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फुटकर काम की तलाश

पहले एक तस्वीर बीच सड़क खड़े पेड़ की:

Mid-Road Tree

मैं मखमुठी से अखनूर जा रहा हूं। जम्मूतवी-अखनूर-जोरिवां मार्ग पर स्थित सैन्य-क्षेत्र है मखमुठी जहां मैं कार्यवशात् चार-पांच दिनों के प्रवास पर आया हूं। यह स्थान अखनूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह के करीब 9:00 बजे हैं। मैं साइकिल से शौकिया अखनूर जा रहा हूं यह जांचने के लिए कि साइकिल से 30-32 कि.मी. आ-जा सकता हूं कि नहीं। मैं साइकिल की उपयोगिता का क़ायल हूं और उम्र के इस पड़ाव में भी साइकिल को ही अपने शहर में आवागमन के लिए यथासंभव इस्तेमाल में लेता हूं।

रास्ते में मैं चाय की छोटी-सी एक दुकान पर रुक जाता हूं, अपने साथ की बोतल से पानी पीने और उसके बाद एक कप चाय पीने के लिए। सड़क की हालत ठीक है, समतल और सपाट, गड्ढामुक्त! वाहनों का आवागमन अधिक नहीं है। फिर भी जो गुजर रहे हैं उनकी रफ़्तार अच्छी-खासी है, इसलिए दोनों तरफ़ देखकर ही सावधानी से ही सड़क पार करने जरूरत दिखती है।

सड़क की दूसरी तरफ़ एक नौजवान सुर्ख लाल टीशर्ट और हल्के सलेटी रंग की पैंट पहने हुए सड़क पार करने की फिराक में खड़ा है। उसके पास कोई सामान नहीं है सिवाय कंधे पर पड़े एक गमछे के और पैरों में पहनी एक जोड़ी  चप्पल के।

मैं पानी पीकर गिलास में परोसी गयी चाय पीने लगता हूं। तब तक वह युवक भी दुकान पर पहुंचता है और दुकानदार से एक कप (गिलास) चाय की मांग करता है। दुकानदार उसे गरम चाय का गिलास थमाता है। चाय की चुस्कियां लेते हुए वह पूछता है, “क्या आसपास कोई गांव है?”

दुकानदार और उसके दो साथी समवेत स्वर में कहते हैं, “यह तो गांव का ही इलाका है, हम सभी गांव के बाशिन्दे हैं। … आपको जाना किधर है?”

वह कोई जवाब नहीं देता है। उसके सवाल पूछने के अंदाज से मैं समझ जाता हूं कि वह उस स्थान से अनभिज्ञ है और उसे किसी खास गांव की तलाश नहीं है। मैं उसे गौर से देखता हूं। उसके हुलिये से लगता है कि वह एक अति सामान्य माली हालत का इंसान है या उससे भी कमजोर। वह काम की तलाश में कहीं दूर-दराज से आया होगा ऐसा मैं अनुमान लगाता हूं। सोचता हूं कि मैं उससे पूछूं, “आप इस अनजान-अजनबी इलाके में क्यों आये हैं? … रोजी-रोटी की तलाश में तो नहीं आये हैं?”। लेकिन यह सवाल पूछने में हिचकता हूं और चुप रहता हूं। अंत में उससे कैसे बात शुरू करूं यह सोचते हुए उस व्यक्ति से पूछ लेता हूं, “बुरा न मानिएगा … आप कहां से आये हैं?”

“मैं यूपी (उत्तर प्रदेश) से आया हूं।” उसका संक्षिप्त उत्तर है।

“यूपी में कहां से?” मैं ठीक-ठीक जानने के लिए पूछता हूं।

“लखनऊ-बाराबंकी से

“लखनऊ से या बाराबंकी से? … शहर? … गांव-देहात?” मैं फिर पूछता हूं।

वह “बाराबकी जिले से” कहके चुप हो जाता है।

बाराबंकी मेरे शहर वाराणसी से बहुत दूर नही है। जम्मू-तवी के निकट के उस इलाके से हजारएक कि.मी. दूर बाराबंकी से आए उस युवक से मैं एक प्रकार की निकटता-सी महसूस करता हूं। उससे मैं पूछता हूं, “आप चाय के साथ समोसा खाना चाहेंगे?”

वह नहीं कहते हुए मना कर देता है। हम एक-दूसरे के लिए एकदम अपरिचित हैं। इसलिए मैं अधिक जोर नहीं डालता।

तब तक वह चाय खत्म कर चुकता है और दुकानदार को उसकी कीमत चुकाता है। फिर सड़क पर दायें-बांये बारी-बारी से दो-तीन दफे नज़र डालता है। वाहनों का आवागमन अधिक न होने बावजूद वह सड़क पार करने में कुछ हिचकिचाहट दिखाता है। सड़कें पार करने का उसे शायद वैसा अभ्यास न हो जैसा आम शहरी को होता है। अंत में वह सड़क के उस पार वापस चला जाता है जिधर से वह आया था। फिर सड़क के किनारे के दो-चार मकानों और खेतों के बीच से गुजरने वाली एक गली में गुम हो हो जाता है।

उसके चले जाने और अपनी चाय पी चुकने के बाद मैं भी चाय की कीमत चुकाता हूं। फिर साइकिल पर चढ़कर मखमुठी का रास्ता तय करने लगता हूं।

रास्ते भर मैं उसके बारे में सोचता हूं। मुझे कोफ़्त होती है कि मैंने उससे अधिक बात करने की कोशिश नहीं की। मैंने पूछा होता कि क्यों वह घर से दूर उस अपेक्षया अपरिचित जगह पर पहुंचा है। अवश्य ही वह कामधंधे की तलाश में वहां आया होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि के जगहों से कई श्रमिक फसल कटाई के समय पंजाब और हरियाणा पहुंचते हैं यह मैं सुनता आया हूं। हो सकता है कुछ जने जम्मू भी पहुंच जाते हों। रबी की फसल कई दिनों पहले तैयार हो चुकी है। कुछ खेतों से फसल उठ चुकी है। फिर भी अभी काम बचा है। मैं मन ही मन प्रर्थना करता हूं कि उस आदमी को आसपास के खेतों में काम और गांवों में ठहरने को मिल जाये। मन खिन्न होने लगता है यह सोचकर कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के आदमी को काम की तलाश में सुदूर प्रदेशों तक भटकना पड़ता है। – योगेन्द्र जोशी

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नमस्ते से “गुड मॉर्निंग” तक की यात्रा

मुझे मौजूदा मोहल्ले में रहते हुए करीब 30 साल बीत चुके हैं। शुरुआती दो वर्षों के बाद से अपने निजी मकान में रह रहा हूं। मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। मैंने इन भाइयों के माता-पिता को देखा है। मैं उनकी पीढ़ी को पहली पीढ़ी संबोधित कर रहा हूं और तदनुसार उक्त भाइयों को दूसरी पीढ़ी के कहूंगा। अब वे माता-पिता इस संसार में नहीं रहे। सुना है कि इस मोहल्ले की भूमि कभी इनकी एवं इनके पट्टीदारों की हुआ करती थी। कालोनाइज़र को जमीन बेचने पर मिले पैसे का समुचित उपयोग ये लोग शायद नहीं कर पाये होंगे। इसलिए इनकी माली हालत सामान्य या उससे बदतर रही है ऐसा मेरा सोचना है। ये पांचों भाई मोहल्ले के पास ही लगने वाली फल-सब्जी-सट्टी में थोक अथवा फुटकर कारोबार करके परिवार का पालन-पोषण करते आये हैं।

अब दूसरी पीढ़ी के इन भाइयों की उम्र साठ के आसपास उसके कुछ ऊपर-नीचे होनी चाहिए ऐसा मेरा अनुमान है। इनमें से कोई साक्षर भी है कि नहीं मुझे ठीक से नहीं मालूम; मैंने कभी पूछा नहीं। कोई साक्षर होगा भी तो उसे मात्र अक्षरज्ञान से कुछ और अधिक ज्ञान नहीं होगा। आम तौर पर वे वाराणसी में प्रचलित भोजपुरी बोलते हैं, किंतु मेरे साथ सामान्य हिन्दी में ही बात करते हैं।

इसके आगे यह भी बता देता हूं कि इनमें से सभी की संतानें संख्या में 4 से 7 के बीच हैं। इस तीसरी पीढ़ी की प्रायः सभी संतानें राज्य-सरकारी/परिषदीय स्कूलों में पढ़ने अवश्य जाया करते थे,  किंतु कोई भी +2 स्तर पार नहीं कर सका। मेरा अनुमान है कि शायद कोई भी हाई-स्कूल उत्तीर्ण नहीं है। फिर भी वे (युवक न कि युवतियां) अच्छा कारोबार कर ले रही है। कइयों ने तो सब्जियों-फलों का पुस्तैनी धंधा छोड़कर नये धंधे भी अपना लिए हैं। अब माहौल काफी बदल चुका है। किसी के भी अधिकतम तीन बच्चे हैं। इस चौथी पीढ़ी के कुछ बच्चे निजी अंग्रेजी विद्यालयों में भी पढ़ रहे हैं।

उक्त विवरण देने के पीछे मेरा मकसद एक दृष्टांत प्रस्तुत करना है कि हमारे देशवासियों के दिलोदिमाग पर आधुनिकता और अंग्रेजी किस प्रकार राज कर रही है । उपर्युक्त खानदान की चार पीढ़ियों – परदादा-परदादी से लेकर आज के नये बच्चों की पीढ़ियों को मैं पिछले करीब तीस साल से देख रहा हूं। चौथी पीढ़ी आते-आते इन लोगों में स्पष्टतः दिखाई देने वाला सांस्कृतिक/भाषायी परिवर्तन मैंने अनुभव किया है। दूसरी पीढ़ी के सबसे बढ़े भाई की सबसे बढ़ी बहू आज भी पारंपरिक लिबास यानी सीधे पल्लू की साड़ी पहने हुए रहती है। लेकिन इन परिवारों की बाद में आईं बहुएं उल्टे पल्लू की साड़ियों में दिखाई देती हैं। दिलचस्प है कि वे हल्का-सा घूंघट अभी नहीं छोड़ पाईं हैं। सुनता हूं कि उनमें से कुछ हाईस्कूल पास भी हैं।

इन पांच भाइयों के बच्चे जब छोटे थे तब वे अपने-अपने माता-पिता को “माई-बाबू” या इसी प्रकार के संबोधन से पुकारते थे। परंतु बड़े हो जाने और अपने-अपने कामधंधों के दौरान समाज के अन्य वर्गों के संपर्क में आने के बाद उनमें से कुछ ने “मम्मी-पापा” का प्रयोग आरंभ कर दिया । अपने देश में अब गैर-रिश्तेदार या अजनबी आदमी को “अंकल” शब्द से पुकारना प्रायः पूरी तरह प्रचलन में आ चुका है, जिसमें संबोधित व्यक्ति की उम्र वक्ता से पर्याप्त अधिक होती है। अंकल संबोधन माता-पिता की उम्र वाले के लिए और  दादा-दादी की उम्र वाले के लिए भी प्रयुक्त होने लगा है।

तीसरी पीढ़ी के उक्त बच्चे मुझे आरंभ से ही अंकल कहते आये हैं। पहले उनका अभिवादन “नमस्ते” हुआ करता था, किंतु अब उनमें से दो-तीन ऐसे हैं जो “गुड मॉर्निंग” पर उतर आये हैं। मेरा प्रत्युत्तर उसी पुरानी शैली में “नमस्ते” रहता है। दुआ-सलाम की बात प्रायः प्रातः काल ही होती है। मैंने इस पर गौर नहीं किया कि वे दोपहर या संध्या पश्चात्‍ भी “गुड मॉर्निंग” ही कहते हैं या कुछ और। उनमें से एक टैक्सी चलाता है, उसे अवश्य अधिक जानकारी होगी।

चौथी पीढ़ी के जो बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं वे अंग्रेजी को लेकर कुछ अधिक ही उत्साहित हैं। वे किसी स्तरीय विद्यालय में नहीं पढ़ते, बल्कि उन्हीं विद्यालयों में से एक में पढ़ते हैं जो आजकल हर गली-कूचे-नुक्कड़ पर अंग्रेजी-माध्यम के नाम पर खुलते देखे जा सकते हैं। वे बच्चे हिन्दी की गिनतियां शायद ठीक-से नहीं जानते हैं। विद्यालय अंग्रेजी पर ही जोर डालते हैं, क्योंकि अंग्रेजी ही सुन्दर भविष्य की कुंजी है यह सभी का मानना है। उनमें से कुछ ने मेरे लिए “गुड मॉर्निंग” का अभिवादन अपना लिया है। बच्चों के जन्मदिन पर केक भी कटने लगे होंगे और “हैप्पी बर्थडे टु यू” का गायन भी होने लगा होगा। मोहल्ले की गली में उन बच्चों को इस गीत को गाते-गुनगुनाते हुए भी मैंने एक-दो बार देखा है।

तो यह है पहली पीढ़ी की निपट निरक्षरता से चौथी पीढ़ी की अंग्रेजी शिक्षा तक पहुंचने की यात्रा का विवरण। और साथ में संबोधन, अभिवादन, एवं पहनावे में आये परिवर्तन की कहानी। -योगेन्द्र जोशी

 

 

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आल्हादित होना उन बच्चों का कुछ पलों के लिए

मैं यदाकदा अपने शहर से बाहर अन्यत्र मित्र-परिचितों से मिलने अथवा पर्यटन हेतु निकल जाता हूं । इन अवसरों पर प्रातः-सायं टहलने निकलने पर मैं अपनी जेब में कभी-कभार एक कैमरा भी रख लेता हूं, यह सोचकर कि कहीं कोई दृश्य कैमरे में कैद करने का मन हो जाय तो वह साथ रहे । आवश्यक नहीं कि मैं दर्शनीय स्थलों की ही तस्वीरें खींचूं, जैसा कि आम पर्यटक करता होगा । मुझे कुछ नया, अवांछित, घृणास्पद ही सही, या अन्यथा, कुछ भी दिखे वह मेरे लिए तस्वीर का विषय बन सकता है ।

कुछ समय पहले मैं मुंबई गया था अपने बेटे के पास जो पश्चिम भांडुप में रहता है । उसका आवास एलबीएस रोड (लाल बहादुर शास्त्री मार्ग) के निकट एक बहुमंजिली इमारत में है । मैं अधिकांश दिनों उस इमारत के परिसर में ही टहला करता था, किंतु कभी-कभी उक्त सड़क पर भी निकल जाता था । एक प्रात मैं कैमरा साथ ले गया था । मैंने देखा कि सड़क के किनारे फुटपाथ पर कुछ लोग (खानाबदोश) अपने रहने का ठिकाना बनाए हुए हैं । मैंने एक तस्वीर खींच ली जो यहां प्रस्तुत है । तीन खंडों की इस तस्वीर के आरंभ में वही है ।

तस्वीर  खींचकर मैं आगे बढ़ गया । दो-चार कदम बढ़ा था कि मैंने दो बच्चों – कदाचित् उन्हीं खानाबदोशों के – को अपने आगे जाते हुए देखा । वे अपने हाथों में पारदर्शी प्लास्टिक की बोतलें तथा एक ‘गैलन’(करीब एक गैलन की क्षमता वाला प्लास्टिक का बर्तन या कनस्तर) लिए हुए थे और उन्हें हाथों से ढोल-नगाड़े के माफिक पीटकर आवाज निकाल रहे थे । मैंने पीछे से उनकी तस्वीर खींच ली (दी गयी तस्वीर में दूसरा खंड) । मेरा मन हुआ कि आगे बढ़कर उनकी सामने से भी तस्वीर ले लूं ।

जैसे ही मैं उनके सामने पहुचा जिज्ञासु बच्चों की भांति उनकी नजर मेरे कैमरे पर पड़ी । लालायित-से वे बोल पड़े, “हमारी भी एक फोटो खींच दो न” । और मैंने फोटो खींची और उन्हें दिखा दी (तीसरे खंड की तस्वीर)। वे खुशी के मारे एक-दूसरे को और फिर मुझे देखकर खिलखिलाने लगे । वे प्रसन्न थे, आल्हादित थे, गोया कि उन्हें कुछ कीमती चीज देखने को मिल गई हो । मैंने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ हाथ हिलाया और आगे बढ़ गया ।

रास्ते में मैं सोचने लगा कि आजकल तो मध्यवर्गीय और उसके ऊपर के परिवारों में कैमरे की उपलब्धता आम बात है । उन परिवारों में गाहे-बगाहे तस्वीरें खिंचती ही रहती हैं । लेकिन इन बच्चों के लिए किसी अपरिचित व्यक्ति के द्वारा उनकी फोटो खींची जाना ही खुशी की बात थी, भले ही वह फोटो उन्हें दुबारा देखने को ही न मिले । अवश्य ही यह खुशी तात्कालिक एवं अस्थाई होती है, मात्र कुछ मिनटों की, लेकिन होती जरूर है । अथवा खुशी कुछ घंटों तक रह सकती है, जब तक कि वे अपने लोगों के बीच जाकर उसकी चर्चा न कर लें । मेरे लिए उनका खुश हो जाना अपने किस्म का एक अनुभव था ।  जीवन में खुशियां क्षणिक, अल्पकालिक या अपेक्षया दीर्घकालिक होती हैं किंतु शाश्वत नहीं । – योगेन्द्र जोशी

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कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा

मुझे एक गाय मुहल्ले की अपनी गली के नुक्कड़ पर घास चरती हुई मिल गयी । आजकल बरसात का मौसम है । बारिस के नाम पर इस मौसम में अपेक्षा से बहुत कम पानी बरसा है अपने इलाके में, फिर भी जमीन में इतनी नमी तो आ ही गई है कि सड़कों-गलियों की कच्ची जमीन पर मौसमी घास उग सके । बस वही घास वह गाय चर रही थी । मैं पास से गुजरने लगा तो उसने मुझे गौर से देखा । उसे शायद मेरा चेहरा देखा-पहचाना-सा लग रहा था ।

Stray Cow

मैंने उसकी ओर मुखातिब होकर पूछा, “क्यों भई गैया माई, आज इधर कैसे ? आजतक तो आपको ऐसे चरते हुए नहीं देखा; कम से कम अपनी इस गली में तो कभी नहीं ।”

“बस यों ही, समझ लें तफरी लेने निकल पड़ी मैं भी । कभी-कभी जिन्दगी में कुछ चेंज भी तो होना चाहिए ।” उसका जवाब था ।
उसकी बात मैं समझ नहीं पाया । अधिक कुछ और पूछे बिना मैं आगे बढ़ गया ।

मैंने उसे सुबह-शाम जब भी देखा घर के नजदीक की मुख्य सड़क के किनारे के एक मकान के सामने ही बंधा देखा था दो-तीन अन्य गायों के साथ । जरूर उस मकान के मालिक ने पाल रखा होगा उन सबको । उस दुमंजिले मकान के भूतल पर किराने की दुकान है उसी मकान मालिक की; और साथ में चलता है गाय-भैंसों के चारे का कारोबार । एक आटा-चक्की भी चलती है वहां; मैं कभी-कभार आटा खरीद ले आता हूं वहां से । ऐसे ही मौकों पर अथवा वहां से सड़क पर पैदल गुजरते हुए मैंने उस गाय को खूंटे से बंधे और नांद से चारा-पानी खाते हुए देखा है । लेकिन कभी भी शहर के आम छुट्टा जानवरों की तरह उसे इधर-उधर घूमते-चरते नहीं देखा । वह पालतू जो थी ।

मुझे जिज्ञासा हुई देखूं कि माजरा क्या है । मैंने सड़क पर आते-जाते उस खूंटे पर गौर करना शुरू किया । अब वह गाय उस खूंटे से बंधी नहीं दिखाई देती, कभी नहीं । मैं समझ गया वह अब बेकार हो चुकी है; वह बूढ़ी हो रही होगी और बछड़े-बछिया जनकर दूध देने की क्षमता खो चुकी होगी । इसलिए उसके मालिक ने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है । अब वह छुट्टा गाय बन गई है दूसरे कई अन्य गायों की तरह ।

मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के पचास-पचपन साल पहले के वे दिन याद आते हैं जब हमारे घरों में गायें पहली थीं । बारह-चौदह साल तक दूध देने के बाद वे इस कार्य से निवृत्त हो जाती थीं । उन्हें तब खदेड़कर जंगल में नहीं छोड़ दिया जाता था, बल्कि अन्य गाय-भेंसों के साथ वे भी पलती रहती थीं । लेकिन वे अधिक दिन नहीं जी पाती थीं और दो-तीन साल में दम तोड़ देती थीं । अवश्य ही तब उनके शवों को जंगल में डाल दिया जाता था । उनका मांस गिद्धों एवं जानवरों का भोजन बनता था । लेकिन यहां वह सब नहीं था ।

लंबे अर्से के बाद एक दिन वह मोहल्ले की ही किसी गली में मुझे मिल गयी लंगड़ाते हुए । मैंने उससे पूछा, “ये पैर में चोट कैसे लगी ?”

जवाब था, “क्या बताऊं, सड़क पार करते वक्त एक कार से टकरा गई ।”

“देखकर चला करिए, अपने शहर में सड़कें पार करना इतना आसान थोड़े ही है ।” मैंने सलाह दी ।

“देखकर ही चल रही थी, कारवाले को ही शायद नहीं दिखाई दिया ।”

“यानी कि कारवाला आपसे टकराया । यही न ?”

“यह मैं कैसे कहूं ? कारवाला बड़ा आदमी होता है, उसको भला कैसे दोष दिया जा सकता है । दोषी तो सदा कमजोर ही माना जाएगा न । यही तो इस दुनिया का उसूल है ।”

उसकी इस टिप्पणी का क्या जवाब दूं मैं सोच नहीं पा रहा रहा था । “चलिए, कुछ दिन में आपका पांव ठीक हो जाए यही प्रार्थना है मेरी ।” कहते हुए मैं वहां से चल दिया ।

यह मेरी उससे अंतिम मुलाकात थी । उसके बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा । वह शायद दिवंगत हो गई होगी । या फिर कुछ और …। मैं स्वयं से पूछता हूं कि गोसेवा का दंभ भरने वाले भारतीय समाज में क्या कोई वाकई गोसेवक होता हैं या गोशोषक । – योगेन्द्र जोशी

 

Tags: गोसेवा, service to cow, गौ माता, mother cow, छुट्टा पशु, stray animals

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जहां चाह वहां राह : वे अंत में वाइस-चांसलर बन ही गये!

अपने देश में उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों का नियुक्तियां अभी तक ‘कॉलेजियम’ नाम की चयन समिति की संस्तुति के आधार पर होती आ रही थीं । इस समिति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उनके चार वरिष्टतम सहयोगी भाग लेते थे । पिछले कुछ समय से यह बहस छिड़ी हुई थी कि इस पद्धति में सही चयन अक्सर नहीं होते हैं और अपेक्षया बेहतर योग्यता वाले व्यक्तियों के छूट जाने की संभावना अधिक रहती है । मौजूदा शासन इस पद्धति को समाप्त करके उसके बदले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (नैशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमिशन) का गठन करने जा रही है, जिसमें शासन की ओर से भी कुछ सदस्य होंगे ।

कॉलेजियम पद्धति के विरुद्ध ये तर्क दिया जा रहा था कि इसमें समिति के सदस्य अपने मित्रों-परिचितों-संबंधियों के प्रति झुकाव रखते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपना लेते हों इस बात की संभावना रहती है । मैं इस पद्धति का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन यह विश्वास भी नहीं कर पाता कि नये आयोग के साथ ऐसी संभावना नहीं हो सकती । मैंने अपने अध्यापन-काल में यह अनुभव किया है कि विश्वविद्यालय जैसी संस्था में जहां चयन-प्रक्रिया प्रमुखतया साक्षात्कार पर आधारित रहती है ईमानदारी से कार्य होता हो ऐसा सामान्यतः नहीं होता । इन समितियों में प्रायः पांच या अधिक सदस्य रहते हैं, जिसके सदस्यगण आम तौर पर अभ्यर्थियों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जानते हैं अथवा उनकी सिफारिशें लिए रहते हैं । उनकी पूरी कोशिश रहती है कि जिनके प्रति वे झुकाव रखते हैं उनका चयन हो ।

वाइस-चासंलरों, जिन्हें कुछ संस्थाओं में कुलपति कहा जाता है तो अन्यत्र उपकुलपति, की नियुक्ति तो अधिक निष्ठा से होनी चाहिए, किंतु उसमें भी ‘अपनों’ को उपकृत करने की परंपरा रही है । इस अहम पद के लिए कदाचित सभी जगह केन्द्र अथवा राज्य सरकार प्रायः तीन सदस्यों की एक ‘खोज समिति’ (सर्च कमेटी) का गठन करती है, जिसके द्वारा संस्तुति-प्राप्त प्रत्याशियों में से किसी एक की नियुक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल (जो भी इस कार्य के लिए अधिकार-संपन्न हो) द्वारा की जाती है ।  मेरा उद्येश्य इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करना नहीं है । कॉलेजियम के गुणदोषों पर टीवी बहसों को देखते और तत्संबंधित लेखों को पढ़ते समय मुझे एक घटना याद आती रही कि किस प्रकार मेरे एक परिचित ने वाइस-चांसलर (वीसी) पद के लिए जी-जोड़ प्रयास किया और सफल भी हुए । उनकी नियुक्ति में संबंधित जनों ने पर्याप्त ईमानदारी बरती होगी ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जिस समाज में भ्रष्ट आचरण का मतलब केवल अवैध तरीके से धन कमाना लिया जाता हो, लेकिन जाति-धर्म आदि के आधार पर किसी के पक्ष में निर्णय लेना सामान्य परंपरा बन चुकी हो, परिचितों-मित्रों के भाई-भतीजों को अहमियत दी जाती हो, व्यक्ति के विवेकाधीन का अर्थ उसकी मनमर्जी माना जाता हो, सिफारिशें करना/मानना आम चलन में हो, उस समाज में कोई भी पद्धति अपनाई जाये सही कार्य होगा इस पर कम से कम मैं भरोसा नहीं कर पाता ।

अस्तु, मैं उन सज्जन के वीसी बनने की कहानी पर लौटता हूं । संबंधित व्यक्तियों/स्थानों को संदर्भ हेतु मैं काल्पनिक नामों से संबोधित कर रहा हूं । कोई दस-बारह वर्ष पुरानी घटना होगी जब मैं अपने दो सहशिक्षकों के साथ सांध्यकालीन चाय पीने हेतु विश्वविद्यालय (वि.वि.) परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर जा रहा था । मंदिर से किंचित दूरी पर ही उन सज्जन से भेंट हो गई जो रास्ते के दूसरी ओर से आ रहे थे । शिष्टाचार के नाते हम कुछ देर के लिए रुक गये और उनसे सामान्य बातचीत करने लगे । लगे हाथ हम में से किसी ने उन्हें छेड़ दिया, “अरे भई सक्सेना साहब, हमने सुना है कि आप जल्दी ही कौशाम्बी वि.वि. के वीसी बनने वाले हैं । कब जा रहे हैं अपने नये दायित्व पर ?”

“अरे यार क्या बताएं सब गड़बड़ हो गया । सब कुछ लगभग तय हो चुका था । चयन समिति में अपने भी परिचित थे, अतः अपना नाम तो आगे बढ़ा ही था । मैं पिछले कुछ समय से गर्वनर महोदय के पीए से भी मिलता आ रहा था । हाल ही में उन्होंने बताया भी था कि आप अपनी नियुक्ति हुई ही समझो, बस फाइनल सिग्नेचर होने की देरी है । मैं तो पूरी तरह आश्वस्त था, लेकिन क्या बताएं ! …” फिर मेरे सहयोगी की ओर मुखातिब होकर कहने लगे, “अरे, आपके वे प्रोफेसर शर्मा हैं न,  … आप तो उन्हें जानते ही हैं । पता नहीं वे कहां से टपक पड़े । बस, हमारा पत्ता काट दिया उन्होंने । धोखा खा गए ।”

हम लोगों ने चुटकी ली, “ये सब तो चलता रहता है । अभी खेल खत्म थोड़े ही हो गया है । कोशिशें जारी रखेंगे तो फिर मौका मिलेगा । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं ।”

इतना कहते हुए हमने उनसे विदाई ली और चल दिए मंदिर की ओर चाय पीने । अपनी मंजिल तो मंदिर के पास का टी-स्टाल था न कि प्रदेश का राजभवन ।

सक्सेना साहब के प्रयास चलते रहे और एक दिन खबर मिली कि वे राज्य के किसी अन्य वि.वि. के वीसी नियुक्त हो गये हैं । उनकी पहुंच ने अंततः उन्हें मंजिल तक पहुचा ही दिया । यह कोर्ई माने नहीं रखता कि बाद में उन पर लगे आरोपों की चर्चा भी प्रादेशिक अखबारों में छपी थीं । अहम बात तो यह है कि पूर्व-कुलपति रह चुकने का तमगा तो उन्हें मिल ही गया । ऐसे तमगों का भी अपना आनन्द होता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

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आम रिक्शावालों से कुछ अलग था वह

दो रोज पहले की बात है जब मेरी मुलाकात एक ऐसे रिक्शा वाले से हुई जिसका व्यवहार आम रिक्शाचालकों से कुछ हटकर था, जिसकी सोच आम आदमी से भिन्न थी, और जिससे बात करना दिलचस्प था । हुआ यह कि कल मैं सपत्नीक घर से गोदौलिया कार्यवशात गया था । गोदौलिया मेरे शहर वाराणसी का पुराना और घनी बस्ती वाला व्यापारिक स्थान है, जिसके निकट ही सुचर्चित बाबा विश्वनाथ मंदिर और गंगातट का दशाश्वमेध घाट हैं । बेहद भीड़भाड़ वाले इस जगह के ‘गोदौलिया चौराहे’ पर आवागमन हेतु सामान्यतः रिक्शा ही उपलब्ध हो पाते हैं । थ्रीह्वीलर आटोरिक्शे करीब आधा-पौन किलोमीटर दूर मिलते हैं । वहां से हम रिक्शा से लौटे थे ।

संध्या का समय था । गौदौलिया से लौटते समय जब हम लंका तक के लिए रिक्शा खोज रहे थे तो संयोग से एक नौजवान रिक्शावाला बगल में आ खड़ा हुआ और बोला, “लंका चलना है न ? आइए, बैठिए ।” और आगे रिक्शाभाड़े के बाबत खुद ही कहने लगा, “वैसे तो लंका तक का किराया चालीस रुपया होता है, लेकिन चूंकि मुझे उसी तरफ जााना है, इसलिए केवल तीस रुपया दे दीजिएगा ।” (बताता चलूं कि लंका हमारे घर के निकट है और वहीं पर सुविख्यात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का प्रवेशद्वार है ।)

भाड़े पर हामी भरते हुए हम रिक्शे पर बैठ गये, और वह चल पड़ा । नौजवान होने के कारण रिक्शा चलाने में उसे खास मशक्कत नहीं करनी पड़ रही थी ऐसा मुझे लगा । मार्ग में वह रामभक्ति के गीत/भजन गाने लगा । बीच रास्ते हमने उससे कहा, “बेटा, हमें लंका के अगले चौराहे यूनिवर्सिटी गेट वाले से पास छोड़ देना ।”

“आप जहां कहें वहां छोड़ दूं ।” उसका जवाब था ।

“तो क्या तुम सुंदरपुर तक चलोगे ?” हमने उससे पूछा ।

“छोड़ तो देता लेकिन अब रिक्शा जमा करने का समय हो रहा है ।”

“यह रिक्शा किराये पर लिए हो क्या ? कितना किराया भरना पड़ता है इसका ? और लंका के पास ही रहते हो क्या ?”

“चालीस रुपया रोज पडता है । लंका से सामनेघाट की ओर कुछ दूरी पर है मालिक की दुकान । गंगा पार रामनगर में मेरा घर है; वहीं से निकल जाऊंगा घर के लिए ।” उसने उत्तर दिया ।

रास्ते भर मुक्त भाव से उसे भजन गुनगुनाते देख मैंने पत्नी से कहा कि लगता है यह व्यक्ति तनाव में नहीं रहता होगा । जिज्ञासावश मैंने उससे पूछा, “लगता है भजन-कीर्तन की पुस्तकें पढ़ने का शौक है । कितने तक पढ़े हो भई ।”

“बाबूजी, स्कूल गये तो थे लेकिन हमें कुछ आता नहीं था । बस टीचर लोग हर साल अगली कक्षा में बढ़ा देते थे । क्या बताऊं ?”

“फिर भी पढ़ना-लिखना तो आता ही होगा ।”

“हां, थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लेता हूं काम भर का, ज्यादा नहीं ।”

तब तक हम लंका पहुंच चुके थे । मैंने पत्नी से इशारे से कहा, क्यों न चालीस रुपया भाड़ा दे दें । पत्नी ने सहमति जताई और उसे मैंने यह धनराशि चुका दी । वह बोला, “लेकिन बाबूजी मैंने तो आपसे तीस ही रुपये मांगे थे । चूंकि मुझे इधर आना था तो सोचा कि जो भी मिल जाए अच्छा ।”

“ठीक है, हम अपनी मरजी से दे रहे हैं ।” कहते हुए हम रिक्शे से उतरने लगे तो उसने रिक्शे के हत्थे पर लटक रहे अपने झोले से कागज के कुछ पन्ने निकाले और हमें सोंपते हुए बोला, “आपको याद होगा, अभी दो-चार पहले राहुल गांधी शहर के रिक्शाचालकों से मिले थे । मैं भी उनसे मिला था; उन्हें एक पत्र भी सोंपा था । यह उसी की कापी है । मैंने उन्हें एक गीत भी सुनाया ।”

उसने भोजपुरी में शब्दबद्ध एवं भारतमाता को संबोधित वही गीत, “माई, माई …” हमें सुना डाला । उस गीत के बोल हमें याद नहीं हैं, लेकिन इतना ध्यान है कि उसमें देश की गरीब जनता की व्यथा का जिक्र करते हुए भारत मां से उनके कष्ट मिटेंगे यह प्रश्न पूछा गया था । मेरे इस सवाल पर कि वह गीत किसका लिखा है, उसने बताया कि गीत स्वयं उसी का लिखा है । मैंने पूछा, “क्या इसकी लिखित प्रति भी रखे हो ? अगर हो तो वह भी दे दो ।”

उसका उत्तर था, “गीत की प्रति तो मेरे पास नहीं है, लेकिन आपको यह इंटरनेट पर मिल जाएगा । बनारस के रिक्शा वालों से आप राहुल जी की बातचीत उनकी जिस साइट पर मिलेगी वहीं यह भी मिल जाएगा ।”

उक्त वार्तालाप के पश्चात हमने उसकी रुचियों पर उसे बधाई के साथ शुभकामनाएं दीं और घर लौट आए । दरअसल धन-दौलत और ऐशो-आराम के बाबत भी उसने अपने खयालात हमारे सामने पेश किए थे । हम दोनों उसकी बातों से प्रभावित थे, क्योंकि वह हमें आम रिक्शावाले से कुछ हटकर लगा । बाद में मैंने इंटरनेट पर उस गीत को खोजने का प्रयास किया, किंतु मुझे वह मिल नहीं सका । गीत तो नहीं परंतु उसके द्वारा लिखित उपर्युक्त पत्र की प्रति वाकये के इस विवरण के साथ संलग्न है । – योगेन्द्र जोशी

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निरीह मुर्गे पर गुस्सा उतारने की घटना

          जिस घटना का जिक्र मैं इस स्थल पर करने जा रहा हूं वह मुझसे सीधे तौर पर नहीं जुड़ी है, बल्कि वह दो-तीन रोज पहले के अखबार में प्रकाशित एक समाचार पर आधारित है । “मुर्गी से इश्क लड़ाने पर मुर्गे को मार दिया तीर” शीर्षक के साथ छपी घटना का विवरण हिंदी दैनिक जागरण के 26 दिसंबर के अंक में देखा जा सकता है । मामला अलीराजपुर का है । ये स्थान कहां है इसका अंदाजा मुझे नहीं, किंतु घटना के विवरण से यही लगता है यह किसी आदिवासी क्षेत्र में है, जहां तीर-कमान प्रचलन में हैं ।

अखबारों में तो तमाम प्रकार की घटनाएं छपती रहती हैं, जो प्रायः राजनैतिक उथल-पुथल, आरोप-प्रत्यारोप, और प्रशासनिक संवेदनहीनता एवं लापरवाही से लेकर हत्या-डकैती-दुष्कर्म आदि जैसी विचलित करने वाली खबरों से जुड़ी रहती हैं । खबरें सभी प्रकार की प्रकाशित होती हैं, जिनमें कुछएक का विशेष सामाजिक महत्व होता है तो अधिकांश अन्य पढ़कर आई-गई के तौर पर भुला दी जाती हैं । किंतु कभी-कभी कोई घटना ऊपरी तौर पर  महत्वहीन होते हुए भी अपने पीछे विचारणीय सवाल छोड़ जाती है । कम से कम मुझे तो अक्सर ऐसा लगता है । उक्त घटना की खबर पढ़ने पर मेरे मन में सवाल उठा कि कुछ मनुष्य गुस्से में विवेकशून्य होकर तुरंत ही आत्म-संयम क्यों खो बैठते हैं ? क्यों वे कुछ क्षण ठहरकर अपनी प्रतिक्रिया के घातक परिणामों पर विचार नहीं कर पाते हैं ? अस्तु, मैं घटना की बात करता हूं ।

खबर यह थी कि दो भाई – कदाचित सगे, जिसका स्पष्ट उल्लेख खबर में नहीं – पड़ोसी थे और हैं । एक के घर में मुर्गी पली थी तो दूसरे के घर में संयोग से मुर्गा । हो सकता है उनके पास और भी मुर्गे-मुर्गियां रही हों, लेकिन घटना में किरदार निभाने वाले एक मुर्गी ओर एक मुर्गा बताए गये हैं । ये दोनों रहे तो पक्षी जाति के, उन्हें क्या मालूम कि उनके मालिकों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं । उन्हें यह समझ नहीं रही कि उन्हें भी मालिकों की भांति आपस में दूरी रखनी चाहिए । उनमें से कोई एक दूसरे के पास पहुंच गया । बहुत संभव है कि मुर्गा ही मुर्गी के पास पहुंचा हो । अपनी प्रजाति का कोई सदस्य आसपास टहल रहा है यह देख दूसरे मन में उससे नजदीकी बढ़ाने की इच्छा स्वभावतः जगी हो । विपरीत लिंग के सदस्यों के बीच ऐसा आकर्षण खास तौर पर देखा जाता है । खबर के अनुसार मुर्गा मुर्गी से ‘इश्क लड़ाने’ पहुंचा था । इश्क का इजहार कैसे किया जा रहा होगा यह अनुमान लगाने की बात है ।

बहरहाल मुर्गी के मालिक को वह इश्कबाजी नागवार लगी । उसे गुस्सा आया और चल दिया घर के भीतर अपना तीर-कमान लेने । हो सकता है उसने मुर्गे को दो-एक बार भगाया हो, लेकिन ढीठ मुर्गा माना न हो जिससे तीरंदाज मुर्गी-मालिक का गुस्सा और भड़क गया हो । घर से बाहर आकर उसने मुर्गे पर निशाना साधा और उस पर तीर छोड़ दिया । बेचारे मुर्गे को अपनी हरकत की सजा मिल गयी; तीर उसके शरीर के आर से पार निकल गया । यह तो गनीमत रही कि उसके मालिक (दूसरा भाई) को पता चल गया और ले गया उसे पशु-चिकित्सक के पास जिसने संभव उपचार आरंभ कर दिया । उसकी जान बच गई और वह स्वास्थ्यलाभ करने लगा । उसके मालिक ने घटना के बाबत पुलिस में रिपोर्ट कर दी । उधर मुर्गी का मालिक गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो गया ।

मनुष्य को ऊपर वाले ने सोचने-विचारने की क्षमता दे रखी है । तब भी वह उल्टी-सीधी हरकतों से बाज नहीं आता है । लाख समझाया जाए तो भी कई मनुष्य गलत-सलत कार्य से बचने की कोशिश नहीं करते । बेचारे पशु-पक्षी तो ऐसी समझ पाये नहीं हैं । उन पर ‘सभ्य मानव समाज’ के नियम-कानून तो लागू होते नहीं हैं । तब उन पर क्या गुस्सा करें ? हां, यदि वे असुविधा पैदा कर रहे हों या किसी प्रकार की हानि पहुंचा रहे हों तो उन्हें डराया-भगाया जा सकता है । नियंत्रित रखने के लिए न्यूनाधिक ताड़ना भी की जा सकती है । लेकिन गुस्से में उनकी जान तक लेने का विचार विवेकहीनता का ही द्योतक कहलाएगा ।

तीर चलाने वाले उस व्यक्ति को यह तो मालूम रहा ही होगा कि वह जो कार्य करने जा रहा है वह अनुचित हैा । इसीलिए तो वह बाद में फरार हो गया । जाहिर है गुस्से के अधीन की गई करतूत की कीमत चुकानी ही पड़ी । दरअसल पूरी घटना की कुछ न कुछ कीमत दोनों ही पक्षों को चुकानी पड़ी । मिला क्या ? केवल तसल्ली इस बात की कि मैंने जो हुआ उसे सहा नहीं और मुर्गे को ‘सबक’ सिखा दिया, गोया कि मुर्गा यह समझ सकता हो कि उसे भविष्य में ऐसी नासमझी नहीं करनी चाहिए!

इस प्रकार की घटनाएं हमें अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं । मैंने महसूस किया है कि अनेकों मनुष्य बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं, अपना आपा खो बैठते हैं, और गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त कर बैठते हैं । अवांछित एवं हानिप्रद व्यवहार किसी एक व्यक्ति तक सीमित हो ऐसा नहीं होता, अपितु पूरा जनसमूह ऐसी हरकत पर उतर आता है । कहीं कोई नहीं रह जाता जो कहे कि जरा ठंडे दिमाग से घटना के बारे में सोचा जाना चाहिए और संयमित प्रतिक्रिया क्या हो इस पर विचार करना चाहिए । कहीं किसी वाहन से दुर्घटनावश किसी की जान निकल गयी तो वहां से गुजरने वाले वाहनों की तोड़फोड़ या उनकी आगजनी पर लोग उतर आते हैं । अस्पताल में गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु पर भी इसी प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है । ऐसी खबर भी सुनने को मिल जाती है जिसमें किसी बात पर गुस्सा होने पर परिवार का कोई सदस्य साल-छः महीने के बच्चे की पटककर जान ले लेता है, अथवा अपनी ही जान गंवा देता है ।

मुझे लगता है कि अनेक जन प्रतिकूल एवं खिन्न करने वाली परिस्थितियों में आत्मसंयम एवं विवेक खो बैठते हैं, और फलतः अनर्थ कर बैठते हैं । हम चाहें या न, यही इस जीवन का कटु एवं अपरिहार्य सत्य है । – योगेन्द्र जोशी

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