Category Archives: मानव व्यवहार

तिरुमल तिरुपति के दर्शन का असफल प्रयास और बंगाली मोशाय की चिंता

इधर कुछ दिनों से तथाकथित बाबा राम रहीम की चर्चा समाचार माध्यमों में छाई हुई है। संबंधित समाचारों और उनको लेकर टीवी चैनलों पर प्रस्तुत बहसों को सुनकर मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि क्यों और कैसे लोग इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के अंध-भक्त बन जाते हैं। इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के तौर-तरीकों को देखने के बाद भी उनके मन में किसी प्रकार की शंका क्यों नहीं उठती? वे इनको भगवान तक का दर्जा कैसे दे बैठते हैं? किंचित् चिंतन करने पर मुझे लगने लगा कि आम आदमी वस्तुतः बहुत कायर होता है – कायर अज्ञात के प्रति, अज्ञात भविष्य के प्रति। अधिकांश मनुष्य अमूर्त शक्तियों में विश्वास करते हैं और उन्हें यह भय रहता है कि ऐसी शक्तियां यदि रुष्ट हो गयीं तो उनका अनिष्ट कर सकती हैं। जो व्यक्ति समस्याओं के दौर से गुजर रहा होता है वह उनके निदान एवं समाधान के लिए मंदिरों, पंडे-पुजारियों, ज्योतिषियों, और तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं आदि के पास पहुंचता है। मूल में अज्ञात शक्तियों का भय होता है ऐसा मेरा सोचना है।

विचार करते-करते मुझे कोई चौदह-पंद्रह वर्ष पहले की एक घटना की याद आ गई। अक्टूबर का महीना था और नौ-दिवसीय शारदीय नवरात्र का पर्व चल रहा था। मेरा प्रायशः पूरा जीवन उत्तर भारत में ही बीता है और यहां के अनुभवों के आधार पर मेरा सोचना यही रहा है कि नवरात्र का समय देवी दुर्गा (या उनके विभिन्न अवतारों) के दर्शन-पूजन का समय होता है। अपनी इसी धारणा से वशीभूत होकर मैंने शारदीय नवरात्र का समय तिरुमल (तिरुमला?) तिरुपति देवस्थानम् के दर्शन के लिए चुना, यह सोचते हुए कि इस देवी-पर्व के समय वहां तीर्थयात्रियों की भीड़ नहीं होगी। मैं अपनी पत्नी के साथ रेलगाड़ी से तिरुपति शहर पहुंच गया और वहां से तिरुमल पहाड़ियों पर स्थित तिरुमल तिरुपति वेंकटेश (श्रीपति वैकुण्ठेश भगवान विष्णु) मंदिर परिसर भी पहुंच गया।

वहां पहुंचने पर हमारी यह गलतफहमी दूर हो गई कि शारदीय नवरात्र-काल में तिरुमल में यात्रियों की भीड़ कम होगी। दरअसल इसी समय वहां भव्य “ब्रह्मोत्सव” का आयोजन होता है। पूरा मंदिर परिसर सजा रहता है। रात भर देवमूर्तियों की सजी हुई झांकियां विशाल मंदिर परिसर में घुमाई जाती हैं। उन्हीं में से एक में तिरुपति वेंकटेश की प्रतिकृति भी रहती है जिसके दर्शन-पूजन के लिए भीड़ उमड़ी रहती है। पूरे नवरात्र रात-दिन चहल-पहल रहती है।

तिरुमल में दर्शन के लिए अलग-अलग मूल्यों के टिकटों की व्यवस्था रहती है और उसी के अनुसार दर्शनार्थियों को छोटी-बड़ी पंक्तियों में खड़ा होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मुफ्त दर्शन वाली पंक्ति भी लगती है, परंतु उसमें दर्शन पाने में काफी समय लगता है। हम लोगों ने टिकट पाने की कोशिश की। पता चला कि पूरे नवरात्र भर के लिए सामान्यतः उपलब्ध टिकट बिक चुके हैं। विशेष मूल्य के टिकट (हजार-दो-हजार या अधिक के टिकट शायद मिल जायें ऐसा कइयों ने सुझाया। उपलब्ध जानकारी भ्रमित करने वाली ही थी। रात एक-डेड़ बजे तक हम भाग-दौड़ करते रहे, एक कार्यालय से दूसरे तक दौड़ते रहे, बैंक की शाखा (रात में भी खुली हुई) के चक्कर लगाते रहे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

दूसरे दिन मुफ्त दर्शन के लिए ५००-६०० मीटर लंबी पंक्ति में हम भी लग लिए। तिरुमल में दर्शन की व्यवस्था मुझे अजीब और असुविधाजनक लगी। मैं अधिक विस्तार से वर्णन नहीं कर रहा हूं किंतु इतना बता दूं वहां १५-२० बड़े-बड़े हॉल हैं जिनमें दर्शानार्थियों को प्रतीक्षारत रहने के लिए टिका दिया जाता है। दर्शन के लिए एक-एक कर हॉलों को खोला जाता है और लोग आगे बढ़ते हैं। ब्रह्मोत्सव के समय भीड़ इतनी होती है कि उनको कभी-कभी आगे किसी और हॉल में फिर-से टिका दिया जाता है। हम भी एक हॉल में इंतिजार करने लगे। मालूम पड़ा कि दर्शन रात्रि ११-१२ बजे होंगे। हम संतुष्ठ थे कि चलो दर्शन तो हो ही जायेंगे। बाद में जानकारी को पुख्ता करने के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटिअर) से पूछा तो पता चला कि दर्शन के लिए ११-१२ बजे का वक्त उस रात का नहीं बल्कि अगली रात का है।

हमारा माथा ठनका। हमारे लौटने का आरक्षण अगले दिन ३-४ बजे का था। हमने दर्शन का विचार त्यागा और बाहर आने के लिए तैयार हुए। पर यह क्या! हॉल के प्रवेश-द्वार पर तो ताला लटका था। वहां ठीक-से हिन्दी या अंग्रेजी समझने वाला स्वयंसेवक नहीं मिला जो हमारी समस्या समझ सके। बड़ी मुश्किल से एक युवक मिला जिसने हमारे मदद की। हम बाहर निकले और राहत की सांस ली। दूसरे दिन रेलगाड़ी से लौट आए बिना दर्शन किए।

इस घटना का रोचक पक्ष है एक बंगाली महाशय की दुश्चिंता जो हमारे देखने में आई। जब हम टिकट के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे तब हमारी उनसे मुलाकात हुई। वे सज्जन तीस-बत्तीस वर्ष के युवा थे और कलकत्ता से पत्नी और छोटे बच्चों के साथ दर्शनार्थ आये थे। हमारी तरह वे भी परेशान थे। जब कहीं भी कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने हमारे सामने अपनी चिंता साझा की, “अब कैसे दर्शन होंगे? हम यहां अधिक समय टिकने की स्थिति में नहीं। बिना दर्शन के लौटना अनिष्टकारी होगा। हमें मालूम ही नहीं था कि इस समय दर्शन पाना इतना मुश्किल होगा।”

देव-दर्शन की कोई संभावना नहीं यह बात हमारे लिए भी निराशाजनक थी। जिस उद्देश्य से घर से चले थे उसका पूरा न हो पाना अच्छा तो नहीं लग रहा था। फिर भी इस बात को एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानकर हम सहज थे। इसके विपरीत वे महाशय बेहद चिंतित थे किसी अनिष्ट की आशंका को लेकर। उनके चेहर पर दुश्चिंता के भाव स्पष्ट झलक रहे थे। उनका कहना था, “देव-दर्शन किए बिना लौटना अनिष्टकारी तो होगा ही। अब हम क्या करें?”

हमने उनको समझाया, “देखिए दर्शन नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें आपकी क्या गलती? परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि आपके लिए दर्शन संभव नहीं हो पा रहे हैं। क्या आप भगवान्‍ को इतना कमजोर समझते हैं कि एक साधारण मनुष्य़ की भांति वह भी बात-बात पर नाखुश हो जाएं? आपने मंदिर के दर्शन कर लिए, परिसर की झांकियों की भी झलक पा ली है। ये कम है क्या? यदि बहुत चिंता हो तो श्री व्यंकटेश से प्रार्थना करिए कि अगली बार दुबारा आने और दर्शन पाने का सुअवसर आपको प्रदान करें।”

मेरी बात उन्होंने गंभीरता से सुनी। मुझे लग रहा था कि उनको मेरी सलाह पसंद आ गई। उस रात हमने उनसे विदा ले ली। अगले दिन हम मुफ्त दर्शन पाने हेतु पंक्ति में लग लिए। उसके बाद क्या हुआ यह बता चुका हूं। उन चिंताग्रस्त महाशय से दुबारा भेंट नही हो सकी। उनकी दुश्चिंता यथावत्‍ बनी रही या नहीं मैं कह नहीं सकता। उस घटना से मुझे यह ज्ञान तो मिला ही कि सामान्य मनुष्य अनागत के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो जाता है। वह अदृश्य शक्तियों में विश्वास ही नहीं करता बल्कि उनसे भय भी खाता है। वह सोचता है कि एक मनुष्य की भांति वे शक्तियां भी बात-बात पर रुष्ट हो सकती हैं और व्यक्ति का अहित कर सकती हैं। लेकिन वे शक्तियां क्या वास्तव में मनुष्य की तरह कमजोर होती हैं? मेरे मत में यह भ्रम मात्र है। – योगेन्द्र जोशी

 

Advertisements

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories, Story

अपूरित कामना

आज मन्नूभाई घर पर तशरीफ़ ले आए, अप्रत्याशित-से दोपहर के वक्त । तीन-चार सप्ताह में वे एक बार मिलने जरूर आते हैं और आते हैं तो संध्याकाल के समय। इस समय आना असामान्य ही था।

मन्नूभाई मेरे पुराने सहयोगी रहे हैं और इसी शहर में वे भी बस चुके हैं। घर में दो ही प्राणी हैं: पत्नी एवं वे स्वयं। शादीशुदा बेटी परिवार के साथ विदेश में जा बसी है, और बेटा-बहू हैदराबाद में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं। दोनों अच्छा कमा लेते हैं और समय की कमी की बात जरूर स्वीकारते हैं।

मन्नूभाई का म्लान-मुख देखकर मैंने चुटकी ली, “लगता है पत्नी से झगड़ के आ रहे हो। अरे मियां, सत्तर-उनहत्तर की इस उम्र में झगड़ना-वगड़ना छोड़ो। जिंदगी के बचे-खुचे दस-बारह साल तो प्यारमोहब्बत से बिता लो।”

“अरे सिन्हा, तुम्हें तो हर समय मजाक की सूझती है। आज बात ही कुछ ऐसी हो गई कि मन उदास हो गया। सोचा तुमसे मिलकर गम गलत कर लूं और तुम हो कि …।” शिकायती लहजे में बोले मन्नूभाई।

“माफ कर दो यार, और गुस्सा थूको … बोलो किस बात पै उदास हो?”

मन्नूभाई चंद लमहों तक चुप रहे और फिर बोले, “देखो भाई, तुम्हें मालूम ही है बेटे की शादी हुए छः-सात साल हो चुके हैं। दोनों पैंतीस पार कर चुके हैं। अभी तक उनके कोई बच्चा नहीं। जब कोई प्रसंग छिड़ता है तो टालू जवाब देते हैं। आज सुबह ही श्रीमतीजी की बेटे-बहू से फोन पर बात हुई। क्या बात हुई इसका विवरण मैंने पूछा नहीं। वे दो अभी तक दो ही बने हैं शायद इसी पर बात की होगी। और इसी मुद्दे को लेकर वे अपना दुखड़ा रोने लगीं। मैं भी उनके दुःख को समझता हूं, पर कर क्या सकता हूं? मैं खुद ही चाहता हूं कि उनके दो नहीं तो कम से कम एक बच्चा हो जाता तो हमें भी तसल्ली हो जाती। पत्नी को पोता-पोती – जो भी हो – के साथ खेलने-खिलाने का मौका मिल जाता। भला कौन नहीं चाहता है दादा-दादी बनना? उसका भी अपना अलग सुख होता है। … है न? अपने को देखो, बड़ा बेटा, उसकी बहू और बच्चे तुम्हारे साथ रहते हैं। खुशी मिलती है न?”

“देखो भई, यह सब संयोग की बातें हैं। संयोग ही समझो कि बहू नौकरी-पेशे में नहीं। भविष्य में जब बच्चे अपना काम खुद करने लगें तो हो सकता है वह भी काम पर निकल पड़े। लेकिन तुम्हारे बेटे-बहू की कहानी एकदम उलट है। दोनों पहले से ही नौकरी में रहे, और वह भी मोटी तनख्वाह के साथ। उस तनख्वाह का लालच छोड़ना आसान नहीं है। फिर भी बच्चे हो सकते थे। बच्चे पलेंगे कैसे शायद यह सवाल उनके सामने उठता होगा। तुम्हारी पत्नी खुद अस्वस्थ रहती हैं; वे भला क्या मदद करेंगी? न ही यह हम मर्दों के वश का काम है। बच्चे पालना कोई दो-चार महीनों का काम तो होता नहीं, कम से पांच-छः साल तो खास निगरानी की जरूरत होती है। तुम्हारी बहू के मायके वाले भी लंबे अरसे की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत शायद जुटा न पा रहे हों।” मैंने समझाने की कोशिश की।

“बात तो तुम ठीक कह रहे हो, लेकिन सोच-सोचकर मानसिक कष्ट तो होता ही है, खास तौर पर धर्मपत्नी को।”

मन्नूभाई के चहरे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं। कुछ देर के लिए खामोसी छाई रही । इस बीच बहू चाय की दो प्यालियां पहुंचा गयी। हम चाय की  चुस्कियां लेने लगे। खामोसी बनी रही।

फिर मैंने चुप्पी तोड़ते हुए बात आगे बढ़ाई, “बुरा न मानो तो एक बात कहूं। … जमाना बहुत बदल गया है। वह जमाना गया जब हमारी-तुम्हारी शादी मां-बाप या घर के अन्य बुजुर्ग तय करते थे। तब दो-एक साल में बच्चे न हुए तो कानाफूसी शुरू हो जाती थी। लोगों की जुबान पर तरह-तरह के सवाल तैरने लगते थे। अब न कोई परवाह करता है, न कुछ कहता है। अब तो मध्यम वर्ग के कई नये विवाहित जोड़ों ने एकल संतान की नीति अपना ली है, और कुछ ने तो उसके आगे बढ़कर संतान नहीं का ही रास्ता चुन लिया है। मैं ऐसे मामले जानता हूं। तुम्हारे बेटा-बहू क्या सोचते हैं यह तो वही बता सकते हैं। मेरी मानो एक बार कुछएक दिनों के लिए उनके पास चले जाओ तुम दोनों, और खुलकर बात कर लो। याद रखो, हर बात टेलीफोन पर नहीं हो पाती है। सामने बैठकर बात करोगे तो वे टालने की कोशिश नहीं कर पायेंगे। समझे?”

“ठीक ही कह रहे हो। हो आयेंगे उनके पास। देखें क्या कहते हैं।”

“तब तक के लिए अपनी इस चिंता को भुला दो। …” कहते हुए मैंने प्रसंग की चर्चा पर विराम लगा दिया और वार्तालाप के विषय की दिशा बदल दी। चाय का अंतिम घूंट लेकर खाली प्याली मैंने मेज पर रख दी। – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, Hindi literature, human behaviour, Short Stories, society, Story

नीयत डोल गयी मूंगफली की चंद फलियों पर

मैं घर के पास के मुख्य मार्ग से लौट रहा हूं । रास्ते में सड़क के किनारे कच्ची जमीन पर भट्टी सुलगाए हुए दो भाई मूंगफली भूनकर बेच रहे हैं । बड़े-से कड़ाह में एक भाई भूनने का काम करता है तो दूसरा ग्राहकों को तौलकर बेचता है । मैं इनको करीब दो महीनों से यहां अपना छोटा-सा कारोबार करते हुए देख रहा हूं । पिछले वर्षों तक मैंने इनको यहां कभी नहीं देखा था । पूछे जाने पर बताते हैं कि ये इसी साल पहली बार मेरे शहर में रोजीरोटी की तलाश में पहुंचे हैं । मूंगफली भूनकर बेचने का धंधा उनकी समझ में आया, सो उसी पर लग गये।

उस रास्ते से कभी-कभार आते-जाते मैं भी उनसे मूंगफली खरीद लेता हूं । वे पच्चीस रुपया पाव बेचते हैं, जब कि आम ठेलों पर भुनी मूंगफली बेचने वालों की दर 35 रुपया पाव है । दाम के साथ मूंगफली में अंतर जरूर रहता है । ठेले वाले कच्ची मूंगफली को छानकर-फटककर साफ करते हैं, अपुष्ट या खोखली फलियों को हटाते हैं और तब भूनते हैं, जब कि ये भाई बाजार से बोरों में भरी मूंगफली को जैसा का तैसा ही इस्तेमाल करते हैं ।

इनके पास पहुंचकर मैं ठहर जाता हूं । दो-तीन गाहक पहले से मौजूद हैं । मुझसे ठीक पहले बारी आती है एक दंपती की । महिला बाइक से उतरकर मूंगफली खरीदती हैं, मेरे अनुमान से पाव भर, और उनके पति बाइक पर बैठे प्रतीक्षा करते हैं । महिला मूल्य चुकाते हुए दुकानदार से मूंगफली भरी पॉलिथीन की थैली थाम लेती हैं । जिज्ञासावश मैं उनके हावभाव गौर से देख रहा हूं । चलते-चलते वे मुठ्ठी में कुछ मूंगफली उठा लेती हैं । हो सकता कि उनके मन में बाइक पर बैठे उन्हें ठूंगने का विचार हो । मैं सोचने लगता हूं कि बाइक में बैठकर अपने को संतुलित रखते हुए यह कार्य आसान तो नहीं ही होगा । लेकिन ऐसा कुछ होना नहीं है । वे मुठ्ठी की सामग्री अपनी झोली में डालती हैं, बाइक पर बैठती हैं, और बाइक चल देती हैं । उस समय मैं अकेला गाहक बच जाता हूं ।

मैं विक्रेता से पूछता हूं, “आपके खरीददार ढेरी में से बिना पूछे कुछ मूंगफली उठा लेते हैं क्या ?”

जवाब मिलता है, “हां, कोई-कोई गाहक खरीदते-खरीदते लगे हाथ दो-चार फलियां ठूंग ही लेते हैं । पर सब ऐसा नहीं करते ।”

मैं अपनी साइकिल पर सवार होकर घर की ओर बढ़ जाता हूं । उस महिला की मुठ्ठी में भला कितनी मूंगफली समाई होगी इस बात का मैं रास्ते में अनुमान लगाता हूं । मुझे लगता है कि मुश्किल से बीस-तीस पैसे की रही होगी, या थोड़ा अधिक पचास पैसे की, या उससे कुछ अधिक की ।

जीवन की यह एक विडंबना ही तो है कि कभी-कभी खाते-पीते व्यक्ति की नीयत उतने कम पर भी डोल जाती है । कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे मिला है अंगूर और जामुन के साथ भी । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories, Story, Uncategorized

किसिम-किसिम के गाहक मिलते हैं फल-सब्जी सट्टी मे

मेरे घर के निकट फलों एवं सब्जियों की सट्टी (बाजार) है । वहां तड़के सुबह इन चीजों की थोक तथा फुटकर दुकानें खुल जाती हैं और दोपहर 11-12 बजे तक कारोबार करती हैं । कुछ फुटकर दुकानें दिन भर भी खुली रहती हैं, अतः जरूरत की चीजें लगभग हर समय मिल जाती हैं । आम तौर पर वहां सुबह के समय ही भीड़ रहती है । मैं वहां से प्रायः एक या दो दिन के लिए साग-सब्जी और फल खरीद ले आता हूं ।

अभी जुलाई का महीना समाप्ति पर है और उसी के साथ जामुन का मौसम भी खत्म होने को है । आम का मौसम कुछ दिन और चलेगा । केला तो प्रायः सदा ही उपलब्ध रहता है । पपीता, सेब, अनार आदि भी अक्सर मिल जाते हैं । आजकल कई फलों की उपलब्धता साल भर रहती है; दामों में मौसमी उतार-चढ़ाव होना स्वाभाविक है ।

सब्जी-विक्रेता सामान्यतः जमीन पर सब्जियों की ढेरी लगाकर बेचते हैं, जब कि फल-विक्रेता ठेलों पर फल सजाए रहते हैं । कुछ चुने हुए विक्रताओं का मैं सालों से ग्राहक हूं अतः उनके साथ एक प्रकार की जान-पहचान हो चुकी है । वे जानते हैं कि मैं उनसे आम तौर पर न दाम पूछता हूं और न मोलभाव करता हूं ।

हां तो मैं बताने जा रहा था कि बीते कल मैं कुछ फल और सब्जियां खरीदने सट्टी गया था । सबसे पहले जामुन वाले के पास पहुंचा । जामुन ठीकठाक लग रहे थे । मैंने पूछा, “जामुन मीठे तो हैं न ? … आधा किलो तौल देना । ठीक-से देख लेना कि कोई सड़े-गले न हों ।”

वह मेरे लिए जामुन तौल ही रहा था एक खरीदार ठेले पर पहुंचे और बोले, “जामुन क्या हिसाब दे रहे हो भई ? मीठे तो हैं न ?” सवाल पूछते-पूछते वे दो-तीन दाने हाथ में लेकर मुंह में डालने लगे ।

दुकानदार जवाब देता है, “बाबूजी, बीस रुपये पाव चल रहा है ।”

“यह तो ज्यादा ले रहे हो । पंद्रह का लगाओ न ? आधा किलो लेंगे ।”

“बाबूजी, सीजन खतम हो रहा है । महंगा ही हमें मिल रहा है । पंद्रह का पड़ता ही नहीं ।” फल वाले ने जवाब दिया ।

“नहीं भई, ये तो महंगा है ।” कहते हुए वे सज्जन चल दिये ।

फल-विक्रेता मुझे जामुन की थैली थमाते हुए कहने लगा, “देखा बाबूजी, खरीदना था नहीं । दाम पूछने के बहाने तीन-चार दाने खा गए । कभी-कभी ऐसे भी गाहक आ जाते हैं, क्या करें !”

मैंने शब्दों में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, बस मुस्कुरा दिया और आगे बढ़ गया । आगे आम वाले के पास पहुंचकर मैंने पके हुए किंतु थोड़े सख्त किस्म के आम छांटना शुरु किया । प्रायः सभी लोग फल-सब्जी छांटकर ही खरीदते हैं । एक सज्जन पहले से ही उस ठेले पर खरीदारी कर रहे थे । वे सेब और अनार खरीद चुके थे । आम खरीदने से पहले उन्होंने कीमत पूछी तो जवाब मिला, “50 रुपये किलो, सर ।”

मेरे ख्याल से आम खरीदने का विचार उनका तत्काल बना होगा । दाम पूछने के बाद ही तो उन्होंने सेब-अनार खरीदे होंगे ।  आजकल सब्जी-सट्टी में कुछ युवा विक्रेता संबोधन हेतु ‘सर’ शब्द का भी प्रयोग करने लगे हैं । वन-टू-थ्री-टेन-फिफ्टी जैसी अगरेजी गिनतियों का प्रयोग भी देखने को मिल जाता है । वस्तुतः अंगरेजी शब्द आम चलन में बोले जाने वाले हिन्दी शब्दों को विस्थापित कर रहे हैं । देश वाकई ‘आधुनिक’ हो चला है । खैर ।

वे जनाब बोले “अरे नहीं, कुछ कम करो । 45 रुपया लगाओ ।”

फल वाले ने दाम घटाने में अपनी असमर्थता जता दी । मेरी उपस्थिति में उन्होंने आधा-एक किलो आम खरीद लिए । फिर फल वाले से पूरा हिसाब पूछा, “कितने का हिसाब बना ?”

“अॅं … आपका किसाब हुआ दो सौ बीस रुपये ।” क्षण भर रुककर फल वाला बोला ।

“मैंने दाम कुछ कम करने को कहा था । … ये लो दो सौ रुपये ।”  जनाब ने पैसे दिए और चलने को उद्यत हुआ ।

“सर, बीस रुपये और दीजिए । इतना नहीं छोड़ पाऊंगा ।”

“अरे ठीक है, रखो इतना । कोई नये खरीदार थोड़े ही हैं तुम्हारे !”

“सो तो ठीक है, सर, लेकिन दो पैसे की कमाई नहीं होगी तो परिवार का पेट कैसे भरेगा !” फल वाले ने लाचारी व्यक्त की ।

“ठीक है, ठीक है, फिर कभी ले लेना । आते तो रहते ही हैं ।” कहते हुए वे चल दिए ।

मैंने खुद के छांटे आम उसके तराजू पर रखे और एक किलो आम खरीद लिए । उसे पचास का नोट पकड़ाते हुए मैं आगे बढ़ने को हुआ । वह पांच का नोट मुझे थमाने लगा तो मैंने पूछा, “ये क्या है ?”

“रख लीजिए । आप सोचेंगे … ।” उसने सफाई पेश करनी चाही ।

“अरे नहीं भई, मैं कुछ नहीं सोचूंगा ।” अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लाते हुए मैंने उसे आश्वस्त किया और वहां से चल दिया ।

आगे चलकर मैं रुका सब्जी वालों के पास तीन-चार वक्त की सब्जियां खरीदने । सड़क के किनारे जमीन पर सब्जियां सजाए दो दुकानों में से मैं पहली पर रुका । बगल की दुकान से एक महिला धनिया, मिर्चा, अदरख, परवल बगैरह-बगैरह खरीदकर पौलिथीन के अलग-अलग थैलियों में भरवा रही थी । कुछ देर तक मैं जिज्ञासावश उसी सौदे को देखता रहा । अपेक्षया कम उम्र की सब्जी वाली उन थैलियों को एक-एककर बड़े पौलिथीन थैले मैं डालती जा रहा थी । मैं सोचने लगा कि वे चीजें मिलाकर दो-एक थैलियों में इकट्ठी रखी जा सकती थीं, पर ऐसा नहीं किया जा रहा था । वह महिला शायद उस मेहनत से बचना चाहती होगी जिसके तहत उसे घर पहुंचकर सभी चीजों को छांटते हुए अलग-अलग करना पड़ता ।

प्रायः सभी लोग पौलिथीन-जन्य पर्यावरण समस्या की बात करते हैं, परंतु तात्कालिक सुविधा हेतु उसके प्रयोग से बाज नहीं आते । क्या ही विडंबना है भारतीय समाज में ।

तभी मेरा ध्यान एक अन्य साइकिल सवार युवा ग्राहक की ओर गया जो अधेड़ उम्र की पहली सब्जी वाली से पूछ रहा था, “अरे चाची, ये प्याज क्या हिसाब दे रही हो ?”

“पेंसठ रुपये किलो चल रहा है ।” उसे जवाब मिला ।

“साठ का लगाओ न, सभी जगह तो साठ का बिक रहा है ।”

अनुभवी सब्जी वाली खरा-खरा बोलने में निपुण थी । वह बोली, “ठीक है भैया, जहां साठ का मिल रहा है वहीं से क्यों नहीं खरीद लेते ?”

मोलभाव के चक्कर में लोगबाग किसी चीज के कम दाम में मिलने की बात कर जाते हैं । उनका तीर कभी-कभार निशाने पर लग भी जाता है, किंतु उस ग्राहक के मामले में बात बनी नहीं ।

 “आपके यहां प्याज साफ-सुथरा, अच्छा मिलता है ।” कहते हुए उसने साइकिल एक ओर खड़ी की और पहुंच गया प्याज खरीदने । मैंने भी कुछ सब्जियां खरीद लीं और पकड़ ली घर की राह । राह में मेरा मन इसी विचार पर केंद्रित हो गया कि प्रकृति ने लोगों के व्यवहार को कितना वैविध्यमय बनाया है । किसिम-किसिम के लोग मिल ही जाते हैं हर जगह । – योगेन्द्र जोशी 

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories

रेलयात्रियों के बीच तू-तू-मैं-मैं और “यू शट अप”

          रेलगाड़ी से लंबी यात्रा करना बहुतों को उबाऊ लगता है, लेकिन मेरे लिए वह अधिकांश मौकों पर काफी दिलचस्प सिद्ध होता है । मैं अपने साथ यात्रा के दौरान विविध प्रकार की पढ़ने की सामग्री लेकर चलता हूं । बीच-बीच में बदलाव के लिए खिड़की के बाहर के दृश्य भी देख लेता हूं । चाय-कॉफी जैसे पेय अगर मिलते रहें तो यात्रा का आनंद बढ़ जाता है, और ऊब का सवाल नहीं के बराबर रह जाता है । अगर रेलगाड़ी के डिब्बे में उछल-कूद मचाने, हंसने-रोने में लगे छोटे-बड़े बच्चे मौजूद हों, अथवा ऐसे यात्री हों जो किंचित असामान्य हरकतों में लगे दिखें या रोचक वार्तालाप के नजारे पेश कर रहे हों, तो यात्रा का समय कैसे कट जाता है पता नहीं चलता । मैंने पाया है कि कुछ लोग अपनी निजी जानकारी भी साथी यात्रिकों के साथ साझा कर बैठते हैं, अन्यथा आम तौर पर समसामयिक राजनैतिक घटनाएं उनके बीच बहस का अच्छा-खासा विषय बन जाता है, जिसमें कब कौन भाग ले ले कहा नहीं जा सकता । और भी यात्रा के दौरान बहुत-कुछ देखने-सुनने को मिल जाता है । आगे मैं ऐसी ही एक घटना का जिक्र कर रहा हूं ।

चंद रोज पहले मैं अपनी सहधर्मिणी के साथ वाराणसी से मुंबई की एसी 2-टियर डिब्बे में बैठकर यात्रा कर रहा था । खिड़की से सटी ऊपर-नीचे की आरक्षित शायिकाएं (बर्थ) हमें मिलीं हुई थीं । सामने की चार बर्थों (ऊपर-नीचे मिलाकर) में से तीन पर एक ही परिवार के पति-पत्नी एवं उनकी युवा बेटी यात्रा कर रहे थे । उस परिवार की प्रौढ़ महिला नीचे की एक शायिका पर लेटकर झपकी ले रही थीं, जब कि सामने की शायिका उस समय कदाचित खाली थी । डिब्बे में अन्यत्र आरक्षित शायिकाओं वाली दो महिलाएं उस खाली शायिका पर बैठकर गपशप में मशगूल हो गई थीं । उन यात्रिकों ने हमारी ओर के पर्दे खींचकर थोड़ा फैला दिए थे । हम दोनों खिड़की के पास बैठे हुए पत्रिकाएं पढ़ने में व्यस्त हो गए थे ।

उस ओर से आने वाली आवाजें हमारे कानों पर पड़ तो रही थीं, किंतु हम उन पर खास ध्यान नहीं दे रहे थे । फिर कुछ समय बाद अनायास उधर से जोर-जोर से बोलने की आवाज आने लगी । हम समझ नहीं पाये कि माजरा क्या है, लेकिन तुरंत ही अंदाजा लग गया कि उस तरफ बैठे दोनों पक्षों के बीच पहले गरमागरम बहस और फिर उससे आगे बढ़कर तू-तू-मैं-मैं शुरू हो चुकी है । हुआ क्या यह जानने की इच्छा हमारे मन में भी जगी । मामले के बारे में हम अनुमान ही लगा सकते थे, क्योंकि उन लोगों से सीधे-सीधे पूछना किसी को भी उचित या अस्वीकार्य लग सकता था । उनकी आपसी बहस पर ध्यान देने पर हमें समझ में आया कि वहां बैठे परिवार की युवती ने अन्य दोनों महिलाओं से शायद यह कहा, “आप लोग हौले-से बातें करते तो मेहरबानी होती; देखिए इधर मेरी मां भी सो रही हैं ।”

उसका यह निवेदन उन महिलाओं को शायद पसंद नहीं आया । उन्होंने प्रतिक्रिया में शायद यह कहा, “आप पहले अपनी मां के खर्राटे बंद क्यों नहीं करवा रही हैं ? क्या दूसरों को उससे परेशानी नहीं होती ?”

 “देखिए सोते हुए व्यक्ति का अपने खर्राटों पर कोई वश नहीं चलता, लेकिन हौले से बातें करना तो आपके वश में है न ? दोनों बातों की तुलना ठीक नहीं ।”

हमारी नजर में मामला बहुत गंभीर नहीं था । परंतु मामला तब बिगड़ ही जाता है जब लोगों के अहम को चोट लगती है । “सामने वाले की यह हिम्मत कि हमें टोके !” का भाव बहस के दौरान लोगों के मन में अक्सर पैदा हो जाता है और एक-दूसरे की बात समझने से वे इंकार कर बैठते हैं । शायद ऐसा ही कुछ तब हुआ होगा और बात तू-तू-मैं-मैं तक जा पहुची ।

उस ‘झगड़े’ का दिलचस्प पहलू यह रहा कि दोनों ही पक्ष जल्दी ही अंगरेजी पर उतर आए, यानी तू-तू-मैं-मैं तुरंत ही अंगरेजी में होने लगी । एक पक्ष की आवाज सुनाई दी, “यू लैक मैनेरिज्म; लर्न दैम ।”

दूसरे पक्ष के शब्द सुनाई दिये, “फर्स्ट यू योअरसेल्फ लर्न मैनेरिज्म बिफोर टेलिंग अदर्स ।”

कुछ देर ऐसे ही चलता रहा । मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी । हम भारतीयों की खासियत यह है कि जब कभी हमें दूसरों पर गुस्सा आता है तो हम अपनी भावना व्यक्त करने में भी अंगरेजी की मदद लेते हैं । अंगरेजी में गुस्से का इजहार अधिक प्रभावी होता है इस विचार से शायद अधिकतर ‘शिक्षित’ भारतीय ग्रस्त रहते हैं । मैं समझता हूं कि कई लोगों के लिए अंगरेजी बोलना दूसरे पर रॉब झाड़ने या उसे स्वयं को हीन अनुभव कराने में मददगार होता है । या हो सकता है वे अनजाने ही अंगरेजी पर उतर आते हों ।

उस घटना के अगले दो-चार मिनट मुझे और भी अधिक रोचक लगे । उन दो महिलाओं के साथ का एक किशोर भी अगल-बगल के किसी शायिका से अवतरित होकर उस कांड में शामिल हो गया । वह बीच-बीच में “यू शट अप !” के शब्द बोलकर दूसरे पक्ष को चेतावनी देने लगा । ऐसा करते समय वह हर बार अपने दांये हाथ के अंगूठे तथा मध्यमा अंगुली से चुटकी बजाता और तर्जनी को दूसरे पक्ष की ओर तान देता । उसका मुख भी तमतमा उठता । उसके हावभाव देख हम मन ही मन खूब हंसे ।

कुछ देर तक इस तमासे को देखने के बाद अपनी श्रीमतीजी अधीर हो बैठीं और उठकर सामने के पर्दे के पास चली गईं । उन लोगों की ओर मुखातिब हो वे बोलीं, “देखिए, आप दोनों ही को मैनरिज्म सीखने की जरूरत है । एक छोटी-सी बात को लेकर झगड़ना कौन-सा मैनरिज्म है ? कंपार्टमेंट में और यात्री भी बैठे हैं, उनके सामने तमासा खड़ा करना बुद्धिमानी नहीं है । अरे भई, यात्रा में कई प्रकार की दिक्कतें हो सकती हैं । अक्सर थोड़ा-बहुत एड्जस्ट करना पड़ जाता है ।”

संयोग से उन्होंने उक्त बातों पर आपत्ति नहीं जताई । बहुत संभव है कि हमारी बढ़ी उम्र का लिहाज किया हो । कारण जो भी हो, दोनों पक्ष शांत जरूर हो गए । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories

निरीह मुर्गे पर गुस्सा उतारने की घटना

          जिस घटना का जिक्र मैं इस स्थल पर करने जा रहा हूं वह मुझसे सीधे तौर पर नहीं जुड़ी है, बल्कि वह दो-तीन रोज पहले के अखबार में प्रकाशित एक समाचार पर आधारित है । “मुर्गी से इश्क लड़ाने पर मुर्गे को मार दिया तीर” शीर्षक के साथ छपी घटना का विवरण हिंदी दैनिक जागरण के 26 दिसंबर के अंक में देखा जा सकता है । मामला अलीराजपुर का है । ये स्थान कहां है इसका अंदाजा मुझे नहीं, किंतु घटना के विवरण से यही लगता है यह किसी आदिवासी क्षेत्र में है, जहां तीर-कमान प्रचलन में हैं ।

अखबारों में तो तमाम प्रकार की घटनाएं छपती रहती हैं, जो प्रायः राजनैतिक उथल-पुथल, आरोप-प्रत्यारोप, और प्रशासनिक संवेदनहीनता एवं लापरवाही से लेकर हत्या-डकैती-दुष्कर्म आदि जैसी विचलित करने वाली खबरों से जुड़ी रहती हैं । खबरें सभी प्रकार की प्रकाशित होती हैं, जिनमें कुछएक का विशेष सामाजिक महत्व होता है तो अधिकांश अन्य पढ़कर आई-गई के तौर पर भुला दी जाती हैं । किंतु कभी-कभी कोई घटना ऊपरी तौर पर  महत्वहीन होते हुए भी अपने पीछे विचारणीय सवाल छोड़ जाती है । कम से कम मुझे तो अक्सर ऐसा लगता है । उक्त घटना की खबर पढ़ने पर मेरे मन में सवाल उठा कि कुछ मनुष्य गुस्से में विवेकशून्य होकर तुरंत ही आत्म-संयम क्यों खो बैठते हैं ? क्यों वे कुछ क्षण ठहरकर अपनी प्रतिक्रिया के घातक परिणामों पर विचार नहीं कर पाते हैं ? अस्तु, मैं घटना की बात करता हूं ।

खबर यह थी कि दो भाई – कदाचित सगे, जिसका स्पष्ट उल्लेख खबर में नहीं – पड़ोसी थे और हैं । एक के घर में मुर्गी पली थी तो दूसरे के घर में संयोग से मुर्गा । हो सकता है उनके पास और भी मुर्गे-मुर्गियां रही हों, लेकिन घटना में किरदार निभाने वाले एक मुर्गी ओर एक मुर्गा बताए गये हैं । ये दोनों रहे तो पक्षी जाति के, उन्हें क्या मालूम कि उनके मालिकों के बीच अच्छे संबंध नहीं हैं । उन्हें यह समझ नहीं रही कि उन्हें भी मालिकों की भांति आपस में दूरी रखनी चाहिए । उनमें से कोई एक दूसरे के पास पहुंच गया । बहुत संभव है कि मुर्गा ही मुर्गी के पास पहुंचा हो । अपनी प्रजाति का कोई सदस्य आसपास टहल रहा है यह देख दूसरे मन में उससे नजदीकी बढ़ाने की इच्छा स्वभावतः जगी हो । विपरीत लिंग के सदस्यों के बीच ऐसा आकर्षण खास तौर पर देखा जाता है । खबर के अनुसार मुर्गा मुर्गी से ‘इश्क लड़ाने’ पहुंचा था । इश्क का इजहार कैसे किया जा रहा होगा यह अनुमान लगाने की बात है ।

बहरहाल मुर्गी के मालिक को वह इश्कबाजी नागवार लगी । उसे गुस्सा आया और चल दिया घर के भीतर अपना तीर-कमान लेने । हो सकता है उसने मुर्गे को दो-एक बार भगाया हो, लेकिन ढीठ मुर्गा माना न हो जिससे तीरंदाज मुर्गी-मालिक का गुस्सा और भड़क गया हो । घर से बाहर आकर उसने मुर्गे पर निशाना साधा और उस पर तीर छोड़ दिया । बेचारे मुर्गे को अपनी हरकत की सजा मिल गयी; तीर उसके शरीर के आर से पार निकल गया । यह तो गनीमत रही कि उसके मालिक (दूसरा भाई) को पता चल गया और ले गया उसे पशु-चिकित्सक के पास जिसने संभव उपचार आरंभ कर दिया । उसकी जान बच गई और वह स्वास्थ्यलाभ करने लगा । उसके मालिक ने घटना के बाबत पुलिस में रिपोर्ट कर दी । उधर मुर्गी का मालिक गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो गया ।

मनुष्य को ऊपर वाले ने सोचने-विचारने की क्षमता दे रखी है । तब भी वह उल्टी-सीधी हरकतों से बाज नहीं आता है । लाख समझाया जाए तो भी कई मनुष्य गलत-सलत कार्य से बचने की कोशिश नहीं करते । बेचारे पशु-पक्षी तो ऐसी समझ पाये नहीं हैं । उन पर ‘सभ्य मानव समाज’ के नियम-कानून तो लागू होते नहीं हैं । तब उन पर क्या गुस्सा करें ? हां, यदि वे असुविधा पैदा कर रहे हों या किसी प्रकार की हानि पहुंचा रहे हों तो उन्हें डराया-भगाया जा सकता है । नियंत्रित रखने के लिए न्यूनाधिक ताड़ना भी की जा सकती है । लेकिन गुस्से में उनकी जान तक लेने का विचार विवेकहीनता का ही द्योतक कहलाएगा ।

तीर चलाने वाले उस व्यक्ति को यह तो मालूम रहा ही होगा कि वह जो कार्य करने जा रहा है वह अनुचित हैा । इसीलिए तो वह बाद में फरार हो गया । जाहिर है गुस्से के अधीन की गई करतूत की कीमत चुकानी ही पड़ी । दरअसल पूरी घटना की कुछ न कुछ कीमत दोनों ही पक्षों को चुकानी पड़ी । मिला क्या ? केवल तसल्ली इस बात की कि मैंने जो हुआ उसे सहा नहीं और मुर्गे को ‘सबक’ सिखा दिया, गोया कि मुर्गा यह समझ सकता हो कि उसे भविष्य में ऐसी नासमझी नहीं करनी चाहिए!

इस प्रकार की घटनाएं हमें अक्सर देखने-सुनने को मिलती हैं । मैंने महसूस किया है कि अनेकों मनुष्य बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं, अपना आपा खो बैठते हैं, और गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त कर बैठते हैं । अवांछित एवं हानिप्रद व्यवहार किसी एक व्यक्ति तक सीमित हो ऐसा नहीं होता, अपितु पूरा जनसमूह ऐसी हरकत पर उतर आता है । कहीं कोई नहीं रह जाता जो कहे कि जरा ठंडे दिमाग से घटना के बारे में सोचा जाना चाहिए और संयमित प्रतिक्रिया क्या हो इस पर विचार करना चाहिए । कहीं किसी वाहन से दुर्घटनावश किसी की जान निकल गयी तो वहां से गुजरने वाले वाहनों की तोड़फोड़ या उनकी आगजनी पर लोग उतर आते हैं । अस्पताल में गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु पर भी इसी प्रकार की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है । ऐसी खबर भी सुनने को मिल जाती है जिसमें किसी बात पर गुस्सा होने पर परिवार का कोई सदस्य साल-छः महीने के बच्चे की पटककर जान ले लेता है, अथवा अपनी ही जान गंवा देता है ।

मुझे लगता है कि अनेक जन प्रतिकूल एवं खिन्न करने वाली परिस्थितियों में आत्मसंयम एवं विवेक खो बैठते हैं, और फलतः अनर्थ कर बैठते हैं । हम चाहें या न, यही इस जीवन का कटु एवं अपरिहार्य सत्य है । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, human behaviour, Short Stories

आवश्यकता के अनुसार भूलने की बिमारी

पिछले 2-3 सालों से 2जी स्पेक्ट्रम नाम के बहुचर्चित घोटाले के मामले की अदालती कार्यवाही चल रही है । मामले का हस्र तो वही होना है जो ऐसे मामलों में सदा से होता आया है । लेकिन सीबीआई उर्फ ‘तोता’ नाम की सरकारी संस्था को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने के लिए छानबीन का नाटक करते ही रहना पड़ता है । वही इस दफा भी हो रहा होगा । मामले में बतौर सरकारी गवाह के अनिल अंबानी नाम के लब्धप्रसिद्ध कारोबारी से भी पूछताछ हुई है ।

समाचार माध्यम बताते हैं कि अदालत में अधिकांश सवालों के जवाब अंबानीजी ने “मुझे याद नहीं है” कह कर दिया । अदालत ने उनसे पूछा, “क्या आप जानते हैं कि आपकी बातें अगर झूठी सिद्ध हुईं तो सजा भी हो सकती है ?” उन्होंने हामी भरते हुए बताया कि उन्हें इस संभावना की जानकारी है । दूसरे दिन जब श्रीमती टीना (मुनीम) अंबानी की बारी गवाही के लिए आई तो उन्होंने भी मुझे कुछ याद नहीं की बात दोहराई ।

मैं समझता हूं अंबानी जी ने मन ही मन कहा होगा, “क्या-क्या हो सकता है यह माने नहीं रखता । माने तो यह रखता है कि असल में क्या होता है । होगा वह जो आज तक होता आया है, यानी कि कुछ नहीं होगा । आप पहाड़ खोदेंगे और उसमें से चुहिया निकलेंगी, और वह भी पकड़ में नहीं आएगी ।”

श्रीमान अंबानी जी ने ऐसा सोचा होगा यह मेरे अपने खयाल हैं । उनके मन में क्या रहा होगा यह तो वही बता सकते हैं । लेकिन वे क्योंकर किसी को बताएंगे ?

मैं अंबानी जी पर कोई लेख लिखने नहीं जा रहा हूं । उनका जिक्र तो मैं इसलिए कर रहा हूं कि कई लोगों को सुविधा एवं आवश्यकता के अनुसार भूल जाने का रोग होता है । जहां याद रहना घाटे का सौदा हो वहां भूल जाना, और जहां काम निकालना हो वहां याद रखना कई जनों के स्वभाव में शामिल रहता है । शायद ही कोई मनुष्य हो जो यह दावा कर सके कि उसको यह रोग जिंदगी में कभी नहीं हुआ । कभी-कभार इस रोग का दौरा पड़ना आम बात है, किंतु कुछ लोग इससे इतना ग्रस्त होते हैं कि पता चल जाता है कि मामला उतना सीधा नहीं है । मैं अपने ऐसे ही एक अनुभव का जिक्र यहां पर कर रहा हूं ।

मेरे शिक्षण संस्थान के मेरे विषय के एम.एससी. की एक प्रयोगशाला यानी लैब में दो-तीन शिक्षकों को साथ-साथ कार्य करना पड़ता था । कोई ढाई-तीन घंटे की प्रायोगिक कक्षाएं वहां चलती थीं । विश्वविद्यालयों-कालेजों में शिक्षकों का लैब की कक्षा में किंचित् विलंब से आना और छात्रों की हाजिरी दर्ज करते हुए समय से कुछ पहले ही खिसक लेना कोई असामान्य बात नहीं होती । परंतु मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ऐसे थे जो इस आदत के कुछ अधिक ही धनी थे । वे अक्सर जरूरत से ज्यादा देर से पहुंचते थे । एक बार वे तब पहुंचे जब लैब का समय लगभग खत्म होने को था । वरिष्ठ होने के नाते उनसे मैं कुछ कहता नहीं था, पर मुझे खीज जरूर होती थी । इस मौके पर एक बात कहूं ? हम भारतीय लिहाज बरतने के मामले में काफी उदार होते हैं । मैं समझता हूं कि कोई गलत-सलत कार्य करे तो टोकने के बजाय चुप्पी साध लेना हमारे ‘जीन्स’ (जैविक गुणधर्म का आधार) में निहित है । खैर, वे हांफते-हूंफते पहुंचे और बोले, “अरे, मैं तो भूल ही गया कि मेरी क्लास है ।”

मेरे पास कहने को कुछ था नहीं । क्या कहता भला ? कह ही चुका हूं कि अपने जीन्स के अनुकूल व्यवहार करना स्वाभाविक था । “अच्छा ! … छोड़िए भी, कभी-कभी अति व्यस्तता के कारण जरूरी काम भी दिमाग से उतर जाते हैं ।” मैंने औपचारिक प्रतिक्रिया पेश की ।

बात आई-गई हो गई । मैं जब कभी अपने कुछएक हमउम्र सहयोगियों के साथ उनके सान्निध्य के अनुभवों को साझा करता तो पता चलता कि ऐसा तो उनके साथ चलता ही रहता था । हम इसे जानबूझकर भूलने की बिमारी कहते थे । आधुनिक ‘समझदार’ लोग इस रोग से स्वेच्छया ग्रस्त हो जाते हैं । यह ठीक वैसा ही है जैसा कि आपराधिक बारदात में पकड़े जाने पर सफेदपोश लोगों के सीने में दर्द उठ जाता है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होने का बहाना मिल जाता है ।

मेरे मत में अधिकांश भारतीयों की मानसिकता इस दोष से ग्रस्त रहती है कि वे अपने पेशे के दायित्वों की तुलना में वैयक्तिक हितों को प्राथमिकता देते हैं । समस्या तब होती है जब वे अपने निजी कार्य उस समय निबटाने चल पड़ते हैं जब उनसे पेशे के कार्य में लगे होने की अपेक्षा की जाती है । मेरे पूर्व सहयोगी बैंक, अस्पताल अथवा अन्यत्र उस समय निकल पड़ते थे जब उन्हें कक्षा में होना चाहिए था । हम अपने दायित्वों के प्रति कितने सचेत रहते हैं यह हमारे राजनेता और प्रशासनिक कर्मियों में व्याप्त लापरवाही स्पष्ट करती है । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

Filed under कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories, society