दूसरों को स्वर्ग का रास्ता दिखाने का ठेका?

मेरे पड़ोस में एक युवक रहता है। अधिक पढ़ा-लिखा नहीं। मैंने उससे कभी पूछा भी नहीं कितने तक पढ़े हो। अवश्य ही १०+२ से अधिक नहीं, या शायद उतना भी नहीं। एससी-एसटी वर्ग का होने के बावजूद आरक्षण का लाभ वह नहीं ले सका है। पिछले कुछ वर्षों से टैस्की चलाने का काम कर रहा है। जब भी सड़क पर मिल जाता है तो उसके हालचाल पूछ लेता हूं।

आज प्रातः वाहन साफ करते हुए उसे मैंने देखा। रुककर पूछा कि उसका आज का क्या कार्यक्रम है। उसने बताया, “आजकल केरला से फ़ादर लोग आए हुए हैं। उन्हीं को अलग-अलग गांवों में घुमाफिरा रहा हूं।”

‘फ़ादर! यानी इसाई धर्म के पादरी या धर्मोपदेशक!

मेरे इस सवाल पर कि गांव-गांव घूमने का उनका मकसद क्या रहता है, उसने जवाब दिया, “वे लोग इसाई धर्म का प्रचार करने आए हुए हैं। उनके स्थानीय कार्यकर्ता लोगों की भीड़ इकट्ठा करते हैं और ये फ़ादर लोग उनको उपदेश देते हैं कि आओ प्रभु ईसू की शरण में आओ। वे आपका उद्धार करेंगे।”

“उनकी बातें सुनकर मेरा मन हुआ कि मैं भी कुछ कहूं।” उसने कहा।

“ऐसी क्या बात हुई उन लोगों से तुम्हारी?”

दरअसल वे बोल रहे थे, “क्या रखा है इस धरती के सुख-चैन में। प्रभु की शरण में आने पर स्वर्ग उपलब्ध होगा जहां सुख ही सुख होगा।”

“तब मैंने कहा सर, आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं वह कभी का गुजर चुका है। आज सभी लोग रोजी-रोटी के इंतिजाम में लगे हैं। उनकी चिंता इसी धरती पर पेट भरने की है। अब देखिए न कि जिन गांवों में आप घूम रहे हैं वहां के किसान फसल काटने-संभालने में लगे हैं। उनको आपकी बात सुनने-समझने का मौका भला कहां?”

“हां भई, आपकी बात तो कुछ हद तक सही है। फिर भी हमारी कोशिश रहती है कि उन्हें ‘रास्ता’ दिखाएं।”

“क्यों आप रास्ता दिखाना चाहते हैं? उनको अपना रास्ता खुद खोजने दीजिए।”

उस युवक ने मुझसे कहा, “दरअसल उनके पास मेरे सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं था।”

कम शिक्षित होने के बावजूद उस युवक की बातों में दम था ऐसा मुझे लगा। वस्तुतः टैक्सी चलाते हुए वह तमाम प्रकार के लोगों के संपर्क में आता है। कभी पर्यटकों से वास्ता पड़ता है तो कभी तीर्थयात्रियों से, और कभी विश्वविद्यालय में सेमिनार-कॉन्फ़रन्स के प्रतिभागियों से, इत्यादि। उनसे बातें करके वह काफी कुछ सीखता रहता है।

मैं इस प्रश्न पर विचार करने लगा कि इस धरती पर जो है वह तो सभी को दिखता है। स्वर्ग जैसी कोई चीज होती भी है क्या? किसी ने उसे देखा है? उस अज्ञात स्वर्ग की अधिक अहमियत है या इस धरती की जिसके सहारे हम सब जी रहे हैं? सोचिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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2 टिप्पणियाँ

Filed under कहानी, मजहब, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Religion

2 responses to “दूसरों को स्वर्ग का रास्ता दिखाने का ठेका?

  1. Abhishek Srivastava

    “उम्र जन्नत में रह कर, उसे उजाड़ने में गुज़ार दी,
    और जिहाद बस इस बात की थी, की मरने के बाद जन्नत मिले…”

    2018-04-22 20:03 GMT+05:30 जिंदगी बस यही है :

    > योगेन्द्र जोशी posted: “मेरे पड़ोस में एक युवक रहता है। अधिक पढ़ा-लिखा नहीं।
    > मैंने उससे कभी पूछा भी नहीं कितने तक पढ़े हो। अवश्य ही १०+२ से अधिक नहीं, या
    > शायद उतना भी नहीं। एससी-एसटी वर्ग का होने के बावजूद आरक्षण का लाभ वह नहीं
    > ले सका है। पिछले कुछ वर्षों से टैस्की चलाने का काम कर ”
    >

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