शृंग्वेरपुर की मेरी यात्रा साइकिल से

जो लोग श्रीराम कथा से सुपरिचित हों उनके लिए शृंग्वेरपुर कदाचित् अपरिचित नाम नहीं होगा। यह वह स्थान है जहां पर श्रीराम को केवटराज (नाविकों के मुखिया) ने श्रीगंगा पार कराई थी। इस स्थान का जिक्र वाल्मीकिकृत रामायण एवं तुलसीदासरचित रामचरित मानस, दोनों ग्रंथों, में मिलता है। कहते हैं कि जब भगवान् श्रीराम ने केवटराज से गंगाजी पार कराने का निवेदन किया तो केवटराज ने प्रथमतः उनके चरण धोने की अनुमति की मांग की। केवट की इच्छा का सम्मान रखते हुए श्रीराम ने उनकी मांग मान ली।

[ध्यान रहे कि अधिकांश लोग शृंग्वेरपुर को श्रृंग्वेरपुर लिखते हैं जो सही नहीं है।]

शृंग्वेरपुर गंगाजी के तट पर बसा है। प्रयागराज (इलाहाबाद) से करीब ३५ किलोमीटर दूर (सड़क मार्ग से) नदी के प्रवाह के विपरीत दिशा में है। अर्थात् गंगाजी शृंग्वेरपुर से होते हुए प्रयागराज पहुंचती है जहां उनका संगम यमुनाजी से होता है।

आज से लगभग ५० वर्ष पहले (१९७०-७१) मैं साइकिल से वहां गया था। उस समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधछात्र था। शृंग्वेरपुर का नाम तो मैंने सुना ही था। एक दिन बैठे-बैठे विचार आया कि क्यों न वहां चला जाये साइकिल से। ऐसे असामान्य कार्य अकेले करना मुझे सदा से पसंद रहा है। अकेले का विशेष लाभ यह रहता है कि आप पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। जहां मन हुए आराम फरमा लिया, चाय-पानी की दुकान पर रुक लिये, सड़क के किनारे पेड़-पौधों, खेत-खलियानों को देखने को रुक लिये, आदि-आदि। साइकिल से इतनी दूर जाने-आने का यह मेरा पहला अनुभव था।

उस यात्रा और शृंग्वेरपुर में एक-डेड़ घंटे ठहरने के अनुभव की याद अब धूमिल हो चुकी है। इतना अवश्य याद है उस स्थान पर जहां में पहुंचा था वीरानगी-सी थी। दूर-दूर तक कोई खास हरियाली नहीं थी। कहीँ-कहीं पर झाड़ियां या छोटे कद के पेड़ दिख रहे थे। शायद फरवरी-मार्च का समय रहा होगा। वह स्थान गंगाजी के प्रवाह की दिशा के सापेक्ष नदी का बांया किनारा था जो कुछ हद तक चट्टानी ऊंचा टीला था।

बीते पचास वर्षों के अंतराल में वहां क्या कुछ बदलाव आ गया होगा इस बात का अनुमान मैं नहीं लगा सकता था, लेकिन आधुनिक गूगल मैप से पता चलता है कि शृंग्वेरपुर में बहुत परिवर्तन हो चुका है। अनेक मंदिर स्थापित हो चुके हैं, कई सड़कें बन चुकी हैं, तब की वीरानगी शायद समाप्त हो चुकी है, और गंगाजी ने इस किनारे को छोड़ दूसरे किनारे के निकट अपना पाट खिसका लिया है।

वहां पर पुराने भवनों के खंडहर देखने को मिले थे मुझे। वे खंडहर प्राचीन काल के रहे होंगे उनमें पतले, अपेक्षया बेडौल ईंटें प्रयुक्त थीं। मैं गूगल मैप की प्रति प्रस्तुत कर रहा हूं। जिसमें तीन स्थलों को १, २, ३, अंकों से इंगित किया है। इसमें अंक ३ खंडहरों का स्थान दर्शाता है।

 

 

 

 

 

 

 

अंक १ वहां का श्मशानघाट का सकेत है। मैं जब वहां पर था तो संयोग से एक शव वहां पहुंचा। जिस तरीके से शवदाह हुआ उससे मुझे लगा कि वहां इंधन की लकड़ी की उपलब्धता अच्छी नहीं रही होगी। मैंने किसी से पूछा भी नहीं। अंतिम संस्कार में शामिल जनों ने लकड़ी के दो-चार टुकड़े इस्तेमाल करते हुए वरायनाम मुखाग्नि दी। फिर शव को बांस के एक डंडे के सहारे दायें-बांये बालू भरे दो मटकियां के साथ बांध दीं और नाव से ले जाकर बीच गंगा में प्रवाहित कर दिया। शव तो प्रवाहित होता नहीं होगा, बल्कि वह नदी की तलहटी में स्थायित्व पाता होगा। मछलियां, कछुए एवं अन्य जलीय जीवजंतु शव का मांस भक्षण कर देते होंगे।

किंतु संयोग से शव का बंधन कभी-कभार टूट जाता होगा और वह ऊपर उतरा जाता होगा। मुझे उस स्थान पर ऐसा नजारा देखने को मिला था। चित्र में अंक २ एक कोटर को इंगित करता है। उस स्थल पर किनारे की जमीन चट्टानी थी जिसके कारण गंगाजी का प्रवाह अटक रहा था। चित्र में अंक २ एवं ३ के बीच की भूमि ऐसी संरचना लिए हुए थी। दोनों तरफ जमीन नीची थी। उक्त कोटर पर मैंने एक शव उतराया हुआ देखा था जिसे दो-तीन कुत्ते किनारे खींचना चाहते थे लेकिन वह उनकी पहुंच में नहीं था। कदाचित् वहां पर पानी गहरा रहा होगा।

अपने ठहराव के उस डेड़-एक घंटे में मैंने शवदाह, कोटर पर फंसा शव, तथा खंडहरों को देखा।

उस स्थान पर जल पर उतराते शव की मुझे आज भी याद आ जाती है जब कभी मैं गंगाजी के तट पर जाता हूं; जब इलाहाबाद में तब और अब जब वाराणसी में रह हूं तब भी। मुझे गंगाजल से आचमन करने में उस याद के कारण परेशानी होती है।

उस काल में वहां आसपास चायपानी की भी कोई दुकान नहीं थी कि मैं दो-चार घूंट चाय ही पी लेता। रास्ते के लिए कुछ भोज्य-पदार्थ मैंने रखे थे जिन्हें मैने मार्ग में कहीं रेस्तरां-ढाबा पर खाया-पिया होगा। तो यह रहा शृंग्वेरपुर का मेरे पांच दशकों पूर्व का अनुभव। -योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s