Category Archives: अनुभव

सिगरेट का शौक छोड़ना आसान नहीं

मैं आजकल चार-एक हफ्तों के प्रवास पर बेंगलूरु (बंगलौर) के ह्वाइट्फ़ील्ड इलाके में हूं जहां आइ-टी यानी इंफ़र्मेशन टेक्नॉलॉजी (सूचना तकनीकी) तथा अन्य प्रकार के अधिकांश कार्यालय हैं। मैं सुबह-शाम और कभी-कभी दोपहर में बाहर कार्यालयों के आसपास टहलने के लिए निकलता हूं। मुझे यह शहर उतना सुव्यवस्थित नहीं लगा जितने की मैंने कल्पना की थी। सड़कें साफ-सुथरी और यातायात सुव्यस्थित हो ऐसा मैंने नहीं पाया।

एक बात जिस पर मैंने गौर किया वह यह है कि इस शहर में सिगरेट पीने का काफी चलन है। मैं शहर के भीतरी और पुराने इलाकों के बारे में कह नहीं सकता, क्योंकि मेरा घूमना-फिरना तीन-चार किलोमीटर के सीमित दायरे में ही रहा है। ह्वाइटफ़ील्ड के इस इलाके में सड़क के किनारे चलते-फिरते या पान-सिगरेट के स्टॉल के पास सिगरेट पीते हुए कई लोग दिख जाते हैं। सिगरेट का शौक नवयुवतियों-महिलाओं में भी देखने को मिला है मुझे। यह बात भारतीय समाज के संदर्भ में काफी असामान्य कही जाएगी। मेरा मन होता रहा कि उन लोगों से उनकी इस आदत के बारे में दो-चार बातें पूछूं, किंतु किसी के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

कल मैंने हिम्मत जुटा ही ली। सड़क के किनारे चबूतरे की शक्ल की एक जगह पर दो युवतियां बैठी थीं सिगरेट के कश खींचती हुईं। उनके पास जाने से मैंने स्वयं को रोक लिया, क्योंकि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी इसका अनुमान लगाना कठिन था। लेकिन दो कदम आगे बढ़कर मुझे कुछ युवा दिख गये, उम्र से कदाचित तीस-चालीस साल के। तीन जने तो आपस में बतियाते हुए पान-सिगरेट खरीद रहे थे और दो कदम की दूरी पर अन्य व्यक्ति एक पेड़ के तने के सहारे अकेले खड़े होकर धूम्रपान का आनंद ले रहा था। मैं उसके पास गया और हिन्दी में बात करने लगा। उसके इशारे से मैं समझ गया कि वह हिन्दी में बात नहीं समझ पायेगा। तब मैंने अंग्रेजी में कहा, “आपसे माफी चाहूंगा; क्या मैं निजता (प्राइवेसी) से जुड़ा एक सवाल पूछ सकता हूं?”

“जी, पूछिए।” उसने जवाब दिया।

मैं सीधे अपने सवाल पर आया, “आप सिगरेट पीते हैं। क्या आप जानते हैं कि सार्वजनिक स्थल (पब्लिक प्लेस) में धूम्रपान कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है और संबंधित व्यक्ति पर जुर्माना लग सकता है?”

उस व्यक्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। बल्कि वह यह कहते हुए आगे बढ़ गया कि उसे ऑफिस की देरी हो रही है।

दूसरे दिन मैंने इस विषय पर फिर से कुछ ’ज्ञान’ प्राप्त करने का प्रयास किया। जहां मैं ठहरा था उसके प्रवेशद्वार के निकट ’फोरम मल्टिप्लेक्स’ नामक व्यापारिक संस्थान है। उसी के सामने सड़क के दूसरी ओर पटरी या फुटपाथ के किनारे चाय-काफी, पान-सिगरेट, आदि की छोटी-मोटी दुकानें सजी मिलती हैं जहां आसपास के कार्यालय-कर्मी दोपहर के अवकाश के समय चाय-पानी आदि के लिए आते हैं।

उसी पटरी पर घूमते-फिरते मैं एक स्थल पर रुक गया। पास ही युवक-युवती का एक जोड़ा मुझे दिख गया। वे नारियल पानी ख्ररीद रहे थे। जब तक दुकानदार नारियल-फल काटछांट कर तैयार करता, उस युवक ने एक सिगरेट लेकर सुलगा ली। उस युगल में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। हिम्मत करके मैं उनके निकट पहुंचा और युवक की ओर मुखातिब होकर मैंने अंग्रेजी में पूछा, आपसे एक निजी सवाल पूछना चहता हूं। अगर बुरा न मानें तो पूछूं?”

मैंने प्रथमतः अपना परिचय दिया कि मैं वाराणसी से आया पर्यटक हूं और कहा कि यहां सिगरेट पीने का काफी चलन है। मेरे वाराणसी कहने पर दोनों (युवक-युवती) एक साथ बोल पड़े, “तब तो आप हिन्दी बोलते होंगे?”

मेरे हांमी भरने पर युवक ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। युवती ने खुद को देहरादून (उत्तराखंड) की बताया। उस वार्तालाप में वैयक्तिक स्तर की कुछएक बातें हम लोगों के बीच भी हुईं। इस बीच नारियल पानी भी आ चुका था जिसे वे पीने लगे। उन्होंने मुझे भी पेश किया जिसे मैंने सधन्यवाद मना कर दिया। फिर मैं असल मुद्दे पर लौट आया और युवक से पूछने लगा, “आप सिगरेट पीते हैं। आपको मालूम है …”

मैं अपना सवाल पूरा कर पाता कि उसके पहले ही वह बोल पड़ा, “मालूम है कि यह ’हेल्थ’ (तन्दुरुस्ती ) के लिए नुकसानदेह है। लेकिन काम के बोझ तले तनाव से इससे कुछ राहत मिल जाती है। यों कहें कि अब आदत बन चुकी है।”

मैं बोल पड़ा, “मैं मुद्दे के दूसरे पहलू की बात करना चाहता हूं। वह यह है कि धूम्रपान कानूनी तौर पर सार्वजनिक स्थल पर वर्जित है और इस पर जुर्माना भरना पड़ सकता है।”

यह देख मुझे आश्चर्य हुआ कि वे दोनों संबंधित कानून से अनभिज्ञ थे। कुछ देर बाद लौटने का समय हो गया कहते हुए वे सड़क पार कर अपने संस्थान ’फोरम’ की ओर चल दिए। दस-पंद्रह मिनट की उस बातचीत के दौरान और पिछले दिन की घटना से यह तो मेरे समझ में आ ही गया कि जिन्हें धूम्रपान का शौक लग गया वे अपनी तन्दुरुस्ती के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। इसके अलावा उनमें से कुछ लोग संबंधित कानून से भी परिचित नहीं होते या वे उसकी परवाह नहीं करते। – योगेन्द्र जोशी

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बच्चे दो मांगें मां से एकल स्मार्टफोन

हम डिजिटल तकनीकी के युग में जी रहे हैं। और इस युग की सबसे बड़ी खासियत है स्मार्टफोन नामक युक्ति की उपलब्धता। स्मार्टफोनों की कीमत शुरुआती दौर में इतनी अधिक हुआ करती थी कि उसे खरीदने से पहले आदमी दस बार सोचता था। लेकिन जल्दी ही उसके सस्ते लेकिन कारगर मॉडल बाज़ार में आ गए। अब स्थिति यह है कि कई जनों के हाथों में अक्सर एक नहीं दो-दो तीन-तीन स्मार्टफोन भी दिख जाते हैं। इतना ही नहीं, स्मार्टफोन का आकर्षण छोटे बच्चों तक पहुंच चुका है। समाज के मध्यवर्ग में यह भी देखने को मिल रहा है कि जैसे ही नवजात शिशु के हाथ की अंगुलियां कोई भी चीज पकड़ने की सामर्थ्य पा जाते है वह भी मोबाइल से बतौर खिलौना खेलने लगता है। और जब तक वह खड़ा होना सीख पाता है तब तक वह अपने काम के वीडिओ भी देखने लगता है। बच्चों में पनप रहे मोबाइल के प्रति यह लगाव मेरी दृष्टि में जोखिम भरा है। लेकिन कई लोग अपने बच्चे की “स्मार्ट्नेस” से गर्वान्वित अनुभव करते हैं और स्मार्टफोन से उसे दूर रखने की जरूरत नहीं समझते हैं। इस स्थल पर मैं स्मार्टफोन के लाभ-हानि की विवेचना करने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि उससे जुड़ा एक अनुभव साझा कर रहा हूं।

कुछ दिनों पूर्व मैं पंजाब के शहर लुधियाना से शताब्दी एक्सप्रेस नामक (चेयरकार) रेलगाड़ी द्वारा नई दिल्ली आ रहा था। मैं गाड़ी के डिब्बे में गलियारे से लगी हुई पहली पंक्ति की सीट पर बैठा था और उसी पंक्ति में गलियारे के दूसरी तरफ तीनों सीटों पर दो महिलाएं और दो बच्चे बैठे थे। छोटा ब्च्चा कोई ५ साल का रहा होगा और उससे बड़ी बच्ची, अनुमानतः उसकी बहिन, डेढ़-दो साल बड़ी रही होगी।

बच्चों की मां के पास एक स्मार्टफोन था। गाड़ी के प्रस्थान करने के थोड़ी देर बाद छोटे बच्चे ने अपना मनपसंद वीडियो देखने के लिए मां से स्मार्टफोन हथिया लिया। जब बड़ी बहिन ने देखा कि स्मार्टफोन पर भाई ने कब्जा जमा लिया है तो उसे लगा कि फोन के प्रयोग का अधिकार उसे भी मिलना चाहिए। थोड़ी देर तक उसकी नजर फोन पर चल रहे वीडियो पर बनी रही। उसके हावभावों से लग रहा था कि उसे वह वीडियो उबाऊ लग रहा है। अंततः अधीर होकर उसने बहलाते-फुसलाते हुए भाई से स्मार्टफोन छीन लिया और अपने मन का वीडियो चलाने के लिए उसके ऊपर उंगलिया फेरना शुरू कर दिया। इससे छोटे भाई का रोना-गाना आरंभ होना स्वाभाविक था। मां ने उससे स्मार्टफोन वापस लेकर भाई को सौंप दिया। अब रोने-चीखने की बारी बहिन की थी।

उस मां की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे दोनों को शांत करे। उसने स्मार्टफोन बच्चों से लेकर अपने पर्स में रख लिया। किंतु ऐसा करना कारगर नहीं रहा। दोनों ने रोना शुरू कर दिया। उसने स्मार्टफोन पर्स से निकालकर एक ऐसा वीडिओ खोजा जो दोनों बच्चों को बहला सके। दोनों ने मिलकर हाथ में फोन लिया और वीडियो देखते हुए शांत हो गए। तब कुछ समय के लिए शान्ति छा सकी।

बच्चों की चीख-पुकार सुनना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। आसपास के यात्रियों की नींद में या उनके पत्र-पत्रिका पढ़ने में उनके रोने-गाने से अवश्य ही खलल पड़ रहा होगा। लेकिन बच्चों की जिद के सामने भला कोई कर भी क्या सकता था? गतंव्य तक पहुंचने का इंतिजार सभी को ही था।

निःसंदेह बच्चों की उस हरकत को देखना कुछ हद तक दिलचस्प भी लग रहा था। मैं सोच रहा था कि स्मार्टफोन किस कदर बच्चों के आकर्षण की चीज बनता जा रहा है। मुझे तो यह सब भविष्य के खतरे की ओर संकेत करता हुआ-सा दिख रहा था। ये बच्चे आने वाले समय में क्या आत्मसंयमी हो सकेंगे? क्या वे एकाग्रचित्त हो पाने की कला सीख पाएंगे? क्या इन युक्तियों पर उपलब्ध होने वाले इलेक्ट्रॉनिक यानी कंप्यूटर खेलों से अपने को अलग रख पाएंगे? इस प्रकार के अनेक प्रश्न मेरे मन में उठने लगे। – योगेन्द्र जोशी

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मेरा शहर वाराणसी – अवयस्क गैरलाइसेंसशुदा ऑटोचालक

     लगभग साड़े-तीन साल पहले जब नरेन्द्र मोदीजी मेरे शहर वारणसी से सांसद चुने गए और तत्पश्चात्‍ प्रधनमंत्री बने तब नगरवासियों को उम्मीद बंधी कि शहर के हालात बदलेंगे, शहर दुर्व्यवस्था के रोग से मुक्त होगा, गंदगी से निजात मिलेगी, अव्यवस्थित यातायात का दौर समाप्त होगा, इत्यादि। और भी न जाने क्या-क्या उम्मीदें लोग पाल बैठे थे। साड़े-तीन साल के इस अंतराल के बाद यह निश्चित हो चुका है कि यहां कुछ भी बदलने वाला नहीं। जब योगी आदित्यनाथ ने राज्य की सत्ता संभाली तब एक बार फिर लगा कि पहले नहीं तो अब चीजें बदलेंगी, क्योंकि पहले प्रशासनिक तंत्र समाजवादी पार्टी के हाथ में था जिसका मोदीजी के प्रति विरोधात्मक रवैया रहा है। लेकिन योगीजी का राज भी कोई सुधार नहीं ला पाया है, और मुझे आगे भी उम्मीद नहीं है। कुछ लोग गंगाजी और वरुणा नदी के किनारों/घाटों तथा दो-चार पर्यटक स्थलों की साफ-सफाई और रंगरोगन की बात करते हुए कह सकते हैं कि कुछ तो हो रहा है। मेरा सवाल है कि शहर के अंदरूनी हिस्सों की व्यवस्था तो जस की तस या पहले से बदतर ही तो है।

     बीते रविवार के दिन घटित एक वाकये का जिक्र करता हूं। यह एक बानगी है जिससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हालात वाकई कितने गंभीर हैं। हमें (पत्नी एवं मैं) मुंबाई जाने के लिए प्रातः 10:25 बजे की रेलगाड़ी पकड़नी थी। हम करीब सवा घंटा पहले रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए। मैंने एक ऑटो-रिक्शा (संक्षेप में ऑटो) तय किया और हम घर से चल दिए। रास्ते में ऑटो वाले से मार्ग में जाम के हालातों पर चर्चा करने लगे, क्योंकि अपने इस शहर वाराणसी में प्रायः हर रोज हर मुख्य मार्ग पर जाम की स्थिति बनी रहती है। हम तो साल में मुश्किल से एक-दो बार शहर की तरफ निकलते हैं, इसलिए इस बारे में अपना अनुभव खास नहीं है। किंतु स्थानीय अखबार में एतद्विषयक समाचार पढ़ने को मिलते ही रहते हैं। ऑटो वाले ने हमें बताया कि उस दिन रविवार होने के कारण काफी राहत रहेगी और हम 20-25 मिनट में स्टेशन पहुंच जाएंगे। हमने पूछा, “और दिनों क्या हालत रहती है?”

     “और दिनों मैं ऑटो नहीं चलाता। केवल इतवार को ही ऑटो निकालता हूं।” उसका सीधा जवाब था।

“केवल इतवार? ऐसा क्यों? और दिनों करते क्या हो फिर?” हमने सवाल दागा।

“मैं फलां-फलां एजेंसी (हमें नाम याद नहीं) में सेक्योरिटी का काम करता हूं। इतवार को मेरी छुट्टी रहती है। इसलिए उस दिन ऑटो निकालता हूं, और तबियत से ऑटो दौड़ाता हूं। डेढ़-दो हजार रुपये की कमाई कर लेता हूं।”

उसके बारे में हमारी जिज्ञासा बढ़ गई। उससे पूछा, “यह ऑटो किसी और का है क्या? इसके कागज-पत्तर तो दुरुस्त हैं न?”

“ऑटो तो मेरा ही है। शौकिया खरीद लिया और मौके-बेमौके काम देता है। लेकिन केवल इतवार को ही चलाता हूं। हफ्ते के छः दिन तो सिक्योरिटी का ही काम करता हूं, क्योंकि उसमें आराम है। ज्यादा काम नहीं रहता। रात में तबियत से सोने को मिल जाता है।” जवाब मिला।

जिज्ञासावश हमने पूछ लिया, “ड्राइविंग लाइसेंस तो रखे हो न?”

“नहीं अभी लाइसेंस नहीं है। छः महीने बाद बनाऊंगा, जब मेरी उम्र 18 पूरी हो जाएगी।”

उसकी बात सुन हमारा माथा ठनका। पहले मालूम होता तो उसे भाड़े पर न लेते। लेकिन तब आधे रास्ते में उसे छोड़ना भी संभव नहीं लगा। हमने पूछा, “क्यों भई, बिना लाइसेंस के चलाना जोखिम भरा नहीं है? रास्ते में पुलिस वाले पकड़ सकते हैं!”

“जेब में दो-चार सौ रुपये तो पड़े ही रहते है। दो सौ रुपये हाथ में टिका देंगे। उन्हें वसूली करने से मतलब। कौन-सा वाहन सीज़ (थाने में जमा) करते हैं जो डर लगे।”

“फिर भी लाइसेंस हो तो पैसा नहीं देना पड़ेगा। और कानून भी तो मानना चाहिए।”

“बनारस में कानून कौन मानता है। जहां तक पुलिस वालों को देने का सवाल है, वह तो करना ही पड़ेगा। जब वसूली करनी होती है तब दुरुस्त कागज-पत्रों के होते हुए भी वसूली करते हैं।”

उसकी बातें सुन हम निरुत्तर हो गए। आगे बोलें भी तो क्या बोलें! आए दिन अखबारों में पढ़ते रहते हैं कि पुलिस वसूली करती है और कानून के कार्यान्वयन में कोई रुचि नहीं लेते है। उस ऑटो-रिक्शा वाले की बातें सुनकर लगा कि हालात वाकई खराब हैं।

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तिरुमल तिरुपति के दर्शन का असफल प्रयास और बंगाली मोशाय की चिंता

इधर कुछ दिनों से तथाकथित बाबा राम रहीम की चर्चा समाचार माध्यमों में छाई हुई है। संबंधित समाचारों और उनको लेकर टीवी चैनलों पर प्रस्तुत बहसों को सुनकर मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि क्यों और कैसे लोग इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के अंध-भक्त बन जाते हैं। इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के तौर-तरीकों को देखने के बाद भी उनके मन में किसी प्रकार की शंका क्यों नहीं उठती? वे इनको भगवान तक का दर्जा कैसे दे बैठते हैं? किंचित् चिंतन करने पर मुझे लगने लगा कि आम आदमी वस्तुतः बहुत कायर होता है – कायर अज्ञात के प्रति, अज्ञात भविष्य के प्रति। अधिकांश मनुष्य अमूर्त शक्तियों में विश्वास करते हैं और उन्हें यह भय रहता है कि ऐसी शक्तियां यदि रुष्ट हो गयीं तो उनका अनिष्ट कर सकती हैं। जो व्यक्ति समस्याओं के दौर से गुजर रहा होता है वह उनके निदान एवं समाधान के लिए मंदिरों, पंडे-पुजारियों, ज्योतिषियों, और तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं आदि के पास पहुंचता है। मूल में अज्ञात शक्तियों का भय होता है ऐसा मेरा सोचना है।

विचार करते-करते मुझे कोई चौदह-पंद्रह वर्ष पहले की एक घटना की याद आ गई। अक्टूबर का महीना था और नौ-दिवसीय शारदीय नवरात्र का पर्व चल रहा था। मेरा प्रायशः पूरा जीवन उत्तर भारत में ही बीता है और यहां के अनुभवों के आधार पर मेरा सोचना यही रहा है कि नवरात्र का समय देवी दुर्गा (या उनके विभिन्न अवतारों) के दर्शन-पूजन का समय होता है। अपनी इसी धारणा से वशीभूत होकर मैंने शारदीय नवरात्र का समय तिरुमल (तिरुमला?) तिरुपति देवस्थानम् के दर्शन के लिए चुना, यह सोचते हुए कि इस देवी-पर्व के समय वहां तीर्थयात्रियों की भीड़ नहीं होगी। मैं अपनी पत्नी के साथ रेलगाड़ी से तिरुपति शहर पहुंच गया और वहां से तिरुमल पहाड़ियों पर स्थित तिरुमल तिरुपति वेंकटेश (श्रीपति वैकुण्ठेश भगवान विष्णु) मंदिर परिसर भी पहुंच गया।

वहां पहुंचने पर हमारी यह गलतफहमी दूर हो गई कि शारदीय नवरात्र-काल में तिरुमल में यात्रियों की भीड़ कम होगी। दरअसल इसी समय वहां भव्य “ब्रह्मोत्सव” का आयोजन होता है। पूरा मंदिर परिसर सजा रहता है। रात भर देवमूर्तियों की सजी हुई झांकियां विशाल मंदिर परिसर में घुमाई जाती हैं। उन्हीं में से एक में तिरुपति वेंकटेश की प्रतिकृति भी रहती है जिसके दर्शन-पूजन के लिए भीड़ उमड़ी रहती है। पूरे नवरात्र रात-दिन चहल-पहल रहती है।

तिरुमल में दर्शन के लिए अलग-अलग मूल्यों के टिकटों की व्यवस्था रहती है और उसी के अनुसार दर्शनार्थियों को छोटी-बड़ी पंक्तियों में खड़ा होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मुफ्त दर्शन वाली पंक्ति भी लगती है, परंतु उसमें दर्शन पाने में काफी समय लगता है। हम लोगों ने टिकट पाने की कोशिश की। पता चला कि पूरे नवरात्र भर के लिए सामान्यतः उपलब्ध टिकट बिक चुके हैं। विशेष मूल्य के टिकट (हजार-दो-हजार या अधिक के टिकट शायद मिल जायें ऐसा कइयों ने सुझाया। उपलब्ध जानकारी भ्रमित करने वाली ही थी। रात एक-डेड़ बजे तक हम भाग-दौड़ करते रहे, एक कार्यालय से दूसरे तक दौड़ते रहे, बैंक की शाखा (रात में भी खुली हुई) के चक्कर लगाते रहे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

दूसरे दिन मुफ्त दर्शन के लिए ५००-६०० मीटर लंबी पंक्ति में हम भी लग लिए। तिरुमल में दर्शन की व्यवस्था मुझे अजीब और असुविधाजनक लगी। मैं अधिक विस्तार से वर्णन नहीं कर रहा हूं किंतु इतना बता दूं वहां १५-२० बड़े-बड़े हॉल हैं जिनमें दर्शानार्थियों को प्रतीक्षारत रहने के लिए टिका दिया जाता है। दर्शन के लिए एक-एक कर हॉलों को खोला जाता है और लोग आगे बढ़ते हैं। ब्रह्मोत्सव के समय भीड़ इतनी होती है कि उनको कभी-कभी आगे किसी और हॉल में फिर-से टिका दिया जाता है। हम भी एक हॉल में इंतिजार करने लगे। मालूम पड़ा कि दर्शन रात्रि ११-१२ बजे होंगे। हम संतुष्ठ थे कि चलो दर्शन तो हो ही जायेंगे। बाद में जानकारी को पुख्ता करने के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटिअर) से पूछा तो पता चला कि दर्शन के लिए ११-१२ बजे का वक्त उस रात का नहीं बल्कि अगली रात का है।

हमारा माथा ठनका। हमारे लौटने का आरक्षण अगले दिन ३-४ बजे का था। हमने दर्शन का विचार त्यागा और बाहर आने के लिए तैयार हुए। पर यह क्या! हॉल के प्रवेश-द्वार पर तो ताला लटका था। वहां ठीक-से हिन्दी या अंग्रेजी समझने वाला स्वयंसेवक नहीं मिला जो हमारी समस्या समझ सके। बड़ी मुश्किल से एक युवक मिला जिसने हमारे मदद की। हम बाहर निकले और राहत की सांस ली। दूसरे दिन रेलगाड़ी से लौट आए बिना दर्शन किए।

इस घटना का रोचक पक्ष है एक बंगाली महाशय की दुश्चिंता जो हमारे देखने में आई। जब हम टिकट के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे तब हमारी उनसे मुलाकात हुई। वे सज्जन तीस-बत्तीस वर्ष के युवा थे और कलकत्ता से पत्नी और छोटे बच्चों के साथ दर्शनार्थ आये थे। हमारी तरह वे भी परेशान थे। जब कहीं भी कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने हमारे सामने अपनी चिंता साझा की, “अब कैसे दर्शन होंगे? हम यहां अधिक समय टिकने की स्थिति में नहीं। बिना दर्शन के लौटना अनिष्टकारी होगा। हमें मालूम ही नहीं था कि इस समय दर्शन पाना इतना मुश्किल होगा।”

देव-दर्शन की कोई संभावना नहीं यह बात हमारे लिए भी निराशाजनक थी। जिस उद्देश्य से घर से चले थे उसका पूरा न हो पाना अच्छा तो नहीं लग रहा था। फिर भी इस बात को एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानकर हम सहज थे। इसके विपरीत वे महाशय बेहद चिंतित थे किसी अनिष्ट की आशंका को लेकर। उनके चेहर पर दुश्चिंता के भाव स्पष्ट झलक रहे थे। उनका कहना था, “देव-दर्शन किए बिना लौटना अनिष्टकारी तो होगा ही। अब हम क्या करें?”

हमने उनको समझाया, “देखिए दर्शन नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें आपकी क्या गलती? परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि आपके लिए दर्शन संभव नहीं हो पा रहे हैं। क्या आप भगवान्‍ को इतना कमजोर समझते हैं कि एक साधारण मनुष्य़ की भांति वह भी बात-बात पर नाखुश हो जाएं? आपने मंदिर के दर्शन कर लिए, परिसर की झांकियों की भी झलक पा ली है। ये कम है क्या? यदि बहुत चिंता हो तो श्री व्यंकटेश से प्रार्थना करिए कि अगली बार दुबारा आने और दर्शन पाने का सुअवसर आपको प्रदान करें।”

मेरी बात उन्होंने गंभीरता से सुनी। मुझे लग रहा था कि उनको मेरी सलाह पसंद आ गई। उस रात हमने उनसे विदा ले ली। अगले दिन हम मुफ्त दर्शन पाने हेतु पंक्ति में लग लिए। उसके बाद क्या हुआ यह बता चुका हूं। उन चिंताग्रस्त महाशय से दुबारा भेंट नही हो सकी। उनकी दुश्चिंता यथावत्‍ बनी रही या नहीं मैं कह नहीं सकता। उस घटना से मुझे यह ज्ञान तो मिला ही कि सामान्य मनुष्य अनागत के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो जाता है। वह अदृश्य शक्तियों में विश्वास ही नहीं करता बल्कि उनसे भय भी खाता है। वह सोचता है कि एक मनुष्य की भांति वे शक्तियां भी बात-बात पर रुष्ट हो सकती हैं और व्यक्ति का अहित कर सकती हैं। लेकिन वे शक्तियां क्या वास्तव में मनुष्य की तरह कमजोर होती हैं? मेरे मत में यह भ्रम मात्र है। – योगेन्द्र जोशी

 

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शक-शुबहा की गुंजाइश हो तो?

घटना तब की है जब बीती गर्मियों में बैष्णवदेवी दर्शन के पश्चात् बेगमपुरा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से हम जम्मू-तवी से वाराणसी लौट रहे थे। जम्मू-तवी में मेरी शायिका (बर्थ) के सामने एक मध्यवयस्क यात्री बैठे थे। उनके साथ एक युवा यात्री भी बैठा था। दोनों की बातचीत से लग रहा था कि वे दोनों एक ही सरकारी संस्था में सेवारत हैं और वह युवक उन मध्यवयस्क यात्री के कनिष्ठ कर्मी के तौर पर कार्यरत है। यह भी पता चल रहा था कि वरिष्ठ यात्री को अंबाला कैंट पर उतरना है। उसके बाद वह शायिका किसी अन्य यात्री के लिए आरक्षित थी। उस युवा यात्री को आरक्षण नहीं मिल पाया था।

अंबाला कैंट पर उस युवक के वरिष्ठ सहकर्मी उतर गये और उस शायिका पर अन्य यात्री काबिज़ हो गया। अब उस युवा को रात्रिविश्राम के लिए उपयुक्त स्थान की चिंता सताने लगी। उसके पास एक अदद सामान – लाल बैग – था जिसे उसने शायिका के नीचे एक कोने पर सुरक्षित रख दिया था। फिर उसने मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा, “आंटी, आप जरा मेरा बैग देख दीजियेगा (यानी उसकी सुरक्षा का ध्यान रखियेगा); मैं देखने जा रहा हूं कि कहीं सीट मिल पाती है क्या?”

हमने उसका अनुरोध मानते हुए पूछा, “आपको जाना कहां है?”

उसने कहा, “मुझे लखनऊ उतरना है। वहां से कानपुर अपने घर जाऊंगा।”

उस रेलमार्ग पर लखनऊ वाराणसी से करीब तीन सौ कि.मी. पहले पड़ता है और हमारी गाड़ी का वहां पहुंचने का समय प्रातःकाल लगभग आठ बजे था।

वह युवक रात भर गायब रहा। उसे शायद कहीं बर्थ नहीं मिली होगी, अन्यथा वह अपना सामान लेने आया होता। उसने येनकेन प्रकारेण किसी डिब्बे में रात बिताई होगी।

प्रातःकाल गाड़ी लखनऊ से पहले भी एक-दो स्टेशनों पर रुकी थी। ग्रीष्मकाल में तो लखनऊ के आसपास छ: बजते-बजते अच्छी-खासी रोशनी हो चुकती है। इसलिए मैं यह उम्मींद कर रहा था कि वह युवक मौका पाते ही हम लोगों के डिब्बे में आ जायेगा। मैं समझता था कि उसे हमारे ही डिब्बे में आकर लखनऊ स्टेशन का इंतिजार करना चाहिए। उसे अपने बैग की सुध तो रखनी ही चाहिए।

मैं आश्वस्त होना चाहता था कि उस बैग में कुछ संदिग्ध सामग्री तो नहीं है। वह युवक और उसका वरिष्ठ सहकर्मी जम्मू से आ रहे थे इसलिए मेरे मन में यह शंका उठ रही थी कि वह व्यक्ति किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने के विचार से तो बैग नहीं छोड़ गया। मैंने अपनी पत्नी से अपनी शंका साझा की। उनका कहना था, “ऐसा कुछ नहीं होगा; वह आता ही होगा। देख नहीं रहे थे कि वे दोनों जने (वह युवक और उसका वरिष्ठ साथी जो अंबाला कैंट पर उतरा था) अपनी संस्था की जुड़ी कितनी बातें कर रहे थे? उनकी हिन्दी भी सामान्य थी। इसलिए ऐसा कुछ नहीं होगा। वह लड़का आता ही होगा।”

मैंने पत्नी के समक्ष अपना तर्क रखा, “देखो, अतिवादी-आतंकवादी भी अपनी पहचान और अपने इरादे छिपाने के लिए ऐसा नाटक खेल सकते हैं। वे भी सामान्य सहयात्री दिखने की कोशिश कर सकते हैं। कौन जाने जो बातें वे कर रहे थे वे सच थीं या झूठ। मैं उस बैग के बारे में आश्वस्त नहीं हूं। अवश्य ही रात भर मैं ऐसी कोई कल्पना नहीं कर रहा था। लेकिन लखनऊ आने वाला है और उसका अता-पता नहीं है। उसे अपने बैग की चिंता तो होनी ही चाहिए थी।”

मैंने अपना संदेह गाड़ी में मौजूद सुरक्षाकर्मियों के समक्ष रखने का विचार किया। मैं अपने डिब्बे के परिचारक (अटेंडेंट) के पास पहुंचा और उससे सुरक्षाकर्मितों के बारे पूछा। उसने बताया, “गाड़ी में कोई सुरक्षाकर्मी नहीं रहते हैं। जम्मू से आते समय अंबाला कैंट तक वे मौजूद रहते हैं। उसके बाद गाड़ी में कोई नहीं रहता।”

उससे मैंने किसी सक्षम अधिकारी का फोन नं. मांगा जो उसके पास नहीं था। मेरा विश्वास था कि आजकल सभी प्रमुख गाड़ियों में सुरक्षा की समुचित व्यवस्था रहती है। ऐसा विश्वास करना मेरी मूर्खता थी।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। मैंने आसपास बैठे सहयात्रियों के सामने अपनी शंका व्यक्त की। उम्मीद के अनुरूप ही उनकी प्रतिक्रिया “ठीक है, क्यों परेशान हो रहे हैं? कुछ नहीं होगा। वह आ जाएगा।” वाली थी।

मैं शंकाग्रस्त था लेकिन क्या करूं यह समझ नहीं पा रहा था। अंततः लखनऊ का चारबाग स्टेशन भी आ गया। अन्य यात्रियों की भांति मैं भी प्रातःकालीन चाय-काफी के लिए स्टेशन पर उतरा और निकट की चाय-काफी-जलपान की दुकान की ओर तेजी से बढ़ा। मुझे काफी के दो कप पाने में चार-छः मिनट तो लग ही गए होंगे।

काफी के दो कप हाथ में लिए जब मैं अपने डिब्बे के पास पहुंचा तो देखा कि वह युवक कंधे पर बैग लटकाए हुए मेरी ओर ही आ रहा है। पास पहुंचने पर उसने मुझे धन्यवाद दिया और जब तक मैं प्रत्युत्तर में उसे दो-चार शब्द कहता, उससे पहले ही वह तेजी से आगे बढ़ गया। – योगेन्द्र जोशी

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सवाल “भारत” के वजूद का

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस समय भी मैं जिज्ञासु दृष्टि से सभी को देख रहा हूं।

मेरी नजर बगल की कुर्सी पर बैठे आठ-दश-वर्षीय एक बच्चे पर पड़ती है। वह भी एक स्मार्टफोन के साथ खेल रहा है, शायद अपने मित्रों के संदेश किसी “सोशल मीडिया” (सामाजिक संपर्क माध्यम?) पर देख रहा है। उसकी उंगलियां सधे अंदाज में फोन के पर्दे पर चलती हैं। मेरे पास भी स्मार्टफोन है पर उसका प्रयोग मैं वैसी प्रवीणता से नहीं कर पाता जैसी इन आधुनिक बच्चों में देखता हूं। मैं उस बच्चे से पूछना चाहता हूं वह क्या कर रहा है, क्या-क्या कर सकता है, इत्यादि। असमंजस में हूं कि पूछूं या नहीं। बड़ों की भांति बच्चे भी संवेदनशील हो सकते हैं। उस बच्चे की निजता में हस्तक्षेप करूं क्या? करूं तो किस बहाने? आज के युग में निजत्व बहुत माने रखने लगा है।

अंततः मैं उसकी एकाग्रता में खलल डाल ही लेता हूं और पूछता हूं, “क्या आप बताना चाहेंगे कि आप अभी क्या कर रहे हैं?”

आम तौर पर मैं बच्चों को आप कहकर नहीं पुकारता, लेकिन इस समय अनायास ही उसके प्रति औपचारिक हो रहा हूं। वह कहता है, “मैं व्हट्सऐप पर दोस्तों के साथ मैसेजेज़ शेयर कर रहा हूं। उसके पहले मैंने उनको यहां की फोटोज़ भेजीं।”

“अच्छा! फोन पर “गेम” भी खेलते होंगे? और भी बहुत-सी चीजें कर लेते होंगे?” मैं फिर पूछता हूं। मैं गेम कहने के बजाय खेल कहना पसंद करता हूं। लेकिन इस समय गेम शब्द ही मेरे मुख से निकलता है। मध्यम वर्ग के आजकल के बच्चे हिन्दी के शब्द बोलते ही कहां हैं?

वह जवाब देता है, “हां-हां, क्यों नहीं! गेम भी खेलता हूं। ई-मेल पढ़ सकता हूं। फोन रिचार्ज कर सकता हूं। ट्रेन-रेज़र्वेशन कर सकता हूं।”

“क्या आप गूगल-मैप के बारे में भी जानते हैं? अपने फोन पर उसे भी देख सकते हैं क्या?” मैं कुछ और जानना चाहता हूं।

वह भी मेरी बातों में दिलचस्पी लेता है। कदाचित् स्मार्टफोन की अपनी जानकारी से मुझे प्रभावित करना चाहता है। ऐसा करना मनुष्यों के स्वभाव में होता ही है और बहुत-से बच्चों में भी यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मैं पूछता हूं, “क्या गूगल मैप के सहारे मुझे दिखा सकते हैं कि आप अभी किस जगह पर हैं।”

वह फोन के पर्दे पर जादुई अंदाज में अपना हाथ फेरता है और मुझे वैवाहिक स्थल तथा संबंधित शहर की स्थिति दिखा देता है। मैं फिर पूछता हूं, “क्या मैप में जापान कहां है इसे भी यह बता सकते हैं?”

वह उसी करिस्माई अंदाज से मैप में जापानी द्वीप-समूह की स्थिति दिखाता है और मुझसे कहता है, “आप क्या जापान के शहरों की लोकेशन भी जानना चाहेंगे?”

“नहीं, इतना काफी है। …” कहते हुए मैं प्रशंसात्मक शब्द बोलता हूं, “वाह, आपका फोन ही स्मार्ट नहीं, आप भी स्मार्ट हैं। … अच्छा, अब जरा भारत कहां है यह भी मैप में दिखा दें।”

दो-एक क्षणों तक उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। फिर अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोलता है, “आपका मतलब इंडिया से है क्या? मेरी टीचर ने एक बार बताया था कि इंडिया को भारत भी कहते हैं। लेकिन मुझे थोड़ा कंफ़्यूज़न है। …”

मैं हामी भरता हूं। उसके फोन के पर्दे पर इंडिया नजर आने लगता है।

“चलिए, इतना काफ़ी है। आपको इतनी देर डिस्टर्ब किया। अब आप अपना व्हट्सऐप वाले काम पर लौट चलिए।” कहते हुए मैं पास में काफी-प्यालों की ट्रे लिए घूम रहे व्यक्ति को इशारा करता हूं। वह पास आता है और मैं एक प्याली काफी ले लेता हूं।

सोचने लगता हूं कि क्या “भारत” का वजूद खत्म हो जायेगा? मेरा इशारा भारत देश की ओर नहीं है। मेरा मतलब तो “भारत” शब्द से है जिसे हमारे पुरखे उस भूभाग के संबोधन के तौर पर प्रयोग में लेते रहे हैं जिसे अब लोग इंडिया कहते हैं। क्या देश का “भारत” संबोधन आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिचित हो जायेगा?

शायद हां! – योगेन्द्र जोशी

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फुटकर काम की तलाश

पहले एक तस्वीर बीच सड़क खड़े पेड़ की:

Mid-Road Tree

मैं रखमुठी से अखनूर जा रहा हूं। जम्मूतवी-अखनूर-जोरिवां मार्ग पर स्थित सैन्य-क्षेत्र है रखमुठी जहां मैं कार्यवशात् चार-पांच दिनों के प्रवास पर आया हूं। यह स्थान अखनूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह के करीब 9:00 बजे हैं। मैं साइकिल से शौकिया अखनूर जा रहा हूं यह जांचने के लिए कि साइकिल से 30-32 कि.मी. आ-जा सकता हूं कि नहीं। मैं साइकिल की उपयोगिता का क़ायल हूं और उम्र के इस पड़ाव में भी साइकिल को ही अपने शहर में आवागमन के लिए यथासंभव इस्तेमाल में लेता हूं।

रास्ते में मैं चाय की छोटी-सी एक दुकान पर रुक जाता हूं, अपने साथ की बोतल से पानी पीने और उसके बाद एक कप चाय पीने के लिए। सड़क की हालत ठीक है, समतल और सपाट, गड्ढामुक्त! वाहनों का आवागमन अधिक नहीं है। फिर भी जो गुजर रहे हैं उनकी रफ़्तार अच्छी-खासी है, इसलिए दोनों तरफ़ देखकर ही सावधानी से ही सड़क पार करने जरूरत दिखती है।

सड़क की दूसरी तरफ़ एक नौजवान सुर्ख लाल टीशर्ट और हल्के सलेटी रंग की पैंट पहने हुए सड़क पार करने की फिराक में खड़ा है। उसके पास कोई सामान नहीं है सिवाय कंधे पर पड़े एक गमछे के और पैरों में पहनी एक जोड़ी  चप्पल के।

मैं पानी पीकर गिलास में परोसी गयी चाय पीने लगता हूं। तब तक वह युवक भी दुकान पर पहुंचता है और दुकानदार से एक कप (गिलास) चाय की मांग करता है। दुकानदार उसे गरम चाय का गिलास थमाता है। चाय की चुस्कियां लेते हुए वह पूछता है, “क्या आसपास कोई गांव है?”

दुकानदार और उसके दो साथी समवेत स्वर में कहते हैं, “यह तो गांव का ही इलाका है, हम सभी गांव के बाशिन्दे हैं। … आपको जाना किधर है?”

वह कोई जवाब नहीं देता है। उसके सवाल पूछने के अंदाज से मैं समझ जाता हूं कि वह उस स्थान से अनभिज्ञ है और उसे किसी खास गांव की तलाश नहीं है। मैं उसे गौर से देखता हूं। उसके हुलिये से लगता है कि वह एक अति सामान्य माली हालत का इंसान है या उससे भी कमजोर। वह काम की तलाश में कहीं दूर-दराज से आया होगा ऐसा मैं अनुमान लगाता हूं। सोचता हूं कि मैं उससे पूछूं, “आप इस अनजान-अजनबी इलाके में क्यों आये हैं? … रोजी-रोटी की तलाश में तो नहीं आये हैं?”। लेकिन यह सवाल पूछने में हिचकता हूं और चुप रहता हूं। अंत में उससे कैसे बात शुरू करूं यह सोचते हुए उस व्यक्ति से पूछ लेता हूं, “बुरा न मानिएगा … आप कहां से आये हैं?”

“मैं यूपी (उत्तर प्रदेश) से आया हूं।” उसका संक्षिप्त उत्तर है।

“यूपी में कहां से?” मैं ठीक-ठीक जानने के लिए पूछता हूं।

“लखनऊ-बाराबंकी से

“लखनऊ से या बाराबंकी से? … शहर? … गांव-देहात?” मैं फिर पूछता हूं।

वह “बाराबकी जिले से” कहके चुप हो जाता है।

बाराबंकी मेरे शहर वाराणसी से बहुत दूर नही है। जम्मू-तवी के निकट के उस इलाके से हजारएक कि.मी. दूर बाराबंकी से आए उस युवक से मैं एक प्रकार की निकटता-सी महसूस करता हूं। उससे मैं पूछता हूं, “आप चाय के साथ समोसा खाना चाहेंगे?”

वह नहीं कहते हुए मना कर देता है। हम एक-दूसरे के लिए एकदम अपरिचित हैं। इसलिए मैं अधिक जोर नहीं डालता।

तब तक वह चाय खत्म कर चुकता है और दुकानदार को उसकी कीमत चुकाता है। फिर सड़क पर दायें-बांये बारी-बारी से दो-तीन दफे नज़र डालता है। वाहनों का आवागमन अधिक न होने बावजूद वह सड़क पार करने में कुछ हिचकिचाहट दिखाता है। सड़कें पार करने का उसे शायद वैसा अभ्यास न हो जैसा आम शहरी को होता है। अंत में वह सड़क के उस पार वापस चला जाता है जिधर से वह आया था। फिर सड़क के किनारे के दो-चार मकानों और खेतों के बीच से गुजरने वाली एक गली में गुम हो हो जाता है।

उसके चले जाने और अपनी चाय पी चुकने के बाद मैं भी चाय की कीमत चुकाता हूं। फिर साइकिल पर चढ़कर रखमुठी का रास्ता तय करने लगता हूं।

रास्ते भर मैं उसके बारे में सोचता हूं। मुझे कोफ़्त होती है कि मैंने उससे अधिक बात करने की कोशिश नहीं की। मैंने पूछा होता कि क्यों वह घर से दूर उस अपेक्षया अपरिचित जगह पर पहुंचा है। अवश्य ही वह कामधंधे की तलाश में वहां आया होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि के जगहों से कई श्रमिक फसल कटाई के समय पंजाब और हरियाणा पहुंचते हैं यह मैं सुनता आया हूं। हो सकता है कुछ जने जम्मू भी पहुंच जाते हों। रबी की फसल कई दिनों पहले तैयार हो चुकी है। कुछ खेतों से फसल उठ चुकी है। फिर भी अभी काम बचा है। मैं मन ही मन प्रर्थना करता हूं कि उस आदमी को आसपास के खेतों में काम और गांवों में ठहरने को मिल जाये। मन खिन्न होने लगता है यह सोचकर कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के आदमी को काम की तलाश में सुदूर प्रदेशों तक भटकना पड़ता है। – योगेन्द्र जोशी

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भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक – शिक्षकों के वेतन से वसूली

हाल के नोटबंदी के निर्णय के बाबत केंद्र सरकार ने दावा किथा था कि इससे भ्रष्टाचार रोकना संभव होगा। तब से मैं सोच रहा हूं कि जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के आचरण का अभिन्न अंग बन चुका हो तब उससे कैसे मुक्ति मिल सकती है। अवश्य ही उपयुक्त कानून के तहत भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, बशर्ते कि उसका भ्रष्ट कृत्य पकड़ में आ जाए। लेकिन उससे क्या व्यक्ति भ्रष्ट मानसिकता से मुक्त हो जाता है? अपनी भ्रष्ट लिप्सा की पूर्ति के लिए वह उपयुक्त अवसरों की तलाश जारी रखेगा ही ऐसा मेरा मत है। इस विषय पर मेरा चिंतन-मनन चल ही रहा था कि एक दिन संयोगवश मेरी भेंट एक महिला रिश्तेदार से हो गयी। उन्होंने जो कहा उससे मेरा इतना ज्ञानवर्धन तो हो ही गया कि जब भ्रष्टाचार के एक रूप पर रोक लगती है तो वह दूसरे रूप में अवतरित हो जाता है। समाज में जब तक असीमित लोभ-लालच वाले लोगों की सुलभता बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार को उपजाऊ भूमि की कमी नहीं रहेगी। पेश है महिला रिश्तेदार से वार्तालाप एक लघुकथा के रूप में।   

मैं कार्यवशात् उन महिला के शहर गया था। रिश्तेदार होने के नाते मैं मिलने के लिए उनसे घर पहुंच गया था। मैंने उनसे पूछा, “अब तो बच्चे बड़े हो गये होंगे। अपना समय-यापन कैसे करती हैं?”

उन्होंने कहा, “पिछले तीन-चार साल से मैं एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रही हूं। मैं काम के लिए घर से अधिक दूर जाने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए पास ही के एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली।”

“सरकारी है या निजी आपकी शिक्षण संस्था?” मैंने जानना चाहा।

उनका उत्तर था, “है तो निजी किंतु सरकारी अनुदान मिलता है विद्यालय को।”

“तब तो कई मामलों में सरकारी नियम-कानून लागू होते होंगे और तनख्वाह ठीक-ठाक मिलती होगी।”

“हां, कागजों में तो सब ठीक रहता है लेकिन हकीकत में नहीं।”

“क्या मतलब?” मैंने जिज्ञासा प्रकट की।

“देखिए तनख्वाह तो मुझे लगभग 25000 रुपया मिलती है और वह मेरे बैंक खाते में जमा भी हो जाती है। लेकिन मुझसे करीब आधी वसूल भी ली जाती है। … इस हाथ से दिया और उस हाथ से ले लिया।”

कुछ क्षणों के लिए मैं उनकी ओर जिज्ञासु दृष्टि से देखता रहा; फिर बोला, “मैं आपका कहना ठीक से समझ नहीं पाया। क्या ऐसा आपके ही साथ हो रहा है या …।”

वे बीच में बोल पड़ीं, “न, न; सभी के साथ यही है, क्या शिक्षक-शिक्षिका और क्या चपरासी। दरअसल हमारी प्रधानाध्यापिका के पति ही विद्यालय चलाते हैं और उन्हीं के परिवार के लोग प्रबंधन आदि में शामिल हैं। प्रबंधन कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाता है। इसलिए हम लोगों का वेतन बैंक खातों में पहुंच जाता है। प्रधानाध्यपिका हमसे कहती हैं कि खाते से लगभग आधा वेतन निकालकर उनके हाथ में सौंप दें। उनका कहना होता है कि विद्यालय के विकास-कार्यों के लिए धन जुटाना जरूरी है। यही तरीका उन्होंने अपना रखा है। कितना विकास के लिए है और कितना उनकी जेब के लिए यह बता पाना मुश्किल है।”

“आप लोग शिकायत नहीं करते?” मैंने पूछा।

“किससे शिकायत करें? किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकाल देंगी। हरएक की अपनी-अपनी विवशता है। इसलिए सभी चुप रहते हैं।”

इस विषय पर आगे कुछ पूछना निरर्थक था। मेरे लिए उनके अनुभव की जानकारी काफी थी यह समझने के लिए कि भ्रष्टाचारी तो अपना काम किसी न किसी रास्ते निकाल ही लेगा। जिसका अंतकरण ही उसे न रोके उसे कोई क्या रोकेगा। इसलिए देश में भ्रष्टाचार है और आगे भी बना रहेगा। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों से कितना पीछे हैं हम (1)

अपना देश विकसित बनने की आकांक्षा लेकर चल रहा है। किन्तु इस बात को समझने की कोशिश देशवासी, विशेषतः देश के कर्णधार राजनेता, नहीं करते हैं कि विकसित देशों के नागरिक नियमों का पालन करते हैं। यह कहना अतिरंजित नहीं होगा कि नागरिक नियमों का पालन उनकी जीवन-पद्धति का हिस्सा बन चुका है। हो सकता है चार-पांच पीढ़ियों पहले उनकी स्थिति बहुत संतोषप्रद न रही हो, किंतु जब हर आने वाली पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी को बहुधा नियमों से बंधे देखती होगी तो वह स्वयं उसके अनुसार ढलती गयी होगी। मनुष्य को अपनी बाल्यावस्था में अपने परिवेश में जो देखने तथा अनुभव करने को मिलता है उसी के अनुसर उसकी सोच बनती है। मैंने अनुभव किया है कि विकसित देशों के नागरिक स्वयं अपने एवं उन लोगों, जिनके बीच वे रहते हैं, के हितों के प्रति काफी हद तक सचेत रहते हैं। मेरा काम कैसे बने केवल यह सोचकर चलना शायद उनकी सोच में नहीं रहता। ऐसा नहीं कि वहां कायदे-कानूनों का उल्लंघन कोई भी नहीं करता, किंतु वैसे लोग कमोबेश अपवाद के तौर पर पाये जाते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि विकसित देशों में कायदे-कानूनों को तोड़ने वाले को बचाने के लिए नेता-वेता और आम आदमियों की भीड़ जमा नहीं होती है जैसा कि हमारे देश में अक्सर होता है।

मुझे विकसित देश का अनुभव कोई 30 वर्ष पहले तब हुआ था जब मैं उच्चाध्ययन एवं शोधकार्य के लिए विलायत गया हुआ था। तब अपने देश एवं उस देश की व्यवस्थाओं का अंतर मुझे साक्षात्‍ देखने का अवसर मिला था। किंतु अपने निर्धारित उद्येश्य की पूर्ति करने की व्यस्तता में मैंने उस समय वहां की नागरिक व्यवस्था की बारिकियों पर कोई चिंतन-मनन नहीं किया था। परंतु बीते ग्रीष्मकाल में एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ भारतीय पर्यटक की हैसियत से कनाडा में अपने बेटे-बहू के पास सात-आठ सप्ताह के प्रवास का जब मुझे अवसर मिला तो वहां की नागरिक व्यवस्था को समझने की कोशिश भी मैंने की थी।

सभी विकसित देशों में एक बात सामान्यतः देखने को मिलती है और वह है नागरिक सुरक्षा। ये बात मैंने कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन तथा इटली में अनुभव की है, और अन्य देशों के बारे में तत्संबंधित जानकारी परोक्षतः प्राप्त की है। नागरिक सुरक्षा से मतलब है किसी व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा, और उसमें भी ‘जान’ की सुरक्षा पहले फिर ‘माल’ की। जो लोग ऐसे कार्यों में लगे हों जिनमें जान खोने का जोखिम हो उनके लिए भी सुरक्षा के यथासंभव प्रयास किए जाते हैं।

सुरक्षा की उक्त नीति के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर अपनी अथवा किसी अन्य व्यक्ति की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं मिलती है। इस हेतु कड़े नियम हैं और आम तौर पर सभी नागरिक उन नियमों से वाकिफ रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मैं समझता हूं ऐसा वे स्वेच्छया करते हैं। अवश्य ही कुछ इस भय से भी करते होंगे कि नियमों का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। विकसित देशों में नेताओं एवं उच्चाधिकारियों के परिजनों को भी नहीं बख़्शा जाता है।

अपने देश में ये सब कल्पना से परे है। सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है और जब भी दुर्घटना होती है तो उससे कोई सीख नहीं ली जाती है; न आम नागरिक सीख लेता है और न ही शासकीय तंत्र।

अब मैं कनाडा के अपने प्रवास के दौरान अनुभव में आयी एक घटना का जिक्र करता हूं। मेरे बेटे-बहू एक 11-मंजिली इमारत की 10वीं मजिल में स्थित अपार्ट्मेंट में रहते हैं। इमारत में कुल करीब 100 अपार्ट्मेंट हैं। एक दिन रसोई के बिजली के “हॉट-प्लेट” (चूल्हा) पर रोटी सेंकने अथवा पापड़ भूनने में कुछ धुंआ उठने लगा। यों तो धुंआ कुछ हद तक चूल्हे के ऊपर लगे पंखे-चिमनी के माध्यम से बाहर निकल जाता है, किंतु अधिक मात्रा होने पर उसका कुछ हिस्सा कमरों में फैल जाता है। उस समय धुंए की मात्रा कुछ अधिक हो गयी थी। फलतः रसोई से सटे कमरे में “स्मोक-सेंसर” का अलार्म (चेतावनी ध्वनि) बज गया। घबराहट में चूल्हे एवं रोटी/पापड़ का काम बंद करके हम लोगों ने स्नानगृह का “एग्जास्ट फैन” चलाते हुए सभी दरवाजे-खिड़कियां खोल दीं ताकि धुंआ निकल जाये। उस समय बेटे को छोड़कर हम तीन – बहू, मेरी पत्नी और मैं – घर में थे।

बाद में जब बेटा घर आया तो उसको हमने घटना के बारे में बताया। तब उसने घर में लगे “अलार्म बटन” के बारे में बताया कि उसे दबाने पर अलार्म बंद हो जाता है। लेकिन “स्मोक-सेंसर” अपना कार्य करता रहता है। बहू को भी उस “बटन” की जानकारी नहीं थी। बेटे ने यह भी बताया कि यदि धुंए की स्थिति नहीं बदली तो पच्चीस-तीस सेंकंड बाद फिर अलार्म बजता है। लेकिन इस बार वह पूरी इमारत में तथा हर अपार्टमेंट में बजता है और परिसर के कार्यालय में भी बज उठता है। उसकी सूचना अग्निशमन-दल को भी तुरंत पहुंच जाती है।

बेटे ने यह भी बताया कि अपार्टमेंट के नियमानुसार उस “सामुदायिक” चेतावनी (अलार्म) के बाद हर व्यक्ति का दायित्व होता है वह तुरंत अपने कमरे/अपार्टमेंट से बाहर खुले में निकल आवे। यदि संयोग से बड़ी दुर्घटना न घटी और यह पाया जाये कि अमुक व्यक्ति अपार्टमेंट में ही रह गया था। तो उसे 500 कनाडाई डॉलर का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

“आपने अपना जीवन जोखिम में डालने का अपराध क्यों किया?” यह सवाल वहां पूछा जाता है। वस्तुतः यह वैसा ही अपराध है जैसा कि आत्महत्या करना। क्या अपने देश में ऐसा सोचा जा सकता है? यहां तो दुर्घटनाओं के पीछे जिसका हाथ हो उसे तक सजा नहीं मिलती! मामला अक्सर कोर्ट में चला जाता है और फिर वर्षों तक मामला चलता रहता है। तब तक बहुत कुछ बदल चुकता है और शायद ही कोई दंडित होता है! – योगेन्द्र जोशी

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