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सवाल “भारत” के वजूद का

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस समय भी मैं जिज्ञासु दृष्टि से सभी को देख रहा हूं।

मेरी नजर बगल की कुर्सी पर बैठे आठ-दश-वर्षीय एक बच्चे पर पड़ती है। वह भी एक स्मार्टफोन के साथ खेल रहा है, शायद अपने मित्रों के संदेश किसी “सोशल मीडिया” (सामाजिक संपर्क माध्यम?) पर देख रहा है। उसकी उंगलियां सधे अंदाज में फोन के पर्दे पर चलती हैं। मेरे पास भी स्मार्टफोन है पर उसका प्रयोग मैं वैसी प्रवीणता से नहीं कर पाता जैसी इन आधुनिक बच्चों में देखता हूं। मैं उस बच्चे से पूछना चाहता हूं वह क्या कर रहा है, क्या-क्या कर सकता है, इत्यादि। असमंजस में हूं कि पूछूं या नहीं। बड़ों की भांति बच्चे भी संवेदनशील हो सकते हैं। उस बच्चे की निजता में हस्तक्षेप करूं क्या? करूं तो किस बहाने? आज के युग में निजत्व बहुत माने रखने लगा है।

अंततः मैं उसकी एकाग्रता में खलल डाल ही लेता हूं और पूछता हूं, “क्या आप बताना चाहेंगे कि आप अभी क्या कर रहे हैं?”

आम तौर पर मैं बच्चों को आप कहकर नहीं पुकारता, लेकिन इस समय अनायास ही उसके प्रति औपचारिक हो रहा हूं। वह कहता है, “मैं व्हट्सऐप पर दोस्तों के साथ मैसेजेज़ शेयर कर रहा हूं। उसके पहले मैंने उनको यहां की फोटोज़ भेजीं।”

“अच्छा! फोन पर “गेम” भी खेलते होंगे? और भी बहुत-सी चीजें कर लेते होंगे?” मैं फिर पूछता हूं। मैं गेम कहने के बजाय खेल कहना पसंद करता हूं। लेकिन इस समय गेम शब्द ही मेरे मुख से निकलता है। मध्यम वर्ग के आजकल के बच्चे हिन्दी के शब्द बोलते ही कहां हैं?

वह जवाब देता है, “हां-हां, क्यों नहीं! गेम भी खेलता हूं। ई-मेल पढ़ सकता हूं। फोन रिचार्ज कर सकता हूं। ट्रेन-रेज़र्वेशन कर सकता हूं।”

“क्या आप गूगल-मैप के बारे में भी जानते हैं? अपने फोन पर उसे भी देख सकते हैं क्या?” मैं कुछ और जानना चाहता हूं।

वह भी मेरी बातों में दिलचस्पी लेता है। कदाचित् स्मार्टफोन की अपनी जानकारी से मुझे प्रभावित करना चाहता है। ऐसा करना मनुष्यों के स्वभाव में होता ही है और बहुत-से बच्चों में भी यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मैं पूछता हूं, “क्या गूगल मैप के सहारे मुझे दिखा सकते हैं कि आप अभी किस जगह पर हैं।”

वह फोन के पर्दे पर जादुई अंदाज में अपना हाथ फेरता है और मुझे वैवाहिक स्थल तथा संबंधित शहर की स्थिति दिखा देता है। मैं फिर पूछता हूं, “क्या मैप में जापान कहां है इसे भी यह बता सकते हैं?”

वह उसी करिस्माई अंदाज से मैप में जापानी द्वीप-समूह की स्थिति दिखाता है और मुझसे कहता है, “आप क्या जापान के शहरों की लोकेशन भी जानना चाहेंगे?”

“नहीं, इतना काफी है। …” कहते हुए मैं प्रशंसात्मक शब्द बोलता हूं, “वाह, आपका फोन ही स्मार्ट नहीं, आप भी स्मार्ट हैं। … अच्छा, अब जरा भारत कहां है यह भी मैप में दिखा दें।”

दो-एक क्षणों तक उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। फिर अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोलता है, “आपका मतलब इंडिया से है क्या? मेरी टीचर ने एक बार बताया था कि इंडिया को भारत भी कहते हैं। लेकिन मुझे थोड़ा कंफ़्यूज़न है। …”

मैं हामी भरता हूं। उसके फोन के पर्दे पर इंडिया नजर आने लगता है।

“चलिए, इतना काफ़ी है। आपको इतनी देर डिस्टर्ब किया। अब आप अपना व्हट्सऐप वाले काम पर लौट चलिए।” कहते हुए मैं पास में काफी-प्यालों की ट्रे लिए घूम रहे व्यक्ति को इशारा करता हूं। वह पास आता है और मैं एक प्याली काफी ले लेता हूं।

सोचने लगता हूं कि क्या “भारत” का वजूद खत्म हो जायेगा? मेरा इशारा भारत देश की ओर नहीं है। मेरा मतलब तो “भारत” शब्द से है जिसे हमारे पुरखे उस भूभाग के संबोधन के तौर पर प्रयोग में लेते रहे हैं जिसे अब लोग इंडिया कहते हैं। क्या देश का “भारत” संबोधन आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिचित हो जायेगा?

शायद हां! – योगेन्द्र जोशी

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फुटकर काम की तलाश

पहले एक तस्वीर बीच सड़क खड़े पेड़ की:

Mid-Road Tree

मैं मखमुठी से अखनूर जा रहा हूं। जम्मूतवी-अखनूर-जोरिवां मार्ग पर स्थित सैन्य-क्षेत्र है मखमुठी जहां मैं कार्यवशात् चार-पांच दिनों के प्रवास पर आया हूं। यह स्थान अखनूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह के करीब 9:00 बजे हैं। मैं साइकिल से शौकिया अखनूर जा रहा हूं यह जांचने के लिए कि साइकिल से 30-32 कि.मी. आ-जा सकता हूं कि नहीं। मैं साइकिल की उपयोगिता का क़ायल हूं और उम्र के इस पड़ाव में भी साइकिल को ही अपने शहर में आवागमन के लिए यथासंभव इस्तेमाल में लेता हूं।

रास्ते में मैं चाय की छोटी-सी एक दुकान पर रुक जाता हूं, अपने साथ की बोतल से पानी पीने और उसके बाद एक कप चाय पीने के लिए। सड़क की हालत ठीक है, समतल और सपाट, गड्ढामुक्त! वाहनों का आवागमन अधिक नहीं है। फिर भी जो गुजर रहे हैं उनकी रफ़्तार अच्छी-खासी है, इसलिए दोनों तरफ़ देखकर ही सावधानी से ही सड़क पार करने जरूरत दिखती है।

सड़क की दूसरी तरफ़ एक नौजवान सुर्ख लाल टीशर्ट और हल्के सलेटी रंग की पैंट पहने हुए सड़क पार करने की फिराक में खड़ा है। उसके पास कोई सामान नहीं है सिवाय कंधे पर पड़े एक गमछे के और पैरों में पहनी एक जोड़ी  चप्पल के।

मैं पानी पीकर गिलास में परोसी गयी चाय पीने लगता हूं। तब तक वह युवक भी दुकान पर पहुंचता है और दुकानदार से एक कप (गिलास) चाय की मांग करता है। दुकानदार उसे गरम चाय का गिलास थमाता है। चाय की चुस्कियां लेते हुए वह पूछता है, “क्या आसपास कोई गांव है?”

दुकानदार और उसके दो साथी समवेत स्वर में कहते हैं, “यह तो गांव का ही इलाका है, हम सभी गांव के बाशिन्दे हैं। … आपको जाना किधर है?”

वह कोई जवाब नहीं देता है। उसके सवाल पूछने के अंदाज से मैं समझ जाता हूं कि वह उस स्थान से अनभिज्ञ है और उसे किसी खास गांव की तलाश नहीं है। मैं उसे गौर से देखता हूं। उसके हुलिये से लगता है कि वह एक अति सामान्य माली हालत का इंसान है या उससे भी कमजोर। वह काम की तलाश में कहीं दूर-दराज से आया होगा ऐसा मैं अनुमान लगाता हूं। सोचता हूं कि मैं उससे पूछूं, “आप इस अनजान-अजनबी इलाके में क्यों आये हैं? … रोजी-रोटी की तलाश में तो नहीं आये हैं?”। लेकिन यह सवाल पूछने में हिचकता हूं और चुप रहता हूं। अंत में उससे कैसे बात शुरू करूं यह सोचते हुए उस व्यक्ति से पूछ लेता हूं, “बुरा न मानिएगा … आप कहां से आये हैं?”

“मैं यूपी (उत्तर प्रदेश) से आया हूं।” उसका संक्षिप्त उत्तर है।

“यूपी में कहां से?” मैं ठीक-ठीक जानने के लिए पूछता हूं।

“लखनऊ-बाराबंकी से

“लखनऊ से या बाराबंकी से? … शहर? … गांव-देहात?” मैं फिर पूछता हूं।

वह “बाराबकी जिले से” कहके चुप हो जाता है।

बाराबंकी मेरे शहर वाराणसी से बहुत दूर नही है। जम्मू-तवी के निकट के उस इलाके से हजारएक कि.मी. दूर बाराबंकी से आए उस युवक से मैं एक प्रकार की निकटता-सी महसूस करता हूं। उससे मैं पूछता हूं, “आप चाय के साथ समोसा खाना चाहेंगे?”

वह नहीं कहते हुए मना कर देता है। हम एक-दूसरे के लिए एकदम अपरिचित हैं। इसलिए मैं अधिक जोर नहीं डालता।

तब तक वह चाय खत्म कर चुकता है और दुकानदार को उसकी कीमत चुकाता है। फिर सड़क पर दायें-बांये बारी-बारी से दो-तीन दफे नज़र डालता है। वाहनों का आवागमन अधिक न होने बावजूद वह सड़क पार करने में कुछ हिचकिचाहट दिखाता है। सड़कें पार करने का उसे शायद वैसा अभ्यास न हो जैसा आम शहरी को होता है। अंत में वह सड़क के उस पार वापस चला जाता है जिधर से वह आया था। फिर सड़क के किनारे के दो-चार मकानों और खेतों के बीच से गुजरने वाली एक गली में गुम हो हो जाता है।

उसके चले जाने और अपनी चाय पी चुकने के बाद मैं भी चाय की कीमत चुकाता हूं। फिर साइकिल पर चढ़कर मखमुठी का रास्ता तय करने लगता हूं।

रास्ते भर मैं उसके बारे में सोचता हूं। मुझे कोफ़्त होती है कि मैंने उससे अधिक बात करने की कोशिश नहीं की। मैंने पूछा होता कि क्यों वह घर से दूर उस अपेक्षया अपरिचित जगह पर पहुंचा है। अवश्य ही वह कामधंधे की तलाश में वहां आया होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि के जगहों से कई श्रमिक फसल कटाई के समय पंजाब और हरियाणा पहुंचते हैं यह मैं सुनता आया हूं। हो सकता है कुछ जने जम्मू भी पहुंच जाते हों। रबी की फसल कई दिनों पहले तैयार हो चुकी है। कुछ खेतों से फसल उठ चुकी है। फिर भी अभी काम बचा है। मैं मन ही मन प्रर्थना करता हूं कि उस आदमी को आसपास के खेतों में काम और गांवों में ठहरने को मिल जाये। मन खिन्न होने लगता है यह सोचकर कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के आदमी को काम की तलाश में सुदूर प्रदेशों तक भटकना पड़ता है। – योगेन्द्र जोशी

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भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक – शिक्षकों के वेतन से वसूली

हाल के नोटबंदी के निर्णय के बाबत केंद्र सरकार ने दावा किथा था कि इससे भ्रष्टाचार रोकना संभव होगा। तब से मैं सोच रहा हूं कि जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के आचरण का अभिन्न अंग बन चुका हो तब उससे कैसे मुक्ति मिल सकती है। अवश्य ही उपयुक्त कानून के तहत भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, बशर्ते कि उसका भ्रष्ट कृत्य पकड़ में आ जाए। लेकिन उससे क्या व्यक्ति भ्रष्ट मानसिकता से मुक्त हो जाता है? अपनी भ्रष्ट लिप्सा की पूर्ति के लिए वह उपयुक्त अवसरों की तलाश जारी रखेगा ही ऐसा मेरा मत है। इस विषय पर मेरा चिंतन-मनन चल ही रहा था कि एक दिन संयोगवश मेरी भेंट एक महिला रिश्तेदार से हो गयी। उन्होंने जो कहा उससे मेरा इतना ज्ञानवर्धन तो हो ही गया कि जब भ्रष्टाचार के एक रूप पर रोक लगती है तो वह दूसरे रूप में अवतरित हो जाता है। समाज में जब तक असीमित लोभ-लालच वाले लोगों की सुलभता बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार को उपजाऊ भूमि की कमी नहीं रहेगी। पेश है महिला रिश्तेदार से वार्तालाप एक लघुकथा के रूप में।   

मैं कार्यवशात् उन महिला के शहर गया था। रिश्तेदार होने के नाते मैं मिलने के लिए उनसे घर पहुंच गया था। मैंने उनसे पूछा, “अब तो बच्चे बड़े हो गये होंगे। अपना समय-यापन कैसे करती हैं?”

उन्होंने कहा, “पिछले तीन-चार साल से मैं एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रही हूं। मैं काम के लिए घर से अधिक दूर जाने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए पास ही के एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली।”

“सरकारी है या निजी आपकी शिक्षण संस्था?” मैंने जानना चाहा।

उनका उत्तर था, “है तो निजी किंतु सरकारी अनुदान मिलता है विद्यालय को।”

“तब तो कई मामलों में सरकारी नियम-कानून लागू होते होंगे और तनख्वाह ठीक-ठाक मिलती होगी।”

“हां, कागजों में तो सब ठीक रहता है लेकिन हकीकत में नहीं।”

“क्या मतलब?” मैंने जिज्ञासा प्रकट की।

“देखिए तनख्वाह तो मुझे लगभग 25000 रुपया मिलती है और वह मेरे बैंक खाते में जमा भी हो जाती है। लेकिन मुझसे करीब आधी वसूल भी ली जाती है। … इस हाथ से दिया और उस हाथ से ले लिया।”

कुछ क्षणों के लिए मैं उनकी ओर जिज्ञासु दृष्टि से देखता रहा; फिर बोला, “मैं आपका कहना ठीक से समझ नहीं पाया। क्या ऐसा आपके ही साथ हो रहा है या …।”

वे बीच में बोल पड़ीं, “न, न; सभी के साथ यही है, क्या शिक्षक-शिक्षिका और क्या चपरासी। दरअसल हमारी प्रधानाध्यापिका के पति ही विद्यालय चलाते हैं और उन्हीं के परिवार के लोग प्रबंधन आदि में शामिल हैं। प्रबंधन कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाता है। इसलिए हम लोगों का वेतन बैंक खातों में पहुंच जाता है। प्रधानाध्यपिका हमसे कहती हैं कि खाते से लगभग आधा वेतन निकालकर उनके हाथ में सौंप दें। उनका कहना होता है कि विद्यालय के विकास-कार्यों के लिए धन जुटाना जरूरी है। यही तरीका उन्होंने अपना रखा है। कितना विकास के लिए है और कितना उनकी जेब के लिए यह बता पाना मुश्किल है।”

“आप लोग शिकायत नहीं करते?” मैंने पूछा।

“किससे शिकायत करें? किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकाल देंगी। हरएक की अपनी-अपनी विवशता है। इसलिए सभी चुप रहते हैं।”

इस विषय पर आगे कुछ पूछना निरर्थक था। मेरे लिए उनके अनुभव की जानकारी काफी थी यह समझने के लिए कि भ्रष्टाचारी तो अपना काम किसी न किसी रास्ते निकाल ही लेगा। जिसका अंतकरण ही उसे न रोके उसे कोई क्या रोकेगा। इसलिए देश में भ्रष्टाचार है और आगे भी बना रहेगा। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों से कितना पीछे हैं हम (1)

अपना देश विकसित बनने की आकांक्षा लेकर चल रहा है। किन्तु इस बात को समझने की कोशिश देशवासी, विशेषतः देश के कर्णधार राजनेता, नहीं करते हैं कि विकसित देशों के नागरिक नियमों का पालन करते हैं। यह कहना अतिरंजित नहीं होगा कि नागरिक नियमों का पालन उनकी जीवन-पद्धति का हिस्सा बन चुका है। हो सकता है चार-पांच पीढ़ियों पहले उनकी स्थिति बहुत संतोषप्रद न रही हो, किंतु जब हर आने वाली पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी को बहुधा नियमों से बंधे देखती होगी तो वह स्वयं उसके अनुसार ढलती गयी होगी। मनुष्य को अपनी बाल्यावस्था में अपने परिवेश में जो देखने तथा अनुभव करने को मिलता है उसी के अनुसर उसकी सोच बनती है। मैंने अनुभव किया है कि विकसित देशों के नागरिक स्वयं अपने एवं उन लोगों, जिनके बीच वे रहते हैं, के हितों के प्रति काफी हद तक सचेत रहते हैं। मेरा काम कैसे बने केवल यह सोचकर चलना शायद उनकी सोच में नहीं रहता। ऐसा नहीं कि वहां कायदे-कानूनों का उल्लंघन कोई भी नहीं करता, किंतु वैसे लोग कमोबेश अपवाद के तौर पर पाये जाते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि विकसित देशों में कायदे-कानूनों को तोड़ने वाले को बचाने के लिए नेता-वेता और आम आदमियों की भीड़ जमा नहीं होती है जैसा कि हमारे देश में अक्सर होता है।

मुझे विकसित देश का अनुभव कोई 30 वर्ष पहले तब हुआ था जब मैं उच्चाध्ययन एवं शोधकार्य के लिए विलायत गया हुआ था। तब अपने देश एवं उस देश की व्यवस्थाओं का अंतर मुझे साक्षात्‍ देखने का अवसर मिला था। किंतु अपने निर्धारित उद्येश्य की पूर्ति करने की व्यस्तता में मैंने उस समय वहां की नागरिक व्यवस्था की बारिकियों पर कोई चिंतन-मनन नहीं किया था। परंतु बीते ग्रीष्मकाल में एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ भारतीय पर्यटक की हैसियत से कनाडा में अपने बेटे-बहू के पास सात-आठ सप्ताह के प्रवास का जब मुझे अवसर मिला तो वहां की नागरिक व्यवस्था को समझने की कोशिश भी मैंने की थी।

सभी विकसित देशों में एक बात सामान्यतः देखने को मिलती है और वह है नागरिक सुरक्षा। ये बात मैंने कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन तथा इटली में अनुभव की है, और अन्य देशों के बारे में तत्संबंधित जानकारी परोक्षतः प्राप्त की है। नागरिक सुरक्षा से मतलब है किसी व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा, और उसमें भी ‘जान’ की सुरक्षा पहले फिर ‘माल’ की। जो लोग ऐसे कार्यों में लगे हों जिनमें जान खोने का जोखिम हो उनके लिए भी सुरक्षा के यथासंभव प्रयास किए जाते हैं।

सुरक्षा की उक्त नीति के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर अपनी अथवा किसी अन्य व्यक्ति की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं मिलती है। इस हेतु कड़े नियम हैं और आम तौर पर सभी नागरिक उन नियमों से वाकिफ रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मैं समझता हूं ऐसा वे स्वेच्छया करते हैं। अवश्य ही कुछ इस भय से भी करते होंगे कि नियमों का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। विकसित देशों में नेताओं एवं उच्चाधिकारियों के परिजनों को भी नहीं बख़्शा जाता है।

अपने देश में ये सब कल्पना से परे है। सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है और जब भी दुर्घटना होती है तो उससे कोई सीख नहीं ली जाती है; न आम नागरिक सीख लेता है और न ही शासकीय तंत्र।

अब मैं कनाडा के अपने प्रवास के दौरान अनुभव में आयी एक घटना का जिक्र करता हूं। मेरे बेटे-बहू एक 11-मंजिली इमारत की 10वीं मजिल में स्थित अपार्ट्मेंट में रहते हैं। इमारत में कुल करीब 100 अपार्ट्मेंट हैं। एक दिन रसोई के बिजली के “हॉट-प्लेट” (चूल्हा) पर रोटी सेंकने अथवा पापड़ भूनने में कुछ धुंआ उठने लगा। यों तो धुंआ कुछ हद तक चूल्हे के ऊपर लगे पंखे-चिमनी के माध्यम से बाहर निकल जाता है, किंतु अधिक मात्रा होने पर उसका कुछ हिस्सा कमरों में फैल जाता है। उस समय धुंए की मात्रा कुछ अधिक हो गयी थी। फलतः रसोई से सटे कमरे में “स्मोक-सेंसर” का अलार्म (चेतावनी ध्वनि) बज गया। घबराहट में चूल्हे एवं रोटी/पापड़ का काम बंद करके हम लोगों ने स्नानगृह का “एग्जास्ट फैन” चलाते हुए सभी दरवाजे-खिड़कियां खोल दीं ताकि धुंआ निकल जाये। उस समय बेटे को छोड़कर हम तीन – बहू, मेरी पत्नी और मैं – घर में थे।

बाद में जब बेटा घर आया तो उसको हमने घटना के बारे में बताया। तब उसने घर में लगे “अलार्म बटन” के बारे में बताया कि उसे दबाने पर अलार्म बंद हो जाता है। लेकिन “स्मोक-सेंसर” अपना कार्य करता रहता है। बहू को भी उस “बटन” की जानकारी नहीं थी। बेटे ने यह भी बताया कि यदि धुंए की स्थिति नहीं बदली तो पच्चीस-तीस सेंकंड बाद फिर अलार्म बजता है। लेकिन इस बार वह पूरी इमारत में तथा हर अपार्टमेंट में बजता है और परिसर के कार्यालय में भी बज उठता है। उसकी सूचना अग्निशमन-दल को भी तुरंत पहुंच जाती है।

बेटे ने यह भी बताया कि अपार्टमेंट के नियमानुसार उस “सामुदायिक” चेतावनी (अलार्म) के बाद हर व्यक्ति का दायित्व होता है वह तुरंत अपने कमरे/अपार्टमेंट से बाहर खुले में निकल आवे। यदि संयोग से बड़ी दुर्घटना न घटी और यह पाया जाये कि अमुक व्यक्ति अपार्टमेंट में ही रह गया था। तो उसे 500 कनाडाई डॉलर का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

“आपने अपना जीवन जोखिम में डालने का अपराध क्यों किया?” यह सवाल वहां पूछा जाता है। वस्तुतः यह वैसा ही अपराध है जैसा कि आत्महत्या करना। क्या अपने देश में ऐसा सोचा जा सकता है? यहां तो दुर्घटनाओं के पीछे जिसका हाथ हो उसे तक सजा नहीं मिलती! मामला अक्सर कोर्ट में चला जाता है और फिर वर्षों तक मामला चलता रहता है। तब तक बहुत कुछ बदल चुकता है और शायद ही कोई दंडित होता है! – योगेन्द्र जोशी

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अलविदा, अवाच् मित्रो !

Huron Woods Pathway

आज मैं करीब डेड़ माह के लंडन प्रवास के बाद स्वदेश लौट रहा हूं । यह इंग्लैंड का सुविख्यात शहर लंडन नहीं है, यह तो है उसी नाम से कनाडा के पूर्वी प्रांत ओंटारियो में बसा हुआ एक छोटा-सा शहर, जिसकी आबादी पांच लाख से भी कम आंकी जाती है । शहर विस्तृत भूभाग में विरलतया बसा है, पेड़-पौधों से पटा, भीड़भाड़ से मुक्त शहर ।

अभी प्रातःकाल है और चंद घंटों के बाद मेरी हवाई उड़ान शुरू होनी है । रोज की भांति मैं आज भी टहलने निकल पड़ता हूं अपने अस्थाई आवास के सामने फैले ‘ह्यूरान वुड्ज’ (ह्यूरान उपवन) के अंदरूनी भाग में बने मार्ग पर । यह मार्ग है पैदल टहलने तथा शौकिया साइकिल-चालन के लिए । इस मार्ग के दोनों ओर हरे-भरे पेड़-पौधे तथा झाड़ियां हैं और बगल में बीस-तीस फुट की दूरी पर बहती है टेम्स नदी । अंगरेजों ने अपने बसाए इस शहर को लंडन नाम तो दिया ही साथ में इस नदी को भी टेम्स नाम से संबोधित किया, भले ही इंग्लैंड की टेम्स नदी की तुलना में यह बहुत छोटी है ।

इस मार्ग पर प्रायः रोज ही प्रातः या सायं अथवा दोनों वक्त मेरे टहलने की दैनिक चर्या होती रही है । किंतु आज का टहलना कुछ विशेष है – अपने लंडन प्रवास के अंतिम दिन का टहलना । संध्याकाल होते-होते तो मैं इस देश को छोड़ चुका होऊंगा । यह टहलना इसलिए भी विशेष है कि आज मुझे इस अवाच् (वाणीरहित) उपवन से, इसके पेड़-पौधों से, टेम्स नदी से विदा लेनी है । इस अल्पकालिक प्रवास के दौरान इन सब से मेरा एक प्रकार का लगाव हो चुका है । समय के बीते अंतराल में मुझे लगा है कि मैं इनके साथ घनिष्टतया जुड़ चुका हूं । भीड़भाड़ एवं कोलाहल से दूर, कभी-कभार इक्का-दुक्का लोगों के अगल-बगल से गुजर जाने के अलावा यहां कोई मानवीय हलचल नहीं रही है । इस स्थिति में मुझे अनुभव होता रहा कि मेरी इन पेड़-पौधों से, पक्षियों से, नदी से, मित्रता हो गई है; ये मुझे जानने लगे हैं, मेरे मनोभावों को ये भी महसूस करने लगे हैं, और ये स्वयं मुझे मूक संदेश देते आ रहे हैं ।

अपने इन मानवेतर अवाच् मित्रों के सान्निध्य से मैं आज वंचित होने जा रहा हूं । इनसे विदा लेते मुझे अच्छा नहीं लग रहा है । आज का मेरा टहलना अन्य दिनों की भांति नहीं हो रहा है । अपनी स्वाभाविक तीव्र गति से मैं आज नहीं टहल रहा हूं । मैं बीच-बीच में ठहर जाता हूं । कभी किसी विशाल वृक्ष के शिखर की ओर दृष्टि डालता हूं तो कभी किसी पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । कभी किसी चहकती चिड़िया को पेड़ों की शाखाओं के बीच ढूढ़ने का प्रयास करता हूं । वह मुझे दिखती नहीं, बस उसका चहकना भर सुन पाता हूं । मैं टेम्स नदी के किनारे चला जाता हूं । नदी पर तैरती बत्तखों का एक झुंड मेरी ओर बढ़ता है, मुझसे दाना-चारा पाने की उम्मीद के साथ । आज मेरी जेब में उनके खाने योग्य कुछ भी नहीं । मैं माफी मांगता हूं और अस्फुट शब्दों में ‘अलविदा’ कहते हुए मन ही मन हाथ हिलाते हुए लौट आता हूं । लगता हैं कि बत्तखें पंख फड़फड़ाकर मुझे शुभयात्रा का संदेश दे रही हैं ।

उस मार्ग पर बीच-बीच में रुकते हुए मैं अपने इन मित्रों के साथ मूक वार्तालाप करता हूं । मैं एक पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । मेरे होंठ कांपते हैं; लगता है मैं उन फूलों से कहना चाहता हूं, “तुम बहुत सुन्दर हो; मैं रोज तुम्हें और तुम्हारे साथी फूलों को प्रतिदिन निहारता आया हूं; पर आज इस पल के बाद नहीं देख पाऊंगा, क्योंकि मैं जा रहा हूं तुम सब से दूर, बहुत दूर । पता नहीं कभी दुबारा यहां आना हो भी पाएगा कि नहीं ।” मंद-मंद प्रवाहित हो रही वायु के साथ हिलते हुए उन फूलों का मूक प्रत्युत्तर लगता है मैं सुन पा रहा हूं, “आना-जाना तो लगा ही रहता है, मित्र । हम ही को देखो, हमारी काया यानी यह पौधा पूर्व में यहां नहीं थी और आगामी शीत ऋतु के हिमपात होते-होते यह अपना अस्तित्व खो देगी । उसके बाद के बसंत काल में हमारी वह अगली पीढ़ी यहां पर होगी जिसे हम बीज रूप में छोड़ जाएंगे । आवागमन तो प्रकृति का नियम है, कभी काया का स्थान परिवर्तन होता है तो कभी जीवात्मा का । रूको नहीं आगे बढ़ो हमारी शुभकामनाओं के साथ ।”

मैं आगे बढ़ जाता हूं । कुछ कदमों की दूरी पर मुझे हिसालू (रैस्पबेरी या रासबेरी) की झाड़ी दिखती है । मैं उसके पास ठहरता हूं । देखता हूं कि उसके कुछ फल सूख चुके हैं या झड़ चुके हैं । कुछ पककर गहरे कत्थई रंग धारण कर चुके हैं तो कुछ अभी कच्चे है । मुझे लगता है कि वह झाड़ी कह रही है, “इन फलों को मेरी ओर से भेंट मानकर ग्रहण कर लो । तुम नहीं तो कोई और इन्हें स्वीकारेगा, या ये अंत में भूमिशायी हो जाऐंगे और कालांतर में पंचतत्व में विलीन हो जाऐंगे ।” मैं हिसालू के चार-छः फलों को चुनकर मुख में डाल लेता हूं और उस झाड़ी को धन्यवाद देते हुए अपने कदम आगे बढ़ाता हूं ।

मुझे उस मार्ग के ओर कम घने एक पेड़ पर गौरैया सदृश एक चिड़िया चीं-चीं की ध्वनि करते हुए एक शाखा से दूसरी, दूसरी से तीसरी, आदि के क्रम से फुदकती दिखाई देती है । बीच-बीच में वह पत्तों के मध्य ओझल भी हो रही है । मुझे लगता है वह मुझसे कह रही हैं, “मुझे देखो मैं एक स्थान पर नहीं ठहरती, इधर-उधर फुदकती रहती हूं । जो स्थावर है उसी के लिए स्थिरता नियत है; जंगम के लिए प्रकृति ने चलते ही रहने का नियम बनाया है । तुम्हारे मुख के भावों से मैं समझ चुकी हूं कि तुम आज जा रहे हो । अवश्य ही जावो और स्मरण करो ऐतरेय ब्राह्मण गंथ के ‘चरैवेति चरैवेति’ के संदेश को । इस उपवन की शुभकामना के साथ हमसे विदा ले लो ।”

मैं पैदल मार्ग के उस छोर पर पहुंचता हूं जहां वह मेरे अस्थायी आवास के निकट के मुख्यमार्ग से जुड़ता है । उस मुख्यमार्ग पर कदम रखने के पहले मैं पीछे मुड़कर अपने हाथ ऊपर की ओर उठाता हूं । उस उपवन के अपने अवाच्‍मित्रों की ओर अंतिम बार देखता हूं और मन ही मन कहता हूं, “मित्रो, तुम सबके सुखद सान्निध्य की स्मृति के साथ मैं विदा लेता हूं । अलविदा !” – योगेन्द्र जोशी

(चित्र में प्रदर्शित रासबेरी के रसीले फल को हमारे कुमाऊं, उत्तराखंड, में हिसालू कहा जाता है ।)

 

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अटैचियों को जंजीर से बांधकर सुरक्षित रखने का असमंजस

 

रेलगाड़ी से यात्रा करते समय बहुत-से यात्रियों के सामने यह समस्या प्रायः आ खड़ी होती है कि रात के समय अटैचियों-बैगों को कैसे सुरक्षित रखा जाये । उत्तर भारत में यह समस्या बहुत आम है, खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में । जब कोई  यात्री रात में गहरी निद्रा में सोया रहता है, तो उसे यह डर बना रहता है कि चोर-उचक्के डिब्बे में घुसकर उसके सामान पर चुपचाप हाथ साफ कर सकते हैं । सामान सुरक्षित रहे इस प्रयोजन के लिए अक्सर सिकड़ी (जंजीर) का प्रयोग किया जाता है । सामान को शायिका (बर्थ) के नीचे लगे छल्ले से सिकड़ी के सहारे बांध दिया जाता है । मैं स्वयं इसी विधि से सामान सुरक्षित रखता हूं; भरोसा नहीं रहता है न कि सामान सुरक्षित रहेगा !

करीब तीन साल पहले मैं पत्नी के साथ पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) पर्यटक के तौर पर गया । हमें हैदराबाद होकर जाना था । वहां से हम पूर्वनिर्धारित आरक्षण के अनुसार रात्रिकालीन रेलगाड़ी द्वारा चेन्नै के लिए रवाना हुए । नौ बजे के बाद हमारा सोने का उपक्रम आरंभ हुआ । सोने से पहले सदा की तरह सोचा कि अपने अटैची-बैग को शायिका के नीचे सिकड़ी से बांधकर सुरक्षित कर लिया जाए । साथ लाए गए बैग से हमने सिकड़ी भी निकाल ली । लेकिन तब हमें असमंजस का एहसास होने लगा । दरअसल डिब्बे में चढ़े हुए या चढ़ रहे अन्य यात्रियों को हम  देख रहे थे कि वे अपना-अपना सामान शायिकाओं के नीचे सरकाते हुए निश्चिंत होकर अपनी-अपनी शायिका पर सोने जा चुके हैं या जा रहे हैं । कोई ऐसा यात्री नजर नहीं आया जिसने सिकड़ी से सामान बांधा हो ।

मैंने पत्नी से कहा, “यहां कोई भी अपने सामान के लिए चिंतित नहीं दिखता । उन लागों को देखते हुए सिकड़ी से सामान बांधने का ख्याल मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा है । तुम्हारा क्या सोचना है ?”

वे बोलीं, “हां, सामान चेन करने में अजीब-सा तो मुझे भी लग रहा है । ऐसा लगता है कि यहां सामान सुरक्षित रखने के लिए सिकड़ी वाला तरीका कोई नहीं अपनाता है । ऐसे में कोई देखेगा तो मन ही मन हंसेगा ।”

“तब चेन करने का ख्याल ही छोड़ दिया जाये । उसमें कोई जोखिम नहीं लगता ।” मैंने प्रत्युत्तर में कहा ।

उन्होंने हामी भरी और अटैची-बैग को हमने शायिका के नीचे यूं ही छोड़ दिया । अगली सुबह हम सकुशल चेन्नै पहुंच गए ।

बहुत-सी बातें हैं जिनके सापेक्ष मैंने दक्षिण भारत को उत्तर भारत से बेहतर पाया है । उत्तर भारतीयों को उनसे कुछ सीखना चाहिए । इस कथन पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, किंतु हकीकत तो हकीकत ही होती है । – योगेन्द्र जोशी

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