इंडियामाता की जय (स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर)

देशवासियों को पंद्रह अगस्त, स्वतंत्रता दिवस, की शुभकामनाएं

 

इस स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्रपति महोदय ने अपने हिन्दी में दिए सम्बोधन में कई बार “न्यू इंडिया” का जिक्र किया। वे “नये भारत” की बात कर सकते थे जो उन्होंने नहीं किया। “भारत(वर्ष)” यहां के बाशिंदों ने अपने देश को दिया हुआ प्राचीन नाम है, जो रामायण-महाभारत काल से प्रचलन में रहा है। किंतु अब इसको भुलाकर विदेशियों द्वारा दिए गये अपेक्षया नये नाम “इंडिया” का प्रयोग देशवासी कर रहे हैं। क्या यह भारत के, नहीं-नहीं इंडिया के, अंग्रेजीकरण की प्रक्रिया का फल है? जब देश का नाम इंडिया हो ही चुका तो “इंडियामाता की जय” क्यों न कहा जाए? इसी को केंद्र में रखकर लिखित एक लघुकथा।

 

पांच वर्षीय रग्घू (राघव) ने इस वर्ष पहली बार विद्यालय में कदम रखा था। उसने कक्षा चार में पढ़ रहे अपने बड़े भाई के साथ विद्यालय आना-जाना शुरू किया था। “के.जी.” स्तर की शिक्षा उसने घर पर ही पाई थी अपने मां से।

उस दिन पंद्रह अगस्त अर्थात्‍ देश का स्वतंत्रता दिवस था। रग्घू के विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस का राष्ट्रीय पर्व पारंपरिक तरीके से मनाया गया। वह विद्यालय में आयोजित कार्यकमों को लेकर उत्साहित था। आयोजन के दौरान उसकी प्रधानाध्यापिका ने ध्वजोत्तोलन के पश्चात्‍ बच्चों को देश की स्वतंत्रता के महत्व और देशवासियों के कर्तब्यों को समझाते हुए संबोधित किया था। संबोधन के अंत में बच्चों से “भारतमाता की जय” का उच्च स्वर में जयघोष करने को कहा गया। रग्घू के लिए आयोजन देखना नितांत नया अनुभव था, यद्यपि वह न तो संबोधन को समझ पा रहा था और न ही उस जयघोष को। अंत में विद्यालय में बंटी मिठाई खाते हुए वह बड़े भाई के साथ घर लौट आया।

घर पहुंचने पर मां ने रग्घू से विद्यालय में बीते उस दिन के अनुभवों के बारे में पूछा। उसने क्या देखा इसका उसने अपनी सीमित भाषाई सामर्थ्य के अनुसार चित्रण कर दिया। फिर मां के समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट की, “अम्मा, स्कूल में हमारी प्रिंसिपल ने हम सभी से जोर से ’भारत माता की जय’ बोलने को कहा। ऐसा क्यों कहा होगा? और इसका मतलब क्या था?”

मां ने उसे देश, उसके नाम और उसकी स्वतंत्रता के मतलब समझाते हुए स्वतंत्रता दिवस के महत्व के बारे में बताया। ऐसे अवसरों पर हम देश का गुणगान करते हैं, उसकी ’जय हो’ कहकर पूजते हैं, वह कभी किसी से न हारे यह कहते हैं, इत्यादि कहते हुए कई तरीके से उस जयघोष के मतलब समझाए। जैसे कोई मां अपने बच्चे को पालती है उसी प्रकार यह देश हम सब को पालती है। खाने-पीने को भोजन, रहने को जगह और घूमने-फिरने की छूट यह सब हमें देश से ही मिलता है। इसीलिए हम इसे माता कहते हैं। हम दुनिया में सब जगह नहीं जा सकते क्योंकि वे हमारे देश के हिस्से नहीं होते हैं। मां ने इस प्रकार से बहुत कुछ उसे बताने का प्रयास किया।

रग्घू गंभीरता से मां की बात सुन रहा था। अभी वह बौद्धिक तौर पर इतना सक्षम नहीं था कि सभी बातों का निहितार्थ समझ सके। फिर भी वह महसूस कर रहा था कि उसका अपना एक देश है जिसे `भारत’ कहते हैं। उसे याद नहीं आ रहा था कि कभी उसने भारत नाम सुना हो। मां से उसने पूछा, “मैं टीवी पर क्रिकेट और दूसरे खेलों के प्रोग्राम देखता हूं। तुम्हारे साथ बैठकर न्यूज भी सुनता हूं। पर भारत कभी सुना हो याद नहीं आ रहा है।”

मां बोलीं, “भारत को इंडिया भी कहते हैं। तुमने टीवी पर कई मौकों पर लोगों के मुख से इंडिया सुना होगा, जैसे ’इंडिया की टीम’, ’इंडिया जीत गई’ आदि। तुम तो अमूल का ‘अमूल दूध पीता है इंडिया’ अक्सर गाते हो; याद है न?”

“हां अम्मा, टीवी पर तो इंडिया कई बार सुना है। खेलकूद के प्रोग्रामों में, न्यूज़ में, और ‘ऐड्ज़’ (विज्ञापनों) में। मेरे समझ में नहीं आ रहा है कि जब देश का नाम इंडिया है तो उसे भारत भी कहने की जरूरत क्या है? और क्यों नहीं ‘इंडियामाता की जय’ कहते हैं?” रग्घू ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।

इस बार मां को सवालों का ठीक-ठीक जवाब नही सूझ रहा था। – योगेन्द्र जोशी

 

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