Category Archives: आपबीती

मीटर से भाड़ा तय करने वाले ऑटोरिक्शा

मैं यदाकदा दिल्ली एवं मुम्बई जैसे महानगरों का चक्कर लगाता रहता हूं । अभी हाल ही में मैं कुछ दिनों के लिए मुम्बई रहा । तब मुझे अपने पौत्र के जन्म के समय अस्पताल के कई चक्कर लगाने पड़े थे । उस दौरान मेरे गमनागमन का साधन ऑटोरिक्शा ही रहा । जाहिर है कि मेरा सापका अलग-अलग ऑटारिक्शॉ वालों से पड़ा । तब मुझे पता चला कि मुम्बई मे ऑटोरिक्शे बिना मीटर के नहीं चलते । मेरा अनुभव दिल्ली में बिल्कुल उल्टा रहा है । मैंने पाया है कि ऑटोरिक्शों पर मीटर तो अवश्य लगे रहते हैं, लेकिन उनका प्रयोग यात्रियों का भाड़ा तय करने में होता है ऐसा मुझे कभी नहीं लगा । आम तौर पर ऑटारिक्शा वाले के साथ मोलभाव करके भाड़ा तय करना पड़ता है । मैंने अक्सर देखा है कि वे वाजिब से डेड़-दो गुना भाड़ा मांगते हैं और मोलभाव के बाद भी सही भाड़े पर वे तैयार हो गये होंगे इस बात को लेकर अश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जिसे भाड़े का अंदाजा न हो उसके लिए धोखा खा जाना स्वाभाविक है । ऐसे लोगों को ‘प्रिपेड’ऑटोरिक्शा की शरण में जाना पड़ता है ।

लेकिन इधर चार-छः दिनों के दिल्ली प्रवास के दौरान मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां भी कुछ ऑटोरिक्शा वाले मीटर के अनुसार भाड़ा लेने को तैयार होने लगे हैं । इस बात का प्रथम अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक दिन अपने गंतव्य पर ऑटोरिक्शा के माध्यम से गया । मैंने अधिकांश दूरी दिल्ली की मेट्रो रेलसेवा से तय की और शेष भाग के लिए ऑटोरिक्शा भाड़े पर लिया । मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद प्लेटफॉर्म से बाहर आकर मैंने एक ऑटोरिक्शा वाले से पूछा कि क्या वह अमुक स्थान को चलेगा । वह तैयार हुआ तो भाड़ा पूछा, “कितना पैसा लेंगे ?” उत्तर मिला, “सत्तर रुपया लगेगा ।”

मेरा अगला सवाल था, “इतना तो ज्यादा है । वहां तक का इतना होता नहीं । … अच्छा, आपके ऑटोरिक्शा पर मीटर लगा है क्या ? … और वह काम भी करता है क्या ?”

जवाब था, “मीटर है, सा’ब । मीटर से चलेंगे क्या ? मीटर से भी वही पड़ेगा ।”

मैंने कहा, “ठीक है, मीटर से ही चलिए । जितना भी लगे देखा जाएगा । दिल्ली में मीटर के हिसाब से भाड़ा तय करने का अनुभव भी तो ले लें । पहली बार देख रहा हूं कि कोई मीटर से भी चलने को तैयार है ।”

गंतव्य पर पहुंचने पर मीटर ने उनसठ रुपया – एक कम साठ रुपया! – भाड़े की रीडिंग दिखाई । मैंने ऑटोरिक्शा चालक को साठ रुपया देते हुए कहा, “यह तो साठ भी नहीं हुआ; आप तो सत्तर मांग रहे थे ।”

“इसी इलाके के फलां सिरे तक चले होते तो इतना हो जाता ।” उसने सफाई पेश की ।

बात खत्म हुई और मैं आगे बढ़ गया ।

अगले दिन मुझे कहीं अन्यत्र जाना था । मैं निकटतम चौराहे पर गया और वहां खड़े ऑटोरिक्शा चालकों से पूछा । उनमें से एक मुझे गंतव्य तक पहुंचाने को तैयार हो गया । बीते दिन के अनुभव को ध्यान में रखते हुए मैंने पूछा, “आपके वाहन पर मीटर लगा हुआ दिख रहा है; काम करता है क्या ? मैं मीटर के हिसाब से चलना चाहूंगा ।”

उसने जवाब दिया, “मीटर है और वह चलता भी है । मैं उसी के हिसाब से भाड़ा लूंगा । दरअसल मैं मीटर से ही चलता हूं । ऐसा करने पर पैसेंजर से झक-झक नहीं करनी पड़ती है ।”

“ताज्जुब है । मैं तो देखता आया हूं कि यहां ऑटोरिक्शों पर लगे मीटर अक्सर काम तक नहीं करते और जिनके काम करते भी हैं वे मीटर से चलने को तैयार नहीं होते ।” मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

उसने उत्तर दिया, “अब माहौल कुछ बदल रहा है । कई पैसेंजर अब मीटर से चलने की बात करते हैं और कई आटो-ड्राइवर उसके हिसाब से चलने भी लगे हैं । बारगेनिंग के मामले में पैसेंजर को शक बन रहता है कि आटो-भाड़ा कहीं अधिक तो नहीं लिया जा रहा है और कभी-कभी वे ड्राइवर से उलझ भी जाते हैं । मैं तो अब मीटर से ही चलता हूं ।”

उसकी बात सुन मुझे भरोसा होने लगा कि मुम्बई की भांति यहां भी देरसबेर ‘मीटर्ड’आटो चलने लगेंगे । – योगेन्द्र जोशी

Tags:  आटोरिक्शा, autorickshaw, आटोरिक्शा भाड़ा, autorickshaw charges, प्रिपेड वाहन, prepaid vehicle,  मोलभाव, bargaining

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प्लास्टिक थैलियां इस्तेमाल न करने की बात और पहले आप पहले आप की चिरस्थायी नीति!

चंद रोज पहले की ही बात है । मैं अपने किराने-परचून की दुकान पर गया था घरेलू इस्तेमाल की दो-चार चीजें खरीदने के लिए । मैं अपने साथ सदा ही कपड़े का थैला ले जाया करता हूं उसमें सामान भरकर लाने के लिए । मेरा दुकानदार जानता है कि मैं पतले प्लास्टिक के थैलों के इस्तेमाल का धुर विरोधी हूं । जब कभी उसका सहायक प्लास्टिक के थैले में कोई चीज लाकर देने लगता है तो वह उसे टोक देता है, “देखते नहीं आप थैला लेकर आये हैं ? यह देखना भूल जाते हो कि कौन ग्राहक थैला लेकर आया है और कौन नहीं।”

मैं खुद भी उसके सहायक को अक्सर टोक देता हूं, अरे भई तपाक-से प्लास्टिक में सामान भर के मत थमा दिया करो । खुद भी कभी-कभार अपनी तरफ से ग्राहकों से कह दिया करो कि बाबूजी, थैला लेकर आते तो ज्यादा अच्छा होता । कोई तुम्हें मारने थोड़े ही आएगा । अगर कोई प्लास्टिक की मांग पर अड़ जाए तो दे दिया करो । लेकिन एक बार कह तो सकते हो न ।”

अपने शहर वाराणसी में प्लास्टिक की बहुत पतली थैलियों का दुकानदारी में बेरोक-टोक इस्तेमाल होता है । मेरी जानकारी में ऐसी थैलियों पर काननूी रोक है । लेकिन कानून बेचारा क्या करें ? उसके अपने हाथ-पांव तो होते नहीं कि खुद चलकर कानून के उल्लंघन को रोके । और प्रशासनिक तंत्र के पास काम का इतना बोझ रहता है कि वह हाथ पर हाथ रखकर सब कुछ होते हुए देखने में ही अपनी भलाई पाता है । अतः कानून तो बन जाते हैं, लेकिन उससे वस्तुस्थिति नहीं बदलती । जो अनर्थ लोग करने लगते हैं वह बदस्तूर चलता रहता है । हर कोई इस बात का इंतिजार करता है कि कानून डंडा लेकर दौड़ते हुए उसके पास आये और उसे रोके । कोई मुझे टोके इसका इंतिजार किए बिना ही मैं खुदबखुद कानून का पालन करूंगा ऐसी सोच ऊपर वाले ने उसे शायद दे ही नहीं रखी है ।

मेरे दुकानदार ने एक-दो बार अपने ग्राहकों को कपड़े की थैलियां बांटकर उनसे आग्रह किया था कि वे उन थैलियों को लेकर आएं । लेकिन जब लोगों ने कसम खा रखी हो कि जब तक उनका वश चलेगा वे कोई भला काम नहीं करेंगे, तो भला चीजें कहां सुधरने वाली । लिहाजा दुकानदार ने ही अपनी गलती सुधार ली । यों उसने मुझे बताया था कि प्लास्टिक का इस्तेमाल कुल मिलाकर उसे महंगा ही पड़ता है । लेकिन करे क्या ग्राहकों को नाखुश भी तो नहीं कर सकते !

उस दिन की घटना पर वापस लौटता हूं । मूल्य चुकता करके जब मैं अपना सामान साथ लाए कपड़े के झोले में संभाल रहा था तब दुकानदार का सहायक प्लास्टिक के एक बड़े-से थैले में अन्य ग्राहक का सामान भरकर ले आया । ग्राहक महोदय मेरे ही बगल में खड़े थे । अपरिचित होते हुए भी मैंने विनम्र भाव के साथ मुस्कराते हुए उनसे कहा, “झोला साथ लेकर अगर  आप भी सामान खरीद ले जाया करें तो अच्छा होगा । देखते ही होंगे कितना प्लास्टिक सड़कों-नालियों में पड़ा रहता है । अपने शहर में इसके निस्तारण का कोई प्रबंध तो है नहीं । अपनी तरफ से हम लोग इतना भी कर लें तो कुछ अंतर तो पड़ेगा ही ।”

मैं जब भी खरीद-फरोख्त करता हूं तो प्लास्टिक की थैली के लिए यथासंभव मना कर देता हूं । मेरी पत्नी एवं मैं आम तौर पर अपने साथ थैला आदि लेकर चलते हैं । कभी-कभार दुकानदार भी कपड़े के थैले में सामान भरके दे देता है । मैं अक्सर दुकानदार तथा अगल-बगल खड़े ग्राहकों को भी बिन मांगी सलाह दे बैठता हूं । ऐसी धृष्टता के साथ पेश आना मेरे स्वभाव का हिस्सा बन चुका है । और यही धृष्टता मैं इस बार भी कर बैठा । उक्त ग्राहक मेरी बात पर नाखुशी व्यक्त कर सकते थे, परंतु ऐसा हुआ नहीं । मेरी भावना को स्वीकार करते हुए बोले, “हां, आप ठीक कहते हैं, लेकिन झोला लेकर चलने की आदत ही नहीं बनी । दुकानदार प्लास्टिक के थैले में सामान दे देता है, तो उसी में सुविधा लगती है । दुकानदार ऐसे थैले देना बंद कर दे तो झोला साथ लाना शुरू हो जाए ।”

“लेकिन दुकानदार कहता है कि अनुरोध करने के बावजूद लोग अपने साथ थैला लाते ही नहीं । वे तो प्लास्टिक की थैली में ही सामान मांगते हैं । आप कहते हैं कि दुकानदार बंद करे ऐसी थैली देना, और दुकानदार कहता है कि ग्राहक मांगना बंद करें । पहले अंडा या मुर्गी वाला सवाल यहां खड़ा हो जाता है । इसलिए कुछ हो नहीं पाता ।” मैंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

वे बोले, “आप सही कह रहे हैं, मुझे कोशिश करनी चाहिए ।”

उनके इस कथन को सुनने के बाद मैंने उनसे विदाई ली और घर की राह चल पड़ा । – योगेन्द्र जोशी

 

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“आप जैसा फिजूल आदमी मैंने नहीं देखा।”

कुछएक दिनों पहले मैं अपने एक रिश्तेदार से मिला । सामान्य कुशल-क्षेम की चर्चा के बाद बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि कैसे ऊटपटांग की टेलीफोन कॉलें उन्हें कभी-कभी मिल जाती हैं । अपने हालिया अनुभव का जिक्र करते हुए वे बोले कि अभी दो-चार दिन पूर्व उन्हें एक आदमी से फोन आया जिसने खुद को बीमा कंपनियों से जुड़ा कर्मचारी बताया । उसने कहा, “देखिए, आपके किसी पुराने बीमा के बोनस का भुगतान किया जाना है ।”

इस तरफ से जवाब गया, “मुझे तो रुके पड़े किसी ऐसे भुगतान का ख्याल नहीं है । फिर भी कोई हो तो भेज दीजिए । इसमें पूछने की क्या बात है ?”

दूसरी तरफ से सलाह मिली, “बोनस की राशि लाखों में है । उसमें सिक्योरिटी और प्रॉसेसिंग आदि की कुछ फीस लगेगी । आपको इतना (याद नहीं कितना) पैसा जमा करना होगा । कहां और कैसे यह हम आपको बताते हैं ।”

मेरे मित्र ने बीच में टोकते हुए फोनकर्ता से कहा, “देखिए यह सब तो नहीं चलेगा । आप बोनस से उतना पैसा काटकर शेष भेज दीजिए । बात सीधी-सी है ।”

इतना कहे जाने पर फोन कट गया । उसके बाद रिश्तेदार के पास से लौटने के दो-तीन दिन बाद कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे भी हुआ । मेरे पास भी एक फोन-कॉल आई । फोनकर्ता बीमा संबंधी बोनस की उपलब्धता की बात करने लगा । मुझे मालूम था कि यह सब लोगों को बेवकूफ बनाने की एक कोशिश है । मैंने पूछा, “आप किस संस्था की ओर से बात कर रहे हैं ?”

उसने कहा,आई.आर.डी.ए.

“आई.आर.डी.ए.? मैंने इस संस्था का नाम कभी नहीं सुना है ।” मैं इस संस्था से वाकई अनभिज्ञ रहा हूं ।

“नाम नहीं सुना ? अजीब बात है । यह भारत सरकार की एक संस्था हैः बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डिवलपमेंट ऑथोरिटी), जो देश की सभी बीमा कंपनियों के कामकाज पर नजर रखती है ।”

मुझे अंदाजा है कि इस प्रकार के फोन लोगों को पैसे का लालच देकर बेवकूफ बनाने और उनसे खुद ही पैसा ऐंठने के लिए किए जाते हैं । सरकारी तंत्र के कर्मचारियों से यह उम्मीद भला कोई कैसे कर सकता है कि वह आपके वाजिब बकाए को लौटाने की बात खुदबखुद करें । उनसे पैसा पाने के लिए तो कागजी लिखापड़ी के साथ कार्यालयों के दसियों चक्कर हर किसी को लगाने पड़ते हैं । और यहां आपके बकाए के लिए चिंता जताने वाला कोई फोन कर रहा है ! भला कैसे कोई विश्वास कर सकता है ! लिहाजा मुझे उस व्यक्ति की बोनस संबंधी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी । फिर भी मेरा मन हुआ कि उससे इधर-उधर के सवाल पूछ डालूं । मैंने कहा, “कौन-कौन सी हैं ये बीमा कंपनियां जिनकी आप बात कर रहे हैं, जानना चाहता हूं ।”

         “आपको बोनस से मतलब है या बीमा कंपनियों की लिस्ट से ?” उसने अपनी नाखुशी जाहिर की ।

         “अरे भई, मामला ठीक से समझ लेना चाहिए । इसलिए कुछएक सवाल-जवाब करना जरूरी है ।” मैंने अपनी सफाई पेश की ।

वह व्यक्ति समझ गया कि उसे कुछ हासिल होना नहीं है । अपना गुस्सा उतारते हुए उसने झल्लाकर कहा, “आप जैसा फिजूल आदमी मैंने नहीं देखा ।”

मैंने चाहा कि उसके इन शब्दों को मैं स्वयं उसके प्रति दोहराऊं, किंतु तब तक उसने फोन काट दिया । – योगेन्द्र जोशी

 

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“भैयाजी, आप साइकिल से चलते हैं ये अच्छा नहीं लगता है!”

मेरे पड़ोस में मेरे हमउम्र एक सज्जन रहते हैं । वे समाज के तथाकथित पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं । वे निरक्षर हैं और उनकी मान्यताएं निहायत रुढ़िवादी हैं ऐसा मैं अनुभव करता आया हूं । वे यह सोचते हैं कि आर्थिक रूप से अपेक्षया संपन्न होने के कारण मुझे साइकिल जैसी ‘घटिया’ सवारी से नहीं चलना-फिरना चाहिए । यहां मैं उनकी उस प्रतिक्रिया का जिक्र कर रहा हूं जो एक दिन मेरे साइकिल चलाने पर उन्होंने व्यक्त की थी ।

आगे बढ़ने से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि मेरे पास ‘सामाजिक प्रतिष्ठा का द्योतक’ चौपहिया वाहन नहीं हैं । मैं स्वयं को धनाड्य नहीं मान सकता हूं, किंतु मैं इतना संपन्न तो हूं ही कि चार-पांच लाख मूल्य की एक कार खरीद सकूं । फिर भी कार खरीदने का विचार मेरे मन मैं कभी नहीं आया । इसके दो प्रमुख कारण रहे हैं । एक कारण तो यही रहा है कि बनारस जैसे दुर्व्यवस्थित शहर में कार की वास्तविक उपयोगिता नाममात्र की है । मेरे उक्त विचार से कई नगरवासी अवश्य सहमत होंगे ऐसा मेरा विश्वास है । किंतु ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण वे कार को ‘बेकार’ कहने में हिचकिचाएंगे इस बात को भी मैं महसूस करता हूं । जहां तक मेरा सवाल है मुझे तो कार चलानी भी नहीं आती है । परंतु अपने पास कार न होने का इससे भी बड़ा कारण यह रहा है कि मैं ‘कार-कल्चर’ का विरोधी नहीं तो पक्षधर तो नहीं ही हूं । मेरे विचार में निजी कारों के बदले सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे यथासंभव पैदल चलें अथवा साइकिल प्रयोग में लें । मुझे तो पैदल चलना पसंद है, अथवा आवश्यकतानुसार साइकिल का प्रयोग मुझे अच्छा लगता है । मेरे पास एक स्कूटर है अवश्य, किंतु उसे चलाने की नौबत आठ-दश दिन में एक बार आती है । मुझ जैसे सेवानिवृत्त व्यक्ति का कहीं आना-जाना बहुत नहीं होता है ।

उक्त बातें मैंने इसलिए बता दी कि पड़ोसी के साथ संपन्न मेरी बातें समुचित परिप्रेक्ष में समझी जा सकें । हां तो हुआ यह कि मैं अपने घर से बाहर निकला साइकिल के साथ, और गेट के बाहर सड़क पर उस सवारी पर चढ़ने के लिए तैयार हुआ । तभी पास ही अपने घर के बाहर बैठे उन पड़ोसी सज्जन ने आवाज दी, “भैयाजी!”

मैंने उनकी आवाज सुनी, मैं ठिठककर रुका और उनकी ओर मुखातिब होकर पूछने लगा, “कहिए, क्या बात है ?”

“भैयाजी, आप साइकिल से चलते हैं ये अच्छा नहीं लगता है!”

उनकी बात पर मुझे किंचित् आश्चर्य हुआ । मेरा साइकिल से चलना कोई नई बात नहीं थी । साइकिल की सवारी तो मैं अक्सर करता ही आ रहा था; कभी साइकिल तो कभी स्कूटर । आज क्या कुछ नया घट गया कि उन्होंने मुझे यों टोक दिया ? मैं समझ नहीं पा रहा था । बदले में मैंने पूछा, “साइकिल से तो मैं अक्सर निकलता रहा हूं भाई; आज कौन-सी नई बात हो गयी है कि आपने यह सवाल उठाया ?”

“भैयाजी, यह सवाल तो मेरे मन में कोई नया नहीं है; बस आज पूछ लिया ।”

“लेकिन सवाल आपने पूछा ही क्यों? साइकिल चलाना कोई बुरी बात तो नहीं ।”

“दरअसल साइकिल चलाना आप जैसों को शोभा नहीं देता । आपको तो कार रखनी चाहिए । साइकिल तो हम जैसे लोगों के लिए ही ठीक है । जिसकी अच्छी हैसियत हो उसका साइकिल से चलना शोभा नहीं देता ।”

“लेकिन मुझे तो साइकिल चलाना अच्छा लगता है । इसमें बुराई क्या है?”

“भैयाजी, सवाल इज्जत का भी तो है । कार से चलने वाले की इज्जत बढ़ती है; साइकिल से चलने पर वह इज्जत कहां?”

“कोई बात नहीं । इज्जत कम होगी, लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता ।” ऐसा कहते हुए मैं आगे बढ़ गया । मुझे झूठी प्रतिष्ठा का कोई शौक नहीं यह बात अपने उन ‘भैयाजी’ को नहीं समझा सकता था । मैं यह भी भलीभांति जानता हूं कि समाज में प्रतिष्ठा के अपने मापदंड होते हैं, जो मुझे मान्य नहीं । समाज में संपन्नता के साथ उसका प्रदर्शन भी जरूरी समझा जाता है । मेरी मान्यताएं भिन्न हैं । किंतु अपनी मान्यताओं को लेकर बहस में न पड़ना ही मैंने ठीक समझा । – योगेन्द्र जोशी

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“आज के जमाने में किसी प्यासे को पानी पिलाने से भी कतराते हैं लोग”

वाकया पांच-छः हफ्तों पहले का है । गर्मियों के दिन, दोपहर का वक्त और ऊपर से तेज धूप । मेरे मकान के गेट पर लगी घंटी घनघनाती है । मैं बाहर आता हूं । गेट पर कूरियर से आई डाक देने एक युवक अपनी साइकिल के साथ खड़ा है । मैं गेट खोलता हूं और वह मकान के अहाते में दाखिल होता है, जहां पर छांव है । मैं उसके द्वारा पेश कागज पर डाक प्राप्ति के संकेत स्वरूप दस्तखत करता हूं, और उससे डाक ले लेता हूं । वह लौटने को गेट की ओर मुड़ने लगता है । मैं उसे रोकते हुए पूछता हूं, “आप धूप में आए हैं, प्यासे होंगे । इस ग्रीष्मकालीन धूप में काफी पानी पीकर चलना चाहिए । पानी पिलाऊं आपको क्या ?”

“अगर एक गिलास पानी पिला सकें तो मेहरबानी होगी ।” वह व्यक्ति पानी पीने की इच्छा जाहिर करते हुए जवाब देता है ।

मैं उस आदमी को दो मिनट रुकने की बात कहते हुए घर के अंदर दाखिल होता हूं । घर में मेरे अतिरिक्त एकमात्र अन्य सदस्य मेरी पत्नी है, बस । मैं पत्नी से एक गिलास शरबत तैयार करने को कहता हूं । फिर एक ट्रे में दो टुकड़े मीठे के साथ शरबत और ठंडे पानी के गिलासों के साथ बाहर आता हूं और बाहर पड़े एक स्टूल पर रखते हुए उस व्यक्ति को पेश करता हूं ।

“अरे…, आप तो …।” उसके मुख से दोएक शब्द निकलते हैं । उसके चेहरे पर किंचित् विस्मय के साथ संतोष के भाव झलकते हैं ।

“कोई बात नहीं, … आप इन्हें लीजिए ।” मैं उसे आश्वस्त करता हूं ।

वह पेश की गयी सामग्री खा-पीकर धन्यवाद देता है, और उसके बाद कहता है, “आप तो बुलाकर पानी पिला रहे हैं । भला कौन करता है ऐसा ! गेट पर खड़े होकर कोई प्यासा एक गिलास पानी मांगे तो उसे देने से भी कतराते हैं लोग । आपकी तरह पानी ही नहीं शरबत भी पिलाए कोई ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिले ।”

“नहीं, ऐसा नहीं है । दुनिया में सभी प्रकार के लोग होते हैं । यह तो संयोग की बात है कि कब किस प्रकार के आदमी से भेंट हो जाए ।” मैं प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं । फिर पूछता हूं “आपको तो अभी और जगह भी जाना होगा । देर हो रही होगी ।”

वह आभार व्यक्त करते हुए नमस्कार करता है और गेट के बाहर निकल जाता है । पीछे से मैं भी गेट पर आता हूं और उसे विदा करते हुए गेट बंद कर देता हूं । बात आई-गई हो गयी ।

संयोग से करीब दो-चार दिन पहले वह व्यक्ति फिर एक डाक लेकर मेरे पास पहुंचा । मुझे अक्सर कूरियर से डाक मिलती रहती है, कभी कोई पुस्तक तो कभी किसी स्वयंसेवी संस्था के कागज पत्र, या परिचितों के द्वारा भेजी कोई सामग्री, आदि । आम तौर पर हर बार किसी नये कूरियर-वाहक से साक्षात्कार होता है । लेकिन इस बार दुबारा एक व्यक्ति मेरे पास पहुंचा । गर्मी यथावत् चल रही थी, और उस दिन भी अच्छी-खासी धूप थी । पिछली बार की तरह इस बार भी मैंने शरबत और पानी के साथ उसकी आवभगत की । प्रतिक्रिया में इस बार वह पूछने लगा, “मुझे याद है कि पिछली बार भी आपने ठंडा खिलाया-पिलाया था । लगता है कि आपके पास आने पर कुछ भी खाने-पीने को मिल जाएगा । क्या आप अक्सर ऐसा करते हैं ?”

“कुछ ऐसा ही समझ लीजिए ।” मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया ।

“मैं समझता हूं आम तौर पर ऐसा शायद ही कोई करता है । लेकिन लगता है कि आप कुछ हटकर सोचते हैं । जान सकता हूं कि ऐसा क्यों ?”

मैं हंस देता हूं, “अच्छा लगता है इसलिए ।” मैं क्षण भर के लिए चुप रहता हूं, फिर अपने विचार समझाने के लिए आगे कहता हूं, “गेट पर कोई पहुंचा हो तो उससे अदब-से पेश आना और चाय-पानी के लिए पूछ लेना अच्छा लगता है, खास तौर पर इसलिए कि ऐसा करना मेरी हैसियत में है । गेट पर आया हर व्यक्ति चोर-उचक्का-बदमाश हो ऐसा मानकर नहीं चला जा सकता है । अभी तक मुझे कोई बुरा अनुभव नहीं हुआ है । किसी जरूरतमंद की छोटीमोटी मदद करने पर सुकून का अनुभव होता है । … और अधिक अहम बात तो यह है कि अब जिंदगी में बहुत-कुछ पाने को नहीं है, बहुत कुछ छोड़कर जाने का वक्त आ रहा है । क्या पता ऐसा करने से अपनी ‘ऊपर’ की यात्रा कुछ हद तक आसान रहे ।”

वह मेरा मतलब समझ जाता है । कहने लगता है, “चाहता हूं कि कभी इतना समय मिले कि साथ बैठकर आपसे अधिक बातें सुन सकूं । अभी तो मुझे अपना काम संपन्न करने निकलना ही है ।”

धन्यवाद ज्ञापन और समुचित अभिवादन करते हुए वह गेट के बाहर निकलता है और साइकिल पर चढ़कर आगे बढ़ जाता है । पीछे से मैं गेट बंद करता हूं, और संतोष भाव के साथ घर के अंदर दाखिल हो जाता हूं । – योगेन्द्र जोशी

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“सेवा में कुछ मिलेगा?” – जल निगम कर-संग्राहक की मांग

आजकल भ्रष्टाचार की बातें जोर-शोर से की जा रही हैं । महज बातों से कुछ होना नहीं है, फिर भी उन पर बहसें चल रही हैं, बौद्धिक विलास के लिए ही सही । समाज अपने तरीके से चलता आया है और आगे भी चलेगा । बातें करते समय हम भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार तो हमारे खून में घुल चुका है, उसे दूर करेंगे कैसे । हालात कुछ वैसे ही वैसे ही हैं जैसे दूध में नमक घुल गया हो । नमक की डली दूध में घुल जाए उसके पहले ही यदि दूध निथार लिया जाए तो उसकी अशुद्धता स्वीकार्य स्तर पर बनी रह सकती है । लेकिन जब नमक घुल ही चुका हो तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं । दूध फेंक सकते हैं, बस । लेकिन दूध फेंकने की हैसियत ही न हो तो आपको उसी से काम चलाना पड़ेगा । हम हिंदुस्तानियों के हाल कुछ ऐसे ही हैं । जिंदगी के दूध में भ्रष्टाचार का नमक घुल चुका है । असल दूध तो आप नाली में उड़ेल सकते हैं, किंतु जिंदगी को तो छोड़ नहीं सकते हैं । उसे जीना ही पड़ेगा, भ्रष्टाचार को सहज भाव से सहते हुए । यही सब चल रहा है । अस्तु ।

मेरा वास्ता सरकारी महकमों से कम ही पड़ता है । इसलिए किसी सरकारी दफ्तर में बैठी भ्रष्टाचार की राक्षसी के दर्शन करने की नौबत लंबे समय से नहीं आई है । लेकिन पिछले हफ्ते वह मुझे घर बैठे ही दर्शन दे गई, भले ही कुछ सेकंडों के लिए । इतने भर से मैं भयभीत नहीं हुआ, किंतु उसका संदेश मेरे सवा लीटर के भेजे में घुस ही गया, “मूर्ख मानुष, इस मुगालते में नहीं रहना कि मैं अब जिंदा नहीं रहूंगी । मैं तो तब तक जीती रहूंगी जब तक तुम्हारी यह मानव जाति घरती पर है । तुम मेरे विरुद्ध जो चाहो बको, मुझे फर्क नहीं पड़ता है । … और सुन लो, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर के बीच का यह भूखंड तो मुझे खास पसंद है । इसे छोड़ मैं कहीं भी जाने वाली नहीं ।” और यह मूक संदेश देकर वह अंतर्धान हो गयी ।

पिछले हफ्ते हुआ क्या इसकी चर्चा पर लौटता हूं । मेरे शहर वाराणसी में जल निगम के कर-संग्राहक पानी एवं सीवर का टैक्स आम तौर पर संबंधित उपभोक्ताओं के मकानों पर जाकर नगद वसूलते हैं । आप चाहें तो उनके कार्यालय की खिड़की पर जाकर भी टैक्स जमा कर सकते हैं । घर पर आकर उनके टैक्स इकट्ठा करने पर किसी को आपत्ति नहीं होती होगी । शायद निगम के तत्संबंधित कर्मियों को भी वसूली दिखानी पड़ती होगी, इसीलिए वे इतनी दिलचस्पी लेते होंगे । अन्यथा सरकारी कर्मी क्योंकर जहमत मोल लेगा ? हां, तो पिछले सप्ताह एक टैक्स कर्मी घर पहुंचे । शिष्टाचार के नाते मैंने उनका हल्के-फुल्के जलपान के साथ स्वागत किया । ऐसा शिष्टाचार मैं अधिकांश मौकों पर बरतता ही हूं । बीते दो-चार सालों से जो सज्जन आ रहे थे उनसे मेरा सामान्य परिचय हो चुका था । किंतु इस बार का चेहरा नया था । मैंने टैक्स की राशि के बारे में पूछा तो पता चला कि इस बीच कुछ वृद्धि हो चुकी है । उन्होंने दो हजार एक सौ छियानबे का हिसाब समझाते हुए कहा, “दो हजार दो सौ का ही हिसाब समझ लीजिए ।”

मैंने उनको पांच-पांच एवं सौ-सौ के नोटों के माध्यम से बाइस सौ रुपयों की राशि पेश की । ये छियानबे की राशि सौ के बेहद करीब थी, इसलिए मैंने सोचा कि वे चार रुपये लौटा देंगे । लेकिन उनके “… हिसाब समझ लीजिए” कहने पर मुझे अंदेशा तो हो ही गया कि उनकी नियत कुछ ठीक नहीं है । घर के ओने-कोने से बीन-बटोरकर फुटकर छियानबे का इंतजाम शायद हो भी जाता, लेकिन मैंने इसकी कोशिश नहीं की । मैंने सोचा कि वे चार रुपये नहीं भी लौटाएंगे तो बहुत बड़ी बात नहीं । चायपानी के तौर पर पांच-सात रुपये का खर्च तो मैं स्वेच्छया कर ही रहा था, चार रुपये और सही यही विचार मन में आया । उन्होंने टैक्स का पैसा जेब में रखा और उसकी रसीद तैयार कर मुझे सौंप दी । उनके साथ बैठे-बैठे दो-चार बातें इधर-उधर की भी हो गयीं ।

असल कार्य संपन्न हो चुका था और मैं इंतजार कर रहा था कि अब वे उठेंगे और विदा लेंगे । अंत में उठने से पहले वे बोल पड़े “सेवा वगैरह कुछ होगी ?”

मैं चौंका, क्षण भर के लिए सोच में पड़ा कि क्या मतलब । फिर संभला और समझ गया कि वे दान-दक्षिणा की उम्मींद लेकर चल रहे थे । मैं उसके लिए तैयार नहीं था और न उसकी कोई वजह ही थी । वे टैक्स इकट्ठा कर रहे थे तो विभाग का दायित्व निभा रहे थे । मैं उनसे कोई उल्टा-सीधा कार्य करवा रहा होता तो कुछ बात भी होती । मुझे तो उनका चार रुपया न लौटाना ही खल रहा था, जिसके बारे में मैंने कुछ कहा नहीं । मैंने संयत होकर जवाब दिया, “आज तक तो ‘ऐसा’ कुछ किया नहीं, भला आज कोई नयी बात तो हुई नहीं ।”

विचारे किंचित् नैराश्य भाव से बोले “हां, वो तो मालूम है … ।” और अपना झोला उठाकर वे चल दिए ।

उनके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि कुछ सरकारी मुलाजिम पूरी बेशर्मी के साथ भिखमंगों की भांति पैसा मांगने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं । मुझे लगता है कोई भी कानून लोगों में संकोच भाव पैदा नहीं कर सकता । बेहयाई के साथ पैसा वसूलने में कइयों को कोई दिक्कत नहीं होती । तब भला भ्रष्टाचार की राक्षसी इस देश को छोड़ कहीं अन्यत्र  क्यों जाएगी ? – योगेन्द्र जोशी

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अंत में छात्रों की शंका का समाधान हो ही गया

घटना पंद्रह-बीस साल पुरानी है, जब मैं विश्वविद्यालय मैं कार्यरत था । एक दिन अपने भौतिकी (फिजिक्स) विभाग के गलियारे से गुजरते वक्त बी.एससी. कक्षा के दो छात्र मेरे सामने आ खड़े हुए । उन्होंने मुझसे भौतिकी पाठ्यक्रम के एक प्रश्न का हल जानना चाहा । वे छात्र मेरी स्वयं की कक्षा के छात्र नहीं थे । दरअसल उन दिनों मैं बी.एससी. कक्षा का कोई भी सैद्धांतिक प्रश्नपत्र (थ्यॉरेटिकल पेपर) नहीं पढ़ा रहा था । अध्यापन के मेरे दायित्व तब बी.एससी. की भौतिकी प्रयोगशाला और एम.एससी. के सैद्धांतिक-प्रायोगिक प्रश्नपत्रों तक सीमित था । अतः असमर्थता व्यक्त करते हुए मैंने उन्हें टालने की कोशिश की, “मैं तो पिछले कुछ अर्से से बी.एससी. में पढ़ा ही नहीं रहा हूं । कई टापिकों (प्रसंगों) से संपर्क भी आजकल छूटा पड़ा है । इस समय ठीक-से तैयार हुए बिना मैं कहां तुम्हारी मदद कर सकूंगा,  भई ?”

“आप सवाल सॉल्व कर लेंगे, सर । आपको अधिक नहीं सोचना पड़ेगा, हमें मालूम है ।” उनका सम्मिलित उत्तर था ।

“तुमसे किसने कह दिया कि मैं सॉल्व कर लूंगा ? न तो मैं तुम्हारी क्लास लेता हूं, और न ही मैं किसी और सेक्सन को थ्यौरी पढ़ा रहा हूं । … खैर छोड़ो । … भला सवाल है किस टॉपिक का, और पढ़ा कौन रहा है तुम लोगों को ?” मैंने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की ।

“सर, मिकैनिक्स (यांत्रिकी) का सवाल है” कहते हुए उन्होंने मुझे संबंधित अध्यापक का नाम बताया । मैं जानता था कि वे सज्जन उनके सवाल में दिलचस्पी नहीं ले रहे होंगे । उनके पास इतनी फुरसत नहीं होगी कि वे सवाल सुनें और उसे हल करने का तरीका बतायें । ऐसे काम में क्योंकर कोई समय गवाये जिससे प्रत्यक्षरूपेण कोई अतिरिक्त लाभ ही न हो ? एक अध्यापक-सह-वैज्ञानिक के नाते उनका ‘कर्तव्य-दर्शन’ कुछ इसी प्रकार का था यह बात एक लंबे अर्से से सहकर्मी होने के नाते मैं उनके बारे में महसूस करता आ रहा था ।

उस समय मेरी मनोदशा (मूड) उन छात्रों की समस्या सुलझाने की नहीं थी । मैं सोचने लगा कि ख्वाहमख्वाह क्यों जहमत मोल लूं । इसलिए बहुत कुछ जानने-समझने के बावजूद मैंने उन्हें टालने के इरादे से कहा, “लेकिन तुम लोगों को तो विषय पढ़ा रहे अपने टीचर से सवाल पूछना चाहिए । अगर वे न मिल पा रहे हों तो दूसरे सेक्सन में जो पढ़ा रहा हो उस टीचर से पूछना चाहिए । मेरे जैसों, जिनका उस टॉपिक से संपर्क छूट चुका हो, के पास जाने का कोई तुक नहीं है ।”

उन्होंने मेरी बात सुनी और बोले, “ठीक है, सर, उन्हीं से पूछ लेते हैं ।”

उसके बाद मैं विभाग में अपने कमरे की ओर बढ़ गया । वे भी विपरीत दिशा में बाहर बरसाती (पोर्च) की तरफ चल दिए । मैं महसूस कर रहा था कि वे निराश हुए होंगे, और यह अच्छी तरह जानता था कि वे संबंधित अध्यापक के पास नहीं जाएंगे । वहां उन्हें पहले भी निराशा हाथ लगी होगी । मुझे लगा कि मैंने नहीं लौटाना चाहिए था । हो सकता है उनका सवाल मेरे लिए कठिन न रहा हो । यों भी एक अध्यापक के नाते बी.एससी. की भौतिकी मेरे लिए कोई कठिन विषय नहीं रही है । बहुत संभव है कि मुझे सवाल पर अधिक दिमाग न खपाना पड़ता ।

अनायास मुझे लगा कि मैंने उनकी मदद करनी चाहिए थी । मैं पीछे मुड़ा और तेज कदमों से उसी ओर चल दिया जिधर छात्र गए थे । बरसाती के पास वे मुझे दिखाई दिए । मैंने उन्हें आवाज दी और अपने पास बुलाया । फिर उन्हें साथ लेकर अपने कमरे में आया और उनसे संबंधित सवाल के बारे में पूछा । मुझे उसको सुलझाने में कोई दिक्कत नहीं हुई । समय के दस-बारह मिनट के अंतराल में उस सवाल का हल समझाकर उन दोनों को विदा कर दिया ।

उस समय आत्मसंतोष का भाव मेरे मन में भर आया । कमरे की शांतता में बैठे मैं सोचने लगा कि एक अध्यापक के दायित्वों को एकदम साफ तौर पर परिभाषित किया जा सकता है क्या । क्या यह कहा जा सकता है कि उससे बस इतना ही अपेक्षित है और इसके आगे नहीं ? क्या व्यक्ति को अपने दायित्व अक्सर स्वयं निर्धारित नही करने होते हैं ? दायित्व सदैव पूर्वतः नियत नहीं होते । कभी-कभी उन्हें तात्कालिक आवश्यकताओं या परिस्थितियों के अनुसार नियत करना होता है । मैं फलां कार्य करूं या उसे भूल जाऊं जैसे विचारों के ऊहापोह का सामना करना पड़ सकता है । तब आपको दूसरों एवं अपने हितों के बीच सामंजस्य बिठाते हुए निर्णय लेना पड़ता है । आपका हित नहीं भी सध रहा हो, लेकिन किसी का भला उस कार्य में निहित हो तो उसे किया जाना चाहिए । उक्त घटना यों तो बहुत छोटी है, किंतु इसमें निहित संदेश अवश्य गंभीर है । – योगेन्द्र जोशी

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