Category Archives: भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक – शिक्षकों के वेतन से वसूली

हाल के नोटबंदी के निर्णय के बाबत केंद्र सरकार ने दावा किथा था कि इससे भ्रष्टाचार रोकना संभव होगा। तब से मैं सोच रहा हूं कि जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के आचरण का अभिन्न अंग बन चुका हो तब उससे कैसे मुक्ति मिल सकती है। अवश्य ही उपयुक्त कानून के तहत भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, बशर्ते कि उसका भ्रष्ट कृत्य पकड़ में आ जाए। लेकिन उससे क्या व्यक्ति भ्रष्ट मानसिकता से मुक्त हो जाता है? अपनी भ्रष्ट लिप्सा की पूर्ति के लिए वह उपयुक्त अवसरों की तलाश जारी रखेगा ही ऐसा मेरा मत है। इस विषय पर मेरा चिंतन-मनन चल ही रहा था कि एक दिन संयोगवश मेरी भेंट एक महिला रिश्तेदार से हो गयी। उन्होंने जो कहा उससे मेरा इतना ज्ञानवर्धन तो हो ही गया कि जब भ्रष्टाचार के एक रूप पर रोक लगती है तो वह दूसरे रूप में अवतरित हो जाता है। समाज में जब तक असीमित लोभ-लालच वाले लोगों की सुलभता बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार को उपजाऊ भूमि की कमी नहीं रहेगी। पेश है महिला रिश्तेदार से वार्तालाप एक लघुकथा के रूप में।   

मैं कार्यवशात् उन महिला के शहर गया था। रिश्तेदार होने के नाते मैं मिलने के लिए उनसे घर पहुंच गया था। मैंने उनसे पूछा, “अब तो बच्चे बड़े हो गये होंगे। अपना समय-यापन कैसे करती हैं?”

उन्होंने कहा, “पिछले तीन-चार साल से मैं एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रही हूं। मैं काम के लिए घर से अधिक दूर जाने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए पास ही के एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली।”

“सरकारी है या निजी आपकी शिक्षण संस्था?” मैंने जानना चाहा।

उनका उत्तर था, “है तो निजी किंतु सरकारी अनुदान मिलता है विद्यालय को।”

“तब तो कई मामलों में सरकारी नियम-कानून लागू होते होंगे और तनख्वाह ठीक-ठाक मिलती होगी।”

“हां, कागजों में तो सब ठीक रहता है लेकिन हकीकत में नहीं।”

“क्या मतलब?” मैंने जिज्ञासा प्रकट की।

“देखिए तनख्वाह तो मुझे लगभग 25000 रुपया मिलती है और वह मेरे बैंक खाते में जमा भी हो जाती है। लेकिन मुझसे करीब आधी वसूल भी ली जाती है। … इस हाथ से दिया और उस हाथ से ले लिया।”

कुछ क्षणों के लिए मैं उनकी ओर जिज्ञासु दृष्टि से देखता रहा; फिर बोला, “मैं आपका कहना ठीक से समझ नहीं पाया। क्या ऐसा आपके ही साथ हो रहा है या …।”

वे बीच में बोल पड़ीं, “न, न; सभी के साथ यही है, क्या शिक्षक-शिक्षिका और क्या चपरासी। दरअसल हमारी प्रधानाध्यापिका के पति ही विद्यालय चलाते हैं और उन्हीं के परिवार के लोग प्रबंधन आदि में शामिल हैं। प्रबंधन कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाता है। इसलिए हम लोगों का वेतन बैंक खातों में पहुंच जाता है। प्रधानाध्यपिका हमसे कहती हैं कि खाते से लगभग आधा वेतन निकालकर उनके हाथ में सौंप दें। उनका कहना होता है कि विद्यालय के विकास-कार्यों के लिए धन जुटाना जरूरी है। यही तरीका उन्होंने अपना रखा है। कितना विकास के लिए है और कितना उनकी जेब के लिए यह बता पाना मुश्किल है।”

“आप लोग शिकायत नहीं करते?” मैंने पूछा।

“किससे शिकायत करें? किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकाल देंगी। हरएक की अपनी-अपनी विवशता है। इसलिए सभी चुप रहते हैं।”

इस विषय पर आगे कुछ पूछना निरर्थक था। मेरे लिए उनके अनुभव की जानकारी काफी थी यह समझने के लिए कि भ्रष्टाचारी तो अपना काम किसी न किसी रास्ते निकाल ही लेगा। जिसका अंतकरण ही उसे न रोके उसे कोई क्या रोकेगा। इसलिए देश में भ्रष्टाचार है और आगे भी बना रहेगा। – योगेन्द्र जोशी

 

 

Advertisements

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, भ्रष्टाचार, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, corruption, experience, Hindi literature, Short Stories, society, Story

नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under administration, अनुभव, प्रशासन, भ्रष्टाचार, समाज, corruption, experience, politics, society

नोटबंदी के बाद लाला को मिला मुफ़्त का पैसा

टिप्पणी: यह लघुकथा साहित्य शिल्पी नामक ई-पत्रिका में छ्प चुकी है (दिनांक 2016-11-29)| आम तौर पर मैं अपने अनुभवों को लघुकथा के रूप में ढ़ालकर इस चिट्ठे पर पेश करता हूं, लेकिन यह पूर्णतः काल्पनिक है, सामयिक घटना पर आधारित।

मैं घर के पास की दुकान से घर के लिए रोजमर्रा का जरूरी सामान लेकर आ रहा था। सामने से मुरारीलाल साइकिल से आते दिख गया। मैं रुक गया। जैसे ही वह नजदीक पहुंचा मैंने उसे रोकने के लिए आवाज दी, “अरे ओ लाला!”

उसने अपनी दायीं ओर नजर घुमाई और मुझे देखकर साइकिल रोकते हुए पास आ गया। मैंने टोका, “अरे लाला, इतनी तेजी से कहां से आ रहे हो? जरा आजू-बाजू भी देख लिया करो। कभी-कभी हमारे जैसे परिचित, यार-दोस्त, राह में बतियाने के लिए खड़े मिल जाते हैं।”

उसने जवाब दिया, “बैंक से आ रहा हूं। हजार-पांचसौ के कुछ नोट जमा करने थे। बहुत भीड़ थी, तीन-चार घंटे लग गये। सुबह का घर से निकला हूं, बिना चाय-नास्ते के, इसलिए पहुंचने की जल्दी थी।”

“चाय-नास्ते के बिना दम निकला जा रहा हो तो चलो मेरे साथ; मैं चाय पिलाता हूं। दो कदम की दूरी पर ही तो मेरा घर है।” मैंने कहा।

वह साथ हो लिया। मैंने चुटकी ली, “बड़े छिपे रुस्तम निकले, भई। हम तो तुम्हें कंगाल समझते थे। तुम तो घर में नोटों की गड्ढी छिपाए पड़े हो यह आज पता चला। पुराने नोट बंद क्या हुए कि लोगों के घरों से जमा नोट निकलने लगे।”

“नहीं यार, अपनी किस्मत कहां जो घर में नोट जमा हों”

“तो फिर कहीं डांका डाले थे क्या? या कहीं कूड़े में मिल गये थे?”

“नहीं भई। बस किसी ने दान में दे दिए समझो।”

“पहेली मत बुझाओ; साफ-साफ बताओ कहां से पा गए नोट?”

“बताता हूं … बताता हूं क्या हुआ। तुम तो मेरे चचेरे भाई, जीवनलाल जी को जानते ही हो। वैसे तो वे उधार में भी पैसा देने से किसी न किसी बहाने बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन कल शाम एक लाख के पुराने नोट लेकर पहुंच गये घर पर और बोले, ‘मुरारी मेरा एक काम करो। ये पैसा लो और अपने बैंक खाते में जमा कर लो। डेड़-दो साल बाद आधा मुझे दे देना और आधा तुम रख लेना।’ मैंने उनकी बात मान ली। गरीब को पचास हजार रुपये मिल रहे हों तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।” उसने मुझे समझाया।

अब तक हम घर पर पहुंच चुके थे। घर में दाखिल होते हुए मैंने श्रीमती जी को आवाज दी और मुरारीलाल को चाय-वाय पिलाने का अनुरोध किया। फिर मुरारी की तरफ़ मुखातिब होते हुए कहा, “आज तक तुम्हारे खाते में तनख्वाह के अलावा कभी एक धेला भी जमा नहीं हुआ होगा। इस बार उसमें अनायास एक लाख की रकम जमा हो गयी। बदकिस्मती से अगर कोई राजस्व अधिकारी पूछ बैठे कि यह रकम कहां से आई तब क्या स्पष्टीकरण देना होगा इसे भी सोच लेना।”

मुरारीलाल का चेहरा देख मुझे लगा कि वह गंभीर सोच में पड़ गया है।  – योगेन्द्र जोशी

 

Tags:

 

1 टिप्पणी

Filed under कहानी, भ्रष्टाचार, लघुकथा, वित्त, हिंदी साहित्य, corruption, Finance, Hindi literature, Short Stories, Story

दारोगा की धुनाई

चंद रोज पहले टीवी के किसी चैनल पर पंजाब राज्य के पुलिस बल से जुड़ा एक समाचार देखने-सुनने को मिला । चैनल पर दिखाए गये वीडियो क्लिप में पुलिस के दो-तीन जवान एक युवक को बेरहमी से पीटते नजर आ रहे थे । उस आम युवक – जाहिर है कि वह कोई “खास श्रेणी” का रसूखदार व्यक्ति नहीं था – की गलती यह थी कि वह अपने किसी मित्र की उन पुलिसवालों के साथ हो रही बहस की वीडियो क्लिप मोबाइल पर रिकार्ड कर रहा था । पुलिस के जवानों की नजर जब उस पर पड़ी तो उन्हें उसकी हरकत किसी “अपराध” से कम नहीं लगी । उन्होंने उसका मोबाइल छीनकर वीडियो रिकाडिंग मिटा दी और “कानून की मर्यादा बनाए रखने” तथा सबक सिखाने के लिए उसकी पिटाई भी कर दी । वे मोबाइल अपने साथ ले गए कि नहीं यह मुझे स्पष्ट नहीं हो सका । उनको शायद यह पता नहीं रहा होगा कि पास के एक दुकान का सीसीटीवी कैमरा घटना की रिकार्डिंग कर रहा है ।

उसी दिन पुलिस बल से जुड़ी दूसरी घटना के समाचार की भी जानकारी मिली । महाराष्ट्र राज्य से संबंधित उस समाचार के अनुसार तीन पुलिस वाले अर्धरात्रि के समय मिठाई की उस समय बंद एक दुकान में घुस गये ताला तोड़कर । और “संवेदनशीलता का परिचय देते हुए” उन्होंने वहां सो रहे कर्मचारियों की तबियत से मरम्मत की । समाचार में बताया गया कि वे दुकान के किसी कर्मचारी से खफा थे ।

इन दो समाचारों ने मुझे लगभग उसी समय की एक स्थानीय घटना की याद दिला दी । मैं घर के पास की सब्जीसट्टी पर सब्जियां और फल खरीदने गया था । वहां एक पेड़ के नीचे एक सब्जी विक्रेता जमीन पर सब्जियों की ढेरियां लगाकर बेच रहा था । मैं खरीदफरोख्त करने लगा । इसी दौरान ठेले पर भूरे जटाधारी नारियल (पुष्ट लेकिन पानी वाले) बेच रहा एक आदमी उसके पास पहुंचा और बोला, “कल खूब धुनाई हुई उसकी ।”

सब्जी वाला उस घटना से पहले से ही वाकिफ रहा होगा जिसके संदंर्भ में उक्त बात कही होगी । उस नारियल वाले से मैं भी यदाकदा नारियल खरीदा करता हूं और उस नजर से देखें तो वह एक प्रकार से मेरा भी परिचित था, सीमित अर्थ में ही सही । मुझे घटना के बारे में जिज्ञासा हुई, अतः मैंने उससे पूछा, “क्यों, क्या हुआ, किसकी धुनाई हो गई ?”

“अरे कुछ नहीं … । आजकल एक दारोगा इस सड़क पर गस्त लगाता है । उसी की धुनाई कर दी कुछ लड़कों ने ।”  उसने जवाब दिया ।

“आखिर मामला क्या था, क्या बात हो गई थी ।” मैंने पूछा ।

“दो-तीन रोज पहले उसने बी.एच.यू. (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) में पढ़ने वाले एक लड़के को किसी बहाने पीट दिया और उसका मोबाइल भी छीन लिया । वह लड़का जब बाद में बी.एच.यू. गया और उसने अपने दोस्तों को घटना के बारे में बताया तो उन्होंने तय किया कि दारोगा को सबक सिखाया जाए । तय हुआ कि वह लड़का उसी इलाके में जाए और देखे कि उससे फिर से सामना हो जाए । तब वह दोस्तों को खबर कर दे । कल 25-30 की संख्या में जुटकर वे लोग अपनी योजना में सफल हो गये । उन्होंने दारोगा की पिटाई कर दी ।”

“लेकिन अखबार में तो इस बारे में कोई खबर नहीं आई ।” मैंने घटना के प्रति शंका जताई ।

“अखबार में हर बारदात के बारे में थोड़े ही छपता है । कोई बहुत बड़ी घटना तो थी नहीं । ऐसी बातें तो शहर में अक्सर होती ही रहती हैं । किसी ने शिकायत भी नहीं की होगी । लड़के क्योंकर शिकायत करते ? और दारोगा भी सोचता होगा कि मामले में कहीं वही न फंस जाए ।”

मैंने घटना की सत्यता के बारे कुछ लोगों से जानना चाहा । किसी ने कहा कि ऐसी कोई जानकारी उसे नहीं है तो किसी और ने कहा कि उसने भी ऐसी घटना के बारे में सुना । अन्य किसी ने कहा कि ऐसी छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं । पुलिस का रवैया अधिकांशतः अच्छा नहीं रहता यह बात लोग अवश्य मानते दिखे ।

परतंत्र भारत में पुलिस व्यवस्था अंगरेजों ने अपने हित साधने के लिए स्थापित की थी । अतः पुलिस जनों में तब आम लोगों के प्रति सेवाभाव न रहा हो तो बात समझ में आती है । लेकिन स्वतंत्र भारत में दो से अधिक पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी पुलिस-बल उसी ढर्रे पर चल रहा हो तो अपने को तकलीफ तो होती ही है । समाचार माध्यमों में उनके अवैधानिक कारनामों तथा लापरवाही की खबरें छपती रहती हैं।  उनकी मानसिकता कभी बदलेगी क्या ? इस सवाल का जवाब मेरा मन नहीं में ही देता है । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under कहानी, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, corruption, Hindi literature, Short Stories, Story, Uncategorized

चोरी और कमिशन का खेल

          गरमी का मौसम और दोपहर के करीब 2 बजे । चोर थानेदार साहब से मिलने पहुंचता है । इस समय बाहर और थाने में अपेक्षया सुनसानी है । साहब से मिलने का यही समय मुकर्रर हुआ है । साहब चोर को एक ओर आड़ में ले जाते हैं । चोर गुड़ी-मुड़ी हालत में कुछ नोट साहब की हथेली पर रखता है । साहब पूछते हैं, “कितना है ?” जवाब मिलता है, “पांच हजार हुजूर ।”

         “कहां और कितने पर हाथ साफ किया ?” साहब रौब से सवाल दागते हैं ।

जवाब में चोर मोहल्ले का नाम लेता है और उसके भीतर मकान की मोटामाटी स्थिति बताता है । लाखएक के करीब का माल रहा होगा यह भी कहता है ।

“इतने से कैसे काम चलेगा ?” सवाल पूछा जाता है ।

“हुजूर अभी देखना होगा बाजार में क्या मिलता है । और फिर रोज-रोज तो मौके मिलते नहीं । इसी में अपना और परिवार का पेट भी पालना होता है । हमारी मजबूरी भी थोड़ा समझिए, हुजूर !”

          “ठीक है, ठीक है”

          “हजूर तो मैं चलूं ?” कहते हुए वह बाहर आकर अपनी साइकिल  पकड़ता है और चल देता है ।

          एक-डेड़ घंटे के बाद एक महिला थाने में पहुंचती है । अपना परिचय देते हुए मोबाइल मिलाती है और कहती है, “सोनी सा’ब, जरा इनसे बात कर लिजिए ।”

          दूसरी ओर से बोले गए हलो और परिचयात्मक शब्दों को सुनने पर साहब बोलते हैं, “अरे लाल साहब, ठीक-ठाक हैं न ? कहां से बोल रहे हैं ?”

          लाल सा’ब फोन पर थानेदार साहब को वाकये के बारे में बताते हुए उनके पास पहुंची अपनी पत्नी की मदद के लिए निवेदन करते हैं । “ठीक है । मैं देख लूंगा, आप परेशान न हों ।”

          लाल साहब की पत्नी अपने घर में हुई चोरी की घटना के बारे में विस्तार से जानकारी देती हैं और तदनुसार एफआईआर दर्ज कराती हैं । मोहल्ले का नाम सुन साहब का माथा ठनकता है । ये तो वही मोहल्ला है जिसके बाबत अभी ‘वह’ आया था । वे आश्वासन देते हुए कहते हैं, “ठीक है हम तुरंत ही आगे की काररवाही करेंगे । आप निश्चिंत होकर लौटिए । चोर पकड़ में आ ही जाएगा ।”

          महिला वापस चली जाती है । थानेदार साहब सोचने लगते हैं, “लगता है यह मामला वही है जिसके लिए कुछ ही समय पहले उन्हें रकम मिली है । … ठीक है, चोरी का सामान तो उससे वापस दिलाना ही पड़ेगा । आखिर अपनी ही बिरादरी का मामला जो है । और पांच हजार की वह रकम ? हाथ में आ चुकी रकम तो लौटाई नहीं जा सकती है । … ठीक है, उससे अगली बार नहीं लेने का वादा करेंगे । … आखिर उसूल का सवाल है ।”

साहब अपने सिपाही को बुलाते हैं और आगे की काररवाही में जुट जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

(यह कथा वास्तविक घटना पर आधारित नहीं है । यह पूर्णतः काल्पनिक है और आज, 20 अप्रैल, के दैनिक जागरण में छपे ‘मडुवाडीह में दारोगा के मकान में चोरी’ शीर्षक वाले समाचार से प्रेरित होकर लिखी गयी है ।यदि कोई आहत महसूस करे तो उससे क्षमा की प्रार्थना है । क्षमा मांगने पर हर पाप धुल जाता है । अपने देश में आजकल माफी मांगने और माफ करने का कर्मकांड काफी लोकप्रिय हो चला है । – योगेन्द्र जोशी)

3 टिप्पणियाँ

Filed under कहानी, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, corruption, Hindi literature, Short Stories

असेम्बली बिल्डिंग और डाइनामाइट और …

बीते अगस्त माह के प्रथम सप्ताह मैं सपत्नीक दिल्ली में था । उन दिनों दिल्ली में पर्याप्त वर्षा हो रही थी, लिहाजा वहां की सड़कों के निचले हिस्सों में भारी जलजमाव की स्थिति पैदा हो रही थी । जलजमाव के कारण सड़कों पर यातायात जाम की समस्या तो थी ही, साथ में कुछ जगहों पर वाहनों के पानी में फंस जाने की भी नौबत आ रही थी । यों बरसात के मौसम में इस प्रकार की समस्याएं अपने देश के अधिकांश बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं ।

दो या तीन तारीख की बात होगी, जब हमें दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में अवस्थित घंटाघर इलाके से पूर्वी छोर पर नौइडा से सटे मयूरबिहार जाना था । इन जगहों के बीच कोई बीस-पच्चीस किलोमीटर की दूरी होगी । लोगबाग आम दिनों यह दूरी बस या आटोरिक्शा से तय करते हैं । हमने भी आटोरिक्शे से जाने का विचार किया, लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी इस लंबी दूरी के लिए तैयार नहीं हुआ । सबको यही डर था कि कहीं फंस गये तो घर वापस लौटना भी मुश्किल हो जाएगा । कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहता था । हार मानकर हमने टैक्सी वाले से संपर्क साधा और उसी से चल पड़े । आटो की तुलना में करीब ढाई गुना किराया देना पड़ा । करते भी क्या, जाना जरूरी जो था । साथ में अटैची-बैग होने के कारण बस-सेवा लेने की भी हिम्मत नहीं थी ।

बताई गयी दूरी को तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लग गया । समय बिताने के लिए हमने टैक्सी वाले से ही गपशप शुरू कर दी । हमने दिल्ली की सड़कों, जलजमाव और ट्रैफिक जाम को ही बातचीत का विषय चुना । उसने विस्तार से तकलीफदेह हालातों की जानकारी दी । अपना असंतोष व्यक्त करते-करते वह कहने लगा, “यह सब आज के राजनेताओं की करतूत है जी । सभी भ्रष्टाचार के नाले में डुबकी लगा रहे हैं, उन्हें अपना घर भरने और भाई-भतीजों, यार-दोस्तों को लाभ पहुंचाने से मतलब । खुद ईमानदार होते तो सरकारी आफिसरों पर भी अंकुश रखते । राजनेता-अधिकारी दोनों ही लूट मचाए हैं । इसीलिए न सड़कें टिक पाती हैं, और न ही उनमें जमा पानी की कारगर निकासी हो पाती है । राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती हैं जरूर, लेकिन हैं सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे ।”

मैंने उससे सहमति जताते हुए कहा, “बात तो आप सही कह रहे हैं । इन लोगों को देश की चिंता नहीं; इनकी असली चिंता तो सत्ता हथियाने और उसका भरपूर फायदा उठाने की है । पूरे देश में कमोबेश यही हाल है । इस देश का भगवान ही मालिक है !!”

“एक बात कहूं सा’ब ?”

“जरूर कहिए; आखिर रास्ता जो तय करना है । चुपचाप बैठे रहने से बेहतर है बातचीत चलती रहे ।”

“इधर दिल्ली में एक नयी असेम्बली बिल्डिंग बनने की खबर है … ”

“अच्छा है, एक और मौका मिलेगा धांधली करने का । बिल्डिंग बनेगी तो बनते-बनते गिर भी पड़ेगी ।” मैंने चुटकी ली ।

“वह तो है ही । लेकिन कोई भरोसा नहीं इन लोगों का । हो सकता है मजबूत ही बनवा लें । आखिर उसमें इन्हीं लोगों की बिरादरी बैठेगी न; कोई गरीब जनता के लिए थोड़े ही बनेगी कि जो कमजोर बनने देंगे ।” उसका जवाब था ।

“हां, ये बात भी सही है ।”

“मैं सोचता हूं, सा’ब, कि कोई उस बिल्डिंग के नीचे नींव में डाइनामाइट फिट कर देता । जिस दिन इनॉग्युरेशन (उद्‌घाटन) होता और ढेरों राजनेता उसमें बैठे रहते, उसे उड़ा दिया जाता । अपने आप मरते सब स्सा…”

उसकी बातें सुनकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि बदले में मैं क्या बोलूं । इतना मुझे जरूर लग रहा था कि उसके मन में आज के राजनेताओं के प्रति नफरत भरी हुई है । उसकी इस बात पर हम चुप ही रहे । वह अपनी बातें कहते रहा ।

आज राजनेताओं की साख किस कदर गिर चुकी है और लोग उनके प्रति कितना रुष्ट हैं, मुझे इन बातों का अंदाजा उस आदमी की बातों से लग रहा था । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under कहानी, किस्सा, भ्रष्टाचार, राजनिति, लघुकथा, शासन, हिंदी साहित्य, corruption, Hindi literature, politics, Short Stories

कक्षा पांच तो पास हो गए, पर अक्षरज्ञान नहीं!

कुछ लोगों का मत है कि अपना देश भगवान भरोसे है । अगर देश सचमुच में भगवान भरोसे है और देश के हालात इतने पतले हैं तो मैं यही कहूंगा कि भगवान भी कितना क्रूर है कि देशवासी उस पर भरोसा करें, किंतु वह है कि उनकी कोई चिंता न करे । कुछ तो उसे रहम करना ही चाहिए । भगवान वास्तव में देश को भूल चुका है इसका अहसास तो मुझे पग-पग पर होता ही रहता है, और इसलिए उस पर मेरा भरोसा सालों पहले ही उठ चुका । किंतु एक ताजा अनुभव ने फिर याद दिला दी कि इस देश के साथ वह कैसे-कैसे मजाक कर डालता है । आप भी सुनिए मेरे हालिया अनुभव के बारे में ।

मेरी धर्मपत्नीजी शिक्षिका रही हैं; अब सेवानिवृत्त हैं । हाल ही में उनका मन हुआ कि शिक्षण के अपने पुराने शौक पर दुबारा हाथ आजमाया जाए, अनौपचारिक रूप से । मेरे सामने उन्होंने अपने इरादे पेश किए, “मैं सोच रही हूं कि पड़ोस में रहने वाले प्राइमरी या जूनियर स्तर के दो-चार गरीब बच्चों को घंटा-दोघंटा पढ़ा दिया जाए । तुम्हारा क्या खयाल है ?”

“नेकी और पूछ-पूछ? भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है? कब, कैसे और कितना समय निकाल पाओगी यह तो तुम्हें सोचना है ।” मेरा जवाब था । किसी का कुछ भला हो जाए तो अच्छा ही होगा यह मेरा भी मानना था । मैं स्वयं यह कार्य नहीं कर रहा था, क्योंकि मैं अपना समय-यापन अन्य प्रकार से करता आ रहा था ।

उनका विचार था कि वे केवल लड़कियों को पढ़ाएंगी । लड़के पढ़ लें यह कोशिश तो प्रायः हर शहरी परिवार करने लगा है, लेकिन लड़कियों के मामले में उनका रवैया ढीलाढाला ही देखने में आता है । उन्होंने पास ही रहने वाली एक लड़की को संदेश भिजवा डाला कि अगर वह पढ़ना चाहे तो घर पर आ जाया करे । सुविधानुसार समय भी निश्चित कर लिया गया । वह सरकारी स्कूल की सातवीं कक्षा में पढ़ती थी, परंतु उसका स्तर कक्षा के अनुरूप नहीं था । खैर, उसकी पढ़ाई आरंभ हो गई और वह नियमित आने लगी ।

तीन-चार दिन बीते होंगे कि उससे छोटी एक लड़की घर पर पहुंची और बोली, “आंटी, आप मुझे भी पढ़ाएंगी क्या ?”

“ठीक है, आ जाना, तुम्हें भी पढ़ा दूंगी ।” पत्नी महोदया ने जवाब दिया । उसे दिन के कितने बजे आना है यह भी बता दिया गया ।

अगले दिन वह अपने साथ अन्य दो-तीन लड़कियों को लेकर पहुंच गयी । वे सभी न तो एक ही विद्यालय में पढ़ती थीं और न ही एक ही कक्षा में । कोई हिंदी माध्यम के सरकारी विद्यालय में पढ़ रही थी तो कोई आसपास के ‘अंग्रेजी मीडियम‘ स्कूल में । यहां पर यह बता दूं कि इन बच्चों में से किसी के भी मां-बाप हाईस्कूल से अधिक शिक्षित नहीं हैं । उनसे एक पीढ़ी पहले के लोग तो निपट अनपढ़ रहे । अवश्य ही यह संतोेष की बात थी कि शिक्षा के प्रति वे जागरूक हो रहे थे ।

खैर, अपनी ‘शिक्षिका’ जी किसी को लेखन-पठन का कार्य सोंपकर तो अन्य को उसकी किताबों के अनुसार हिंदी-अंग्रेजी एवं गणित के पाठ पढ़ाकर कार्य संपादन करने लगीं । कक्षा सात की जिस लड़की से कार्यारंभ हुआ था उसने कालांतर में आना बंद कर दिया । दूसरी तरफ प्राथमिक स्तर की जो बच्चियां आ रही थीं उनके साथ दो लड़के और जुड़ गये । वे भी स्वीकार कर लिए गये, यद्यपि आरंभिक योजना लड़कियों के लिए बनाई गई थी । अस्तु, किसी प्रकार कार्य चलने लगा । तब से अब तक ग्रीष्मकालीन एक महीना बीत चुका है । बच्चों का उत्साह अभी बरकरार है

अभी तक मैंने उक्त प्रकरण के रोचक पहलू का जिक्र नहीं किया है । उसे बताता हूं । इन बच्चों में एक लड़की है जिसको अपने विद्यालय से चंद रोज पहले ही परीक्षा परिणाम प्राप्त हुआ है । पता चला कि उसने कक्षा पांच की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है । क्या सचमुच में ? यह जानने के लिए हमने उससे ‘रिपोर्ट कार्ड’ मंगवाया । अधिकतम 1100 अंकों में से 577 – द्वितीय श्रेणी । हमारा मन विश्वास करने को तैयार तो नहीं था, लेकिन दस्तावेज तो यही बता रहा था ! विश्वास न करने का कारण ? क्योंकि उसे अक्षरज्ञान नहीं के बराबर था । हालत यह थी कि उससे ‘ह’ लिखने को कहें तो कभी सही लिख जाए तो कभी गलत । और अपने ही लिखे अक्षर को पढ़ने के लिए कहें तो कभी सही पढ़ जाए तो कभी गलत । यदि किताब में छपे वाक्यों को हूबहू उतारने में वह माहिर थी । मतलब यह कि नकल तो वह कर लेती थी, पर नकल किए जा रहे पाठ की सही पहचान और उसका उच्चारण उसे मालूम नहीं था ।

मैंने सुना है कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों में कक्षा एक से चार तक इम्तहान नहीं होते हैं और सभी को हर कक्षा से प्रोन्नत कर दिया जाता है । किंतु कक्षा पांच की तो परीक्षा होती ही है । और उसकी यह हालत ? मेरी इन बातों पर आप विश्वास नहीं करना चाहेंगे, लेकिन मैं झूठ नहीं कह रहा ।

सचमुच में यह देश भगवान भरोसे है । – योगेन्द्र जोशी

 

2 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, किस्सा, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, corruption, experience, Hindi literature, Short Stories