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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

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जांच अधिकारी

वह पुलिस महकमे से प्रतिनियुक्ति पर आया एक सीबीआई अधिकारी था । अपने कार्य के प्रति समर्पित निष्ठावान कर्मठ अधिकारी था वह । मुश्किल से डेड़-दो साल हुए होंगे उसे नयी संस्था में आए हुए । वह चाहता था कि जिस जांच में उसे लगाया गया हो उसे पूरा करने का उसे अवसर मिले । वह समझ नहीं पा रहा था कि इस अल्पकाल में ही विभाग के भीतर उसके दो तबादले क्यों हो गये । उच्चाधिकारी से पूछने पर दोनों बार यही जवाब मिला कि उसकी जरूरत दूसरी जगह महसूस की जा रही है । यह उसकी योग्यता का प्रमाण था या कुछ और यह उसके लिए समझ से परे था । अस्तु, आदेश मानना उसका कर्तव्य था, अतः वह आधा-अधूरा कार्य छोड़ दूसरी जांच में मनोयोग से जुट जाता । अब वह रसूखदार और चर्चित किसी राजनेता की  आपराधिक संलिप्तता की जांच में जुटा था । उसे दाल में बहुत कुछ काला दिख रहा था और वह आशान्वतित था कि जांच के सार्थक परिणाम शीघ्र ही उसके हाथ लगेंगे । किंतु आज उसके उच्चाधिकारी ने जो कहा उससे उसे मानसिक कष्ट के साथ निराशा हो गयी ।

शाम को वह घर पहुंचा और सोफ़े के कोने पर हत्थे के सहारे बैठ गया । आम दिनों की तरह वह हाथमुंह धोकर तरोताजा होने वाशबेसिन या बाथरूम नहीं गया । थोड़ी देर में पत्नी उसके लिए हल्के नाश्ते के साथ चाय बना के ले आई । उसका मुरझाया चेहरा देख पत्नी ने पूछा, “काम के बोझ से तुम थके-हारे तो अक्सर दिखते हो, लेकिन आज तुम्हारे चेहरे पर परेशानी के भाव उभर रहे हैं । तबियत तो ठीक है न ? कोई खास बात तो नहीं हो गयी आफ़िस में ?”

पत्नी उसकी बगल में आकर बैठ गई । वह कुछ क्षणों तक शांत रहा । फिर प्रश्न भरी निगाह से देख रही पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए बोला, “हां कुछ ऐसा ही हो गया आफिस में ।” और पुनः शांत होकर सुनी आंखों से छत की ओर ताकने लगा । पत्नी असमंजस में थी कि कुछ आगे पूछे या उसे अपनी बाहों में भरकर उसके उद्वेग को किंचित दूर करे ।

“लो, चाय पी लो, ठंडी हो रही होगी ।” कहते हुए पत्नी ने उसके हाथ में चाय का प्याला पकड़ाया । उसने चाय की दो-चार चुस्कियां जब ले लीं तो पत्नी की हिम्मत थोड़ी बढ़ी कि आगे कुछ पूछे । “बताओ कुछ हुआ क्य़ा आफिस में ? मैं आफ़िस की समस्या का हल नहीं दे सकती, किंतु मुझे बताके तुम अपना मन हल्का तो कर ही सकते हो न !”

चाय की चुस्कियों और पत्नी के सान्निध्य ने अब तक उसके मन का बोझ कुछ कम कर दिया था । उसने कहना शुरू किया, “आज मेरे बॉस ने मुझे बुलाया और मुझसे कहा कि मैं जांच का काम धीमी गति से करूं । जल्दी से जल्दी परिणाम पाने की कोशिश मैं न करूं और मामले को कुछ हद तक लटकाये रहूं । मैं उनकी बात मानना नहीं चाहता था । मेरा सोचना है कि ऐसा करना मेरे व्यवसाय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता है और न ही दायित्वों के निर्वाह में ढीला रवैया मुझे व्यक्तिगत तौर पर स्वीकार्य है । मैंने अपना पक्ष रखते हुए उनसे जानना चाहा कि वे ऐसी सलाह क्यों दे रहे हैं । पहले तो वे टालते रहे फिर बोले कि ऐसा अलिखित निर्देश ऊपर से आया है । ऊपर का मतलब मंत्री के स्तर से है यह मैं समझ गया । फिर वे कहने लगे, ‘मुझे मालूम है कि यह बात तुम्हें पसंद नहीं । मुझे भी यह सब पसंद नहीं, परंतु अनुभव ने मुझे सिखा दिया है कि यहां ऐसा कुछ चलता रहता है । चुनाव नजदीक हैं उस समय यह मुद्दा सत्तापक्ष के काम आ सकता है यह मेरा अनुमान है । राजनेताओं के मामले ऐसे ही लटकाए रखे जाते हैं । न चाहते हुए भी हमें बहुत कुछ करना पड़ता है ।’ उसके बाद मैंने अधिक बात नहीं की और मैं अपने कार्यालय लौट आया । तुम्हें मालूम है ऐसी स्थिति में मुझे तकलीफ़ होती है ।”

“हां, मुझे मालूम है । इतना तो तुम्हें समझती ही हूं । मुझे भी बहुत-सी बातें ठीक नहीं लगती हैं, पर कर भी क्या सकते हैं ? बहुत-से मौकों पर समझौते करने पड़ते है । परिवार के भीतर, मित्र-परिचितों के स्तर पर, राह चलते अजनबियों के बीच, बताओ हम कहां-कहां समझौते नहीं करते ? इतना दुःखी न होओ । … चलो टीवी चलाती हूं, आज की खबरें सुनो ।”  पत्नी ने अपने तरीके से उसे आश्वस्त करने का प्रयास किया । वह टीवी ऑन करने उठी तो उसने उसका हाथ खींचकर वापस अपने साथ बिठा लिया ।

“फ़र्क है । सामाजिक जीवन में हमारे समझौते हमारी व्यक्तिगत लाभहानि की कीमत पर होते हैं, हम अपनी सुख-सुविधा या वैचारिक प्रतिबद्धता दांव पर लगाते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन में समझौतों का मतलब है देशहित की अनदेखी करना, अपने दायित्व को न निभाना जिनके लिए देश से आर्थिक लाभ ले रहे होते हैं । इस फ़र्क को समझो ।” उसने अपनी धारणा स्पष्ट की ।

उसने आगे कहना आरंभ किया, “इससे तो अच्छा है अपने राज्य में रहकर ही काम करना ।  जब शासन में बैठे लोग किसी से काम नहीं लेना चाहते हैं तो उसे ऐसी जगह भेज दिया जाता है जहां बंधा-बंधाया काम (रूटीन वर्क) करना काफ़ी होता है । तब इस बात की ग्लानि नहीं होती है कि मैं अपना दायित्व नहीं निभा रहा हूं । लेकिन इस महकमे में तो किसी न किसी जांच से जुड़ना ही होता है और तमाम दबाव झेलने होते हैं ।”

उस रात उसे काफ़ी देर तक नींद नहीं आई । वह सोचने लगा कि जिस संस्था में किसी न किसी बहाने दायित्व निभाने से रोका जाये वहां टिके रहना चाहिए अथवा नहीं ।

दूसरे दिन रोज की भांति वह वह कार्यालय के लिए तैयार हुआ । पत्नी ने प्रातःकालीन नाश्ता कराया और दोपहर के भोजन के लिए लंचबाक्स थमाते हुए बोली, “अगर शाम को जल्दी लौट सको तो कुछ देर के लिए कहीं घूमने निकल चलेंगे ।” वह चुप रहा, कोई जवाब नहीं दिया ।

घर से निकलते-निकलते वह पत्नी से बोला, “मेरी प्रतिनियुक्ति निरस्त करके मुझे अपने मूल राज्य वापस भेज दिया जाए इस आशय का निवेदन मैं आज कार्यालय को सोंप दूंगा ।” – योगेन्द्र जोशी

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दारोगा की धुनाई

चंद रोज पहले टीवी के किसी चैनल पर पंजाब राज्य के पुलिस बल से जुड़ा एक समाचार देखने-सुनने को मिला । चैनल पर दिखाए गये वीडियो क्लिप में पुलिस के दो-तीन जवान एक युवक को बेरहमी से पीटते नजर आ रहे थे । उस आम युवक – जाहिर है कि वह कोई “खास श्रेणी” का रसूखदार व्यक्ति नहीं था – की गलती यह थी कि वह अपने किसी मित्र की उन पुलिसवालों के साथ हो रही बहस की वीडियो क्लिप मोबाइल पर रिकार्ड कर रहा था । पुलिस के जवानों की नजर जब उस पर पड़ी तो उन्हें उसकी हरकत किसी “अपराध” से कम नहीं लगी । उन्होंने उसका मोबाइल छीनकर वीडियो रिकाडिंग मिटा दी और “कानून की मर्यादा बनाए रखने” तथा सबक सिखाने के लिए उसकी पिटाई भी कर दी । वे मोबाइल अपने साथ ले गए कि नहीं यह मुझे स्पष्ट नहीं हो सका । उनको शायद यह पता नहीं रहा होगा कि पास के एक दुकान का सीसीटीवी कैमरा घटना की रिकार्डिंग कर रहा है ।

उसी दिन पुलिस बल से जुड़ी दूसरी घटना के समाचार की भी जानकारी मिली । महाराष्ट्र राज्य से संबंधित उस समाचार के अनुसार तीन पुलिस वाले अर्धरात्रि के समय मिठाई की उस समय बंद एक दुकान में घुस गये ताला तोड़कर । और “संवेदनशीलता का परिचय देते हुए” उन्होंने वहां सो रहे कर्मचारियों की तबियत से मरम्मत की । समाचार में बताया गया कि वे दुकान के किसी कर्मचारी से खफा थे ।

इन दो समाचारों ने मुझे लगभग उसी समय की एक स्थानीय घटना की याद दिला दी । मैं घर के पास की सब्जीसट्टी पर सब्जियां और फल खरीदने गया था । वहां एक पेड़ के नीचे एक सब्जी विक्रेता जमीन पर सब्जियों की ढेरियां लगाकर बेच रहा था । मैं खरीदफरोख्त करने लगा । इसी दौरान ठेले पर भूरे जटाधारी नारियल (पुष्ट लेकिन पानी वाले) बेच रहा एक आदमी उसके पास पहुंचा और बोला, “कल खूब धुनाई हुई उसकी ।”

सब्जी वाला उस घटना से पहले से ही वाकिफ रहा होगा जिसके संदंर्भ में उक्त बात कही होगी । उस नारियल वाले से मैं भी यदाकदा नारियल खरीदा करता हूं और उस नजर से देखें तो वह एक प्रकार से मेरा भी परिचित था, सीमित अर्थ में ही सही । मुझे घटना के बारे में जिज्ञासा हुई, अतः मैंने उससे पूछा, “क्यों, क्या हुआ, किसकी धुनाई हो गई ?”

“अरे कुछ नहीं … । आजकल एक दारोगा इस सड़क पर गस्त लगाता है । उसी की धुनाई कर दी कुछ लड़कों ने ।”  उसने जवाब दिया ।

“आखिर मामला क्या था, क्या बात हो गई थी ।” मैंने पूछा ।

“दो-तीन रोज पहले उसने बी.एच.यू. (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) में पढ़ने वाले एक लड़के को किसी बहाने पीट दिया और उसका मोबाइल भी छीन लिया । वह लड़का जब बाद में बी.एच.यू. गया और उसने अपने दोस्तों को घटना के बारे में बताया तो उन्होंने तय किया कि दारोगा को सबक सिखाया जाए । तय हुआ कि वह लड़का उसी इलाके में जाए और देखे कि उससे फिर से सामना हो जाए । तब वह दोस्तों को खबर कर दे । कल 25-30 की संख्या में जुटकर वे लोग अपनी योजना में सफल हो गये । उन्होंने दारोगा की पिटाई कर दी ।”

“लेकिन अखबार में तो इस बारे में कोई खबर नहीं आई ।” मैंने घटना के प्रति शंका जताई ।

“अखबार में हर बारदात के बारे में थोड़े ही छपता है । कोई बहुत बड़ी घटना तो थी नहीं । ऐसी बातें तो शहर में अक्सर होती ही रहती हैं । किसी ने शिकायत भी नहीं की होगी । लड़के क्योंकर शिकायत करते ? और दारोगा भी सोचता होगा कि मामले में कहीं वही न फंस जाए ।”

मैंने घटना की सत्यता के बारे कुछ लोगों से जानना चाहा । किसी ने कहा कि ऐसी कोई जानकारी उसे नहीं है तो किसी और ने कहा कि उसने भी ऐसी घटना के बारे में सुना । अन्य किसी ने कहा कि ऐसी छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं । पुलिस का रवैया अधिकांशतः अच्छा नहीं रहता यह बात लोग अवश्य मानते दिखे ।

परतंत्र भारत में पुलिस व्यवस्था अंगरेजों ने अपने हित साधने के लिए स्थापित की थी । अतः पुलिस जनों में तब आम लोगों के प्रति सेवाभाव न रहा हो तो बात समझ में आती है । लेकिन स्वतंत्र भारत में दो से अधिक पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी पुलिस-बल उसी ढर्रे पर चल रहा हो तो अपने को तकलीफ तो होती ही है । समाचार माध्यमों में उनके अवैधानिक कारनामों तथा लापरवाही की खबरें छपती रहती हैं।  उनकी मानसिकता कभी बदलेगी क्या ? इस सवाल का जवाब मेरा मन नहीं में ही देता है । – योगेन्द्र जोशी

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“हे भगवन्, अगला जनम मोहे अमरीका में दीजो ।”

सोमबार, 15 अक्टूबर, का दिन है और अभी संध्याकाल का समय है । मैं घर के पास की दवा की दुकान पर पहुंचा हूं । परिचित होने के नाते दवा-विक्रेता से दो-चार मिनट बतियाते हुए काउंटर के एक तरफ खड़ा रहता हूं । तभी एक युवक तेजी से दुकान पर पहुंचता है । दवाविक्रेता से वांछित दवा मांगते हुए वह समाचार देता है, “जानते हो, गोदौलिया और उसके आसपास कर्फ्यू लग गया है ।”

दवाविक्रेता पूछता है, “क्यों ? क्या हो गया वहां ?”

युवक बताता है, “मालूम नहीं है क्या ? आज साधु-संतों  ने प्रतिकार दिवस मनाने का कार्यक्रम रखा था । गोदौलिया क्षेत्र में उनका विरोध-प्रदर्शन चल रहा था । जुलूस लेकर शहर के अन्य जगहों पर पहुंचने का इरादा रहा होगा प्रदर्शनकारियों का । पुलिस ने उनको आगे बढ़ने से रोकना चाहा । बस, क्या था, भगदड़ मच गयी । उपद्रवी लोगों को मौका मिल गया और उतर गये आगजनी और लूटपाट पर ।”

“अभी एक-दो घंटा हो रहा होगा घटना हुए । यहां गोदौलिया से दूर हम लोगों को तुरंत खबर कहां लगती है, वह भी दुकानदारी की व्यस्तता के समय । शहर की ओर से कोई आ रहा हो तो उसी के मुख से सुनने को मिलता है ।” दुकानदार घटना के बारे में अनभिज्ञता जताता है ।

अन्य नगरवासियों की भांति मुझे भी तथाकथित साधु-संतों के प्रतिकार दिवस की पृष्ठभूमि का अंदाजा है । बीते 22 सितंबर को ये साधु-संन्यासी इस मांग को लेकर आंदोलन पर उतर आए थे कि उन्हें गंगाजी में ही मूर्ति-विसर्जन की इजाजत दी जाए । कुछ दिनों पहले गणेशोत्सव मनाया गया था । उस समय गणेश-प्रतिमाओं को गंगाजी में विसर्जित करने पर रोक लगाई गयी थी । गंगाजी में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के मद्देनजर प्रशासन ने उसके जल में मूर्ति-विसर्जन को प्रतिबंधित कर रखा है । आस्था के नाम पर इन साधु-संन्यासियों को वैकल्पिक व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है । शायद उस समय की कुछ प्रतिमाएं अभी विसर्जित होनी हैं । चंद रोज बाद दशहरा-पूजा पर देवी-प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित होंगी, तब उनके विसर्जन की भी समस्या होगी । उस 22 सितंबर को इन लोगों के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था और पुलिस ने भीड़ नियंत्रित करने का वही पुराना तरीका अपनाया था । साधु-संतों पर लाठियां बरसीं थीं और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे । आज की प्रतिकार रैली उस दिन की लाठीचार्ज की घटना के प्रति विरोध दर्ज करने के उद्येश्य से आयोजित थी । प्रायः हर ऐसे मौके पर बात अंत में बिगड़ ही जाती है । मतलब कि इस बार फिर से लाठीचार्ज हुआ ।

मैं उस अपरिचित युवक की ओर मुखातिब होकर पूछता हूं । “भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने लाठियां भांजी होंगी । बेचारी पुलिस करे भी क्या ! भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उसके पास सदा लाठी का ही तो एकमात्र सहारा होता है । और जनता है कि ढेलेबाजी से जवाब देना वह भी नहीं भूलती है ।”

मेरी बात पर सहमत होते हुए युवक कहता है, “पता नहीं इस देश को क्या हो गया है । जब देखो जहां देखो कुछ न कुछ अनिष्ट घटित होता दिख जाएगा । कहीं गोमांस को लेकर लोग आपस में लड़ रहे हैं । कहीं सड़क पर मामूली विवाद पर लोगों का कत्ल हो जा रहा है । कहीं किसी युवती या बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है । कही पुलिस अपनी हिरासत में ही आरोपी को मार डालती है । कभी बात-बात पर रेलगाड़ियां रोक दी जाती हैं, तो कभी सड़क पर वाहनों को आग लगा दी जाती है, और कभी बाजार में लूटपाट शुरू हो जाती है । यह सब उस देश में हो रहा है जहां के लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति और धर्मनिष्ठा का ढिंडोरा पीटने से नहीं अघाते हैं ।”

“अपनी बात में इतना और जोड़ लीजिए कि जनता की सेवा का ढोंग रचने वाले हमारे राजनेताओं ने तो संयत और शिष्ट भाषा न बोलने की कसम खा रखी है । दो-चार दिन में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं । अपने चुनाव अभियान में नेतागण कैसी भाषा बोल रहे हैं ? वे अपने विपक्षियों के विरुद्ध गाली-गलौज की भाषा में आरोप-प्रत्यारोप में जुटे हैं । लोकतंत्र में शालीनता होनी चाहिए कि नहीं ? समाज के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण पेश करते देखा है आपने कभी उनको ?” मैं भी दो शब्द उसकी बातों में जोड़ देता हूं ।

“यही सब देखकर तो मन खिन्न हो जाता है, अंकलजी । समझ में नहीं आता है कि देश के हालात कभी बेहतर भी होंगे ।” उसने मेरी ओर देखकर कहता है । वह मेरी उम्र देखते हुए मुझे ‘अंकलजी’ कहकर संबोधित करता है । पिछले कुछएक दशकों से उम्रदराज आदमियों को अंकल शब्द से पुकारने की परिपाटी समाज में चल चुकी है ।

उसकी खिन्नता मुझे वास्तविक लगती है । मैं खुद भी देश के हालात को निराशाप्रद पाता हूं । मैं उसके कहता हूं, “यह देश सुधरने वाला नहीं है । मैं पचास-एक सालों से देश के हालातों को देखते आ रहा हूं । अवश्य ही देश भौतिक उपलब्धियों के नजरिये से आगे बढ़ा है; लोगों की संपन्नता बढ़ी है, सुख-सुविधा और ऐशो-आराम के साधन बढ़े हैं । लेकिन सामाजिक स्तर पर गिरावट आती गई है । ईमानदारी घटी है, संवेदनशीलता में कमी आई है, आपसी विश्वास पहले जैसा नहीं रहा, लोभ-लालच बहुत बढ़ गया है, असहिष्णुता बढ़ी है, लोग अधिक हिंसक हो चले हैं, और भी बहुत कुछ मेरे देखने में आया है । क्या-क्या बताऊं ?”

“अंकलजी, कभी-कभी मेरा मन होता है कि भगवान से प्रार्थना करूं, ‘हे भगवान, अगले जनम में मुझे अमेरिका में पैदा करना ।’” कहते हुए वह युवक अपनी दवा उठाकर चल देता है । – योगेन्द्र जोशी

 

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चोरी और कमिशन का खेल

          गरमी का मौसम और दोपहर के करीब 2 बजे । चोर थानेदार साहब से मिलने पहुंचता है । इस समय बाहर और थाने में अपेक्षया सुनसानी है । साहब से मिलने का यही समय मुकर्रर हुआ है । साहब चोर को एक ओर आड़ में ले जाते हैं । चोर गुड़ी-मुड़ी हालत में कुछ नोट साहब की हथेली पर रखता है । साहब पूछते हैं, “कितना है ?” जवाब मिलता है, “पांच हजार हुजूर ।”

         “कहां और कितने पर हाथ साफ किया ?” साहब रौब से सवाल दागते हैं ।

जवाब में चोर मोहल्ले का नाम लेता है और उसके भीतर मकान की मोटामाटी स्थिति बताता है । लाखएक के करीब का माल रहा होगा यह भी कहता है ।

“इतने से कैसे काम चलेगा ?” सवाल पूछा जाता है ।

“हुजूर अभी देखना होगा बाजार में क्या मिलता है । और फिर रोज-रोज तो मौके मिलते नहीं । इसी में अपना और परिवार का पेट भी पालना होता है । हमारी मजबूरी भी थोड़ा समझिए, हुजूर !”

          “ठीक है, ठीक है”

          “हजूर तो मैं चलूं ?” कहते हुए वह बाहर आकर अपनी साइकिल  पकड़ता है और चल देता है ।

          एक-डेड़ घंटे के बाद एक महिला थाने में पहुंचती है । अपना परिचय देते हुए मोबाइल मिलाती है और कहती है, “सोनी सा’ब, जरा इनसे बात कर लिजिए ।”

          दूसरी ओर से बोले गए हलो और परिचयात्मक शब्दों को सुनने पर साहब बोलते हैं, “अरे लाल साहब, ठीक-ठाक हैं न ? कहां से बोल रहे हैं ?”

          लाल सा’ब फोन पर थानेदार साहब को वाकये के बारे में बताते हुए उनके पास पहुंची अपनी पत्नी की मदद के लिए निवेदन करते हैं । “ठीक है । मैं देख लूंगा, आप परेशान न हों ।”

          लाल साहब की पत्नी अपने घर में हुई चोरी की घटना के बारे में विस्तार से जानकारी देती हैं और तदनुसार एफआईआर दर्ज कराती हैं । मोहल्ले का नाम सुन साहब का माथा ठनकता है । ये तो वही मोहल्ला है जिसके बाबत अभी ‘वह’ आया था । वे आश्वासन देते हुए कहते हैं, “ठीक है हम तुरंत ही आगे की काररवाही करेंगे । आप निश्चिंत होकर लौटिए । चोर पकड़ में आ ही जाएगा ।”

          महिला वापस चली जाती है । थानेदार साहब सोचने लगते हैं, “लगता है यह मामला वही है जिसके लिए कुछ ही समय पहले उन्हें रकम मिली है । … ठीक है, चोरी का सामान तो उससे वापस दिलाना ही पड़ेगा । आखिर अपनी ही बिरादरी का मामला जो है । और पांच हजार की वह रकम ? हाथ में आ चुकी रकम तो लौटाई नहीं जा सकती है । … ठीक है, उससे अगली बार नहीं लेने का वादा करेंगे । … आखिर उसूल का सवाल है ।”

साहब अपने सिपाही को बुलाते हैं और आगे की काररवाही में जुट जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

(यह कथा वास्तविक घटना पर आधारित नहीं है । यह पूर्णतः काल्पनिक है और आज, 20 अप्रैल, के दैनिक जागरण में छपे ‘मडुवाडीह में दारोगा के मकान में चोरी’ शीर्षक वाले समाचार से प्रेरित होकर लिखी गयी है ।यदि कोई आहत महसूस करे तो उससे क्षमा की प्रार्थना है । क्षमा मांगने पर हर पाप धुल जाता है । अपने देश में आजकल माफी मांगने और माफ करने का कर्मकांड काफी लोकप्रिय हो चला है । – योगेन्द्र जोशी)

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आरोपियों को खोजने के लिए पुलिस के पास तरह-तरह के चश्में होते हैं !!

आजकल टीवी चैनलों पर एक समाचार चर्चा में है । हरियाणा राज्य के एक मंत्री (अब पूर्वमंत्री) पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने एक युवती, जो उनकी विमानन कंपनी की कर्मचारी हुआ करती थी, को आत्महत्या के लिए विवश किया था । तीन दिनों की निष्क्रियता के बाद दिल्ली पुलिस ने उनको हिरासत में लेने के प्रयास आरंभ किए । बारह दिन बीत गये, किंतु पुलिस उनका पता नहीं लगा सकी । अब ‘माननीय’ जनप्रतिनिधि ने खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया है । आरंभ के तीन दिन तक दिल्ली पुलिस ने उनको पकड़ा क्यों नहीं ? क्या उसके प्रयास अभी तक महज दिखावा थे ? ये प्रश्न सहज रूप से मन मैं उठ सकते हैं । इस वाकये को सुनकर मुझे पैंतीस-चालीस साल पहले की एक घटना का स्मरण हो आता है ।

बात तब की है जब पिछली शताब्दि के आठवें दशक के मध्य में (1975 के आसपास) लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आंदोलन चला था और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपात्काल घोषित कर दिया था । तब अनेकों विरोधी राजनेताओं एवं सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की धरपकड़ हुई थी और उन्हें जेल में ठूंस दिया गया था । कई जन बचते-बचाते भूमिगत हो गये, जिनमें से एक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैय्या भी थे, जो उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी थे ।

संक्षेप में बताता चलूं कि रज्जू भैय्या (अविवाहित) इलाहाबाद विश्वविद्यालय के फिजिक्स (भौतिकी) विभाग में अध्यापक हुआ करते थे । सन् 1966 के अंत (या 1967 के आरंभ) में सेवानिवृत्ति लेकर वे रा.स्व.से.संघ के पूर्णकालिक पदाधिकारी हो गये । उन दिनों मैं एम.एससी. प्रीवियस (पूर्वार्ध) में पढ़ता था । आरंभिक कुछ महीने उन्होंने हम छात्रों को भी पढ़ाया था, इसलिए उनका अल्पकालिक सान्निध्य हम लोगों को भी मिला था । आपात्काल के दौरान वे कैसे भूमिगत हुए थे इसका विवरण संध से संबद्ध मेरे एक मित्र ने मुझे कालांतर में बताया था । उसी का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं ।

अपने अध्यापन-काल में रज्जू भैय्या ने बहुत से छात्रों को पढ़ाया था । उनमें से अनेकों आइ.ए.एस., आइ.पी.एस. स्तर के अधिकारी बनकर प्रशासनिक तंत्र में शामिल हो चुके थे । वे सभी रज्जू भैय्या का सम्मान करते थे । आपात्काल के दौरान जब रज्जू भैय्या भी उस जमात में सम्मिलित थे जो ‘इंदिरा-राज’ की खिलाफत कर रहा था, तो उनको भी सलाखों के पीछे भेजने की कोशिश होने लगी । पुलिस को अपना फर्ज निभाना था । परंतु उसी पुलिस बल में एक उच्च अधिकारी भी थे जो उनको बचाना चाहते थे, एक पूर्व-छात्र होने के नाते । वे उन्हें चुपचाप अपने आवास पर लिवा लाये, ताकि वे वहां सुरक्षित रह सकें । जो पुलिस बल रसूखदार नागरिकों के घर खंगालने की हिम्मत नहीं करती वह भला अपने ही उच्च अधिकारी के यहां छापा कैसे मार सकती है ? लिहाजा रज्जू भैय्या ने आपात्काल के दिन चैन से वहां बिताए ।

मेरे मित्र के द्वारा बताए गए इस वाकये में कितनी सत्यता है इस बारे में मैं दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता । वे संघ के कार्यकर्ता थे और उन्हें वहां की जानकारी रहा करती थी । उनके कहे शब्दों में विश्वास करने का यही मेरा कारण है । ऐसी घटनाएं अक्सर सुनने में आ जाती हैं जिनमें रसूखदार व्यक्ति पुलिस की पकड़ से बचा रहता है । क्या वे पकड़े ही नहीं जा सकते हैं, या जानबूझकर उन्हें पकड़ा नहीं जाता है, यह कहते हुए कि उनका पता नहीं चल पा रहा है ?

पुलिस की कार्यप्रणाली देख मुझे यही लगता है कि आरोपियों को खोजने के लिए पुलिस के पास तरह-तरह के चश्में रहा करते हैं । एक चश्मा ऐसा होता है जिसे पहन लेने पर निरपराध भी अपराधी नजर आने लगता है, और ऐसा ‘अपराधी’ जेल की हवा खाने को मजबूर हो जाता है । दूसरी तरफ ऐसा चश्मा भी होता है जिसे पहनने पर सभी नजर आते हैं, सामने खड़े आरोपी को छोड़कर । कुछ चश्मों से बहुत धुंधला दिखता है तो किसी से बहुत देर बाद । पुलिस मौके की नजाकत के हिसाब से ‘सही’ चश्मा पहनने की आदी होती है ।

तरह-तरह के चश्में पुलिस बल के !! – योगेन्द्र जोशी

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कक्षा पांच तो पास हो गए, पर अक्षरज्ञान नहीं!

कुछ लोगों का मत है कि अपना देश भगवान भरोसे है । अगर देश सचमुच में भगवान भरोसे है और देश के हालात इतने पतले हैं तो मैं यही कहूंगा कि भगवान भी कितना क्रूर है कि देशवासी उस पर भरोसा करें, किंतु वह है कि उनकी कोई चिंता न करे । कुछ तो उसे रहम करना ही चाहिए । भगवान वास्तव में देश को भूल चुका है इसका अहसास तो मुझे पग-पग पर होता ही रहता है, और इसलिए उस पर मेरा भरोसा सालों पहले ही उठ चुका । किंतु एक ताजा अनुभव ने फिर याद दिला दी कि इस देश के साथ वह कैसे-कैसे मजाक कर डालता है । आप भी सुनिए मेरे हालिया अनुभव के बारे में ।

मेरी धर्मपत्नीजी शिक्षिका रही हैं; अब सेवानिवृत्त हैं । हाल ही में उनका मन हुआ कि शिक्षण के अपने पुराने शौक पर दुबारा हाथ आजमाया जाए, अनौपचारिक रूप से । मेरे सामने उन्होंने अपने इरादे पेश किए, “मैं सोच रही हूं कि पड़ोस में रहने वाले प्राइमरी या जूनियर स्तर के दो-चार गरीब बच्चों को घंटा-दोघंटा पढ़ा दिया जाए । तुम्हारा क्या खयाल है ?”

“नेकी और पूछ-पूछ? भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है? कब, कैसे और कितना समय निकाल पाओगी यह तो तुम्हें सोचना है ।” मेरा जवाब था । किसी का कुछ भला हो जाए तो अच्छा ही होगा यह मेरा भी मानना था । मैं स्वयं यह कार्य नहीं कर रहा था, क्योंकि मैं अपना समय-यापन अन्य प्रकार से करता आ रहा था ।

उनका विचार था कि वे केवल लड़कियों को पढ़ाएंगी । लड़के पढ़ लें यह कोशिश तो प्रायः हर शहरी परिवार करने लगा है, लेकिन लड़कियों के मामले में उनका रवैया ढीलाढाला ही देखने में आता है । उन्होंने पास ही रहने वाली एक लड़की को संदेश भिजवा डाला कि अगर वह पढ़ना चाहे तो घर पर आ जाया करे । सुविधानुसार समय भी निश्चित कर लिया गया । वह सरकारी स्कूल की सातवीं कक्षा में पढ़ती थी, परंतु उसका स्तर कक्षा के अनुरूप नहीं था । खैर, उसकी पढ़ाई आरंभ हो गई और वह नियमित आने लगी ।

तीन-चार दिन बीते होंगे कि उससे छोटी एक लड़की घर पर पहुंची और बोली, “आंटी, आप मुझे भी पढ़ाएंगी क्या ?”

“ठीक है, आ जाना, तुम्हें भी पढ़ा दूंगी ।” पत्नी महोदया ने जवाब दिया । उसे दिन के कितने बजे आना है यह भी बता दिया गया ।

अगले दिन वह अपने साथ अन्य दो-तीन लड़कियों को लेकर पहुंच गयी । वे सभी न तो एक ही विद्यालय में पढ़ती थीं और न ही एक ही कक्षा में । कोई हिंदी माध्यम के सरकारी विद्यालय में पढ़ रही थी तो कोई आसपास के ‘अंग्रेजी मीडियम‘ स्कूल में । यहां पर यह बता दूं कि इन बच्चों में से किसी के भी मां-बाप हाईस्कूल से अधिक शिक्षित नहीं हैं । उनसे एक पीढ़ी पहले के लोग तो निपट अनपढ़ रहे । अवश्य ही यह संतोेष की बात थी कि शिक्षा के प्रति वे जागरूक हो रहे थे ।

खैर, अपनी ‘शिक्षिका’ जी किसी को लेखन-पठन का कार्य सोंपकर तो अन्य को उसकी किताबों के अनुसार हिंदी-अंग्रेजी एवं गणित के पाठ पढ़ाकर कार्य संपादन करने लगीं । कक्षा सात की जिस लड़की से कार्यारंभ हुआ था उसने कालांतर में आना बंद कर दिया । दूसरी तरफ प्राथमिक स्तर की जो बच्चियां आ रही थीं उनके साथ दो लड़के और जुड़ गये । वे भी स्वीकार कर लिए गये, यद्यपि आरंभिक योजना लड़कियों के लिए बनाई गई थी । अस्तु, किसी प्रकार कार्य चलने लगा । तब से अब तक ग्रीष्मकालीन एक महीना बीत चुका है । बच्चों का उत्साह अभी बरकरार है

अभी तक मैंने उक्त प्रकरण के रोचक पहलू का जिक्र नहीं किया है । उसे बताता हूं । इन बच्चों में एक लड़की है जिसको अपने विद्यालय से चंद रोज पहले ही परीक्षा परिणाम प्राप्त हुआ है । पता चला कि उसने कक्षा पांच की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है । क्या सचमुच में ? यह जानने के लिए हमने उससे ‘रिपोर्ट कार्ड’ मंगवाया । अधिकतम 1100 अंकों में से 577 – द्वितीय श्रेणी । हमारा मन विश्वास करने को तैयार तो नहीं था, लेकिन दस्तावेज तो यही बता रहा था ! विश्वास न करने का कारण ? क्योंकि उसे अक्षरज्ञान नहीं के बराबर था । हालत यह थी कि उससे ‘ह’ लिखने को कहें तो कभी सही लिख जाए तो कभी गलत । और अपने ही लिखे अक्षर को पढ़ने के लिए कहें तो कभी सही पढ़ जाए तो कभी गलत । यदि किताब में छपे वाक्यों को हूबहू उतारने में वह माहिर थी । मतलब यह कि नकल तो वह कर लेती थी, पर नकल किए जा रहे पाठ की सही पहचान और उसका उच्चारण उसे मालूम नहीं था ।

मैंने सुना है कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों में कक्षा एक से चार तक इम्तहान नहीं होते हैं और सभी को हर कक्षा से प्रोन्नत कर दिया जाता है । किंतु कक्षा पांच की तो परीक्षा होती ही है । और उसकी यह हालत ? मेरी इन बातों पर आप विश्वास नहीं करना चाहेंगे, लेकिन मैं झूठ नहीं कह रहा ।

सचमुच में यह देश भगवान भरोसे है । – योगेन्द्र जोशी

 

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