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नमस्ते से “गुड मॉर्निंग” तक की यात्रा

मुझे मौजूदा मोहल्ले में रहते हुए करीब 30 साल बीत चुके हैं। शुरुआती दो वर्षों के बाद से अपने निजी मकान में रह रहा हूं। मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। मैंने इन भाइयों के माता-पिता को देखा है। मैं उनकी पीढ़ी को पहली पीढ़ी संबोधित कर रहा हूं और तदनुसार उक्त भाइयों को दूसरी पीढ़ी के कहूंगा। अब वे माता-पिता इस संसार में नहीं रहे। सुना है कि इस मोहल्ले की भूमि कभी इनकी एवं इनके पट्टीदारों की हुआ करती थी। कालोनाइज़र को जमीन बेचने पर मिले पैसे का समुचित उपयोग ये लोग शायद नहीं कर पाये होंगे। इसलिए इनकी माली हालत सामान्य या उससे बदतर रही है ऐसा मेरा सोचना है। ये पांचों भाई मोहल्ले के पास ही लगने वाली फल-सब्जी-सट्टी में थोक अथवा फुटकर कारोबार करके परिवार का पालन-पोषण करते आये हैं।

अब दूसरी पीढ़ी के इन भाइयों की उम्र साठ के आसपास उसके कुछ ऊपर-नीचे होनी चाहिए ऐसा मेरा अनुमान है। इनमें से कोई साक्षर भी है कि नहीं मुझे ठीक से नहीं मालूम; मैंने कभी पूछा नहीं। कोई साक्षर होगा भी तो उसे मात्र अक्षरज्ञान से कुछ और अधिक ज्ञान नहीं होगा। आम तौर पर वे वाराणसी में प्रचलित भोजपुरी बोलते हैं, किंतु मेरे साथ सामान्य हिन्दी में ही बात करते हैं।

इसके आगे यह भी बता देता हूं कि इनमें से सभी की संतानें संख्या में 4 से 7 के बीच हैं। इस तीसरी पीढ़ी की प्रायः सभी संतानें राज्य-सरकारी/परिषदीय स्कूलों में पढ़ने अवश्य जाया करते थे,  किंतु कोई भी +2 स्तर पार नहीं कर सका। मेरा अनुमान है कि शायद कोई भी हाई-स्कूल उत्तीर्ण नहीं है। फिर भी वे (युवक न कि युवतियां) अच्छा कारोबार कर ले रही है। कइयों ने तो सब्जियों-फलों का पुस्तैनी धंधा छोड़कर नये धंधे भी अपना लिए हैं। अब माहौल काफी बदल चुका है। किसी के भी अधिकतम तीन बच्चे हैं। इस चौथी पीढ़ी के कुछ बच्चे निजी अंग्रेजी विद्यालयों में भी पढ़ रहे हैं।

उक्त विवरण देने के पीछे मेरा मकसद एक दृष्टांत प्रस्तुत करना है कि हमारे देशवासियों के दिलोदिमाग पर आधुनिकता और अंग्रेजी किस प्रकार राज कर रही है । उपर्युक्त खानदान की चार पीढ़ियों – परदादा-परदादी से लेकर आज के नये बच्चों की पीढ़ियों को मैं पिछले करीब तीस साल से देख रहा हूं। चौथी पीढ़ी आते-आते इन लोगों में स्पष्टतः दिखाई देने वाला सांस्कृतिक/भाषायी परिवर्तन मैंने अनुभव किया है। दूसरी पीढ़ी के सबसे बढ़े भाई की सबसे बढ़ी बहू आज भी पारंपरिक लिबास यानी सीधे पल्लू की साड़ी पहने हुए रहती है। लेकिन इन परिवारों की बाद में आईं बहुएं उल्टे पल्लू की साड़ियों में दिखाई देती हैं। दिलचस्प है कि वे हल्का-सा घूंघट अभी नहीं छोड़ पाईं हैं। सुनता हूं कि उनमें से कुछ हाईस्कूल पास भी हैं।

इन पांच भाइयों के बच्चे जब छोटे थे तब वे अपने-अपने माता-पिता को “माई-बाबू” या इसी प्रकार के संबोधन से पुकारते थे। परंतु बड़े हो जाने और अपने-अपने कामधंधों के दौरान समाज के अन्य वर्गों के संपर्क में आने के बाद उनमें से कुछ ने “मम्मी-पापा” का प्रयोग आरंभ कर दिया । अपने देश में अब गैर-रिश्तेदार या अजनबी आदमी को “अंकल” शब्द से पुकारना प्रायः पूरी तरह प्रचलन में आ चुका है, जिसमें संबोधित व्यक्ति की उम्र वक्ता से पर्याप्त अधिक होती है। अंकल संबोधन माता-पिता की उम्र वाले के लिए और  दादा-दादी की उम्र वाले के लिए भी प्रयुक्त होने लगा है।

तीसरी पीढ़ी के उक्त बच्चे मुझे आरंभ से ही अंकल कहते आये हैं। पहले उनका अभिवादन “नमस्ते” हुआ करता था, किंतु अब उनमें से दो-तीन ऐसे हैं जो “गुड मॉर्निंग” पर उतर आये हैं। मेरा प्रत्युत्तर उसी पुरानी शैली में “नमस्ते” रहता है। दुआ-सलाम की बात प्रायः प्रातः काल ही होती है। मैंने इस पर गौर नहीं किया कि वे दोपहर या संध्या पश्चात्‍ भी “गुड मॉर्निंग” ही कहते हैं या कुछ और। उनमें से एक टैक्सी चलाता है, उसे अवश्य अधिक जानकारी होगी।

चौथी पीढ़ी के जो बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं वे अंग्रेजी को लेकर कुछ अधिक ही उत्साहित हैं। वे किसी स्तरीय विद्यालय में नहीं पढ़ते, बल्कि उन्हीं विद्यालयों में से एक में पढ़ते हैं जो आजकल हर गली-कूचे-नुक्कड़ पर अंग्रेजी-माध्यम के नाम पर खुलते देखे जा सकते हैं। वे बच्चे हिन्दी की गिनतियां शायद ठीक-से नहीं जानते हैं। विद्यालय अंग्रेजी पर ही जोर डालते हैं, क्योंकि अंग्रेजी ही सुन्दर भविष्य की कुंजी है यह सभी का मानना है। उनमें से कुछ ने मेरे लिए “गुड मॉर्निंग” का अभिवादन अपना लिया है। बच्चों के जन्मदिन पर केक भी कटने लगे होंगे और “हैप्पी बर्थडे टु यू” का गायन भी होने लगा होगा। मोहल्ले की गली में उन बच्चों को इस गीत को गाते-गुनगुनाते हुए भी मैंने एक-दो बार देखा है।

तो यह है पहली पीढ़ी की निपट निरक्षरता से चौथी पीढ़ी की अंग्रेजी शिक्षा तक पहुंचने की यात्रा का विवरण। और साथ में संबोधन, अभिवादन, एवं पहनावे में आये परिवर्तन की कहानी। -योगेन्द्र जोशी

 

 

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हिंदी के जहाज से उतर, अंग्रेजी की नाव पर जा बैठ

अपने लोग कभी-कभी इस बात पर गर्वान्वित-से दिखते हैं कि अपनी भाषा हिंदी – ‘इंडिया दैट इज भारत’ की राजभाषा – विश्व की दूसरी-तीसरी सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है । यह बात शायद सही हो, लेकिन यह तो सच है ही कि यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में सर्वाधिक तिरस्कृत है । कोई भी ‘हिंदीभाषी’ व्यक्ति जो अंग्रेजी पढ़ने-लिखने से परिचित हो चुका हो इसे आम जनों के साथ बोलचाल के लिए मजबूरन प्रयोग में लेता है, अन्यथा उसकी प्राथमिकता तो अंग्रेजी ही रहती है, जो देशवासियों की नजर में श्रेष्ठ एवं उपयोगी भाषा ही नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार एवं द्योतक भी है । आप अंग्रेजी जानते हुए भी हिंदी ही प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेते हों इसकी उम्मीद आम तौर पर नहीं की जा सकती है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही है । मैं ऐसे ही एक ताजे अनुभव की बात करता हूं ।

दो-तीन दिन पूर्व मैं सपत्नीक दो-तीन सप्ताह के नई दिल्ली प्रवास के बाद वापस अपने शहर वाराणसी आ रहा था । मुरादाबाद होकर चलने वाली काशी-विश्वनाथ नाम की गाड़ी के आरक्षित डिब्बे में हमारे बर्थों (शायिकाओं) के पास खिड़की से सटी बर्थ एक युवती के नाम थी । वह युवती गाजियाबाद के किसी तकनीकी संस्थान में अध्ययन कर रही है यह बात बाद में दो-तीन अन्य युवा यात्रिकों, जो स्वयं भी तकनीकी विषयों के छात्र थे, के साथ उसके वार्तालाप से मुझे ज्ञात हो गयी । मतलब यह है कि उनके छात्र होने का अनुमान मैंने उनकी आपसी बातचीत के आधार पर लगाया था ।

हमारे उस डिब्बे में मुरादाबाद स्टेशन पर एक सज्जन भी सवार हुए । उनकी बर्थ हम लोगों के ही अगल-बगल थी । साथी यात्रिकों से उनकी बातों से स्पष्ट हो गया था कि वे बीएचयू (पूर्व में मेरा कार्यस्थल) में अध्यापक हैं और मेरठ में आयोजित एक वैज्ञानिक गोष्ठी में भाग लेकर वाराणसी लौट रहे हैं ।

रेलगाड़ी के मुरादाबाद स्टेशन से आगे बढ़ने के कुछ मिनटों बाद उन अपेक्षया नवागन्तुक यात्री ने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि वह क्या करती है और कहां जा रही है । केवल उसी छात्रा में उनकी दिलचस्पी क्यों जगी थी यह मैं समझ नहीं सका । खैर, जैसा कि उम्मीद की जाती है उन दोनों के बीच की आरंभिक बातचीत सामान्य हिंदी में ही हुई । किंतु जैसे ही उन सज्जन को यह अहसास हुआ कि वह युवती तकनीकी विषय की छात्रा है, और तदनुसार अंग्रेजी भाषा के प्रयोग से सुपरिचित है, तो वे हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आये । उन दोनों के बीच चंद मिनटों की बाद की वार्ता अंग्रेजी में ही संपन्न हुई । मुझे याद आता है कि उन्होंने अपनी निकटता दर्शाने के लिए छात्रा को कुछ ‘स्नैक्स’ भी अर्पित किए जिन्हें उसने विनम्र भाव के साथ अस्वीकार कर दिया था ।

मैं उस वार्तालाप में भागीदार नहीं था और अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने कुछ यूं उलट-पलट रहा था कि गोया मैं उस वार्तालाप से अनजान, था या उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी । किंतु बाहरी तौर पर अनभिज्ञ-सा बना मैं वस्तुतः पूरे वाकये पर गौर कर रहा था । मेरे लिए उनकी बातचीत के असली विषय की कोई अहमियत नहीं थी । उस समय जो बात मेरी दृष्टि में अहम थी और जो मुझे खटक रही थी वह थी उनका हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आना । दोनों हिंदी जानते थे, और मुझे पक्का विश्वास है कि दोनों की मातृभाषा – भले ही कहने भर को ही मातृभाषा हो – हिंदी ही रही होगी ।

उस समय मैं सोचने लगा कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी रहती है जिसके कारण एक हिंदीभाषी अन्य हिंदीभाषी के साथ भी हिंदी में बात करने से कतराता है, और तुरंत ही अंग्रेजी को वरीयता देते हुए उसमें बतियाने लगता है । कोई व्यक्ति अन्य भाषाभाषियों के साथ भी पहले हिंदी में प्रयास करे और काम न चलने पर ही अंग्रेजी का प्रयोग करे तो यह बात मेरे समझ में आती है । किंतु अपने देश में हाल उल्टे ही लगते हैं । यहां तो अजनबियों के साथ अंग्रेजी में बात करना अंग्रेजी पढ़े-लिखे अनेकों लोगों की प्राथमिकता रहती है । क्या इस मानसिकता से हम भारतीय कभी मुक्त हो पाएंगे यह प्रश्न मेरे मन में शेष यात्रा के दौरान उठता रहा ।

और अपने घर पहुंचने पर मैंने जब खुद की अनुपस्थिति में इकट्ठी हुई डाक पर नजर डाली तो उसमें एक निमंत्रण-पत्र मिला, जिसका विषय था हमारे एक पड़ोसी की पोती का जन्मदिन, जो इस बीच मनाया जा चुका था । निमंत्रण-पत्र था ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले एक पड़ोसी परिवार का, जिससे जुड़े लोगों के लिए – मुझे पूरा विश्वास है – अंग्रेजी आज भी कमोबेश अनजान भाषा होगी । नवजात बच्ची के दादा से पहले की पीढ़ियां अनपढ़ या अल्पशिक्षित रही होंगी ऐसा सोचता हूं मैं । अवश्य ही अब ‘फॉरेन’ अनुभव वाले बच्ची के कंप्यूटर इंजीनियर ‘पापा’ को अब हिंदी से परहेज और अंग्रेजी से लगाव हो गया होगा ।

उपर्युल्लिखित अनुभव मेरे लिए नये नहीं हैं । हिंदी से जुड़े ऐसे अनुभव मुझे आए दिन होते रहते हैं, और हर बार हिंदी को लेकर हिंदीभाषियों में व्याप्त कुंठा मेरे चिंतन का विषय बन जाता है । मुझे लगता है हिंदी एक जहाज की तरह है जिसमें जहां-तहां सुराख हो गये हों, जिनसे रिसता हुआ पानी उसे डुबाए जा रहा हो । लेकिन उस भाषा के प्रति लगाव रखने वाले और उसे बचाए रखने को समर्पित अभिमानी कुछ गिने-चुने देशवासी उस पानी को उलीच कर हटाने और जहाज को बचाने की जुगत में लगे हैं । डुबाने को तत्पर रिसाव और उससे लड़ रही ताकतें परस्पर संघर्षरत हैं । वस्तुस्थिति की गंभीरता को भांपते हुए ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो हिंदी के उस जहाज को छोड़ अंग्रेजी की नाव पर चढ़कर सुरक्षित हो चुकने का सुख पा रहे हैं । वर्तमान परिस्थिति में वही बुद्धिमान समझा जा रहा है जो हिंदी का जहाज छोड़ झट-से अंग्रेजी-नाव की ओर लपक रहा हो ।  योगेन्द्र जोशी

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हिंदी की दुरवस्था का एक अनुभव यह भी

मेरे मोहल्ले में बंदरों का आतंक छाया हुआ है । पहले यहां बंदर नहीं दिखाई थे, लेकिन कोई डेड़ दशक पहले उन्होंने अपने कदम यहां जो रखे तो उसके बाद लौटने का नाम नहीं लिया । तब सुना गया था कि संकटमोचन मंदिर (वाराणसीवासियों की असीम श्रद्धा का प्रतीक प्रख्यात हनुमान् मंदिर) से खदेड़े जाने पर ही उन्होंने इस मोहल्ले में शरण ली थी । कालांतर में वे इस स्थान के स्थाई बाशिंदे हो गये । आप कहेंगे बंदर तो अपने देश के प्रायः सभी शहरी इलाकों में दिखाई दे जाते हैं, आपके मोहल्ले में भी हैं तो आश्चर्य ही क्या है, न होते तब आश्चर्य होता । आप सच कह रहे हैं । जैसे आदमी गांव-देहात छोड़कर शहर में बसने चले आ रहे हैं, ठीक वैसे ही बंदर भी अपना आशियाना शहरों में खोज रहे हैं । कारण दोनों के अलग-अलग भले ही हों । खैर इन बंदरों की मौजूदगी का हिंदी से कोई लेना-देना नहीं । मुझे तो हिंदी से जुड़े एक अनुभव का जिक्र करना है, जिसका मंकी (बंदर) शब्द से संबंध अवश्य है । इसीलिए इतना कह गया । सो सुनिए उसके बारे में ।

बस दो रोज पहले की ही बात है । सुबह-सुबह मैं निकल गया अपने घर के सामने की चालीस-फुटा सड़क पर करीब सौ मीटर चलते हुए पास के मुख्य मार्ग पर दुकान से कुछ सामान लेने । लौटते वक्त आठएक साल का एक बच्चा, जो मेरे मकान के सामने ही रहता है, मुझे मिल गया सड़क के किनारे किसी का इंतिजार-सा करता हुआ । जैसे ही मैं उसके पास से गुजरा, उसने मुझे देखा और दौड़कर मेरे बगल में आ गया । मुझसे लगभग सटते हुए-सा वह मेरे साथ चलने लगा । मैं उस बच्चे को जानता तो था ही, पर कभी राह चलते उससे बात की हो या वह दो कदम भी मेरे साथ चला हो ऐसा याद नहीं पड़ता । सो उसके उस समय के बरताव से मैं कुछ चौंेका । मैंने पूछ डाला, “क्यों भई, क्या हो गया जो मेरे साथ बगल में चल रहे हो ?”

उसने सामने आगे सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, “वहां मंकी हैं, काटते हैं ।”

“मंकी हैं या बंदर ?” मैंने पूछा, जानने के लिए कि देखूं क्या जवाब देता है । सामने कुछ दूरी पर दो-तीन बंदर दिखाई दे रहे थे । मोहल्ले के बंदर कभी-कभी काटने भी दौड़ पड़ते हैं, खासकर तब जब उन्हें छेड़ा जाए । उस बच्चे का डर स्वाभाविक था और वह कदाचित् मेरे साथ खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था ।

मेरे सवाल का जवाब उसने यों दिया, “बंदर तो हिंदी में कहते हैं, अंगरेजी में तो मंकी कहते हैं ।”

मैंने उसे टोकते हए कहा, “पर तुम तो हिंदी में बोल रहे हो, अंगरेजी में तो नहीं ।”

वह चुप रहा । उसके पास मेरे प्रश्न का शायद कोई उत्तर नहीं था । वयसा आठएक साल के उस बच्चे के पास भला क्या उत्तर हो सकता था ? कह नहीं सकता कि उसके मन में कोई विचार उठे भी होंगे । लेकिन एक चीज मैं महसूस कर रहा था । उस बच्चे के मन में स्कूली पढ़ाई यह विचार भर रही थी कि तुम्हें अंगरेजी सीखना ही नहीं, बल्कि उसे बोलना भी है । और उसकी शुरुआत अपनी रोजमर्रा की बोली में अधिकाधिक अंगरेजी शब्दों को ठूंसने से ही होगी । अंगरेती की श्रेष्ठता एवं अनिवार्यता और हिंदी की निरर्थकता के भाव उसके मन में उपजाये जा रहे होंगे ऐसा मेरा विश्वास है ।

स्थिति का समुचित आकलन करने में उस बच्चे की पृष्ठभूमि पर विचार करना आवश्यक है । बता दूं कि उसके दादा पांच भाइयों में से एक हैं । आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्ग के पांचों भाई मेरे घर के सामने छोटे तथा अतिसामान्य अलग-अलग मकानों में गुजर-बसर करते हैं । कभी इन भाइयों के बाप-दादा इस मोहल्ले की कृषि योग्य पूरी जमीन पर मालिकाना हक रखते थे । करीब पचास वर्ष पूर्व जब उनकी जमीन पर कालोनी विकसित हुई तो वे लोग जमीन के एक छोटे-से टुकड़े में सिमटकर रह गये । जमीन का जो भी मूल्य तब मिला होगा उसका सदुपयोग उनके बाप-दादा शायद नहीं कर पाये । मौजूदा पांचों भाई निपट निरक्षर हैं, अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह । इन भाइयों के बच्चों — जिनकी कुल संख्या बीस-पच्चीस है और जिनमें से केवल तीन-चार ही शादीशुदा तथा बाल-बच्चेदार हैं — तक अब साक्षरता पहुंच चुकी है, लेकिन मात्र प्राथमिक दर्जे की । शायद एक या दो ने हाईस्कूल तक पढ़ भी लिया है, किंतु उसके आगे नहीं । भाइयों के बाद की इस बीच की पीढ़ी के सदस्य अब स्कूली पढ़ाई के प्रति सजग हो चुके हैं । वे स्वयं भले ही अंगरेजी न जानते हों, किंतु अंगरेजी की महत्ता को समझने लगे हैं । और इसी कारण अपनी सीमित आमदनी के भीतर वे अपने बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने के बजाय चौराहे-चौराहे पर खुल चुके आजकल के ‘इंग्लिश मीडियम’ निजी विद्यालयों में से किसी एक में भेज रहे हैं । वह बच्चा ऐसे ही किसी स्कूल से ‘बंदर’ के बदले ‘मंकी’ कहना सीख गया है ।

यह वाकया एक कटु सच को उजागर करता है । वह यह कि जैसे-जैसे अपने देश की उम्र बढ़ रही है, वैसे-वैसे अंगरेजी की जड़ें ‘इंडियन सोसाइटी’ में गहरे उतरती जा रही हैं, और हिंदी अपने ही लोगों के मध्य तिरस्कृत होती जा रही है । वाकई विचित्र है इस देश के बाशिंदों का रवैया । – योगेन्द्र जोशी

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एक दुःस्वप्न – राजनीति में सत्ता, सत्ता पर कब्जा, कब्जे की राजनीति

पूरे एक माह के लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया का आज अंतिम दिन है । सायं पांच बजे पंचम चरण का मतदान भी संपन्न हो चुका है । मतों की गिनती दो रोज बाद होनी है । राजनेताओं को तो परिणामों का बेसब्री से इंतजार है ही, जनता की भी उत्सुकता कोई कम नहीं । उसके लिए यह नयी सरकार चुनने का मौका ही नहीं है बल्कि एक मनोरंजक खेल भी है । यह तो हर कोई समझता है कि कोई दल सरकार बनाये, आम आदमी की जिंदगी वैसी ही चलनी है जैसे अभी तक चलती आ रही है । वही बिजली-पानी की किल्लत, अस्पतालों में लगती मरीजों की लंबी कतारें, बच्चों के एड्मिशन के लिए एक स्कूल से दूसरे, तीसरे, चौथे तक की दौड़ और उस पर बढ़ती फीस के जुगाड़ की चिंता, रेलगाड़ियों के डिब्बों में ठुंसकर सफर करने की मजबूरी । और भी न जाने क्या-क्या देखना-सहना पड़ता है । बस, रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाते-सुलझाते जिंदगी गुजारना सबकी नहीं तो कइयों की नियति है, जिससे निजात नहीं मिलनी है, चाहे कोई राजकाज संभाले ।

रात का वक्त है । भोजन कर चुका हूं । सोचता हूं टेलीविजन चैनलों पर चुनाव संबंधी समाचार, परिचर्चाएं तथा समीक्षाएं देख-सुन लिये जायें । रिमोट कंट्रोल का बटन दबा-दबाकर एक चैनल से दूसरे-तीसरे पर भटकता हूं । खबरें कमोबेश वही हैं, बातें भी वही । मतदान का प्रतिशत क्या है, जहां कम है तो क्यों है । किस दल को कितनी सीटें मिलनी हैं और कैसे किसी भी मोरचे को बहुमत नहीं मिलना है । वे गठबंधनों के टूटने और दलों के बीच नये रिश्तों के बनने की बात करते हैं । जोड़तोड़ की राजनीति आरंभ हो चुकी है यह मुझे सुनने को मिल रहा है । जो कल तक एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी थे अब साथ आने की फिराक में हैं, और जिनके बीच दोस्ती थी वे अब साथ छोड़ रहे हैं । सत्ता कैसे हाथ लगेगी यह चिंता सबको सता रही है । देश कहां जायेगा, आम आदमी की समस्याएं कैसे सुलझेंगी जैसी बातें नदारद हैं । ऐसा लगता है कि बस सत्ता पाना एकमेव उद्येश्य है सबका । सत्ता हथियाने की बात खुलकर कही जा रही है । टीवी पर्दे पर नजर गड़ाये और उसके स्पीकरों पर कान दिये हुए तीन-एक घंटे का अंतराल बीत जाता है । अर्धरात्रि होने को है । देश की राजनीति को लेकर मन नैराश्य भाव से भर जाता है । टीवी ऑफ कर देता हूं और चला जाता हूं अपने बिस्तर पर लेटने । कुछ देर के लिए देश की भावी तस्वीर के मंसूबों में खो जाता हूं, और फिर कब आंख लग जाती है पता नहीं ।

नींद में एक सपना देखता हूं । किसी गांव का एक परिवार मेरे सपने में आ पहुंचता है । एक परिवार जिसमें कई पीढ़ियों से एक ही वारिस पैदा होता आ रहा है । मौजूदा वारिस के बाप, दादा, परदादा, सभी अपने-अपने मां-बाप की इकलौती संतानें रहीं । बिरादरी लंबी-चौढ़ी है, लेकिन उसमें कोई नजदीकी रिश्तेदार नहीं उस परिवार का । समय बीतता है और फिर एक हादसा घटता है जिसमें उस परिवार का अस्तित्व मिट जाता है, बिना किसी वारिस को अपने पीछे छोड़ते हुए ।

बिरादरी के लोगों की नजर आ टिकती है उस जमीन-जायदाद पर जो वह परिवार छोड़ गया है । कौन हो सकता है सही दावेदार । सभी अपने-अपने दावे करने लगते हैं । वह संपदा अशांति का कारण बन बैठती है । गांव खेमों में बंट जाता है उसे कब्जियाने के लिए । गाली-गलौज, मारपीट की नौबत आ जाती है । लाठी-डंडे चलने लगते है । लोगों का एक दल जमीन-जायदाद हथियाने में सफल रहता है । उनमें से जो जितनी ताकत दिखाता है वह उतना ही बड़ा हिस्सा पा जाता है । लेकिन दूसरे दलों के लोग शांत नहीं बैठते हैं । वे एकजुट हो आगे की योजना बनाते हैं । पहले दल के लोगों को तोड़ते हैं, उन्हें बेहतर हिस्सेदारी का भरोसा दिलाते हैं । और दो-चार साल में तस्वीर बदल जाती है । गांव के दूसरे लोग जमीन हथियाने में सफल हो जाते हैं । हार खा चुके लोग हार मानते नहीं । वे चुप नहीं बैठते । उनकी कोशिशें होती हैं दुबारा कब्जा पाने की । गाली-गलौज, लाठी-डंडे अपनी भूमिका निभाते हैं । कालांतर में वे उसे वापस पा जाते हैं । कुल मिलाकर एक-दूसरे से कब्जा छीनने का एक खेल गांव में चल निकलता है, अमन-चैन की कीमत पर ।

अचानक मेरी नींद खुलती है । बाहर चिड़ियों के चहचहाने का शोर सुनाई देता है । संकेत है कि सुबह हो चुकी है । मैं बिस्तर से उठ खड़ा होता हूं । सपने की याद अभी ताजा है । दो-चार दिन में भूल जाऊंगा । शायद अगले चुनाव के मौके पर फिर ऐसा ही एक सपना दिखे, कौन जाने ! – योगेन्द्र

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पोते की अंग्रेजी से खुश दादाजी

देश की राजधानी दिल्ली में अपने अल्पकालिक प्रवास के बाद मेरे एक मित्र घर लौट आये । एक दिन संयोग से राह चलते जब मेरी भेंट उनसे हुयी तो कुशलक्षेम की औपचारिक बातों के पश्चात् उन्होंने हर्ष और चिंता के मिले-जुले भाव के साथ मुझे बताना आरंभ किया कि प्राथमिक पाठशाला में पढ़ रहा उनका पोता स्कूली पढ़ाई में अव्वल चल रहा है । उन्होंने इतना और जोड़ा कि वह इंग्लिश अच्छी बोल तथा लिख लेता है, किंतु हिन्दी में उसकी प्रगति अच्छी नहीं चल रही है । वह हिन्दी शब्दों का ठीक-ठीक उच्चारण नहीं कर पाता है और देवनागरी में लिखने में उसे कठिनाई होती है । उनकी समस्या के मूल में वह प्रतिष्ठित और खर्चीली शिक्षण संस्था थी जिस में बच्चों को हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अनदेखी करते हुए अंग्रेजी में पारंगत करने की हर संभव कोशिश की जाती है । देश में अनेकों ऐसी शिक्षण संस्थाएं हैं जहां बच्चों को प्रकारांतर से भारतीय भाषाओं के ‘घटियापन’ तथा ‘अनुपयोगिता’ का संदेश दिया जाता है ।

पोते की अंग्रेजी को लेकर वे काफी उत्साहित और उसके अच्छे व्यावसायिक भविष्य के प्रति आशान्वित थे । लेकिन हिन्दी को लेकर उन्हें कुछ चिंता भी सता रह थी यह उनकी आवाज और माथे की लकीरों में झलक रहा था । उन्हें आश्वस्त करते हुए मैंने कहा “यह तो बहुत अच्छी बात है । पोता अंग्रेजी का एक्सपर्ट हो जाये तो समस्या की बात ही क्या है ? बड़ा हो जाने पर आम बोलचाल के लिए कामचलाऊ हिन्दी तो यूं ही सीख जायेगा । भला हिन्दी की जरूरत कहां है, और हिंग्लिश तो वह बखूबी बोल ही लेगा । हिन्दी लिखने की जरूरत उसे होगी नहीं, तब देवनागरी में न भी लिख सके तो क्या फर्क पड़ेगा ?”

“आपका कहना सही है । अंग्रेजी के बिना तो अब देश-दुनिया में काम चलता नहीं । आखिर इंटरनैशनल भाषा जो है । फिर भी कहीं-कहीं हिन्दी की जरूरत पड़ ही जाती है । और असल बात तो यह है कि आगे की उच्चतर कक्षाओं के हिन्दी पेपर भी तो उसे पास करने होंगे । तब रिजल्ट गड़बड़ा सकता है । इसलिए सोचते हैं कि कुछ हिन्दी सीख लेता तो ठीक रहता ।” वे प्रत्युत्तर में बोले ।

अपने देश में अपनी मूल भाषाओं की दशा और उन पर अंग्रेजी के वर्चस्व पर हम दोनों के बीच कुछ देर तक विचार-विमर्ष चलता रहा । बाद में मैंने उनसे जिज्ञासावश पूछ डाला कि अंग्रेजी इंटरनैशनल भाषा है इस कथन का वह क्या अर्थ लगाते हैं । उनका उत्तर सुनना मेरे लिए दिलचस्प था । साथ ही मुझे उनकी अज्ञानता पर हैरानी भी हो रही थी । उनका कहना था कि दुनिया के हर कोने में तो अंग्रेजी चल रही है । वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन, व्यावसायिक क्रियाकलाप तथा प्रशासन इत्यादि सभी कुछ तो सर्वत्र अंग्रेजी में होने लगा है । उनका सोचना था कि बिना अंग्रेजी के अब किसी भी देश की प्रगति संभव नहीं और उसके बिना कोई व्यक्ति आगे बढ़ भी नहीं सकता ।

अंग्रेजी की ‘अंतरराष्ट्रीयता’ को लेकर उनके मन में व्याप्त भ्रम को मैंने तोड़ने की कोशिश की और कहा, “यह कहना शायद ठीक होगा कि विश्व के प्रमुख देशों में अंग्रेजी एक अतिरिक्त भाषा के रूप में स्वीकारी जा रही है । परंतु वहां के लोगों को यह मान्य नहीं कि अंग्रेजी उनकी भाषाओं को विस्थापित कर उन्हें दोयम दर्जे का बना डाले, जैसा कि अपने यहां है । वहां के लोग अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कार्यों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग भले ही करें, अपने घरेलू कामकाज में अपनी ही भाषाएं प्रयोग में लेते हैं और उनका सम्मान करते हैं । चाहे डाक्टरी नुस्खा हो, या उपभोक्ता वस्तुओं के बाबत जानकारी, या सरकारी कामकाज, सर्वत्र उनकी अपनी भाषाएं काम देती हैं ।”

मैंने खड़े-खड़े ही उनको एक छोटा-सा भाषण पिला दिया । मेरी बातें सुनकर वे बोले, “आप कह रहे हैं तो मान लेते हैं । लेकिन अपने यहां तो अंग्रेजी ही चलेगी न ?” और आगे बढ़ गये । मैं सोचने लगा कि क्या कभी अपने लोग अंग्रेजी के भ्रमजाल से बाहर निकल सकेंगे ? – योगेन्द्र

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हिंदी, अंग्रेजी और फ़्रांसीसी: पेरिस का अनुभव

आज से करीब ढाई दशक पहले की एक घटना की मुझे सदा याद आती है । उन दिनों में इंग्लैंड में उच्चाध्ययन के लिए गया हुआ था । मेरे साथ मेरा परिवार भी था जिसमें तीन-चार साल के दो बच्चे तथा पत्नी शामिल थे ।

एक बार ग्रीष्मकाल में हमने पेरिस देखने का कार्यक्रम बनाया । इस हेतु हमने पर्यटन संचालित करने वाली एक संस्था के छोटे जहाज (फेरी) की सेवा ली । हमारा जहाज रात्रि द्वितीय प्रहर इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी तट पर अवस्थित पोर्ट्समथ शहर से रवाना हुआ और अगले सबेरे तड़के फ्रांस के कैलल्स पहुंचा । वहां से करीब तीन घंटे की बस-यात्रा द्वारा हम पेरिस पहुंच गये, जहां पर्यटन संचालक ने हमें दिन भर घूमने-फिरने के लिए छोड़ दिया । संध्याकाल सूर्यास्त के समय हमारी वापसी यात्रा नियत की गयी थी । पेरिस में हमने मुख्य-मुख्य पर्यटक स्थलों का दर्शन किया जिनमें प्रमुख था विश्वप्रसिद्ध ‘एफिल टावर’ देखना और नगर की ‘सेन’ नदी पर नौकाभ्रमण करना ।

उस दिन दोपहर के समय एफिल टावर के नजदीक किसी पार्क में हम लोगों ने थोड़ी देर आराम किया, क्योंकि हम सभी, खासकर बच्चे, काफी थक चुके थे । वहीं हमने दोपहर का भोजन किया जो हम अपने साथ ले आये थे । कुछ देर घूमने-फिरने के बाद हम पार्क से निकल मुख्य मार्ग पर आने लगे । पार्क के प्रवेशद्वार पर मिले एक फ्रांसीसी नौजवान से हमने कुछ जानकारी लेनी चाही । जैसा अभी तक चलता आ रहा था, हमने अपना सवाल अंग्रेजी में उससे पूछा । उसने फ्रांसीसी में कुछ उत्तर दिया जो हमारी समझ से परे था । हमने उसे बताने की कोशिश की कि उसकी बात हम समझ नहीं सके और वह कृपया अंग्रेजी में जवाब दे दे । उसने फ्रांसीसी में फिर कुछ कहा । हमने अंग्रेजी में धन्यवाद दिया और पार्क से बाहर आ गये ।

मुख्य मार्ग पर फिर एक व्यक्ति से हमने वांछित जानकारी लेनी चाही । इस व्यक्ति का भी व्यवहार संयत और शिष्ट था, किंतु उसका भी उत्तर फ्रांसीसी में ही था । हमने इस बात का संकेत देना चाहा कि हम भारतीय पर्यटक हैं और फ्रांसीसी न जानने के कारण अंग्रेजी में उत्तर चाहते हैं । इस बार भी हमें निराशा ही हुयी ।

बाद में हमारी समस्या का हल एक रेस्तरां में मिल सका जहां बैठकर हमने कुछ खाया-पिया । वहीं एक कर्मचारी से हमने वांछित जानकारी प्राप्त की । क्षमायाचना के साथ हमने उससे पूछा, “माफ कीजियेगा, आपके पेरिस में लोग अंग्रेजी नहीं जानते क्या ? मैं सोचता था कि यहां अंग्रेजी का अच्छा-खासा चलन होगा ।”

रेस्तरां के उस कर्मचारी ने मुस्कराते हुए (अंग्रेजी में) जवाब दिया, “नहीं, ऐसी बात नहीं है । यहां अंग्रेजी जानने वाले ढेरों मिल जायेंगे । हां, ऐसे कम लोग होंगे जिन्हें बढ़िया अंग्रेजी आती हो । पर काम लायक अंग्रेजीज्ञान तो कमोबेश बहुतों को होगा । … क्यों कोई खास बात है क्या ?”

“दरअसल आपसे पहले हमने अन्य दो लोगों से बात की थी । वे दोनों व्यवहार से संभ्रांत लग रहे थे, किंतु हमें वांछित जानकारी नहीं दे पाये । हमें लगा कि कदाचित् उन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती है । संयोग ही कुछ ऐसा बन पड़ा होगा ।”

उस व्यक्ति ने हमें समझाते हुए कहा, “आपका अनुमान शायद गलत हो । इसकी गुंजाइश कम ही है कि उन्हें अंग्रेजी न आती हो । फिर भी अंग्रेजी में उत्तर न देने के उनके कारण हैं । हम फ्रांसीसियों को अंग्रेजी स्वीकार्य नहीं है । आपस में हम न अंग्रेजी बोलते हैं और न ही किसी को बोलने की छूट देते हैं । मैं भी अंग्रेजी का प्रयोग यथसंभव नहीं करता । परंतु इस रेस्तरां में विदेशी पर्यटक आते रहते हैं जिनकी मदद के लिए मैं अंग्रेजी बोलता हूं । अंग्रेजी ही नहीं, मैं तो कामचलाऊ जर्मन तथा इतालवी भाषा भी बोलता हूं । यह हमारी व्यावसायिक विवशता है । अन्यथा अपनी भाषा या फिर संभव हो तो सामने खड़े मुसाफिर की भाषा का चुनाव हमारी नीति है ।”

जीवन में वह पहला क्षण था जब मुझे लगा कि हम भारतीयों के मन में भी उन लोगों की तरह अपनी देसी भाषाओं के प्रति आदर भाव होना ही चाहिए ।

इस ब्लाग पर मैं अपने रोजमर्रा के अनुभवों पर आधारित किस्से प्रस्तुत करने जा रहा हूं और यह मेरी पहली प्रविष्ठि है । आज चौदह सितंबर, हिन्दी दिवस, है । मैंने सोचा कि क्यों न शुरुआत पेरिस के उस भाषायी अनुभव से ही की जाये । — योगेन्द्र

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