनी ही चाहिए थी।”

मैंने अपना संदेह गाड़ी में मौजूद सुरक्षाकर्मियों के समक्ष रखने का विचार किया। मैं अपने डिब्बे के परिचारक (अटेंडेंट) के पास पहुंचा और उससे सुरक्षाकर्मितों के बारे पूछा। उसने बताया, “गाड़ी में कोई सुरक्षाकर्मी नहीं रहते हैं। जम्मू से आते समय अंबाला कैंट तक वे मौजूद रहते हैं। उसके बाद गाड़ी में कोई नहीं रहता।”

उससे मैंने किसी सक्षम अधिकारी का फोन नं. मांगा जो उसके पास नहीं था। मेरा विश्वास था कि आजकल सभी प्रमुख गाड़ियों में सुरक्षा की समुचित व्यवस्था रहती है। ऐसा विश्वास करना मेरी मूर्खता थी।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। मैंने आसपास बैठे सहयात्रियों के सामने अपनी शंका व्यक्त की। उम्मीद के अनुरूप ही उनकी प्रतिक्रिया “ठीक है, क्यों परेशान हो रहे हैं? कुछ नहीं होगा। वह आ जाएगा।” वाली थी।

मैं शंकाग्रस्त था लेकिन क्या करूं यह समझ नहीं पा रहा था। अंततः लखनऊ का चारबाग स्टेशन भी आ गया। अन्य यात्रियों की भांति मैं भी प्रातःकालीन चाय-काफी के लिए स्टेशन पर उतरा और निकट की चाय-काफी-जलपान की दुकान की ओर तेजी से बढ़ा। मुझे काफी के दो कप पाने में चार-छः मिनट तो लग ही गए होंगे।

काफी के दो कप हाथ में लिए जब मैं अपने डिब्बे के पास पहुंचा तो देखा कि वह युवक कंधे पर बैग लटकाए हुए मेरी ओर ही आ रहा है। पास पहुंचने पर उसने मुझे धन्यवाद दिया और जब तक मैं प्रत्युत्तर में उसे दो-चार शब्द कहता, उससे पहले ही वह तेजी से आगे बढ़ गया। – योगेन्द्र जोशी

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