Category Archives: अनुभव

अलविदा, अवाच् मित्रो !

Huron Woods Pathway

आज मैं करीब डेड़ माह के लंडन प्रवास के बाद स्वदेश लौट रहा हूं । यह इंग्लैंड का सुविख्यात शहर लंडन नहीं है, यह तो है उसी नाम से कनाडा के पूर्वी प्रांत ओंटारियो में बसा हुआ एक छोटा-सा शहर, जिसकी आबादी पांच लाख से भी कम आंकी जाती है । शहर विस्तृत भूभाग में विरलतया बसा है, पेड़-पौधों से पटा, भीड़भाड़ से मुक्त शहर ।

अभी प्रातःकाल है और चंद घंटों के बाद मेरी हवाई उड़ान शुरू होनी है । रोज की भांति मैं आज भी टहलने निकल पड़ता हूं अपने अस्थाई आवास के सामने फैले ‘ह्यूरान वुड्ज’ (ह्यूरान उपवन) के अंदरूनी भाग में बने मार्ग पर । यह मार्ग है पैदल टहलने तथा शौकिया साइकिल-चालन के लिए । इस मार्ग के दोनों ओर हरे-भरे पेड़-पौधे तथा झाड़ियां हैं और बगल में बीस-तीस फुट की दूरी पर बहती है टेम्स नदी । अंगरेजों ने अपने बसाए इस शहर को लंडन नाम तो दिया ही साथ में इस नदी को भी टेम्स नाम से संबोधित किया, भले ही इंग्लैंड की टेम्स नदी की तुलना में यह बहुत छोटी है ।

इस मार्ग पर प्रायः रोज ही प्रातः या सायं अथवा दोनों वक्त मेरे टहलने की दैनिक चर्या होती रही है । किंतु आज का टहलना कुछ विशेष है – अपने लंडन प्रवास के अंतिम दिन का टहलना । संध्याकाल होते-होते तो मैं इस देश को छोड़ चुका होऊंगा । यह टहलना इसलिए भी विशेष है कि आज मुझे इस अवाच् (वाणीरहित) उपवन से, इसके पेड़-पौधों से, टेम्स नदी से विदा लेनी है । इस अल्पकालिक प्रवास के दौरान इन सब से मेरा एक प्रकार का लगाव हो चुका है । समय के बीते अंतराल में मुझे लगा है कि मैं इनके साथ घनिष्टतया जुड़ चुका हूं । भीड़भाड़ एवं कोलाहल से दूर, कभी-कभार इक्का-दुक्का लोगों के अगल-बगल से गुजर जाने के अलावा यहां कोई मानवीय हलचल नहीं रही है । इस स्थिति में मुझे अनुभव होता रहा कि मेरी इन पेड़-पौधों से, पक्षियों से, नदी से, मित्रता हो गई है; ये मुझे जानने लगे हैं, मेरे मनोभावों को ये भी महसूस करने लगे हैं, और ये स्वयं मुझे मूक संदेश देते आ रहे हैं ।

अपने इन मानवेतर अवाच् मित्रों के सान्निध्य से मैं आज वंचित होने जा रहा हूं । इनसे विदा लेते मुझे अच्छा नहीं लग रहा है । आज का मेरा टहलना अन्य दिनों की भांति नहीं हो रहा है । अपनी स्वाभाविक तीव्र गति से मैं आज नहीं टहल रहा हूं । मैं बीच-बीच में ठहर जाता हूं । कभी किसी विशाल वृक्ष के शिखर की ओर दृष्टि डालता हूं तो कभी किसी पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । कभी किसी चहकती चिड़िया को पेड़ों की शाखाओं के बीच ढूढ़ने का प्रयास करता हूं । वह मुझे दिखती नहीं, बस उसका चहकना भर सुन पाता हूं । मैं टेम्स नदी के किनारे चला जाता हूं । नदी पर तैरती बत्तखों का एक झुंड मेरी ओर बढ़ता है, मुझसे दाना-चारा पाने की उम्मीद के साथ । आज मेरी जेब में उनके खाने योग्य कुछ भी नहीं । मैं माफी मांगता हूं और अस्फुट शब्दों में ‘अलविदा’ कहते हुए मन ही मन हाथ हिलाते हुए लौट आता हूं । लगता हैं कि बत्तखें पंख फड़फड़ाकर मुझे शुभयात्रा का संदेश दे रही हैं ।

उस मार्ग पर बीच-बीच में रुकते हुए मैं अपने इन मित्रों के साथ मूक वार्तालाप करता हूं । मैं एक पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । मेरे होंठ कांपते हैं; लगता है मैं उन फूलों से कहना चाहता हूं, “तुम बहुत सुन्दर हो; मैं रोज तुम्हें और तुम्हारे साथी फूलों को प्रतिदिन निहारता आया हूं; पर आज इस पल के बाद नहीं देख पाऊंगा, क्योंकि मैं जा रहा हूं तुम सब से दूर, बहुत दूर । पता नहीं कभी दुबारा यहां आना हो भी पाएगा कि नहीं ।” मंद-मंद प्रवाहित हो रही वायु के साथ हिलते हुए उन फूलों का मूक प्रत्युत्तर लगता है मैं सुन पा रहा हूं, “आना-जाना तो लगा ही रहता है, मित्र । हम ही को देखो, हमारी काया यानी यह पौधा पूर्व में यहां नहीं थी और आगामी शीत ऋतु के हिमपात होते-होते यह अपना अस्तित्व खो देगी । उसके बाद के बसंत काल में हमारी वह अगली पीढ़ी यहां पर होगी जिसे हम बीज रूप में छोड़ जाएंगे । आवागमन तो प्रकृति का नियम है, कभी काया का स्थान परिवर्तन होता है तो कभी जीवात्मा का । रूको नहीं आगे बढ़ो हमारी शुभकामनाओं के साथ ।”

मैं आगे बढ़ जाता हूं । कुछ कदमों की दूरी पर मुझे हिसालू (रैस्पबेरी या रासबेरी) की झाड़ी दिखती है । मैं उसके पास ठहरता हूं । देखता हूं कि उसके कुछ फल सूख चुके हैं या झड़ चुके हैं । कुछ पककर गहरे कत्थई रंग धारण कर चुके हैं तो कुछ अभी कच्चे है । मुझे लगता है कि वह झाड़ी कह रही है, “इन फलों को मेरी ओर से भेंट मानकर ग्रहण कर लो । तुम नहीं तो कोई और इन्हें स्वीकारेगा, या ये अंत में भूमिशायी हो जाऐंगे और कालांतर में पंचतत्व में विलीन हो जाऐंगे ।” मैं हिसालू के चार-छः फलों को चुनकर मुख में डाल लेता हूं और उस झाड़ी को धन्यवाद देते हुए अपने कदम आगे बढ़ाता हूं ।

मुझे उस मार्ग के ओर कम घने एक पेड़ पर गौरैया सदृश एक चिड़िया चीं-चीं की ध्वनि करते हुए एक शाखा से दूसरी, दूसरी से तीसरी, आदि के क्रम से फुदकती दिखाई देती है । बीच-बीच में वह पत्तों के मध्य ओझल भी हो रही है । मुझे लगता है वह मुझसे कह रही हैं, “मुझे देखो मैं एक स्थान पर नहीं ठहरती, इधर-उधर फुदकती रहती हूं । जो स्थावर है उसी के लिए स्थिरता नियत है; जंगम के लिए प्रकृति ने चलते ही रहने का नियम बनाया है । तुम्हारे मुख के भावों से मैं समझ चुकी हूं कि तुम आज जा रहे हो । अवश्य ही जावो और स्मरण करो ऐतरेय ब्राह्मण गंथ के ‘चरैवेति चरैवेति’ के संदेश को । इस उपवन की शुभकामना के साथ हमसे विदा ले लो ।”

मैं पैदल मार्ग के उस छोर पर पहुंचता हूं जहां वह मेरे अस्थायी आवास के निकट के मुख्यमार्ग से जुड़ता है । उस मुख्यमार्ग पर कदम रखने के पहले मैं पीछे मुड़कर अपने हाथ ऊपर की ओर उठाता हूं । उस उपवन के अपने अवाच्‍मित्रों की ओर अंतिम बार देखता हूं और मन ही मन कहता हूं, “मित्रो, तुम सबके सुखद सान्निध्य की स्मृति के साथ मैं विदा लेता हूं । अलविदा !” – योगेन्द्र जोशी

(चित्र में प्रदर्शित रासबेरी के रसीले फल को हमारे कुमाऊं, उत्तराखंड, में हिसालू कहा जाता है ।)

 

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अटैचियों को जंजीर से बांधकर सुरक्षित रखने का असमंजस

 

रेलगाड़ी से यात्रा करते समय बहुत-से यात्रियों के सामने यह समस्या प्रायः आ खड़ी होती है कि रात के समय अटैचियों-बैगों को कैसे सुरक्षित रखा जाये । उत्तर भारत में यह समस्या बहुत आम है, खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में । जब कोई  यात्री रात में गहरी निद्रा में सोया रहता है, तो उसे यह डर बना रहता है कि चोर-उचक्के डिब्बे में घुसकर उसके सामान पर चुपचाप हाथ साफ कर सकते हैं । सामान सुरक्षित रहे इस प्रयोजन के लिए अक्सर सिकड़ी (जंजीर) का प्रयोग किया जाता है । सामान को शायिका (बर्थ) के नीचे लगे छल्ले से सिकड़ी के सहारे बांध दिया जाता है । मैं स्वयं इसी विधि से सामान सुरक्षित रखता हूं; भरोसा नहीं रहता है न कि सामान सुरक्षित रहेगा !

करीब तीन साल पहले मैं पत्नी के साथ पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) पर्यटक के तौर पर गया । हमें हैदराबाद होकर जाना था । वहां से हम पूर्वनिर्धारित आरक्षण के अनुसार रात्रिकालीन रेलगाड़ी द्वारा चेन्नै के लिए रवाना हुए । नौ बजे के बाद हमारा सोने का उपक्रम आरंभ हुआ । सोने से पहले सदा की तरह सोचा कि अपने अटैची-बैग को शायिका के नीचे सिकड़ी से बांधकर सुरक्षित कर लिया जाए । साथ लाए गए बैग से हमने सिकड़ी भी निकाल ली । लेकिन तब हमें असमंजस का एहसास होने लगा । दरअसल डिब्बे में चढ़े हुए या चढ़ रहे अन्य यात्रियों को हम  देख रहे थे कि वे अपना-अपना सामान शायिकाओं के नीचे सरकाते हुए निश्चिंत होकर अपनी-अपनी शायिका पर सोने जा चुके हैं या जा रहे हैं । कोई ऐसा यात्री नजर नहीं आया जिसने सिकड़ी से सामान बांधा हो ।

मैंने पत्नी से कहा, “यहां कोई भी अपने सामान के लिए चिंतित नहीं दिखता । उन लागों को देखते हुए सिकड़ी से सामान बांधने का ख्याल मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा है । तुम्हारा क्या सोचना है ?”

वे बोलीं, “हां, सामान चेन करने में अजीब-सा तो मुझे भी लग रहा है । ऐसा लगता है कि यहां सामान सुरक्षित रखने के लिए सिकड़ी वाला तरीका कोई नहीं अपनाता है । ऐसे में कोई देखेगा तो मन ही मन हंसेगा ।”

“तब चेन करने का ख्याल ही छोड़ दिया जाये । उसमें कोई जोखिम नहीं लगता ।” मैंने प्रत्युत्तर में कहा ।

उन्होंने हामी भरी और अटैची-बैग को हमने शायिका के नीचे यूं ही छोड़ दिया । अगली सुबह हम सकुशल चेन्नै पहुंच गए ।

बहुत-सी बातें हैं जिनके सापेक्ष मैंने दक्षिण भारत को उत्तर भारत से बेहतर पाया है । उत्तर भारतीयों को उनसे कुछ सीखना चाहिए । इस कथन पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, किंतु हकीकत तो हकीकत ही होती है । – योगेन्द्र जोशी

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नीयत डोल गयी मूंगफली की चंद फलियों पर

मैं घर के पास के मुख्य मार्ग से लौट रहा हूं । रास्ते में सड़क के किनारे कच्ची जमीन पर भट्टी सुलगाए हुए दो भाई मूंगफली भूनकर बेच रहे हैं । बड़े-से कड़ाह में एक भाई भूनने का काम करता है तो दूसरा ग्राहकों को तौलकर बेचता है । मैं इनको करीब दो महीनों से यहां अपना छोटा-सा कारोबार करते हुए देख रहा हूं । पिछले वर्षों तक मैंने इनको यहां कभी नहीं देखा था । पूछे जाने पर बताते हैं कि ये इसी साल पहली बार मेरे शहर में रोजीरोटी की तलाश में पहुंचे हैं । मूंगफली भूनकर बेचने का धंधा उनकी समझ में आया, सो उसी पर लग गये।

उस रास्ते से कभी-कभार आते-जाते मैं भी उनसे मूंगफली खरीद लेता हूं । वे पच्चीस रुपया पाव बेचते हैं, जब कि आम ठेलों पर भुनी मूंगफली बेचने वालों की दर 35 रुपया पाव है । दाम के साथ मूंगफली में अंतर जरूर रहता है । ठेले वाले कच्ची मूंगफली को छानकर-फटककर साफ करते हैं, अपुष्ट या खोखली फलियों को हटाते हैं और तब भूनते हैं, जब कि ये भाई बाजार से बोरों में भरी मूंगफली को जैसा का तैसा ही इस्तेमाल करते हैं ।

इनके पास पहुंचकर मैं ठहर जाता हूं । दो-तीन गाहक पहले से मौजूद हैं । मुझसे ठीक पहले बारी आती है एक दंपती की । महिला बाइक से उतरकर मूंगफली खरीदती हैं, मेरे अनुमान से पाव भर, और उनके पति बाइक पर बैठे प्रतीक्षा करते हैं । महिला मूल्य चुकाते हुए दुकानदार से मूंगफली भरी पॉलिथीन की थैली थाम लेती हैं । जिज्ञासावश मैं उनके हावभाव गौर से देख रहा हूं । चलते-चलते वे मुठ्ठी में कुछ मूंगफली उठा लेती हैं । हो सकता कि उनके मन में बाइक पर बैठे उन्हें ठूंगने का विचार हो । मैं सोचने लगता हूं कि बाइक में बैठकर अपने को संतुलित रखते हुए यह कार्य आसान तो नहीं ही होगा । लेकिन ऐसा कुछ होना नहीं है । वे मुठ्ठी की सामग्री अपनी झोली में डालती हैं, बाइक पर बैठती हैं, और बाइक चल देती हैं । उस समय मैं अकेला गाहक बच जाता हूं ।

मैं विक्रेता से पूछता हूं, “आपके खरीददार ढेरी में से बिना पूछे कुछ मूंगफली उठा लेते हैं क्या ?”

जवाब मिलता है, “हां, कोई-कोई गाहक खरीदते-खरीदते लगे हाथ दो-चार फलियां ठूंग ही लेते हैं । पर सब ऐसा नहीं करते ।”

मैं अपनी साइकिल पर सवार होकर घर की ओर बढ़ जाता हूं । उस महिला की मुठ्ठी में भला कितनी मूंगफली समाई होगी इस बात का मैं रास्ते में अनुमान लगाता हूं । मुझे लगता है कि मुश्किल से बीस-तीस पैसे की रही होगी, या थोड़ा अधिक पचास पैसे की, या उससे कुछ अधिक की ।

जीवन की यह एक विडंबना ही तो है कि कभी-कभी खाते-पीते व्यक्ति की नीयत उतने कम पर भी डोल जाती है । कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे मिला है अंगूर और जामुन के साथ भी । – योगेन्द्र जोशी

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किसिम-किसिम के गाहक मिलते हैं फल-सब्जी सट्टी मे

मेरे घर के निकट फलों एवं सब्जियों की सट्टी (बाजार) है । वहां तड़के सुबह इन चीजों की थोक तथा फुटकर दुकानें खुल जाती हैं और दोपहर 11-12 बजे तक कारोबार करती हैं । कुछ फुटकर दुकानें दिन भर भी खुली रहती हैं, अतः जरूरत की चीजें लगभग हर समय मिल जाती हैं । आम तौर पर वहां सुबह के समय ही भीड़ रहती है । मैं वहां से प्रायः एक या दो दिन के लिए साग-सब्जी और फल खरीद ले आता हूं ।

अभी जुलाई का महीना समाप्ति पर है और उसी के साथ जामुन का मौसम भी खत्म होने को है । आम का मौसम कुछ दिन और चलेगा । केला तो प्रायः सदा ही उपलब्ध रहता है । पपीता, सेब, अनार आदि भी अक्सर मिल जाते हैं । आजकल कई फलों की उपलब्धता साल भर रहती है; दामों में मौसमी उतार-चढ़ाव होना स्वाभाविक है ।

सब्जी-विक्रेता सामान्यतः जमीन पर सब्जियों की ढेरी लगाकर बेचते हैं, जब कि फल-विक्रेता ठेलों पर फल सजाए रहते हैं । कुछ चुने हुए विक्रताओं का मैं सालों से ग्राहक हूं अतः उनके साथ एक प्रकार की जान-पहचान हो चुकी है । वे जानते हैं कि मैं उनसे आम तौर पर न दाम पूछता हूं और न मोलभाव करता हूं ।

हां तो मैं बताने जा रहा था कि बीते कल मैं कुछ फल और सब्जियां खरीदने सट्टी गया था । सबसे पहले जामुन वाले के पास पहुंचा । जामुन ठीकठाक लग रहे थे । मैंने पूछा, “जामुन मीठे तो हैं न ? … आधा किलो तौल देना । ठीक-से देख लेना कि कोई सड़े-गले न हों ।”

वह मेरे लिए जामुन तौल ही रहा था एक खरीदार ठेले पर पहुंचे और बोले, “जामुन क्या हिसाब दे रहे हो भई ? मीठे तो हैं न ?” सवाल पूछते-पूछते वे दो-तीन दाने हाथ में लेकर मुंह में डालने लगे ।

दुकानदार जवाब देता है, “बाबूजी, बीस रुपये पाव चल रहा है ।”

“यह तो ज्यादा ले रहे हो । पंद्रह का लगाओ न ? आधा किलो लेंगे ।”

“बाबूजी, सीजन खतम हो रहा है । महंगा ही हमें मिल रहा है । पंद्रह का पड़ता ही नहीं ।” फल वाले ने जवाब दिया ।

“नहीं भई, ये तो महंगा है ।” कहते हुए वे सज्जन चल दिये ।

फल-विक्रेता मुझे जामुन की थैली थमाते हुए कहने लगा, “देखा बाबूजी, खरीदना था नहीं । दाम पूछने के बहाने तीन-चार दाने खा गए । कभी-कभी ऐसे भी गाहक आ जाते हैं, क्या करें !”

मैंने शब्दों में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, बस मुस्कुरा दिया और आगे बढ़ गया । आगे आम वाले के पास पहुंचकर मैंने पके हुए किंतु थोड़े सख्त किस्म के आम छांटना शुरु किया । प्रायः सभी लोग फल-सब्जी छांटकर ही खरीदते हैं । एक सज्जन पहले से ही उस ठेले पर खरीदारी कर रहे थे । वे सेब और अनार खरीद चुके थे । आम खरीदने से पहले उन्होंने कीमत पूछी तो जवाब मिला, “50 रुपये किलो, सर ।”

मेरे ख्याल से आम खरीदने का विचार उनका तत्काल बना होगा । दाम पूछने के बाद ही तो उन्होंने सेब-अनार खरीदे होंगे ।  आजकल सब्जी-सट्टी में कुछ युवा विक्रेता संबोधन हेतु ‘सर’ शब्द का भी प्रयोग करने लगे हैं । वन-टू-थ्री-टेन-फिफ्टी जैसी अगरेजी गिनतियों का प्रयोग भी देखने को मिल जाता है । वस्तुतः अंगरेजी शब्द आम चलन में बोले जाने वाले हिन्दी शब्दों को विस्थापित कर रहे हैं । देश वाकई ‘आधुनिक’ हो चला है । खैर ।

वे जनाब बोले “अरे नहीं, कुछ कम करो । 45 रुपया लगाओ ।”

फल वाले ने दाम घटाने में अपनी असमर्थता जता दी । मेरी उपस्थिति में उन्होंने आधा-एक किलो आम खरीद लिए । फिर फल वाले से पूरा हिसाब पूछा, “कितने का हिसाब बना ?”

“अॅं … आपका किसाब हुआ दो सौ बीस रुपये ।” क्षण भर रुककर फल वाला बोला ।

“मैंने दाम कुछ कम करने को कहा था । … ये लो दो सौ रुपये ।”  जनाब ने पैसे दिए और चलने को उद्यत हुआ ।

“सर, बीस रुपये और दीजिए । इतना नहीं छोड़ पाऊंगा ।”

“अरे ठीक है, रखो इतना । कोई नये खरीदार थोड़े ही हैं तुम्हारे !”

“सो तो ठीक है, सर, लेकिन दो पैसे की कमाई नहीं होगी तो परिवार का पेट कैसे भरेगा !” फल वाले ने लाचारी व्यक्त की ।

“ठीक है, ठीक है, फिर कभी ले लेना । आते तो रहते ही हैं ।” कहते हुए वे चल दिए ।

मैंने खुद के छांटे आम उसके तराजू पर रखे और एक किलो आम खरीद लिए । उसे पचास का नोट पकड़ाते हुए मैं आगे बढ़ने को हुआ । वह पांच का नोट मुझे थमाने लगा तो मैंने पूछा, “ये क्या है ?”

“रख लीजिए । आप सोचेंगे … ।” उसने सफाई पेश करनी चाही ।

“अरे नहीं भई, मैं कुछ नहीं सोचूंगा ।” अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लाते हुए मैंने उसे आश्वस्त किया और वहां से चल दिया ।

आगे चलकर मैं रुका सब्जी वालों के पास तीन-चार वक्त की सब्जियां खरीदने । सड़क के किनारे जमीन पर सब्जियां सजाए दो दुकानों में से मैं पहली पर रुका । बगल की दुकान से एक महिला धनिया, मिर्चा, अदरख, परवल बगैरह-बगैरह खरीदकर पौलिथीन के अलग-अलग थैलियों में भरवा रही थी । कुछ देर तक मैं जिज्ञासावश उसी सौदे को देखता रहा । अपेक्षया कम उम्र की सब्जी वाली उन थैलियों को एक-एककर बड़े पौलिथीन थैले मैं डालती जा रहा थी । मैं सोचने लगा कि वे चीजें मिलाकर दो-एक थैलियों में इकट्ठी रखी जा सकती थीं, पर ऐसा नहीं किया जा रहा था । वह महिला शायद उस मेहनत से बचना चाहती होगी जिसके तहत उसे घर पहुंचकर सभी चीजों को छांटते हुए अलग-अलग करना पड़ता ।

प्रायः सभी लोग पौलिथीन-जन्य पर्यावरण समस्या की बात करते हैं, परंतु तात्कालिक सुविधा हेतु उसके प्रयोग से बाज नहीं आते । क्या ही विडंबना है भारतीय समाज में ।

तभी मेरा ध्यान एक अन्य साइकिल सवार युवा ग्राहक की ओर गया जो अधेड़ उम्र की पहली सब्जी वाली से पूछ रहा था, “अरे चाची, ये प्याज क्या हिसाब दे रही हो ?”

“पेंसठ रुपये किलो चल रहा है ।” उसे जवाब मिला ।

“साठ का लगाओ न, सभी जगह तो साठ का बिक रहा है ।”

अनुभवी सब्जी वाली खरा-खरा बोलने में निपुण थी । वह बोली, “ठीक है भैया, जहां साठ का मिल रहा है वहीं से क्यों नहीं खरीद लेते ?”

मोलभाव के चक्कर में लोगबाग किसी चीज के कम दाम में मिलने की बात कर जाते हैं । उनका तीर कभी-कभार निशाने पर लग भी जाता है, किंतु उस ग्राहक के मामले में बात बनी नहीं ।

 “आपके यहां प्याज साफ-सुथरा, अच्छा मिलता है ।” कहते हुए उसने साइकिल एक ओर खड़ी की और पहुंच गया प्याज खरीदने । मैंने भी कुछ सब्जियां खरीद लीं और पकड़ ली घर की राह । राह में मेरा मन इसी विचार पर केंद्रित हो गया कि प्रकृति ने लोगों के व्यवहार को कितना वैविध्यमय बनाया है । किसिम-किसिम के लोग मिल ही जाते हैं हर जगह । – योगेन्द्र जोशी 

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आलस्य अथवा अकर्मण्यता की कोई सीमा नहीं होती !

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।

नास्ति उद्यमसमो बन्धुः कर्माणो नावसीदति ।।

(भर्तृहरिरचित नीतिशतकम्, 86)

अर्थात मनुष्य के शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु आलस्य ही है । उद्यम (किसी न किसी कर्म में संलग्नता) के समान बन्धु (मित्र, सहायक) कोई नहीं जिसे करने पर दुःखानुभूति नहीं होती है ।

मेरा एक मित्र है अनंत खन्ना मेरा हमउम्र, जिसे संगी-साथी खन्ना सा’ब कहकर पुकारते हैं । मेरे ही नगर में रहता है लेकिन मेरे घर से दूर, नगर के एक छोर पर मैं और दूसरे छोर पर वह । इसलिए उससे मुलाकातें कम ही हो पाती हैं, बमुश्किल 2-3 बार वर्ष भर में । टेलीफोन पर कभी-कभार बात हो जाती है । फिलहाल बीते कुछ महीनों से उससे भेंट नहीं हो सकी है । इसलिए दो रोज पहले मन में आया कि क्यों न उससे मिलने चला जाऊं । बरसात का मौसम होने के बावजूद उस दिन पानी बरसने की आसार न के बराबर थे । आसमान पर बादलों की हलकी-सी चादर बिछी थी और मौसम कमोबेश सुहावना था । उस दिन मेरे उपवास का भी दिन था इसलिए खाने-पीने का भी झंझट नहीं था । अतः पूर्वाह्न ही में जाने का कार्यक्रम बना लिया, ताकि दो-तीन घंटे उसके साथ बिताया जा सके । हम दोनों ही सेवानिवृत्त हैं इसलिए समय की कमी नहीं रहती । बस दूरी की वजह से मिलना नहीं हो पाता है । अनंत खन्ना को फोन से अपने आने की खबर दे दी थी ।

          अपने नगर वाराणसी में यातयात की ढंग की सुविधा है नहीं । इस उम्र में अब स्कूटर जैसा वाहन चलाने की मेरी हिम्मत नहीं होती है विशेषतः नगर के अंदरूनी क्षेत्र में । अपने पास कार नहीं है, अगर होती भी तो उसे चलाने का भी जोखिम मैं न उठा पाता । बेतरतीब अनियंत्रित यातयात, न जाने कब कहां जाम लगा हो । और आज के युवा बाइक-चालकों का भी तो कोई भरोसा नहीं कि कब भीड़भाड में रफ्तार के साथ आपके दायें-बांये घुस जायें और आपको टक्कर मारकर चल दें । आटोरिक्शा से जाना ही एकमेव विकल्प है मेरे पास ।

          सवा-डेड़ घंटे में मैं मित्र के घर पहुंच गया । देखा कि उसके मकान के बाहर जो थोड़ी-सी खुली जगह है उसी में वह कुर्सी डालकर बैठा है । उसके सामने ही एक और कुर्सा पड़ी थी खाली; उसका इंतिजाम शायद मेरे बैठने के लिए ही किया था । मैं उसी पर बैठ गया । लग रहा था कि घर पर वह अकेला ही है । मुझे मालूम था कि उसकी पत्नी मायके गई हैं । अब तक लौटीं कि नहीं यह जानने के लिए मैंने पूछा, “लगता है अभी अकेले ही हो, भाभीजी लौटीं नहीं क्या ?”

खन्ना बोला, “कहां लौटीं ? फिलहाल लौटने की संभावना कम ही है । गईं थीं अपने बीमार माता-पिता से मिलने । लेकिन इस बीच उनके पिताजी की तबियत कुछ अधिक ही खराब हो गई । हैं भी तो करीब 85 वर्ष के । घर में कोई और है नहीं । छोटा भाई और उसकी पत्नी नौकरी-पेशे वाले हैं, और वह भी दूसरे शहर में । इसलिए वह वहीं रुक गई हैं पिताजी की सेवा-शुश्रूषा करने । समझ लो कि 2-3 महीनों की छुट्टी तो हो ही गई ।”

“अच्छा ? तब तो भोजन-पानी की दिक्कत हो रही होगी । क्या प्रबंध किए हो ?” मैंने पूछा ।

“उसकी दिक्कत है नहीं । इसका इंतिजाम वह पहले ही कर चुकी थीं । दरअसल पिछले कई महीनों से उन्होंने खाना बनाने वाली को रख लिया था । झाड़ू-पोंछा वाली तो वर्षों से ही काम कर रही है । … चाय पियोगे न ? साथ में मीठा-नमकीन ?” इतना कहते हुए वह उठा और खिड़की पर जाकर अंदर आवाज देने लगा, “अरे चंदा, जरा दो कप चाय बनाकर ले आना तो ।”

फिर लौटकर कुर्सी पर बैठते हुए मुझसे बोला, “चंदा खाना बनाने वाली का नाम है । अभी खाना बनाकर रख जाएगी; बाद में जब झाड़ू-पोंछे वाली आएगी तो वह गर्म करके मुझे खिला देगी ।”

उसके खिला देगी कहने पर मुझे कुछ ऐसा लगा कि जैसे कोई मां अपने बच्चे को खिलाने लगेगी । मन में सोचने लगा कि वह खुद ही खाना गर्म करके खा सकता था । इतना भी नहीं कर सकता ! परंतु मैंने उससे यह सब नहीं कहा और सहजता से पूछा, “चलो अच्छा है कि भोजन-पानी आदि की कोई समस्या नहीं है । लेकिन भाभीजी की गैरमौजूदगी में अकेलापन थोड़ा खलता होगा, है न ? … और साग-सब्जी, राशन-पानी की भी व्यवस्था करनी पड़ती होगी ? उसकी आदत तो होगी ही पहले से ।”

“अरे नहीं, वह तो मैं पहले भी नहीं करता था । किचन से जुड़े सभी काम वही किया करती थीं ।”

“राशन-पानी तो घर में भर गई होंगी, मान लेता हूं । लेकिन साग-सब्जी का तो कुछ इंतिजाम होना ही चाहिए । क्या किए हो ?” मैंने सवाल किया ।

“खाना बनाने वाली ही कर लेती हैं सब काम ।”

“अच्छी किस्म्त है यार तुम्हारी । फिर भी कभी-कभार   वह न आ पाए तो कुछ तो करना ही पड़ता होगा ।” मैंने टिप्पणी की

“ऐसी नौबत अभी तक नहीं आई है । दरअसल खाना बनाने वाली और झाड़ू-पोंछा वाली के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग (समझ) है । उनमें से कोई एक जब दो-तीन दिन नहीं आ पाती है तो दूसरी उसके हिस्से का जरूरी काम कर जाती है ।”

“मतलब यह है कि जिंदगी आराम से कट रही है । लत्ते-कपड़े धोना धोबी का काम । तब बचता ही क्या है ? हां एक काम रह जाता होगा तुम्हारे जिम्मे – नहाने के बाद पहने हुए अंतर्वस्त्र (अंडरवियर-बनियान) धोने का काम ।”

“उसकी भी कोई समस्या नहीं है । दरअसल झाड़ू-पोंछे वाली ही कपड़े धोने का काम कर जाती है । घर में 6-7 जोड़ी अंडरवियर-बनियान रखे रहता हूं । जब वह छुट्टी पर रहती है, पहनेे हुए धोने के लिए रख देता हूं । बाद में धुल जाते हैं ।”

मन हुआ पूछूं कि अंडरबनियान जैसे अंतर्वस्त्र किसी अन्य से और वह भी किसी गैर-महिला से धुलवाने में कुछ अटपटा-सा या अजीब-सा या ऐसा ही कुछ नहीं लगता क्या ? पर सवाल नहीं उठाता; पता नहीं क्या प्रतिक्रिया होगी । घर-परिवार से जुड़ी कई बातें मैं पूछ सकता था लेकिन पूछा नहीं, और बातों का सिलसिला मैंने किसी और दिशा में मोड़ दिया । तब तक चंदा चाय-नाश्ता ले आई । मैंने खन्ना  बताया कि मेरा उपवास है इसलिए सिर्फ चाय पीयूंगा, कुछ खाऊंगा नही ।

मैंने उसके साथ डेड़-दो घंटे बिताए । घर लौटते समय सोचने लगा कि क्या खन्ना अपने अंडरबियर-अनियान भी नहीं धो सकता । मैं अपने अंतर्वस्त्र किसी से नहीं धुलवाता अपनी पत्नी से भी नहीं, जब तक कि कोई आकस्मिकता न आन पड़े । मुझे अजीब-सा लगता है । मेरी नजर में ये कपड़े एक प्रकार से निजता (प्राइवेसी) के द्योतक मालूम देते हैं । मैंने कुछ घरों में देखा है कि परिवार के पुरुष सदस्य नहाते समय उतरे कपड़े स्नानागार में ही छोड़ आते हैं जिन्हें बाद में घर की महिलाएं धोती हैं ।

खन्ना इतना आरामतलब होगा इसका अंदाजा मुझे नहीं था । मैं समझ नहीं पाता क्योंकर कोई धेले भर का भी शारीरिक श्रम नहीं करना चाहता । इसे आलस्य कहूं या अकर्मण्यता ? – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

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आदमी जीता चला जाता है, आखिर क्यों ? – एक प्रश्न

मैं अपने घर से निकल कर सामने के मुख्य मार्ग पर प्रातःकाल सजने वाली सब्जी-विक्रताओं की दुकानों की ओर चल पड़ता हूं । ये दुकानें घर से बहुत दूर नहीं हैं, फिर भी मैं साग-सब्जी प्रतिदिन नहीं खरीदता, बल्कि एक बार में 2-3 दिनों के लिए खरीद लेता हूं ।

रास्ते में मुझे एक मिनीट्रक खड़ी दिखती है जिसका पिछला हिस्सा मेरे सामने है । उसका पिछला दाहिना चक्का सड़क के पक्के हिस्से में है तो दूसरा किनारे की कच्ची जमीन पर । किंचित दूर से मुझे उसके एक कोने पर एक वृद्ध महोदय खड़े दिखते हैं । आगे बढ़ते हुए मैं उनके निकट पहुंचता हूं और देखता हूं कि वे थोड़ा झुकते हुए जमीन पर पड़ी अपने सहारे की छड़ी उठाने का असफल प्रयास कर रहे हैं । उनके कपड़ों को देख मुझे नहीं लगता कि वे किसी खाते-पीते परिवार से होंगे । वे शायद वृद्धावस्था के चलते अशक्त हो चुके होंगे, अथवा यह भी संभव है कि वे शारीरिक अस्वस्थता के शिकार हों । मुझे लगता है कि उन्होंने छड़ी को ट्रक के सहारे खड़ा किया होगा, लेकिन वह सरककर जमीन पर गिर पड़ी होगी । अस्तु, मैं छड़ी उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं और आगे बढ़ जाता हूं ।

ट्रक के आगे पहुंचने पर मुझे लगता है कि उनका कोई और सामान भी शायद जमीन में पड़ा है । मैं मुड़कर देखता हूं कि सड़क पर उनके पैरों के निकट धूसर-सलेटी रंग का थैला पड़ा है जिसे वे उठाने का यत्न कर रहे हैं । मैं लौटकर उनके पास आता हूं और जमीन से थैला उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं । वे उसे कंधे पर लेने की कोशिश करते हैं । मैं उनकी मदद करता हूं किंतु थैला कंधे पर टिकता नही और हाथ पर कलाई तक सरक जाता है । मैं दो-एक बार प्रयास करता हूं परंतु सफलता नहीं मिलती है । अंत में झोले को कलाई के सहारे लटकाते हुए उसके उपरी हिस्से को मुट्ठी में पकड़े रहने की सलाह देता हूं । वे मुश्किल-से सुनाई दे सकने वाली धीमी आवाज में मुझे धन्यवाद देते हैं । और मैं आगे बढ़ जाता हूं ।

आगे बढ़ते हुए और वांछित सामग्री खरीदने के बाद लौटते हुए मैं एक वैचारिक द्वंद्व से घिर जाता हूं । मन में एक प्रश्न उठता है, ऐसा प्रश्न जो पहले भी कई बार मेरे मन में उठ चुका है । मैं हर बार उसका उत्तर खोजने की चेष्टा करता हूं, कभी खुद चिंतन-मनन की प्रक्रिया अपनाकर तो कभी चित-परिचितों से साथ विचार-मंथन करके । मेरा प्रश्न अपने स्थान पर आज भी यथावत है । प्रश्न है कि मनुष्य क्यों जीता चला जाता है ? क्यों कभी यह नहीं सोचता कि काफी हो चुका है, अब मुझे इस धरती को अपने संसाधनों के साथ दूसरों के लिए छोड़ देना है । मृत्यु को हम भयावह, घृणास्पद, सर्वथा त्याज्य इत्यादि नकारात्मक विशेषणों से क्यों जोड़ते हैं ? मैं उन लोगों के मामलों से परिचित हूं जो हताश-निराश हो चुकते हैं, जिन्हें यह लगने लगता है कि उनकी मनोकामनाएं पूरा नहीं हो सकती हैं, और उस स्थिति से फलीभूत जीवन की कटुता का सामना करने का साहस खो बैठते हैं और अपनी इहलीला समाप्त कर देते हैं । जीवन के प्रति उनका मोह समाप्त नहीं होता है अपितु वे वस्तुस्थिति झेलने की सामर्थ्य खो बैठते हैं । मैं दूसरी श्रेणी के उन लोगों की बात करना चाहता हूं जिनके सामने ऐसी समस्या न हो, फिर भी जो सोचते हों कि जीवन के प्रति कभी न समाप्य मोह क्यों हो ? हम कभी हंसते हुए लेकिन पूर्ण गंभीरता के साथ अपने निकटस्थों ये यह क्यों नहीं कह पाते हैं, “क्यों भई कब तक हमसे जीते रहने को कहोगे ? इतना कम है क्या ? बताओ, एक दिन हमने यह इच्छा नहीं व्यक्त करनी चाहिए कि अब चलना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कि कोई मुलाकाती कहे अब चलना चाहिए, काफी देर हो चुकी है ।”

मैं उपर्युल्लिखित शरीरतः अशक्त सज्जन के बारे में कह नहीं सकता कि उनकी पारिवारिक स्थिति कैसी है, आर्थिक दशा के क्या हाल हैं, जीवन को लेकर उनके मन में कोई विचार उठते भी हैं या नहीं, अगर मन में विचार आते हैं तो वे क्या रहते हैं, इत्यादि । परंतु मैं जब उन लोगों को देखता हूं जिनके जीवन में न कुछ करने को रह जाता है और न कुछ भोगने को तब सोचता हूं कि क्या अब भी जिजीविषा बनी रहनी चाहिए । जब जीवन अपनी अर्थवत्ता खो चुका हो तो उस व्यक्ति को मृत्यु के साक्षात्कार की इच्छा नहीं हो जानी चाहिए ? उससे जुड़े सुहृदों को भी मुक्ति की कामना नहीं करनी चाहिए क्या ? इस प्रकार के तमाम प्रश्न मन में आज तक अनुत्तरित रहे हैं और कदाचित आगे भी अनुत्तरित रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

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मीटर से भाड़ा तय करने वाले ऑटोरिक्शा

मैं यदाकदा दिल्ली एवं मुम्बई जैसे महानगरों का चक्कर लगाता रहता हूं । अभी हाल ही में मैं कुछ दिनों के लिए मुम्बई रहा । तब मुझे अपने पौत्र के जन्म के समय अस्पताल के कई चक्कर लगाने पड़े थे । उस दौरान मेरे गमनागमन का साधन ऑटोरिक्शा ही रहा । जाहिर है कि मेरा सापका अलग-अलग ऑटारिक्शॉ वालों से पड़ा । तब मुझे पता चला कि मुम्बई मे ऑटोरिक्शे बिना मीटर के नहीं चलते । मेरा अनुभव दिल्ली में बिल्कुल उल्टा रहा है । मैंने पाया है कि ऑटोरिक्शों पर मीटर तो अवश्य लगे रहते हैं, लेकिन उनका प्रयोग यात्रियों का भाड़ा तय करने में होता है ऐसा मुझे कभी नहीं लगा । आम तौर पर ऑटारिक्शा वाले के साथ मोलभाव करके भाड़ा तय करना पड़ता है । मैंने अक्सर देखा है कि वे वाजिब से डेड़-दो गुना भाड़ा मांगते हैं और मोलभाव के बाद भी सही भाड़े पर वे तैयार हो गये होंगे इस बात को लेकर अश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जिसे भाड़े का अंदाजा न हो उसके लिए धोखा खा जाना स्वाभाविक है । ऐसे लोगों को ‘प्रिपेड’ऑटोरिक्शा की शरण में जाना पड़ता है ।

लेकिन इधर चार-छः दिनों के दिल्ली प्रवास के दौरान मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां भी कुछ ऑटोरिक्शा वाले मीटर के अनुसार भाड़ा लेने को तैयार होने लगे हैं । इस बात का प्रथम अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक दिन अपने गंतव्य पर ऑटोरिक्शा के माध्यम से गया । मैंने अधिकांश दूरी दिल्ली की मेट्रो रेलसेवा से तय की और शेष भाग के लिए ऑटोरिक्शा भाड़े पर लिया । मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद प्लेटफॉर्म से बाहर आकर मैंने एक ऑटोरिक्शा वाले से पूछा कि क्या वह अमुक स्थान को चलेगा । वह तैयार हुआ तो भाड़ा पूछा, “कितना पैसा लेंगे ?” उत्तर मिला, “सत्तर रुपया लगेगा ।”

मेरा अगला सवाल था, “इतना तो ज्यादा है । वहां तक का इतना होता नहीं । … अच्छा, आपके ऑटोरिक्शा पर मीटर लगा है क्या ? … और वह काम भी करता है क्या ?”

जवाब था, “मीटर है, सा’ब । मीटर से चलेंगे क्या ? मीटर से भी वही पड़ेगा ।”

मैंने कहा, “ठीक है, मीटर से ही चलिए । जितना भी लगे देखा जाएगा । दिल्ली में मीटर के हिसाब से भाड़ा तय करने का अनुभव भी तो ले लें । पहली बार देख रहा हूं कि कोई मीटर से भी चलने को तैयार है ।”

गंतव्य पर पहुंचने पर मीटर ने उनसठ रुपया – एक कम साठ रुपया! – भाड़े की रीडिंग दिखाई । मैंने ऑटोरिक्शा चालक को साठ रुपया देते हुए कहा, “यह तो साठ भी नहीं हुआ; आप तो सत्तर मांग रहे थे ।”

“इसी इलाके के फलां सिरे तक चले होते तो इतना हो जाता ।” उसने सफाई पेश की ।

बात खत्म हुई और मैं आगे बढ़ गया ।

अगले दिन मुझे कहीं अन्यत्र जाना था । मैं निकटतम चौराहे पर गया और वहां खड़े ऑटोरिक्शा चालकों से पूछा । उनमें से एक मुझे गंतव्य तक पहुंचाने को तैयार हो गया । बीते दिन के अनुभव को ध्यान में रखते हुए मैंने पूछा, “आपके वाहन पर मीटर लगा हुआ दिख रहा है; काम करता है क्या ? मैं मीटर के हिसाब से चलना चाहूंगा ।”

उसने जवाब दिया, “मीटर है और वह चलता भी है । मैं उसी के हिसाब से भाड़ा लूंगा । दरअसल मैं मीटर से ही चलता हूं । ऐसा करने पर पैसेंजर से झक-झक नहीं करनी पड़ती है ।”

“ताज्जुब है । मैं तो देखता आया हूं कि यहां ऑटोरिक्शों पर लगे मीटर अक्सर काम तक नहीं करते और जिनके काम करते भी हैं वे मीटर से चलने को तैयार नहीं होते ।” मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

उसने उत्तर दिया, “अब माहौल कुछ बदल रहा है । कई पैसेंजर अब मीटर से चलने की बात करते हैं और कई आटो-ड्राइवर उसके हिसाब से चलने भी लगे हैं । बारगेनिंग के मामले में पैसेंजर को शक बन रहता है कि आटो-भाड़ा कहीं अधिक तो नहीं लिया जा रहा है और कभी-कभी वे ड्राइवर से उलझ भी जाते हैं । मैं तो अब मीटर से ही चलता हूं ।”

उसकी बात सुन मुझे भरोसा होने लगा कि मुम्बई की भांति यहां भी देरसबेर ‘मीटर्ड’आटो चलने लगेंगे । – योगेन्द्र जोशी

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आल्हादित होना उन बच्चों का कुछ पलों के लिए

मैं यदाकदा अपने शहर से बाहर अन्यत्र मित्र-परिचितों से मिलने अथवा पर्यटन हेतु निकल जाता हूं । इन अवसरों पर प्रातः-सायं टहलने निकलने पर मैं अपनी जेब में कभी-कभार एक कैमरा भी रख लेता हूं, यह सोचकर कि कहीं कोई दृश्य कैमरे में कैद करने का मन हो जाय तो वह साथ रहे । आवश्यक नहीं कि मैं दर्शनीय स्थलों की ही तस्वीरें खींचूं, जैसा कि आम पर्यटक करता होगा । मुझे कुछ नया, अवांछित, घृणास्पद ही सही, या अन्यथा, कुछ भी दिखे वह मेरे लिए तस्वीर का विषय बन सकता है ।

कुछ समय पहले मैं मुंबई गया था अपने बेटे के पास जो पश्चिम भांडुप में रहता है । उसका आवास एलबीएस रोड (लाल बहादुर शास्त्री मार्ग) के निकट एक बहुमंजिली इमारत में है । मैं अधिकांश दिनों उस इमारत के परिसर में ही टहला करता था, किंतु कभी-कभी उक्त सड़क पर भी निकल जाता था । एक प्रात मैं कैमरा साथ ले गया था । मैंने देखा कि सड़क के किनारे फुटपाथ पर कुछ लोग (खानाबदोश) अपने रहने का ठिकाना बनाए हुए हैं । मैंने एक तस्वीर खींच ली जो यहां प्रस्तुत है । तीन खंडों की इस तस्वीर के आरंभ में वही है ।

तस्वीर  खींचकर मैं आगे बढ़ गया । दो-चार कदम बढ़ा था कि मैंने दो बच्चों – कदाचित् उन्हीं खानाबदोशों के – को अपने आगे जाते हुए देखा । वे अपने हाथों में पारदर्शी प्लास्टिक की बोतलें तथा एक ‘गैलन’(करीब एक गैलन की क्षमता वाला प्लास्टिक का बर्तन या कनस्तर) लिए हुए थे और उन्हें हाथों से ढोल-नगाड़े के माफिक पीटकर आवाज निकाल रहे थे । मैंने पीछे से उनकी तस्वीर खींच ली (दी गयी तस्वीर में दूसरा खंड) । मेरा मन हुआ कि आगे बढ़कर उनकी सामने से भी तस्वीर ले लूं ।

जैसे ही मैं उनके सामने पहुचा जिज्ञासु बच्चों की भांति उनकी नजर मेरे कैमरे पर पड़ी । लालायित-से वे बोल पड़े, “हमारी भी एक फोटो खींच दो न” । और मैंने फोटो खींची और उन्हें दिखा दी (तीसरे खंड की तस्वीर)। वे खुशी के मारे एक-दूसरे को और फिर मुझे देखकर खिलखिलाने लगे । वे प्रसन्न थे, आल्हादित थे, गोया कि उन्हें कुछ कीमती चीज देखने को मिल गई हो । मैंने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ हाथ हिलाया और आगे बढ़ गया ।

रास्ते में मैं सोचने लगा कि आजकल तो मध्यवर्गीय और उसके ऊपर के परिवारों में कैमरे की उपलब्धता आम बात है । उन परिवारों में गाहे-बगाहे तस्वीरें खिंचती ही रहती हैं । लेकिन इन बच्चों के लिए किसी अपरिचित व्यक्ति के द्वारा उनकी फोटो खींची जाना ही खुशी की बात थी, भले ही वह फोटो उन्हें दुबारा देखने को ही न मिले । अवश्य ही यह खुशी तात्कालिक एवं अस्थाई होती है, मात्र कुछ मिनटों की, लेकिन होती जरूर है । अथवा खुशी कुछ घंटों तक रह सकती है, जब तक कि वे अपने लोगों के बीच जाकर उसकी चर्चा न कर लें । मेरे लिए उनका खुश हो जाना अपने किस्म का एक अनुभव था ।  जीवन में खुशियां क्षणिक, अल्पकालिक या अपेक्षया दीर्घकालिक होती हैं किंतु शाश्वत नहीं । – योगेन्द्र जोशी

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जेब में पैसा लेकर न चलने का खामियाजा

किसी व्यक्ति के अनुभवों को मैं मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटकर देखता हूं । पहले में वे हैं जो उन घटनाओं से जुड़े होते हैं जिनका व्यक्ति स्वयं भोक्ता के रूप में अनुभव करता है, और जो कभी-कभी उसके स्मृति-पटल पर लंबे अर्से के लिए अंकित हो जाते हैं, सुस्वप्न अथवा दुःस्वप्न के तौर पर । दूसरी श्रेणी के अनुभवों का साक्षात्कार व्यक्ति तब करता है जब वह संबंधित घटनाओं को निष्पक्ष दर्शक के तौर पर अपने समक्ष घटित होते देखता है । आम तौर पर ये घटनाएं भुला दी जाती हैं क्योंकि उनका कोई प्रभाव उसके जीवन पर नहीं पड़ता है । फिर भी तात्कालिक स्तर पर वे दिलचस्प हो सकते हैं और उनमें सार्थक संदेश निहित पाया जा सकता है । ऐसे ही एक वाकये का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं ।

आजकल मैं अपने शहर वाराणसी से दूर अपेक्षया अपरिचित एक महानगर में हूं चार-छः सप्ताह के लिए । आज मुझे कुछ फल खरीदने थे जिसके लिए मैं प्रातःकाल अपने स्थानीय आवास से निकल पड़ा । यहां बाजार में फलों की सभी दूकानें अगल-बगल एक ही जगह पर हों ऐसा नहीं है । केले बेचने वाले ठेले पर उन्हें सजाए हुए रास्तों पर कुछ-कुछ दूरी पर यत्रतत्र मिल जाते हैं । मेरा सोचना हैं कि ऐसा वे सकारण करते हैं । मैंने देखा है कि राह चलते कई लोग दो-चार केले खरीदकर वहीं पर खा लेते हैं । ऐसा अन्य फलों के साथ आम तौर पर नहीं होता है, जिन्हें लोग घर या आवास पर खाने के लिए साथ लिए जाते हैं । इसलिए ठेलों पर केलों को सजाकर बेचते हुए विक्रेता उन जगहों पर भी मिल जाते हैं जहां अन्य फल न बेचे जा रहे हों ।

अनार-अमरूद आदि फलों को खरीदने के बाद मैं केलों वाले एक ठेले पर रुक गया । केला-विक्रेता एक युवक से उलझ रहा था । मैं रुक गया यह सोचते हुए कि पैसे के लेन-देन की बात चल रही होगी । मैंने देखा कि उनके बीच बहस कुछ लंबी ही खिंच रही है । मुझे भी जिज्ञासा हुई मामले को समझने की, इसलिए इंतिजार करने लगा । अंत में जब वह युवक पैसा चुकता करके चल दिया तो मैंने विक्रेता से केले लिए और उसकी कीमत अदा करने लगा । लगे हाथ मैंने उससे पूछ लिया, “क्यों भई, क्या बात थी जो काफी देर तक आप दोनों बहस में उलझे हुए थे ?”

“अरे सा’ब, आपको क्या बताएं । वे जनाब घंटा भर पहले मुझसे केला लेकर खा गये, और जब पेमेंट की बात आई तो बोले कि अभी मेरे पास पैसा नहीं, बटुआ घर पर छूट गया है । कहने लगे शाम को जब कंपनी से लौटूंगा तो पैसा दे दूंगा ।” केला विक्रेता का जवाब था ।

वह आगे बोला, “मैंने उनसे कहा कि जब आपके पास पैसा ही नहीं था तो केला खाने की क्या जरूरत थी । पहले अपनी जेब टटोल लेनी चाहिए थी । मैं न आपको जानता हूं और न ही आपको इधर से आते-जाते कभी ही देखा है । तो फिर उधारी कैसे दे दूं ? ऐसे तो मेरा बिजनेस चल चुका । अगल-बगल का कोई दुकानदार कहे तो भी कुछ भरोसा कर सकता । जब तक पेमेंट नहीं होगा आप नहीं जाएंगे ।”

विक्रेता के कथनानुसार जब उस युवक ने देखा कि उसका अनुरोध कारगर नहीं हो पा रहा है तो वह अपना मोबाइल धरोहर के तौर पर वहां छोड़ गया और चला गया अपनी कंपनी या अन्यत्र पैसे का प्रबंध करने । मैं जब केला खरीदने जा रहा था तभी वह लौटा था पैसा चुकता करने और मोबाइल वापस लेने । अपनी नाखुशी व्यक्त करने के लिए ही वह उस समय विक्रेता से उलझा हुआ था ।

इस घटना में एक संदेश छिपा है । महानगरीय जीवन की खासियत यह है कि लोगों की भीड़ में प्रायः सभी अजनबी होते हैं । जिंदगी की भागदौड़ में पड़ोसी तक पड़ोसी से अपरिचित बना रहता है । राह चलते कोई किसी में दिलचस्पी नहीं लेता । ऐसे में किसी से मौके-बेमौके मदद की उम्मीद नहीं की जा सकती । गंभीर दुर्घटना के समय तक विरले ही मदद के लिए आगे बढ़ते हैं । ऐसी स्थिति में आदमी को जेब में बिना पैसे के चलना ही नहीं चाहिए । पैसा ही मित्र सिद्ध होता है ! – योगेन्द्र जोशी

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चालीस साल पहले हुआ था हिन्दी से जुड़ा एक अनुभव मद्रास (चेन्नै) में

मोदी सरकार ने हाल में राजभाषा हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया है । इस नई सरकार के “हिन्दी प्रेम”के प्रति कई राजनेताओं ने विरोधात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है । प्रखर विरोध तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों के शीर्षस्थ नेताओं की ओर से देखने को मिला है । अन्य राज्यों के नेताओं ने नाखुशी तो व्यक्त कर दी, लेकिन उनका विरोध जबर्दस्त नही कहा जा सकता है । वस्तुतः तमिल राजनीति हिन्दी विरोध पर टिकी है । वहां के नेतागण इसे अपनी तमिल अस्मिता से जोड़ते हैं । संविधान सभा में जब हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात की जा रही थी तब भी यह विरोध था और आज भी है । दक्षिण भारत की अपनी हालिया यात्राओं में मैंने अनुभव किया है कि हिन्दी के प्रति उनके रवैये में बदलाव आता जा रहा है ।

हिन्दी विरोध की बात पर मुझे 1973 में संपन्न दक्षिण भारत की अपनी यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब मैं अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में नया-नया प्रविष्ट हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । तब बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । किसी अन्य शहर से चेन्नै-बेंगलूरु का आरक्षण रेलवे विभाग तार (टेलीग्राम) द्वारा किया करता था जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । लेकिन आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में होती भी नहीं थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । (प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर सोते हुए रातें गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है ।) कुछ ही देर में वहीं मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रह सकते हैं और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । पाश्चात्य समाजों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन से यह खासियत अब गायब होने लगी है ।

उन सज्जन को जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर तो हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।”

उनको जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।

उनका उत्तर था, “मैं केरला का रहने वाला हूं और कुछ देर बाद अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकलूंगा । दरअसल मुझे कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से नहीं बात कर सकते ।”

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनसे कहा, “मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उस विरोध का अनुभव भी कर रहा हूं । ऐसा विरोध तो केरला में भी होगा न ?”

“नहीं, ऐसा नहीं है । केरला के लोग व्यावहारिक हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं । आपने केरला की नर्सों को उत्तर भारत के अस्पतालों में भी देखा होगा । केरला के लोग जानते हैं हिन्दी से परहेज उनके हक में नहीं है ।”उनका उत्तर था ।

और कुछ समय बाद वे अपनी रेलगाड़ी पकड़ने चल दिए । इस दौरान उनसे अन्य कितनी तथा कैसी बातें हुई होंगी इसे आज ठीक-से बता पाना संभव नहीं । पर इतना जरूर कह सकता हूं कि ऊपर कही गईं बातें वार्तालाप का सारांश प्रस्तुत करती हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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