Category Archives: मानव व्यवहार

सौ मीटर दूर चलना भी गवारा नहीं

          आज के औद्योगिक युग में मनुष्य बेहद आराम-तलब हो चुका है । मुझे लगता है कि कभी-कभी यह आराम-तलबी हास्यास्पद सीमा पार कर जाती है । चंद रोज पहले एक दिलचस्प और अपने किस्म का वाकया मेरे अनुभव में आया – दिलचस्प मेरी नजर में । हो सकता है लोग ऐसा न मानें ।

          इससे पहले कि वाकये का ब्योरा पेश करूं, मैं बताना चाहूंगा कि मेरे शहर बनारस (वाराणसी) की जो भी तारीफें आपने सुनी हों वे किस हद तक सही होंगी इस पर मैं कुछ कहना नहीं चाहता; बस, मेरी अपनी नजर में यह शहर दुर्व्यव्यवस्था के मामले मैं अद्वितीय है । इस शहर में कौन-सी सड़क ठीक-ठाक हालत में है इसे आपको खोजना पड़ेगा । कोई भी सड़क बनने के बाद पहली बरसात झेल जाए तो आश्चर्य होता है । सड़कों पर वाहनों के बेतरतीब आवागमन को देख आपके मन में सहज शंका उठेगी कि यहां यातायात के कोई नियम हैं भी कि नहीं । पुराना शहर होने के कारण सड़कें सब जगह इतनी चौड़ी नहीं हैं कि निरंतर बढ़ते निजी मोटर-वाहनों का बोझ झेल सकें । परिणाम साफ जाहिर है, ट्रैफिक जाम । और कोढ़ में खाज की नौबत आ जाती है जब इन सड़कों पर पाइप-लाइनें बिझाने के लिए खोदाई होने लगती है, जैसा कि आजकल चल रहा है ।

          ‘लंका’ इस शहर के प्रमुख स्थानों में से एक है, जहां बी.एच.यू. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) का प्रवेश द्वार है और उसके परिसर में अवस्थित चिकित्सा संस्थान के अस्पताल पहुंचने का मार्ग है । इसके आसपास रिहायशी मकान और बहुमंजिली इमारतें हैं, तथा स्थानीय लोगों की जरूरतों की पूर्ति करने वाला बाजार है । शहर के अन्य स्थानों के लिए पैडल-रिक्शे, आटोरिक्शे जैसे साधन भी यहां पर रात-दिन मिलते हैं ।

          वाकत तब का है जब एक दिन मुझे अपनी धर्मपत्नी जी के साथ कार्यवशात् यहां आना पड़ा था । हम घर के पास स्थित सुंदरपुर चौराहे से सवारी आधार पर चलने वाले आटोरिक्शा से लंका के लिए चल दिये । बताता चलूं कि वाराणसी में आटोरिक्शे पांच सवारियां बिठाकर चलते हैं । लंका के निकट पहुंचने पर देखने को मिला कि वहां तो जाम लगा है । हमारे आटोरिक्शे को गंतव्य स्थल, चौराहे, पर पहुंचने के लिए अभी कोई डेड़ सौ या उससे भी कम दूरी तय करनी थी, लेकिन उस जाम को देखते हुए उसने वाहन रोक दिया और सामने के वाहनों के आगे बढ़ने का इंतजार करने लगा । हमने देख रहे थे कि दूर तक खड़े वाहनों में कोई गति नहीं है । स्थिति खराब देख मैंने अपनी सहधर्मिणी से कहा, “क्यों न हम उतर जायें और पैदल चल दें । मुझे तो लगता है जितनी देर में यह आटो चौराहे पर पहुंचेगा उससे कहीं कम समय में हम पैदल वहां पहुंच जाऐंगे ।”

उन्होंने सहमति जताई, और भाड़ा अदा करते हुए हम उतरने लगे । इतने में एक महिला, उम्र से अंदाजन तीस-पैंतीस वर्ष की, आटोरिक्शे के पास पहुंची और बोली, “चौराहे तक ले चलिए तो ।”

          “अरे बहन जी, सामने ही तो चौराहा है, पैदल चले जाइए ।”

          “कौन चले वहां तक पैदल ! आप छोड़ दीजिए ।”

          तब तक हम दोनों उतर चुके थे । वाहन चालक और उस महिला के बीच आगे क्या बातें हुई होंगी मैं बता नहीं सकता, क्योंकि हम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए बगल की एक गली के रास्ते चौराहे की तरफ चल दिए । बगल की गली का रास्ता हमने इसलिए चुना कि उस जाम में घुसकर पैदल भी आगे निकल पाना नामुमकिन-सा लग रहा था ।

गली से गुजरते हुए पत्नी महोदया बोलीं, “पता नहीं कैसी खबती महिला थी वह कि दस कदम पैदल चलने से भी कतरा रही थी ।”

पर्वतीय क्षेत्र का मूल बाशिंदा होने के कारण मुझे मीलों पैदल चलने की आदत रही है । पहाड़ों पर तो पैदल चलने के अलावा कोई अन्य साधन आम तौर पर उपलब्ध भी नहीं रहता है । लेकिन मैदानी इलाकों में स्थिति कुछ अलग रहती है । तथापि यहां भी लोग पैदल चलते ही हैं या साइकिल चलाते हैं । पता नहीं क्यों अब कुछ लोग कुछ कदम भी पैदल चलने से बचते हैं । ऐसा नहीं कि वह महिला अस्वस्थ हो । अधिकतर लोग उस महिला की तरह बर्ताव करते भी नहीं होंगे । मैं समझता हूं वह अपवाद रही होगी । लेकिन यह दिलचस्प तो है ही कि उस सरीखे लोग भी दुनिया में मिल जाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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पैसे की अहमियत – एक आवश्यकता, और उसके आगे एक नशा

मनुष्य के ऐहिक जीवन में धनसंपदा की अहमियत सदा से ही स्वीकारी जाती रही है । जीवन की प्रायः तमाम आवश्यकताओं की पूर्ति उसके माध्यम से ही संभव हो पाती है । आवश्यकताएं क्या होती हैं यह अपने आप में सुपरिभाषित नहीं होती हैं । किसी चीज को एक व्यक्ति आवश्यक कहता है, तो कोई दूसरा उसे अनावश्यक घोषित करता है । मेरी दृष्टि में उसी को आवश्यक माना जा सकता है, जिसकी अहमियत व्यापक स्तर पर समाज में स्वीकारी जाती हो । मैं इस बात को और स्पष्ट करता हूं ।

जब किसी चीज को कुछ गिने-चुने लोग ही हर हाल में पाना चाहें, किंतु अधिकांश जन उसे बेमतलब, फिजूलखर्ची का मामला, या एक शौक कहें तो उसे आवश्यकता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है । भोजन-पानी, लत्ता-कपड़ा आदि जैसी चीजों को हर कोई आवश्यकताओं में शामिल करता है । जो संपन्न हो वह इन चीजों को बेहतर और पर्याप्त मात्रा में भोगेगा; उन पर अधिक खर्च करेगा; और उनकी गुणवत्ता को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ेगा । लेकिन कुछ चीजें हैं जिन्हें अतिसंपन्न लोग भी नहीं चुनेंगे । दृष्टांत के तौर पर मैं दुनिया की सबसे कीमती आवासीय भवन की बात करता हूं, जिसे अपने देश के एक धनाढ्य व्यवसायी ने अभी हाल में बनवाया है । दुनिया में उनकी टक्कर के सैकड़ों अन्य धनिक हैं, किंतु उनमें से किसी ने वैसा भवन बनाने की आवश्यकता शायद नहीं समझी । मैं इसी प्रकार के तार्किक विचार-मंथन द्वारा ‘क्या आवश्यक है’ इसका उत्तर खोजता आया हूं । अपने इसी चिंतन को परिप्रेक्ष में रखकर मैं एक युवक के साथ संपन्न अपनी वार्ता की चर्चा करता हूं ।

एक बार मैं दिल्ली से पुणे तक की रेलयात्रा कर रहा था । घटना तीन-चार साल पहले की होगी । रेलगाड़ी के डिब्बे की खिड़की के पास की शायिका (बर्थ) की एक ओर मेरी सीट थी तो दूसरी ओर एक नवयुवक की । यात्राओं के दौरान मैं अपने साथ सदैव पाठ्य सामग्री लेकर चलता हूं । उस यात्रा में भी दो-एक वैज्ञानिक पत्रिकाएं/पुस्तकें तथा अन्य पठनीय सामग्री मेरे साथ रहीं । इस प्रकार की सामग्री पढ़ते देख उस युवक के मन में मेरे प्रति शायद जिज्ञासा जाग गयी । कुछ समय तक देखते रहने के बाद वह मुझसे बोला, “अंकल, आप कहीं पढ़ाते हैं क्या?”

मेरा खयाल है कि आम तौर पर लोग वैज्ञानिक पत्रिकाएं/पुस्तकें नहीं पढ़ते हैं । कदाचित् विज्ञान के अध्यापक, विशेषतः विश्वविद्यालय स्तर के, ही ऐसी पठनीय सामग्री के साथ समय-यापन करते होंगे । या फिर विज्ञान में विशेष रुचि रखने वाले गिने-चुने लेखक/पत्रकार ऐसी पाठ्य सामग्री पढ़ते होंगे । उस युवक को लगा होगा कि मैं अवश्य ही अध्यापक रहा हूंगा । मैंने उसके प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, “हां, मैं एक अध्यापक हुआ करता था, किंतु अब मैं रिटायर्ड (सेवानिवृत्त) हूं ।”

उसकी जिज्ञासा शांत करने के इरादे से मैंने उसे अपने विषय (भौतिकी) के बारे में बताया और साथ ही अपने उस केंद्रीय विश्वविद्यालय की जानकारी भी दी जहां मैं कार्यरत था ।

“मैंने सुना है कि अब केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रिटायरमेंट एज पैंसठ साल है । लेकिन आपकी उम्र अभी इतनी लगती नहीं । क्या मैं जान सकता हूं आपका रिटायरमेंट कब हुआ?”

“मैं रिटायर हुआ नहीं, मैंने रिटायरमेंट ले लिया था, समय से कुछएक वर्ष पहले ही – ‘वॉलेंटरी रिटायरमेंट’ ।” मैंने किंचित् हंसते हुए जवाब दिया, गोया कि सेवानिवृत्ति लेना उतना ही सरल, सहज और सामान्य हो जितना किसी पर्वतीय स्थान पर ग्रीष्मावकाश बिताने के बाद घर लौटना । मैंने उसे अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि भी बता दी ।

“और बेटा, तुम ‘क्यों’ यह भी जानना चाहोगे । सो वह भी बता देता हूं । संक्षेप में यही कह सकता हूं कि मेरा मन हुआ नौकरी-पेशे से मुक्त होकर नये किस्म की जीवनचर्या अपनाऊं । बच्चे व्यवस्थित हो ही चुके । अपने को लगा कि मात्र रोजी के लिए अब नौकरी क्या करनी, जब दैनिक आवश्यकताएं पेंशन से पूरी हो सकती हों ।” मैंने उसे बेटा संबोधित करते हुए जवाब दिया । बेटा-बेटी का संबोधन मैं उन अजनबी युवाओं के लिए भी इस्तेमाल कर लेता हूं, जो मुझे मेरे बच्चों की उम्र के आसपास नजर आते हैं । वे अक्सर ‘अंकल’ कहकर पुकारते हैं । मुझे इस आजतक नहीं ‘अंकल’ के अनुरूप कोई ‘अंग्रेजी संबोधन’ सूझा । ‘बेटा-बेटी’ ही ठीक लगता है, और साथ में तुम कहकर पुकारना भी । मेरे ये संबोधन उन्हें खलते नहीं होंगे यही मानकर चलता हूं ।

“आपका मतलब यह है कि भविष्य में आपकी जो फाइनेंसियल अर्निंग्ज होतीं उनके घाटे को आपने जानबूझकर नजरअंदाज किया । मैं समझता हूं कम ही लोग ऐसे नौकरी छोड़ने की सोचते होंगे ।” उसने मेरी बात पर प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

“हां, तुम ठीक कह रहे हो ।” मैंने सहमति जताई और फिर तनिक रुककर उससे पूछा, “और ये बताओ तुम खुद क्या करते हो, और कहां जा रहे हो ।”

“मैं पुणे के सिम्बायोसिस इंस्टिट्यूट से एमबीए का कोर्स कर रहा हूं । तीन-चार दिन की छुट्टी में घर आया था, अब लौट रहा हूं ।” उसका जवाब था ।

“एम-बी-ए!” ‘एमबीए’ के एक-एक अक्षर पर जोर डालते हुए मैंने उसका उच्चारण किया और कहा, “यह कोर्स तो आजकल काफी पॉप्युलर है । सुनते हैं कि टॉप-रैंकिग इंस्टिट्यूट से मैनेजमेंट कोर्स करने पर कइयों को भारी-भरकम पे-पैकेज मिल जाता है ।”

“हां, बहुतों को कैम्पस इंटरव्यू में मोटी तनख्वाह का ऑफर मिल जाता है ।” उत्तर था ।

“अच्छा, एक बात पूछता हूं । शायद तुम्हारे पास जवाब हो । एमबीए या ऐसे ही किसी और प्रोफेशनल कोर्स को लड़के-लड़कियां क्या इसलिए चुनते हैं कि ये कोर्स उनको मोटी तनख्वाह वाली नौकरियां दिला सकते हैं ? या इसलिए चुनते हैं कि उन विषयों में उनकी खास दिलचस्पी होती है ? मैंने यह देखा है कि जो छात्र अन्य विषयों में अच्छा प्रदर्शन करते हैं वे भी एमबीए में प्रवेश के लिए किस्मत आजमाते हैं । छात्रों को अक्सर पे-पैकेज की चर्चा करते भी देखता हूं ।” अनायास ही अटपटा-सा सवाल मैंने उसके सामने रख दिया ।

पैसा तो मेन कंसिडरेशन (प्रमुख विचार) रहता ही है । पैसे की अहमियत तो सारी दुनिया कबूलती है । जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसा ही तो चाहिए । …”

वह कुछ और भी कहता इससे पहले ही मैं बोल पड़ा, “बस केवल जरूरतें पूरा करने के लिए ? या उसके आगे कुछ और … ?” अपनी बात कैसे रखूं इसे मैं ठीक-से नहीं सोच पा रहा था ।

“आपका मतलब ? … मैं समझा नहीं ।”

“दरअसल मैं कहना चाहता हूं कि मनुष्य की जरूरतें सीमित होती हैं । आदमी बढ़िया खाएगा-पीएगा, बढ़िया पहनेगा-ओढ़ेगा, ऐशोआराम से रहेगा । लेकिन इस सब की भी एक सीमा होती है, उसके आगे नहीं जाया जा सकता । मानता हूं आदमी को धन चाहिए, पर कितना ? और किस कीमत पर ? जिंदगी के दूसरे पहलुओं को नजरअंदाज करते हुए ? अपने चौबीस घंटे का समय गिरवी रखते हुए, ताकि स्वयं तथा दूसरों के लिए भी फुरसत न रहे ? अभी और कमा लूं की भावना ताउम्र पाले हुए ? बस चले तो मरते दम तक धनोपार्जन करते हुए ? मुझे ऐसे भी लोग नजर आते हैं जिनके पास कोई कमी नहीं, फिर भी सही-गलत किसी भी तरीके से अधिकाधिक कमाई कर लेने का जुनून जैसे उनके सिर पर चढ़ा हो ऐसा लगता है । वे कौन-सी जरूरतें हैं जिनके लिए आदमी सब कुछ भुलाकर बस पैसे के पीछे भागता है ? लगता है कि धन-संपदा की उसकी भूख शांत नहीं हो सकती । ऐसा अतिरिक्त धन जिसे आदमी भोग न सके, दूसरे को दे न सके, उसकी क्या अहमियत हो सकती है ? यही न कि आदमी उसे कहीं इंवेस्ट (निवेश) करे । उस इंवेस्टमेंट से मिले रिटर्न (लाभ) का क्या करेगा वह ? उसे भी इंवेस्ट करे । और यह सिलसिला चलता रहे । पैसे को लेकर मेरे मन में ऐसे सवाल उठते रहे हैं । इसीलिए पूछ बैठा । क्या मैं गलत कह रहा हूं ?”

वह कुछ देर तक चुप रहा; फिर बोला, “कह नहीं सकता कि क्या जवाब दूं । … शायद कुछ हद तक आप सही हों ।”

“वर्तमान और भविष्य की संभावित आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर धनोपार्जन की मैं आलोचना नहीं कर रहा हूं । परंतु जब ‘हाय रे पैसा’ की धुन के साथ सब कुछ भुलाकर येनकेन प्रकारेण धनसंग्रह में ही कोई लगा रह जाए तो मैं उसे एक नशा मानता हूं । … खैर, छोड़ो इस बहस को । ऐसे खयाल, जिन्हें लोग बेतुके कहेंगे, मेरे मन में कभी-कभी आ जाते हैं, इसलिए इतना सब कुछ कह गया, जानने के लिए कि तुम क्या सोचते हो । ऐसी बातें में लोगों के सामने अक्सर छेड़ देता हूं उनकी प्रतिक्रियाएं पाने के लिए । माफ करना मैं तुम्हें हतोत्साहित करने के लिए ये बातें नहीं कह रहा । जीवन के लंबे अनुभव से जो समझ में आया वह कह गया । मेरी बातों पर गौर करना जरूर । लेकिन अभी नहीं, पर तब जब जिंदगी के उस रास्ते में कदम रखो जिसकी तैयारी आज कर रहे हो । मैंने कहा और उस बहस को बंद करते हुए बातचीत की दिशा मोड़ दी । – योगेन्द्र जोशी

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“भ्रष्ट आचरण का वाइरस तो हमारे खून में है, सर!”

मैं अपने कंप्यूटर डीलर के आफिस में बैठा हूं । उसके साथ मेरा संबंध कोई अढाई दशक पुराना है – उस काल से जब उसने एक युवा उद्यमी के तौर पर कंप्यूटर के क्षेत्र में कारोबार करना आरंभ किया था, और हम (मैं तथा मेरे अन्य सह-अध्यापक) अपने विश्वविद्यालय (बीएचयू) में कंप्यूटर पाठ्यक्रम की शुरुआत कर रहे थे । देश में तब कंप्यूटर संस्कृति ने कदम रखे भर थे । तब से उस कंप्यूटर विक्रेता के साथ हम लोगों के संबंध बने हुए हैं । ये बातें कहना मुझे प्रासंगिक लगीं इसलिए बता रहा हूं । हां तो हम दोनों वार्तालाप में मग्न हैं । तभी एक भावी खरीददार उनके कार्यालय में पहुंचता है । विक्रेता उस आगंतुक से परिचित है ऐसा मुझे उन दोनों की आपसी बातचीत से लग रहा है ।
वह व्यक्ति विक्रेता से पूछता है, “आप क्या जीरॉक्स मशीन सप्लाइ कर सकेंगे ? ऐसी मशीन जो जीरॉक्स के साथ प्रिंटिंग, स्कैनिंग आदि भी कर सके ?”

“आपका मतलब है ऑल-इन-वन किस्म की मशीन ? हां मिल जाएगी ।” विक्रेता का जवाब है । किस कंपनी की कितने में मिलेगी इसका मोटा हिसाब भी वे बताते हैं । आजकल बाजार में ऐसी मशीनें आ चुकी हैं ।

“दरअसल मेरे फलां अध्यापक ने आपके पास भेजा है जानकारी जुटाने के लिए । उनके पास कुल करीब लाख-एक की रिसर्च ग्रांट है । उसी में जीरॉक्स मशीन के साथ एक डेस्क-टॉप भी लेना है । हो जाएगा न ?”

“हां इतने के भीतर दोनों मिल जाएंगे ।”

“और कुछ कमिशन …।”

“वह… अच्छा… देख लिया जाएगा…, कोशिश करेंगे ।” किंचित् अस्पष्ट-सा जवाब दिया जाता है । दो-चार अन्य बातें भी दोनों के बीच होती हैं । फिर वह आदमी चला जाता है । उसके चले जाने पर कंप्यूटर विक्रेता मुझसे बोलते हैं, “देखा आपने ? खुलकर मांग रखते हैं कमिशन की । विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं । आप अंदाजा लगा ही सकते हैं कि अच्छी-खासी तनख्वाह मिलती होगी । फिर भी मांग रखते हैं कि हमारा भी कुछ हिस्सा होना चाहिए … ।” तनिक चुप्पी के बाद वे आगे कहते हैं, “हम भी क्या करें ? आजकल ऐसे खरीदारों की कमी नहीं है । मना करें तो बिजनेस पर असर पड़ता है । मतलब यह कि मैं और मेरे कर्मचारी सभी प्रभावित होते हैं ।”

मैं उनकी मजबूरी समझ रहा हूं । उन्हें तो बिजनेस करते रहना है । जो आदमी अच्छे वेतन, तमाम भत्तों एवं भविष्य की पेंशन के साथ आर्थिक सुरक्षा भोग रहा हो वही जब कदाचरण पर तुल जाए तब वह क्या करे जिसके स्वयं तथा कर्मचारियों के पास सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी नहीं ? मैं जिज्ञासावश पूछ लेता हूं, “कहां के अध्यापक हैं वे जिनका जिक्र हो रहा था ?” ।

“काशी विद्यापीठ ।” जवाब मिलता है ।

विद्यापीठ! यानी वाराणसी के तीन सरकारी विश्वविद्यालयों में से एक । आर्थिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हमारे बीच कुछ देर तक बातचीत चलती है । बीच-बीच में किसी के आने से व्यवधान भी पड़ता रहता है । वार्तालाप के दौरान वे कहते हैं, बीएचयू में आज भी यह सब नहीं चलता है । इक्का-दुक्का कोई मामले हों तो हों । आपके फिजिक्स विभाग के साथ पिछले पच्चीस-एक साल से मेरा बिजनेस चल रहा है, किंतु आजतक किसी के साथ ऐसी बात नहीं हुई ।”

“मुझे बीएचयू (फिजिक्स विभाग) छोड़े तो सात साल हो चुके हैं । इस समय वहां के हाल क्या हैं कह नहीं सकता, लेकिन मेरे कार्यकाल के समय स्थिति ठीक थी । अब तो कुल मिलाकर सभी जगह गिरावट का दौर चल रहा है । कोई चारा नहीं है ऐसा लगता है मुझे । ”

भ्रष्टाचार का वाइरस तो हम लोगों के खून में घुल चुका है, सर! जिनसे इलाज की उम्मींद की जानी चाहिए उनके खून में भी ।”

“हो सकता है ।” कहते हुए मैं उठता हूं और उसके आफिस से लौट आता हूं । सोचने लगता हूं कि समाज की यह बीमारी क्या वाकई में लाइलाज है । जब विश्वविद्यालय का अच्छाखासा खातापीता शिक्षक तक इस मानसिकता पर उतर आया हो तो औरों के क्या हाल होंगे ? – योगेन्द्र जोशी

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“भैयाजी, आप साइकिल से चलते हैं ये अच्छा नहीं लगता है!”

मेरे पड़ोस में मेरे हमउम्र एक सज्जन रहते हैं । वे समाज के तथाकथित पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं । वे निरक्षर हैं और उनकी मान्यताएं निहायत रुढ़िवादी हैं ऐसा मैं अनुभव करता आया हूं । वे यह सोचते हैं कि आर्थिक रूप से अपेक्षया संपन्न होने के कारण मुझे साइकिल जैसी ‘घटिया’ सवारी से नहीं चलना-फिरना चाहिए । यहां मैं उनकी उस प्रतिक्रिया का जिक्र कर रहा हूं जो एक दिन मेरे साइकिल चलाने पर उन्होंने व्यक्त की थी ।

आगे बढ़ने से पहले मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि मेरे पास ‘सामाजिक प्रतिष्ठा का द्योतक’ चौपहिया वाहन नहीं हैं । मैं स्वयं को धनाड्य नहीं मान सकता हूं, किंतु मैं इतना संपन्न तो हूं ही कि चार-पांच लाख मूल्य की एक कार खरीद सकूं । फिर भी कार खरीदने का विचार मेरे मन मैं कभी नहीं आया । इसके दो प्रमुख कारण रहे हैं । एक कारण तो यही रहा है कि बनारस जैसे दुर्व्यवस्थित शहर में कार की वास्तविक उपयोगिता नाममात्र की है । मेरे उक्त विचार से कई नगरवासी अवश्य सहमत होंगे ऐसा मेरा विश्वास है । किंतु ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण वे कार को ‘बेकार’ कहने में हिचकिचाएंगे इस बात को भी मैं महसूस करता हूं । जहां तक मेरा सवाल है मुझे तो कार चलानी भी नहीं आती है । परंतु अपने पास कार न होने का इससे भी बड़ा कारण यह रहा है कि मैं ‘कार-कल्चर’ का विरोधी नहीं तो पक्षधर तो नहीं ही हूं । मेरे विचार में निजी कारों के बदले सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे यथासंभव पैदल चलें अथवा साइकिल प्रयोग में लें । मुझे तो पैदल चलना पसंद है, अथवा आवश्यकतानुसार साइकिल का प्रयोग मुझे अच्छा लगता है । मेरे पास एक स्कूटर है अवश्य, किंतु उसे चलाने की नौबत आठ-दश दिन में एक बार आती है । मुझ जैसे सेवानिवृत्त व्यक्ति का कहीं आना-जाना बहुत नहीं होता है ।

उक्त बातें मैंने इसलिए बता दी कि पड़ोसी के साथ संपन्न मेरी बातें समुचित परिप्रेक्ष में समझी जा सकें । हां तो हुआ यह कि मैं अपने घर से बाहर निकला साइकिल के साथ, और गेट के बाहर सड़क पर उस सवारी पर चढ़ने के लिए तैयार हुआ । तभी पास ही अपने घर के बाहर बैठे उन पड़ोसी सज्जन ने आवाज दी, “भैयाजी!”

मैंने उनकी आवाज सुनी, मैं ठिठककर रुका और उनकी ओर मुखातिब होकर पूछने लगा, “कहिए, क्या बात है ?”

“भैयाजी, आप साइकिल से चलते हैं ये अच्छा नहीं लगता है!”

उनकी बात पर मुझे किंचित् आश्चर्य हुआ । मेरा साइकिल से चलना कोई नई बात नहीं थी । साइकिल की सवारी तो मैं अक्सर करता ही आ रहा था; कभी साइकिल तो कभी स्कूटर । आज क्या कुछ नया घट गया कि उन्होंने मुझे यों टोक दिया ? मैं समझ नहीं पा रहा था । बदले में मैंने पूछा, “साइकिल से तो मैं अक्सर निकलता रहा हूं भाई; आज कौन-सी नई बात हो गयी है कि आपने यह सवाल उठाया ?”

“भैयाजी, यह सवाल तो मेरे मन में कोई नया नहीं है; बस आज पूछ लिया ।”

“लेकिन सवाल आपने पूछा ही क्यों? साइकिल चलाना कोई बुरी बात तो नहीं ।”

“दरअसल साइकिल चलाना आप जैसों को शोभा नहीं देता । आपको तो कार रखनी चाहिए । साइकिल तो हम जैसे लोगों के लिए ही ठीक है । जिसकी अच्छी हैसियत हो उसका साइकिल से चलना शोभा नहीं देता ।”

“लेकिन मुझे तो साइकिल चलाना अच्छा लगता है । इसमें बुराई क्या है?”

“भैयाजी, सवाल इज्जत का भी तो है । कार से चलने वाले की इज्जत बढ़ती है; साइकिल से चलने पर वह इज्जत कहां?”

“कोई बात नहीं । इज्जत कम होगी, लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता ।” ऐसा कहते हुए मैं आगे बढ़ गया । मुझे झूठी प्रतिष्ठा का कोई शौक नहीं यह बात अपने उन ‘भैयाजी’ को नहीं समझा सकता था । मैं यह भी भलीभांति जानता हूं कि समाज में प्रतिष्ठा के अपने मापदंड होते हैं, जो मुझे मान्य नहीं । समाज में संपन्नता के साथ उसका प्रदर्शन भी जरूरी समझा जाता है । मेरी मान्यताएं भिन्न हैं । किंतु अपनी मान्यताओं को लेकर बहस में न पड़ना ही मैंने ठीक समझा । – योगेन्द्र जोशी

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न जाने उसके क्या हाल होंगे!

हाल ही में मुझे अपने घर के दरवाजों-पल्लों की मरम्मत संबंधी छोटे-मोटे काम करवाने थे । मैंने अपनी कालोनी के आसपास ही रहने वाले एक बढ़ई से संपर्क साधा । वह सुबह-शाम घर पर आकर कार्य संपन्न करने को तैयार हो गया । तदनुसार वह रोज ही दो-एक घंटे काम कर जाता था । अपने साथ वह किसी सहायक को नहीं लाता था, अतः जहां कहीं जरूरत होती मुझे ही उसकी मदद करनी पड़ रही थी । उसके साथ कार्य करते समय मैं उससे आम चर्या की बातें भी कर लेता था ।

इसी दौरान एक दिन मैंने उससे उसके बालबच्चों के बारे में पूछ लिया । उसने बताया, “सा’ब, मेरे तीन बच्चे हैं, दो लड़कियां और सबसे छोटा एक लड़का ।”

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछे जाने पर उसने कहा, “सा’ब, बड़ी लड़की गूंगी-बहरी है, इसलिए उसके स्कूल जाने का सवाल ही नहीं । दूसरी लड़की +2 में पढ़ रही है । तीसरा स्कूल ही नहीं जाता । क्या करें कहना नहीं मानता और दिन भर मुहल्ले के आवारा लड़कों के साथ अपना समय जाया करता है । मैंने उसे अपने साथ काम पर लगाने की कोशिश की कि कुछ सीख लेगा और अपनी रोजी-रोटी कमाने लगेगा । लेकिन वह किसी की सुनता ही नहीं ।”

बड़ी लड़की के बारे में उसने बताया कि वह कहीं खो गयी है । मेरे यह पूछने पर कि कब और कैसे गायब हुई, उसने बताया, “दो साल पहले इसी विजयादशमी के मौके पर वह मोहल्ले के लोगों के साथ डीएलडब्ल्यू परिसर में रावणदहन देखने चली गयी, जहां उन लोगों का साथ छूट गया । गूंगी बहरी वह किसी को कुछ बता ही नहीं पाई होगी ।”

अपना दुखड़ा सुनाते-सुनाते उसने आगे कहा, “उसको खोजने में मेरे लाख-एक का खर्चा भी हो गया, लेकिन वह मिली नहीं । इधर किसी ने बताया है कि भदोही में एक ज्योतिषी जी रहते हैं, जो खोए हुए आदमी के बारे में सटीक बता देते हैं । कल उनके पास भी जाने की सोच रहा हूं । शायद लड़की का कुछ पता चले ।”

और दूसरे दिन वह भदोही भी हो आया । अगली सुबह मेरे काम पर आने पर उसने कहा, “सा’ब, ज्योतिषी जी ने बताया है कि मेरी लड़की चुनार में किसी भले मानुष के घर पर सकुशल रह रही है । अब एक चक्कर वहां का भी लगाना है ।”

फिर दोएक रोज के बाद वह चुनार भी हो आया । अगले दिन उसने चुनार तक हो आने की बात बताई और कहा कि वहां भी लड़की का कुछ पता नहीं चला । मैंने उससे जानना चाहा, “क्या आपने कभी पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई ? उन्होंने मदद का आश्वासन दिया क्या ?

उसने कहा, “पुलिस कहां हम गरीबों की सुनती है, सा’ब । कह दिया जाकर खुद ही खोजो । हम रोज कमाकर पेट पालने वाले लोग हैं । काम छोड़ कहां-कहां जाएं और कितने-कितने दिन के लिए जाएं ?”

उस दिन उसके चले जाने के बाद मैं सोचने लगा कि भारत वाकई अजीब देश है । यहां पुलिस आम लोगों की मदद के लिए नहीं होती । अगर रसूखदार आदमी का कुत्ता भी गायब हो जाए, तो पूरा पुलिस बल उसे खोजने निकल पड़ता है । किंतु किसी साधारण आदमी के घर का सदस्य खो जाए, तब वह भुक्तभोगी को दुत्कार कर भगा देती है । इस जमाने में तो संचार-प्रसार के सक्षम माध्यम मौजूद हैं, और किसी की भी तस्वीर का प्रसारण करके गुमशुदा व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है । फिर भी पुलिस की उदासीनता और अक्षमता के चलते आम जन को कोई मदद नहीं मिल पाती है ।

उस रात मेरे दिलो-दिमाग में उस लड़की को लेकर एक सवाल रह-रहकर उठने लगा । न जाने क्या हाल होंगे उस लड़की के । वह जिंदा तो होगी ही, क्योंकि मौत आसानी से आती नहीं । आदमी में जिजीविषा की भावना बहुत प्रबल होती है । वह मांग-मूंगकर भी पेट भर लेता है और जिंदा रह पाता है । लेकिन एक लड़की होने के नाते वह बेहद असुरक्षित अवश्य होगी । मुझे लगने लगा कि अब तक उसके साथ कोई न कोई जरूर बलात्कार कर चुका होगा । हो सकता है किसी पुलिस वाले ने ही उसे अपना शिकार बनाया हो । भरोसा नहीं पुलिस का ! आखिर इस संसार में मानव भेड़ियों की कोई कमी थोड़े ही है । और …, और वह गर्भवती भी हो चुकी होगी । अब तो दो साल बीत चुके हैं । क्या पता इस बीच उसने किसी मासूम को जन्म भी दे डाला हो, जिसे गोदी में लेकर वह दर-दर ठोकर खा रही हो । भला उसे किसने शरण दी होगी, किसने उसकी मदद की होगी ? ऐसी तमाम संंभावनाएं मेरे विचारों में छाने लगीं ।

… जिंदगी की वास्तविकता कभी-कभी बड़ी डरावनी लगती है मुझे । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी –
भदोही’ वाराणसी के नजदीक एक छोटी-सी नगरी एवं जिला मुख्यालय है जो कालीन व्यवसाय के लिए विख्यात है । ‘चुनार’ वाराणसी से सटे मिर्जापुर जिले का एक कस्बा है जो सस्ते प्रकार के चाइना क्ले के बने कप-प्लेटों तथा सजावटी सामानों के लिए जाना जाता है । वहां एक किला भी है ।

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“आज के जमाने में किसी प्यासे को पानी पिलाने से भी कतराते हैं लोग”

वाकया पांच-छः हफ्तों पहले का है । गर्मियों के दिन, दोपहर का वक्त और ऊपर से तेज धूप । मेरे मकान के गेट पर लगी घंटी घनघनाती है । मैं बाहर आता हूं । गेट पर कूरियर से आई डाक देने एक युवक अपनी साइकिल के साथ खड़ा है । मैं गेट खोलता हूं और वह मकान के अहाते में दाखिल होता है, जहां पर छांव है । मैं उसके द्वारा पेश कागज पर डाक प्राप्ति के संकेत स्वरूप दस्तखत करता हूं, और उससे डाक ले लेता हूं । वह लौटने को गेट की ओर मुड़ने लगता है । मैं उसे रोकते हुए पूछता हूं, “आप धूप में आए हैं, प्यासे होंगे । इस ग्रीष्मकालीन धूप में काफी पानी पीकर चलना चाहिए । पानी पिलाऊं आपको क्या ?”

“अगर एक गिलास पानी पिला सकें तो मेहरबानी होगी ।” वह व्यक्ति पानी पीने की इच्छा जाहिर करते हुए जवाब देता है ।

मैं उस आदमी को दो मिनट रुकने की बात कहते हुए घर के अंदर दाखिल होता हूं । घर में मेरे अतिरिक्त एकमात्र अन्य सदस्य मेरी पत्नी है, बस । मैं पत्नी से एक गिलास शरबत तैयार करने को कहता हूं । फिर एक ट्रे में दो टुकड़े मीठे के साथ शरबत और ठंडे पानी के गिलासों के साथ बाहर आता हूं और बाहर पड़े एक स्टूल पर रखते हुए उस व्यक्ति को पेश करता हूं ।

“अरे…, आप तो …।” उसके मुख से दोएक शब्द निकलते हैं । उसके चेहरे पर किंचित् विस्मय के साथ संतोष के भाव झलकते हैं ।

“कोई बात नहीं, … आप इन्हें लीजिए ।” मैं उसे आश्वस्त करता हूं ।

वह पेश की गयी सामग्री खा-पीकर धन्यवाद देता है, और उसके बाद कहता है, “आप तो बुलाकर पानी पिला रहे हैं । भला कौन करता है ऐसा ! गेट पर खड़े होकर कोई प्यासा एक गिलास पानी मांगे तो उसे देने से भी कतराते हैं लोग । आपकी तरह पानी ही नहीं शरबत भी पिलाए कोई ऐसा शायद ही कहीं देखने को मिले ।”

“नहीं, ऐसा नहीं है । दुनिया में सभी प्रकार के लोग होते हैं । यह तो संयोग की बात है कि कब किस प्रकार के आदमी से भेंट हो जाए ।” मैं प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूं । फिर पूछता हूं “आपको तो अभी और जगह भी जाना होगा । देर हो रही होगी ।”

वह आभार व्यक्त करते हुए नमस्कार करता है और गेट के बाहर निकल जाता है । पीछे से मैं भी गेट पर आता हूं और उसे विदा करते हुए गेट बंद कर देता हूं । बात आई-गई हो गयी ।

संयोग से करीब दो-चार दिन पहले वह व्यक्ति फिर एक डाक लेकर मेरे पास पहुंचा । मुझे अक्सर कूरियर से डाक मिलती रहती है, कभी कोई पुस्तक तो कभी किसी स्वयंसेवी संस्था के कागज पत्र, या परिचितों के द्वारा भेजी कोई सामग्री, आदि । आम तौर पर हर बार किसी नये कूरियर-वाहक से साक्षात्कार होता है । लेकिन इस बार दुबारा एक व्यक्ति मेरे पास पहुंचा । गर्मी यथावत् चल रही थी, और उस दिन भी अच्छी-खासी धूप थी । पिछली बार की तरह इस बार भी मैंने शरबत और पानी के साथ उसकी आवभगत की । प्रतिक्रिया में इस बार वह पूछने लगा, “मुझे याद है कि पिछली बार भी आपने ठंडा खिलाया-पिलाया था । लगता है कि आपके पास आने पर कुछ भी खाने-पीने को मिल जाएगा । क्या आप अक्सर ऐसा करते हैं ?”

“कुछ ऐसा ही समझ लीजिए ।” मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया ।

“मैं समझता हूं आम तौर पर ऐसा शायद ही कोई करता है । लेकिन लगता है कि आप कुछ हटकर सोचते हैं । जान सकता हूं कि ऐसा क्यों ?”

मैं हंस देता हूं, “अच्छा लगता है इसलिए ।” मैं क्षण भर के लिए चुप रहता हूं, फिर अपने विचार समझाने के लिए आगे कहता हूं, “गेट पर कोई पहुंचा हो तो उससे अदब-से पेश आना और चाय-पानी के लिए पूछ लेना अच्छा लगता है, खास तौर पर इसलिए कि ऐसा करना मेरी हैसियत में है । गेट पर आया हर व्यक्ति चोर-उचक्का-बदमाश हो ऐसा मानकर नहीं चला जा सकता है । अभी तक मुझे कोई बुरा अनुभव नहीं हुआ है । किसी जरूरतमंद की छोटीमोटी मदद करने पर सुकून का अनुभव होता है । … और अधिक अहम बात तो यह है कि अब जिंदगी में बहुत-कुछ पाने को नहीं है, बहुत कुछ छोड़कर जाने का वक्त आ रहा है । क्या पता ऐसा करने से अपनी ‘ऊपर’ की यात्रा कुछ हद तक आसान रहे ।”

वह मेरा मतलब समझ जाता है । कहने लगता है, “चाहता हूं कि कभी इतना समय मिले कि साथ बैठकर आपसे अधिक बातें सुन सकूं । अभी तो मुझे अपना काम संपन्न करने निकलना ही है ।”

धन्यवाद ज्ञापन और समुचित अभिवादन करते हुए वह गेट के बाहर निकलता है और साइकिल पर चढ़कर आगे बढ़ जाता है । पीछे से मैं गेट बंद करता हूं, और संतोष भाव के साथ घर के अंदर दाखिल हो जाता हूं । – योगेन्द्र जोशी

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सिगरेट का धुआं न उड़ा सके तो जिंदगी का मजा क्या? (विश्व धूम्रपान निषेध दिवस – 31 मई)

आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस (World no Tobacco Day) – 31 मई – है । आम जनों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस दिन किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन न करने का संकल्प लें । कोई चार दशक पहले मैं भी सिगरेट पीता था, बहुत नहीं फिर भी करीब एक डिब्बी प्रतिदिन, 10 बत्तियों वाली । तब किसी दिन एक झटके के साथ मैंने उसे छोड़ दिया था । उस घटना के बारे में मैंने इसी ब्लाग में अन्यत्र (20 अप्रैल 2009) लिखा है । धूम्रपान छोड़ना सरल नहीं होता है, लेकिन इतना कठिन भी नहीं होता कि ऐसा करने का इरादा ही न बने । इस अवसर पर मुझे दो घटनाओं का स्मरण हो आता है ।

पहली घटना इंग्लैंड की है करीब 25-26 साल पहले की । मैं तब वहां एक शिक्षा-संस्थान में उच्चानुशीलन के लिए गया हुआ था । जिस प्रोफेसर के साथ मैं अनुसंधान-कार्य में संलग्न था उसकी पत्नी काफी सिगरेट पीती थी, वह शायद चेनस्मोकर थी । वह स्वयं सिगार-सिगरेट का शौकीन नहीं था । (यूरोप में महिलाओं में सिगरेट एवं पुरुषों में सिगार लोकप्रिय है ।) उसने मेरे समक्ष अपनी पत्नी की इस आदत का जिक्र किया था ।

एक दिन मैं प्रोफेसर के घर पर भोजन पर आमंत्रित था । भोजनोपरांत उसकी पत्नी ने सिगरेट सुलगाकर पीना आरंभ किया, तो मुझे सिगरेट पर बहस छेड़ने का मौका मिल गया । मैंने जब उससे जानना चाहा कि वह सिगरेट क्यों पीती है तो उसका सीधा और सपाट उत्तर था कि उसे अच्छा लगता है । यों मेरा प्रश्न बेमानी ही था क्योंकि सिगरेट पीने वाला हर व्यक्ति उसका लुत्फ उठाने के लिए ही ऐसा करता है । लेकिन इस बाबत बात शुरू करने के लिए कुछ तो पूछना ही था । सिगरेट पर बहस छिड़ गयी तो सभी ने अपने-अपने मत किए । प्रोफेसर और मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि सिगरेट स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है । मैंने कहना चाहा कि सिगरेट तो कैंसर रोग तक पैदा कर सकती है । कम से कम इसे ध्यान में रखते हुए तो उसे सिगरेट छोड़ ही देनी चाहिए ।

सिद्धांततः वह हमसे सहमत थी । लेकिन उसने मुझसे पूछा, “क्या सिगरेट ही कैंसर जैसे रोग पैदा करती है? क्या रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम ऐसी बातों का सामना नहीं करना पड़ता है जो आपके शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं? क्या सड़क पर वाहन चलाने पर दुर्घटना नहीं घट सकती है? तो क्या कोई वाहन चलाना बंद कर दे? इस प्रकार के अनेकों प्रश्न मेरे समक्ष रखते हुढ उसने इस बात पर जोर डाला कि निःसंदेह अकाल मृत्यु के संभव कारणों में से एक सिगरेट भी है । किंतु सवाल यह था कि सिगरेट का अपना योगदान कितना होगा, आधा फीसदी, एक फीसदी? यों सुरक्षित अनुभव करने के लिए एक-एक करके अनेकों चीजें छोड़नी पड़ जाएंगी । ऐसे में तो जिंदगी ही बेमजा हो जाए । नीरस जीवन जीने से अच्छा है कि मौत के पास पहुंच लिया जाए ।”

मैंने अनुभव किया कि जिंदगी के प्रति हर व्यक्ति का अपना दर्शन होता है । बिना मजे के जिंदगी बिताने का कोई मतलब नहीं । मजे के लिए कुछ हद तक जोखिम उठाना ही पड़ता है । सवालों का उस महिला को स्वीकार्य उत्तर प्रस्तुत कर पाना उस समय मेरे लिए संभव नहीं हो सका ।

कुछ इसी प्रकार का दूसरा अनुभव मुझे अपने ही नगर वाराणसी में हुआ था । वह घटना भी लगभग तभी की है, शायद बीसएक वर्ष पहले की । मेरे एक रिश्तेदार एवं मित्र मेरे विश्वविद्यालय के ‘रेडियोथेरपी’ विभाग के वरिष्ठतम अध्यापक-चिकित्सक थे । बता दूं कि उक्त विभाग में कैंसर-पीड़ित रोगियों की चिकित्सा होती है । ‘नाभिकीय विकिरण’ यानी ‘न्यूक्लियर रेडिएशन’ से इलाज की व्यवस्था भी वहां थी, जिसे आम बोलचाल में ‘सेंकना’ कहा जाता है । यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि एक चिकित्सक के नाते वे कैंसर का निदान और उपचार करते थे । उम्र में वे मुझसे बारह-चौदह वर्ष बड़े थे । उनसे मेरी मुलाकातें यदाकदा होती रहती थीं, लेकिन किसी भी मुलाकात में मैंने उन्हें सिगरेट पीते नहीं देखा था । वे सिगरेट भी पीते हैं यह बात मेरी जानकारी में नहीं थी, और न ही कभी उनके सिगरेट पीने की संभावना का विचार मेरे मन में आया था ।

एक दिन दोपहर के आसपास कार्यवशात् मैं उनसे मिलने रेडियोथेरपी विभाग पहुंचा । रोगीगण तब तक बहिरंग विभाग छोड़ चुके थे और वे अंदर के अन्य कमरे में आराम करने जा चुके थे । बाहर एक कर्मचारी से मैंने उनसे मिलने की बात कही तो वह अंदर संदेश दे आया । प्रत्युत्तर में डाक्टर साहब ने मुझे कमरे ही बुलवा लिया । अंदर पहुंचने पर मैंने देखा कि वे सिगरेट के कस ले रहे हैं । मेरे लिए यह अप्रत्याशित दृश्य था । सामान्य शिष्टाचार प्रदर्शन के बाद मैंने उनसे पूछ डाला, “आप सिगरेट भी पीते हैं? मैंने पहले कभी सिगरेट पीते नहीं देखा आपको, और न ही किसी के मुख से इस बारे में सुना ।”

मेरी बात पर वे मुस्कुरा दिए और बोले, “अकेले में पीता हूं । बहुत कम लोगों को इस बारे में जानकारी होगी ।”

“लेकिन आप तो अपने मरीजों को सिगरेट छोड़ने की सलाह देते होंगे? और खुद सिगरेट पीते हैं?” मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा ।

वे हंसते हुए बोले, “इसीलिए तो छिपकर पीता हूं । खुद सिगरेट पियूं और दूसरों को न पीने की सलाह दूं, कुछ अजीब नहीं लगता है?”

“इसीलिए तो मैं भी चकित हूं । डाक्टर होने के बावजूद आप सिगरेट पीते हैं यह मेरी समझ से परे है । जानते हैं कि पीना नहीं चाहिए, फिर भी पीते हैं । ऐसा क्यों?”

“अरे यार जोशीजी, आखिर सिगरेट अकेले तो कैंसर का कारण नहीं है । सिगरेट पीने वाला भी बचा रहता है और न पीने वाला भी कैंसर का रोगी हो जाता है । वास्तव में अनेकों कारक हैं रोगों के पीछे । कोई नहीं जानता किसका कितना योगदान है । किस-किस चीज से बचा जाए? मरीजों को सलाह देना पेशे की एक मजबूरी है, और व्यक्तिगत स्तर पर जिंदगी का अपने तरीके से मजा लेना दूसरी मजबूरी है । इसलिए देखा जाएगा ।”

मैंने उनकी बात सुनी और टिप्पणी किए बिना वार्तालाप का विषय बदल दिया ।

दुर्योग देखिए कि इस घटना के करीब दसएक साल बाद वे स्वयं कैंसरयुक्त अर्बुद (ट्यूमर) के रोगी हो गये । समुचित चिकित्सा की गयी, लेकिन वे मृत्यु से बच नहीं सके । – योगेन्द्र जोशी

 

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सहज नहीं सहज बुद्धि का होना

अंग्रेजी में एक शब्द (असल में पदबंध या फ्रेज) है ‘कॉमन सेंस’, जिसका मतलब है वह बौद्धिक क्षमता जिसके हर व्यक्ति (नादान बच्चों को छोड़कर) में होने की सामान्यतः उम्मीद की जाती है, और जिसके बल पर व्यक्ति रोजमर्रा के छोटे-मोटे कार्य संपन्न करने में मूर्खता या गलती करने से बच जाता है । इस कॉमन सेंस को अर्जित करने के लिए किसी को स्कूल-कालेज जाने की जरूरत नहीं होती है, और न ही किसी से प्रशिक्षण लेना पड़ता है । यह तो उम्र के साथ सहज रूप से विकसित होने वाली बुद्धि में निहित रहता है । कहा जाता है कि कॉमन सेंस वास्तव में उतना कॉमन नहीं होता है जितना लोग सोचते हैं । मनुष्य कई मौकों पर हास्यास्पद भूलें कर बैठता है, जो कॉमन सेंस के अभाव का द्योतक होती हैं । शब्दकोश के अनुसार हिंदी में इस शब्दयुग्म के लिए सामान्य बुद्धि है, लेकिन मैं इसे ‘सहज बुद्धि’ कहना पसंद करता हूं – बुद्धि लोगों में जिसके मौजूद होने की उम्मीद सहज या स्वाभाविक तौर पर की जाती है ।

मैं कभी-कभी बहुत खिन्न होता हूं यह देखकर कि कुछ लोगों में सहज बुद्धि का निराशाजनक अभाव होता है – ऐसा अभाव जो मेरी समझ से परे हो । अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं अभी दो-चार दिन पहले के अपने अनुभव का जिक्र करता हूं ।

मेरे पड़ोस में, मेरे मकान के दाहिने बगल, एक बुजुर्गवार रहते हैं । चंद रोज पहले वे मेरे पास आए, मुझसे नट-बोल्ट खोलने-कसने के काम आने वाला रिंच मांगने । उन्हें अपने घर में पानी-पाइप की टोंटी का वाशर बदलना था, या ऐसा ही कोई काम था । बता गये कि उनके परिचित दो युवक वह काम कर लेंगे । करीब आधे घंटे के बाद पड़ोसी के परिचित वे युवक मेरे पास रिंच लौटाने आए । मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि काम नहीं बन सका, अतः किसी जलकल मिस्त्री से ही काम करवाना होगा । उस समय मेरे लिए बात आई-गई हो गयी ।

कोई डेड़-दो घंटे के बाद मेरे घर की घंटी बजी तो मैं बाहर आया । गेट पर एक व्यक्ति खड़ा था । उससे मैंने पूछा, “किसको पूछ रहे हैं ?”

उत्तर मिला, “आपके घर पर पानी-नल की टोंटी ठीक करने आया हूं ।”

मैंने कहा, “मैंने तो किसी को नहीं बुलाया है । किसके यहां जाना है आपको ? नाम-पता तो होगा आपके पास ? टेलीफोन नंबर भी शायद होगा ?”

“यहीं कहीं बताया गया था मुझे ।” उत्तर था ।

“अरे भई नाम तो मालूम होगा मकान मालिक का, या मकान नंबर ही सही । आपको बुलाने वाले ने कुछ तो बताया होगा, लिखकर दिया होगा, आपने नोट किया होगा ।”

“दो-तीन घंटे पहले मेरे परिचित ‘हार्डवेयर’ की दुकान पर दो लड़के पहुंचे थे । वे ही दुकानदार से प्लंबर भेज देने को कह गये थे । यहीं कहीं उन्होंने बताया था ।”

“कमाल के आदमी हैं आप । बिना ठीक-से जाने-बूझे चल पड़े अपने ग्राहक का घर ढूढ़ने । अरे भई, भला नाम-पते के बिना कोई कैसे कुछ बता सकता है ।” मैंने अपनी झल्लाहट को काबू में रखते हुए टिप्पणी की ।

बेचारा मिस्त्री अगल-बगल खोजी नजर डालते हुए आगे बढ़ने लगा । तभी मुझे अनायास याद आई कुछ देर पहले की वह घटना, जब पड़ोसी बुजुर्ग रिंच ले गए थे । मैंने उस आदमी को रोका और पड़ोसी के मकान की ओर इशारा करते हुए कहा, “देखो, शायद इन्होंने आपको बुलाया होगा; जाकर पूछ लो ।”

वह व्यक्ति पड़ोसी का गेट पार कर अंदर चला गया । मैंने डेढ़-दो मिनट इंतजार किया और समझ गया कि वह सही जगह पहुंच गया है ।

दरअसल यह उन कई घटनाओं में से एक है जो मेरे अनुभव में आए हैं । कभी कोई कुकिंग गैस का ‘ट्रालीमैन’ गेट खटखटाता है । पूछे जाने पर “गैस सिलिंडर है सा’ब ।” का उत्तर मिलता है । मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता सुनकर । क्योंकि उसे मकान का वहीं पता मिला होता है जो मेरे मकान का है; जब कि पते में मोहल्ले का ‘एक्सटेंशन’ भी होना चाहिए, जिसे न जाने क्यों नहीं लिखा होता है । मैं उस व्यक्ति को समझाता हूं और उसे सही पते पर भेज देता हूं ।

गैस वाले की तरह ‘हार्डवेयर’ का सामान लेकर भी कुछ ट्राली वाले दरवाजे पर पहुंच जाते हैं । मैं उन्हें अक्सर भटकते हुए देखता हूं । मेरा मोहल्ला काफी बड़ा है । मैं ठीक से नहीं जानता, परंतु सुनता हूं कि इसमें हजारएक से अधिक परिवार रहते हैं । मेरे परिचय क्षेत्र में अधिक लोग नहीं हैं । अतः अक्सर मदद नहीं कर पाता हूं । महीने में दो-तीन वाकये सामने आते ही हैं । किस्म-किस्म के भटकते हुए लोग मुझे देखने को मिल जाते हैं । कोई मरीज को लेकर चिकित्सक को खोजता है, तो कोई अपने नाते-रिश्तेदार को । “किसे खोज रहे हैं ?” पूछे जाने पर नाम-पता ठीक से नहीं बता पाते । कुछ ऐसा जवाब सुनने को मिलता हैः “कान के डाक्टर हैं वे” या “फलां जगह डाक्टर हैं, उन्हींने घर पर बुलाया है ।”

नाते-रिश्तेदार को खोज रहा व्यक्ति कुछ यों पूछता है, “मनोरंजन दुबे कहां रहते हैं, भाईसा’ब ?” “पता-ठिकाना कुछ मालूम है आपको ?” “बी एच यू हैं पढ़ाते हैं जी, इसी मोहल्ले में रहते हैं ।” अधिक कुछ बताने में असमर्थ ।

मैं यह नहीं समझ पाता कि लोग आवश्यक जानकारी लेकर क्यों नहीं चलते । वे इस बात को क्यों नहीं समझ पाते हैं कि जानकारी के अभाव उन्हें भटकना पड़ेगा ? ये बातें सहज बुद्धि की हैं । मुझे लगता है कि कई जनों में सहज बुद्धि वास्तव में नहीं रहती है । – योगेन्द्र जोशी

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जातीय अभिमान का एक उदाहरण

जातीय मानसिकता हमारे हिंदू समाज की विशेषता कही जाती है, एक ऐसी विशेषता जिस पर गर्व नहीं किया जा सकता है और न ही जिसे उचित ठहराया जा सकता है । जातीय व्यवस्था को प्राचीन काल की वर्णाश्रम व्यवस्था का विकृत रूप माना जा सकता है । वर्णाश्रम को स्वयं में कोई दोषपूर्ण सामाजिक व्यवस्था कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उसके सैद्धान्तिक आधार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है । किंतु क्या प्राचीन काल में उन सिद्धांतों का पालन समुचित रूप से समाज में हो रहा था इस प्रश्न का उत्तर असंदिग्ध हां में दे पाना कठिन है । कदाचित् आरंभ में व्यवस्था ठीक चली हो, परंतु कालांतर में वर्णभेद सामाजिक भेदभाव और ऊंचनीच का आधार बन गया हो, जिसने अंततः आज के जातिगत भेदभाव का रूप ले लिया हो ।

क्या यह जातीय मानसिकता हिंदू समाज तक ही सीमित है ? मुझे लगता है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता है और इस क्षेत्र के अन्य धर्मावलंबियों में भी व्याप्त है, भले ही वह खुलकर देखने को न मिले । मैंने सुना है कि अपने देश में मुस्लिमों और सिखों में भी ऊंचनीच की बातें प्रचलित हैं । यह एक तथ्य है कि आज के हिंदुस्तानी गैरहिंदुओं के पूर्वज प्रायः हिंदू ही थे, जिन्होंने परिस्थितिवश अन्य धर्म स्वीकार तो कर लिया, लेकिन जो जातीय दृष्टि से ऊंचे या नीचे होने के भाव से मुक्त नहीं हो सके । जिनके पूर्वज पहले कभी बतौर हिंदू के तथाकथित उच्च जाति में थे, वे धर्मांतरण के बाद भी अपने को ऊंचा समझते रहे । पीढ़ियों पहले की हिंदू पृष्ठभूमि से जुड़े ऐसे विचार वास्तविक हैं इस बात का अनुभव मुझे अपने इंग्लैंड प्रवास में हुआ था, जिसका उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं । (जातीय मानसिकता का एक किस्सा मैं पहले भी अन्य पोस्ट (क्लिक करें) में बयान कर चुका हूं ।)

कोई ढाई दशक पहले मैं दक्षिणी इंग्लैंड के साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक उच्चानुशीलन के लिए गया हुआ था । अपने वहां के प्रवास के समय मेरा परिचय एक पाकिस्तानी शोधछात्र से हुआ था, लगभग मेरा हमउम्र और इस्लाम-धर्मावलंबी । मुझे उसका नाम अब ठीक-ठीक याद नहीं है; इतना ही अब याद आता है कि उसका पारिवारिक नाम (सर्नेम) रफीक था । हम दोनों की भेंट यदाकदा हो जाया करती थी । हमारी परस्पर बातचीत हिंदुस्तानी में ही हुआ करती थी । भेंट होने पर रफीक ‘नमस्ते’ कहकर मेरा अभिवादन करता था । वह जानता था कि कई हिंदीभाषी हिंदू अभिवादन के तौर पर ‘नमस्ते’ का प्रयोग करते हैं । यहां पर इतना बता दूं कि हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी अपने-अपने घरों, यानी देशों, में रहकर एक-दूसरे को जितना भी भला-बुरा कहें, इंग्लैंड प्रवास के दौरान उनके संबंध पर्याप्त मैत्रीपूर्ण और घनिष्ठ रहते हैं । यह बात उत्तरभारतीय हिंदीभाषियों पर खास तौर पर लागू होती है । इसका कारण उनके खान-पान और बोली में पर्याप्त समानता का होना कहा जायेगा । अस्तु, जातीयता संबंधी अपनी आंरभिक बात पर लौटता हूं ।

एक बार रफीक और मेरे बीच की बातचीत में संयोगवश जातीयता का जिक्र आ गया । प्रसंग क्या रहा होगा अब ध्यान में नहीं आता है, किंतु उसके दो-चार शब्द मेरे स्मरण में आज भी हैं । रफीक बोला “भाई साहब, आपको बताऊं, हम राजपूत यानी क्षत्रिय मुसलमान हैं ।”

मेरे यह पूछने पर कि राजपूत मुसलमान होने का मतलब क्या है, उसका जवाब था “असल में हमारे पुरखे राजस्थान के रजवाड़े या उनके खानदान से थे । धर्मांतरण के बाद वे मुसलमान हो गये, लेकिन हमारी जाति अन्य मुस्लिमों से ऊपर रही है । हम ऐसे-वैसे मुसलमान नहीं हैं; हम तो अपने को औरों से ऊंचा मानते हैं ।”

उसकी बात में जातीय गर्वानुभूति की झलक मुझे मिल रही थी । इस संबंध में रफीक से अन्य क्या बातें हुईं अब याद नहीं, लेकिन उसके राजपूत मुस्लिम होने के गर्व का खयाल मुझे आज भी आ जाता है । मुझे लगता है कि वंशानुगत श्रेष्ठता की भावना सभी समाजों में कमोबेश मौजूद रहती है । – योगेन्द्र

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नस्ली भेदभाव का एक छोटा-सा अनुभव

मानव समाज में भेदभाव की भावना सर्वव्यापी है । भेदभाव का आधार सभी समाजों में एक ही हो ऐसा नहीं है । अपने देश में जातीय भेदभाव सामान्य बात है और दुनिया के प्रमुख देशों में शायद ही कोई अन्य हो जहां हमारी तरह का जातिवाद देखने को मिले । इसके विपरीत नस्ली दुर्भावना, जो कई देशों में आम बात है, अपने देश में कदाचित् है ही नहीं । इसका कारण यह हो सकता है कि नस्ल की दृष्टि से हम भारतीय मिश्रित माने जा सकते हैं । शारीरिक बनावट और रंगरूप के आधार पर हम किसी नस्ल के नहीं कहे जा सकते हैं । विदेशियों के साथ अगर कभी कोई दुर्व्यवहार की बात अपने यहां घटती है तो वह नस्ली आधार पर नहीं बल्कि किसी अन्य कारण से होता है । परंतु पश्चिम के देशों, जहां के मूल बाशिंदे गोरे कहे जाते हैं, में नस्लभेद कोई नई बात नहीं रही है । विश्व के जिन भूक्षेत्रों में वे उपनिवेश स्थापित करके और बहुसंख्यक बनके बस गये, वहां भी नस्ली भेद की आशंका की जा सकती है ।

यह अवश्य है कि सामान्यतः नस्लवाद की मौजूदगी हिंसक वारदातों के रूप में बहुत कम देखने को मिले । अपने यहां ही देखिए, जातिवाद की जड़ें गहरी हैं, किंतु खुलेआम जातिगत दुर्व्यवहार के मामले गिनेचुने ही होते हैं । भावना रहती है, लेकिन उजागर नहीं होती है । काले-गोरे, देशी-विदेशी, मुस्लिम-ईसाई, आदि की भावनाओं से मानव समाज कहीं भी मुक्त नहीं है, बस ये प्रायः सर्वत्र नियंत्रण में रहती हैं । फिर भी कभी-कभार कुछ कमजोर प्रकृति के लोग अपनी वैमनस्य की अथवा किसी प्रकार की असुरक्षा की भावना से प्रेरित होकर उल्टा-सीधा करने निकल पड़ते हैं, जैसा कि आजकल आस्ट्रेलिया में भारतीयों के विरुद्ध कुछएक घटनाओं में हुआ है । पश्चिमी देशों में विदेशियों या विदेशी मूल के नागरिकों की मौजूदगी कइयों को नागवार लगती है ऐसा मैंने खुद अनुभव किया है, अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान ।

मेरे अनुभव पिछली शताब्दि के नौवें दशक के मध्य के हैं । तब से अब तक इंग्लैंड में माहौल बहुत कुछ बदल चुका होगा । मैं तब वहां साउथ्हैम्टन विश्वविद्यालय में उच्चाध्ययन के लिए गया था दो वर्ष के प्रवास पर । एक बात का खुलासा मैं आरंभ में ही कर दूं कि हम हिंदुस्तानियों की अंग्रेजी प्रायः किताबी होती है, अर्थात् पुस्तकों से पढ़-पढ़कर सीखी हुई । इस भाषा के व्याकरण के ज्ञान में हम औसत अंगरेज से बेहतर हो सकते हैं, लेकिन हमारे बोलने-चालने में नैसर्गिक प्रवाह कम ही रहता है । रोजमर्रा के बोलचाल में हम में से कम ही लोग उसका व्यवहार करते हैं । हम हिंदुस्तानियों का लहजा एक ठेठ अंगरेज से भिन्न रहता है और ‘एक्सेंट’ के मामले में तो हम काफी पीछे माने जायेंगे । कहने का मतलब यह है कि यदि किसी हिंदुस्तानी को अचानक इंग्लैंड में आम अंगरेजों के बीच में बिठा दिया जाये, तो उसे अपना अंगरेजी ज्ञान अपर्याप्त ही लगेगा । कम से कम मुझे तो आंरभ में यही लगा था । तब मुझे विश्वविद्यालय में खास दिक्कत नहीं हुई थी, क्योंकि वहां के पढ़े-लिखे लोगों के मुख से ‘मानक’ साफ-सुथरी अंगरेजी सुनने और समझने को मिल जाती थी । लेकिन सड़कों और बाजारों में सभी प्रकार के लोग मिल जाते थे, जिनमें से किसी-किसी की अंगरेजी मुझे कभी-कभी समझ से परे लगती थी ।

हां, तो मैं अपने अनुभव की चर्चा पर लौटता हूं । वहां के मेरे प्रवास के आरंभिक दिनों की बात है । तब मैं उस नये वातावरण से परिचित होने की प्रक्रिया में था । हर सायंकाल शहर के किसी न किसी कोने पर पहुंच जाता था । शाम के दो-तीन घंटे वहां के बाजारों, दुकानों, सड़कों, पार्कों, और लोगों के तौर-तरीकों की जानकारी हासिल करने में निकल जाते थे । एक दिन मैं ‘सिटी सेंटर’ की ओर निकल गया, और एक सड़क के किनारे खड़े होकर वहां का नजारा देखने लगा । तभी एक उम्रदराज व्यक्ति मेरे बगल में आ खड़ा हुआ और मुझसे सटते हुए-सा कुछ बोलने लगा । वह कद-काठी में सामान्य था और उसके पहनावे तथा हावभाव से मुझे यही लगा कि वह वहां के संपन्न वर्ग का अंगरेज नहीं था । मैं उसकी बातों को समझने की कोशिश करने लगा, लेकिन समझ में ठीक-से कुछ आ नहीं रहा था । उसके चेहरे पर उभरे नाखुशी या असंतोष के भावों को मैं अनुभव कर रहा था । असहज महसूस करने पर कुछ सेकंडों के बाद मैं एक-दो कदम बगल की ओर में खिसक लिया । वह फिर मेरे बगल में सटकर खड़ा हो गया और कुछ बोलता रहा । मुझे लगा कि उसे मेरी मौजूदगी ठीक नहीं लग रही थी । ऐसा लग रहा था कि उसे मुझसे चिड़-सी हो रही है और वह शायद मेरे प्रति अपशब्द बोल रहा था, परंतु क्यों इस बात को मैं समझ नहीं पा रहा था । उस क्षण नस्लभेद जैसी बात का विचार भी मेरे मन में नहीं आया था । मुझे लगा कि वहां से हट जाना ही ठीक रहेगा । और मैं तेज कदमों से आगे बढ़ गया । बाद में रात्रि विश्राम के समय मेरा ध्यान दिन की उस घटना की ओर गया । तब मुझे लगा कि बात कुछ ‘वैसी’ ही है ।

बात कुछ ‘वैसी’ ही रही होगी इस बात का एहसास मुझे बाद में अपने कार्यस्थल (विश्वविद्यालय) के एक कर्मचारी के रवैये से भी लगा । मैं अपने विभाग के भंडार (स्टोर) से कागज-कलम, पेंसिल-इरेजर आदि सामग्री यदाकदा आवश्यकतानुसार लेने जाया करता था । वहां मेरा सामना कभी-कभी एक अधेड़ उम्र के कर्मचारी से हो जाया करता था । वह व्यक्ति गाहे-बगाहे मुझसे अप्रासंगिक सवाल पूछ बैठता था, जैसे ‘इंडिया से यहां क्यों आये हो ?’, ‘इंडिया कब लौट रहे हो ?’, ‘अभी तुम इंडिया लौटे नहीं ?’, इत्यादि । मैं सोचता कि यह आदमी हर बार ऐसे ही सवाल क्यों पूछता है । आंरभ में तो मुझे ऐसे प्रश्न सहज जिज्ञासा से प्रेरित लगे थे, किंतु बाद में मुझे ये दुर्भावना-जनित लगने लगे ।

इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि उक्त प्रकार की घटनाएं अपवाद रूप में ही घटीं और वह भी विशेष गंभीर नहीं थीं । किंतु उनमें छिपा संदेश स्पष्ट था । अन्यथा यह सुयोग ही रहा कि मेरे दो वर्ष के प्रवास में वहां के आम बाशिंदों के व्यवहार में शायद ही कभी कोई कमी मैंने पाई । – योगेन्द्र

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