Category Archives: राजनिति

“हे भगवन्, अगला जनम मोहे अमरीका में दीजो ।”

सोमबार, 15 अक्टूबर, का दिन है और अभी संध्याकाल का समय है । मैं घर के पास की दवा की दुकान पर पहुंचा हूं । परिचित होने के नाते दवा-विक्रेता से दो-चार मिनट बतियाते हुए काउंटर के एक तरफ खड़ा रहता हूं । तभी एक युवक तेजी से दुकान पर पहुंचता है । दवाविक्रेता से वांछित दवा मांगते हुए वह समाचार देता है, “जानते हो, गोदौलिया और उसके आसपास कर्फ्यू लग गया है ।”

दवाविक्रेता पूछता है, “क्यों ? क्या हो गया वहां ?”

युवक बताता है, “मालूम नहीं है क्या ? आज साधु-संतों  ने प्रतिकार दिवस मनाने का कार्यक्रम रखा था । गोदौलिया क्षेत्र में उनका विरोध-प्रदर्शन चल रहा था । जुलूस लेकर शहर के अन्य जगहों पर पहुंचने का इरादा रहा होगा प्रदर्शनकारियों का । पुलिस ने उनको आगे बढ़ने से रोकना चाहा । बस, क्या था, भगदड़ मच गयी । उपद्रवी लोगों को मौका मिल गया और उतर गये आगजनी और लूटपाट पर ।”

“अभी एक-दो घंटा हो रहा होगा घटना हुए । यहां गोदौलिया से दूर हम लोगों को तुरंत खबर कहां लगती है, वह भी दुकानदारी की व्यस्तता के समय । शहर की ओर से कोई आ रहा हो तो उसी के मुख से सुनने को मिलता है ।” दुकानदार घटना के बारे में अनभिज्ञता जताता है ।

अन्य नगरवासियों की भांति मुझे भी तथाकथित साधु-संतों के प्रतिकार दिवस की पृष्ठभूमि का अंदाजा है । बीते 22 सितंबर को ये साधु-संन्यासी इस मांग को लेकर आंदोलन पर उतर आए थे कि उन्हें गंगाजी में ही मूर्ति-विसर्जन की इजाजत दी जाए । कुछ दिनों पहले गणेशोत्सव मनाया गया था । उस समय गणेश-प्रतिमाओं को गंगाजी में विसर्जित करने पर रोक लगाई गयी थी । गंगाजी में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के मद्देनजर प्रशासन ने उसके जल में मूर्ति-विसर्जन को प्रतिबंधित कर रखा है । आस्था के नाम पर इन साधु-संन्यासियों को वैकल्पिक व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है । शायद उस समय की कुछ प्रतिमाएं अभी विसर्जित होनी हैं । चंद रोज बाद दशहरा-पूजा पर देवी-प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित होंगी, तब उनके विसर्जन की भी समस्या होगी । उस 22 सितंबर को इन लोगों के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था और पुलिस ने भीड़ नियंत्रित करने का वही पुराना तरीका अपनाया था । साधु-संतों पर लाठियां बरसीं थीं और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे । आज की प्रतिकार रैली उस दिन की लाठीचार्ज की घटना के प्रति विरोध दर्ज करने के उद्येश्य से आयोजित थी । प्रायः हर ऐसे मौके पर बात अंत में बिगड़ ही जाती है । मतलब कि इस बार फिर से लाठीचार्ज हुआ ।

मैं उस अपरिचित युवक की ओर मुखातिब होकर पूछता हूं । “भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने लाठियां भांजी होंगी । बेचारी पुलिस करे भी क्या ! भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उसके पास सदा लाठी का ही तो एकमात्र सहारा होता है । और जनता है कि ढेलेबाजी से जवाब देना वह भी नहीं भूलती है ।”

मेरी बात पर सहमत होते हुए युवक कहता है, “पता नहीं इस देश को क्या हो गया है । जब देखो जहां देखो कुछ न कुछ अनिष्ट घटित होता दिख जाएगा । कहीं गोमांस को लेकर लोग आपस में लड़ रहे हैं । कहीं सड़क पर मामूली विवाद पर लोगों का कत्ल हो जा रहा है । कहीं किसी युवती या बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है । कही पुलिस अपनी हिरासत में ही आरोपी को मार डालती है । कभी बात-बात पर रेलगाड़ियां रोक दी जाती हैं, तो कभी सड़क पर वाहनों को आग लगा दी जाती है, और कभी बाजार में लूटपाट शुरू हो जाती है । यह सब उस देश में हो रहा है जहां के लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति और धर्मनिष्ठा का ढिंडोरा पीटने से नहीं अघाते हैं ।”

“अपनी बात में इतना और जोड़ लीजिए कि जनता की सेवा का ढोंग रचने वाले हमारे राजनेताओं ने तो संयत और शिष्ट भाषा न बोलने की कसम खा रखी है । दो-चार दिन में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं । अपने चुनाव अभियान में नेतागण कैसी भाषा बोल रहे हैं ? वे अपने विपक्षियों के विरुद्ध गाली-गलौज की भाषा में आरोप-प्रत्यारोप में जुटे हैं । लोकतंत्र में शालीनता होनी चाहिए कि नहीं ? समाज के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण पेश करते देखा है आपने कभी उनको ?” मैं भी दो शब्द उसकी बातों में जोड़ देता हूं ।

“यही सब देखकर तो मन खिन्न हो जाता है, अंकलजी । समझ में नहीं आता है कि देश के हालात कभी बेहतर भी होंगे ।” उसने मेरी ओर देखकर कहता है । वह मेरी उम्र देखते हुए मुझे ‘अंकलजी’ कहकर संबोधित करता है । पिछले कुछएक दशकों से उम्रदराज आदमियों को अंकल शब्द से पुकारने की परिपाटी समाज में चल चुकी है ।

उसकी खिन्नता मुझे वास्तविक लगती है । मैं खुद भी देश के हालात को निराशाप्रद पाता हूं । मैं उसके कहता हूं, “यह देश सुधरने वाला नहीं है । मैं पचास-एक सालों से देश के हालातों को देखते आ रहा हूं । अवश्य ही देश भौतिक उपलब्धियों के नजरिये से आगे बढ़ा है; लोगों की संपन्नता बढ़ी है, सुख-सुविधा और ऐशो-आराम के साधन बढ़े हैं । लेकिन सामाजिक स्तर पर गिरावट आती गई है । ईमानदारी घटी है, संवेदनशीलता में कमी आई है, आपसी विश्वास पहले जैसा नहीं रहा, लोभ-लालच बहुत बढ़ गया है, असहिष्णुता बढ़ी है, लोग अधिक हिंसक हो चले हैं, और भी बहुत कुछ मेरे देखने में आया है । क्या-क्या बताऊं ?”

“अंकलजी, कभी-कभी मेरा मन होता है कि भगवान से प्रार्थना करूं, ‘हे भगवान, अगले जनम में मुझे अमेरिका में पैदा करना ।’” कहते हुए वह युवक अपनी दवा उठाकर चल देता है । – योगेन्द्र जोशी

 

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चालीस साल पहले हुआ था हिन्दी से जुड़ा एक अनुभव मद्रास (चेन्नै) में

मोदी सरकार ने हाल में राजभाषा हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया है । इस नई सरकार के “हिन्दी प्रेम”के प्रति कई राजनेताओं ने विरोधात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है । प्रखर विरोध तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों के शीर्षस्थ नेताओं की ओर से देखने को मिला है । अन्य राज्यों के नेताओं ने नाखुशी तो व्यक्त कर दी, लेकिन उनका विरोध जबर्दस्त नही कहा जा सकता है । वस्तुतः तमिल राजनीति हिन्दी विरोध पर टिकी है । वहां के नेतागण इसे अपनी तमिल अस्मिता से जोड़ते हैं । संविधान सभा में जब हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात की जा रही थी तब भी यह विरोध था और आज भी है । दक्षिण भारत की अपनी हालिया यात्राओं में मैंने अनुभव किया है कि हिन्दी के प्रति उनके रवैये में बदलाव आता जा रहा है ।

हिन्दी विरोध की बात पर मुझे 1973 में संपन्न दक्षिण भारत की अपनी यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब मैं अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में नया-नया प्रविष्ट हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । तब बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । किसी अन्य शहर से चेन्नै-बेंगलूरु का आरक्षण रेलवे विभाग तार (टेलीग्राम) द्वारा किया करता था जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । लेकिन आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में होती भी नहीं थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । (प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर सोते हुए रातें गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है ।) कुछ ही देर में वहीं मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रह सकते हैं और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । पाश्चात्य समाजों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन से यह खासियत अब गायब होने लगी है ।

उन सज्जन को जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर तो हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।”

उनको जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।

उनका उत्तर था, “मैं केरला का रहने वाला हूं और कुछ देर बाद अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकलूंगा । दरअसल मुझे कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से नहीं बात कर सकते ।”

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनसे कहा, “मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उस विरोध का अनुभव भी कर रहा हूं । ऐसा विरोध तो केरला में भी होगा न ?”

“नहीं, ऐसा नहीं है । केरला के लोग व्यावहारिक हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं । आपने केरला की नर्सों को उत्तर भारत के अस्पतालों में भी देखा होगा । केरला के लोग जानते हैं हिन्दी से परहेज उनके हक में नहीं है ।”उनका उत्तर था ।

और कुछ समय बाद वे अपनी रेलगाड़ी पकड़ने चल दिए । इस दौरान उनसे अन्य कितनी तथा कैसी बातें हुई होंगी इसे आज ठीक-से बता पाना संभव नहीं । पर इतना जरूर कह सकता हूं कि ऊपर कही गईं बातें वार्तालाप का सारांश प्रस्तुत करती हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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एक नहीं दो बार वोट, और वह भी एक को नहीं

इस बार मेरे शहर वाराणसी का लोकसभा चुनाव देश भर के लिए सर्वाधिक महत्व का रहा, क्योंकि यहां से बहुचर्चित प्रत्याशी थे नरेन्द्र मोदी और साथ में थे उनको चुनौती देने वाले नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल । यों इनके अलावा भी मैदान में ताल ठोंकने वाले थे अपने-अपने दलों के प्रत्याशी अजय राय, कैलाश चौरसिया एवं विजय जायसवाल, जिनका अपना-अपना जनाधार रहा है । इन पाचों को मिलाकर मैदान में थे कुल 42 प्रत्याशी जिनमें अधिकांश अज्ञात श्रेणी के थे । इतनी बड़ी संख्या के लिए तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था की गई थी प्रत्येक पोलिंग बूथ पर । इतने प्रत्याशी मैदान में क्यों उतरे होंगे यह वे ही बता सकते हैं, पर मतदान को पेचीदा बनाने में उनका योगदान अवश्य रहा ।

वस्तुतः वाराणसी इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र बन गया था । मेरे लिएयह चुनाव इसलिए माने रखता था कि मैं एवं मेरी पत्नी स्थायी बाशिंदे होने के कारण इस क्षेत्र के लंबे अर्से से मतदाता हैं । इस बार के चुनाव में मुझे कुछएक ऐसे अनुभव हुए जो मेरी दृष्टि में चुनाव आयोग की घटिया कार्यप्रणाली दर्शाते हैं ।

हमारी कालोनी के चुनाव स्थल पर दो अलग-अलग कमरों में अलग-अलग मतदाता सूची के अनुसार मतदान प्रक्रिया चली । पहले कमरे पर मतदाताओं की संख्या इतनी कम थी कि वहां लाइन लगााने की जरूरत ही नहीं थी, जब कि दूसरे पर मतदाताओं को लंबी लाइन में इंतिजार करना पड़ रहा था । एक दिलचस्प लेकिन आपत्तिजनक बात जो मैंने वहां देखी वह है कि कुछ मतदाताओं के नाम दोनों ही सूचियों में मौजूद थे । पोलिंग बूथ पर पहुंचने पर जब हम अपने को मिले मतदाता पर्ची के अनुसार उस लंबी लाइन में लगे तो एक युवक हमारे पास पहुंचा और बोला, “अंकलजी, आप दोनों का नाम तो पहली सूची में भी है । क्यों न वहीं वोट डाल दें । लंबी लाइन में लगने से बच जाएंगे ।”

लाइन में लगने से बच जाएं और तुरंत मतदान करके छुट्टी पा जाएं इससे भला और क्या हो सकता था । लाइन छोड़ हम वहीं पहुंच गए । उस कमरे के प्रभारी ने आरंभ में मेरी पहचान पर शंका जाहिर की लेकिन फिर मान लिया कि मैं सही मतदाता हूं । मतदान की शेष प्रक्रिया संपन्न की गई और मैंने मशीन का वांछित बटन दबाकर मत व्यक्त कर लिया । लेकिन समस्या मेरी पत्नी के साथ आई जब मतदान कर्मचारियों ने कहा कि उनका नाम सूची में “विलोपित”श्रेणी में है । यानी वे मतदाता हुआ करती थीं लेकिन अब नहीं रहीं । अजीब बात कि पति-पत्नी सालों से साथ-साथ अपने निजी मकान में रहते आए हैं और उनमें से एक का नाम गायब ! बहस करना निरर्थक रहा । इस विलोपित श्रेणी को मतदाता सूची में रखने का औचित्य हमारी समझ से परे था । हम बाहर निकले और मेरी पत्नी वापस उसी लाइन में फिर से लग गईं जिसे छोड़कर आईं थी । इस बीच लाइन में और लोग जुड़ चुके थे, जिसके कारण अतिरिक्त विलंब झेलना पड़ा । डेड़एक घंटे में वह अपना मत दे पाईं ।

मैंने मतदाताओं की परस्पर भिन्न दो-दो सूचियों की बात ऊपर कही है और बता चुका हूं कि कुछ व्यक्तियों के नाम दोनों में मौजूद थे । ऐसी सूचियों को मैं आयोग की अकुशल एवं दोषपूर्ण कार्य प्रणाली के प्रमाण के तौर पर देखता हूं । ऐसी सूची दोहरे मतदान की संभावना कैसे पैदा करती हैं इसे मैं एक अनुभव से स्पष्ट करना हूं ।

मतदान के दूसरे दिन प्रातः मैं अपने घर के पास की सब्जीसट्टी पर गया । वहां मैं एक परिचित युवक के पास पहुंचा जो ठेले पर सजाकर सब्जी बेच रहा था । खरीद-फरोख्त के दौरान उसने पूछा, “अंकल, कल वोट तो दिया ही होगा । किसको दिया वोट ?” 

मैंने अपने वोट के बारे में बताने के बजाय उल्टे उसी से पूछ डाला, “तुम बताओ तुमने किसको वोट दिया ?”

  “मैंने तो दो-दो वोट डाले कल, दोनों अलग-अलग जनों को ।”उसका उत्तर था ।

“सो कैसे ?” मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा ।

“हुआ यह कि मैं सुबह ही वोट डाल आया । घर लौटने पर मेरे पड़ोसी दोस्त ने कहा, ‘तुम्हारा नाम तो दोनों लिस्ट में है । क्यों न दुबारा वोट डाल आते हो ।’सो मैं दुबारा वोट डाल आया ।”

“दूसरी बार भी उसी प्रत्याशी को वोट दिया होगा ।” मैंने अनुमान लगाया ।

“नहीं अंकलजी, पहली बार मैंने मोदी को वोट दिया और दूसरी बार केजरीवाल को । असल में दोनों ही अच्छे हैं । इसलिए दोनों को ही एक-एक वोट दे दिया ।” उसका जवाब था ।

“लेकिन तुम्हारी अंगुली पर तो स्याही का निशान रहा होगा; दुबारा कैसे वोट डाल पाए ?” मैंने सवाल किया ।

“दरअसल मेरे दोस्त ने उसकी काट भी मुझे बताई । उसने कहा कि निशान ताजा है सो पपीते के सफेद चेप से साफ हो जाएगा । वही मैंने किया । यों टॉयलेट की सफाई में इस्तेमाल होने वाले एसिड से भी साफ हो जाता है ।”

“अच्छा ठीक है, अभी तुम अपने ग्राहकों को सब्जियां तौलो ।” कहते हुए मैं घर लौट आया ।

इतना बता दूं कि वह युवक किसी अन्य पोलिंग बूथ का मतदाता था । उसकी बातें सुनकर मैं सोचने लगा कि अगर मतदाताओं के नाम एकाधिक सूचियों में हों और वे अंगुली पर लगा निशान मिटाकर दुबारा-तिबारा मत प्रयोग करें तो चुनाव परिणाम विश्वसनीय नहीं रह सकते । – योगेन्द्र जोशी

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नेताजी की नींद में खलल और टूटना सपने का

          नेताजी की पार्टी के मुखिया और सर्वेसर्वा का जन्मदिन था । शहर में बड़े धूमधाम से जन्मदिन बनाया गया । मुखिया के वजन के बराबर का केक बनवाया गया । ऐसा करना जरूरी जो था, अपनी प्रतिष्ठा के लिए और मुखिया तक संदेश पहुचाने के लिए कि वे कितने बफादार और समर्पित तोताछाप स्नेहपात्र हैं । वे थे तोताछाप ही क्योंकि मुखिया के मुंह से जो भी सही-गलत निकलता था उसे वे शब्दशः रट लेते थे और गाहे-बगाहे कहीं भी उगलकर अपनी स्वामीभक्ति प्रकट कर लेते थे । वैसे तो पूरी पार्टी तोताछाप बधुंवा कार्यकर्ताओं का एक जमावड़ा था, फिर भी उनकी जैसी खूबी और लोगों में नहीं थी । मुखिया ने भी खुश होकर उन्हें प्रदेश का अध्यक्ष चुना था । वे आश्वस्त थे कि मुखिया कभी न कभी उन्हें राष्ट्रीय स्तर की बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपेंगे और पार्टी में उनका कद बढ़ाएंगे । इसी उम्मीद के साथ उन्होंने जन्मदिन की इतनी तैयारी की थी । शहर में जगह-जगह मुखिया और उनके ‘सम्मानित’ परिवार के पोस्टर लगवाए थे जिसमें अपनी फोटो भी शामिल करना वे नहीं भूले । समारोह स्थल पर रंगबिरंगा तथा लंबा-चौड़ा बैनर भी लगवाया था । समारोह भी काफी देर तक चला जिसमें नेताजी ने अपने वफादारों को भी भरपूर बोलने का मौका दिया । मुखिया और उनके परिवार की जितनी तारीफ हो सकती थी वह उन्होंने की ।

समारोह समाप्त होते-होते काफी समय बीत गया, रात के ग्यारह बीत गये । वे काफी थक चुके थे । समारोह के दौरान चले नाश्ते-पानी से ही उनका पेट भर चुका था । घर पहुंचते-पहुंचते रात के 12 बज चुके थे । आते ही उन्होंने प्रतीक्षारत पत्नी को अपनी थकान के बारे में बताया तो पत्नी ने एक सांस में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी, “किसने कहा इतनी मेहनत करने के लिए ? इतने दिनों से जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहे थे तड़के सुबह से लेकर रात देर तक, थकान नहीं होगी तो क्या होगी । इतनी मेहनत से बफादारी दिखाने से मिलेगा क्या ? अरे कुछ अपनी तंदुरुस्ती और उम्र का भी खयाल रखो । मुझे नहीं पसंद तुम्हारा इतना काम करना ।”

“अरे भागवान, तुम समझोगी नहीं । मुखियाजी खुश हो गये तो कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल सकती है, वह नहीं तो कम से कम एक अदद अहम मंत्री पद तो मिल ही जाएगा ।” नेताजी ने तपाक से अपना वही घिसा-पिटा पुराना जवाब दिया जिसे वे वर्षों से देते आ रहे थे ।

“अच्छा ? ऐसी बात कर रहे हो कि जैसे उनके परिवार, रिश्तेदारी और जात-बिरादरी में कोई मिलेगा नहीं ! फिर भी मेरे जीते-जी ऐसा हुआ तो मैं भी देख लूंगी । ख्वाब देखने में क्या जाता है ? इस पर बहस करना फिजूल है, इस समय थके हो, सो जाओ ।”

नेताजी तुरंत गहरी नींद के आगोश में चले गये । पता नहीं रात भर कैसे-कैसे सपने देखे यह उन्हें भी याद नहीं, लेकिन सुबह के सपने में जो खलल पड़ा वह जरूर उन्हें खला । सपने में देखा कि मुखिया जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गये । यों तो यह अच्छी खबर नहीं थी, लेकिन इसकी वजह से उन्होंने नेताजी को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया ताकि पार्टी का राज्य में कामकाज विश्वस्त हाथों में सुरक्षित रहे । नेताजी खुश थे, बेहद खुश, जिंदगी की मुराद पूरी जो हो रही थी । शपथ ग्रहण की पूरी तैयारी उनकी अपनी देखरेख में हुई । मंत्रीमंडल में शामिल करके किसे उपकृत करना है और किसे नहीं इसकी सूची भी उन्होंने तैयार कर ली । घर के भीतर और बाहर जश्न का माहौल था । चाटुकारों और चहेतों की फौज उन्हें घेरे थी । लेकिन …

  “अजी, उठोगे कि नहीं ? आठ बज चुके हैं । लो अपनी बेड-टी ले लो ।”

पत्नी ने मुर्गे की नाईं बांग लगाई तो नेताजी हड़बड़ाकर उठ बैठे । बोले, “अरे भागवान, तुमने सब गड़बड़ कर दिया । क्या खूबसूरत सपना देख रहा था । जानती हो, मुख्यमंत्री की शपथ लेने जा रहा था, सपना तो पूरा देखने देतीं ।”

“ऐसे बोल रहे हो जैसे कि सच में ही मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे । अरे सपना ही तो था न, फिर देख लेना आज रात । सपना ही तो था, दुबारा-तिबारा देख सकते हो । … मगर हां, उसका जिक्र किसी के सामने मत कर देना, अपने विश्वस्तों के सामने भी नहीं । कहीं तुम्हारे मुखिया के कान में बात पड़ गई तो वे दल से ही निकाल देंगे । कहेंगे इसकी ये हिम्मत कि मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देखता है ।” पत्नी ने नेताजी को आगाह किया ।

“सच कहती हो, लेने के देने पड़ सकते हैं । ऐसे सपनों से बच कर ही रहना चाहिए ।” नेताजी ने नैराश्य भाव के साथ हामी भरी । (काल्पनिक) – योगेन्द्र जोशी

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असेम्बली बिल्डिंग और डाइनामाइट और …

बीते अगस्त माह के प्रथम सप्ताह मैं सपत्नीक दिल्ली में था । उन दिनों दिल्ली में पर्याप्त वर्षा हो रही थी, लिहाजा वहां की सड़कों के निचले हिस्सों में भारी जलजमाव की स्थिति पैदा हो रही थी । जलजमाव के कारण सड़कों पर यातायात जाम की समस्या तो थी ही, साथ में कुछ जगहों पर वाहनों के पानी में फंस जाने की भी नौबत आ रही थी । यों बरसात के मौसम में इस प्रकार की समस्याएं अपने देश के अधिकांश बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं ।

दो या तीन तारीख की बात होगी, जब हमें दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में अवस्थित घंटाघर इलाके से पूर्वी छोर पर नौइडा से सटे मयूरबिहार जाना था । इन जगहों के बीच कोई बीस-पच्चीस किलोमीटर की दूरी होगी । लोगबाग आम दिनों यह दूरी बस या आटोरिक्शा से तय करते हैं । हमने भी आटोरिक्शे से जाने का विचार किया, लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी इस लंबी दूरी के लिए तैयार नहीं हुआ । सबको यही डर था कि कहीं फंस गये तो घर वापस लौटना भी मुश्किल हो जाएगा । कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहता था । हार मानकर हमने टैक्सी वाले से संपर्क साधा और उसी से चल पड़े । आटो की तुलना में करीब ढाई गुना किराया देना पड़ा । करते भी क्या, जाना जरूरी जो था । साथ में अटैची-बैग होने के कारण बस-सेवा लेने की भी हिम्मत नहीं थी ।

बताई गयी दूरी को तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लग गया । समय बिताने के लिए हमने टैक्सी वाले से ही गपशप शुरू कर दी । हमने दिल्ली की सड़कों, जलजमाव और ट्रैफिक जाम को ही बातचीत का विषय चुना । उसने विस्तार से तकलीफदेह हालातों की जानकारी दी । अपना असंतोष व्यक्त करते-करते वह कहने लगा, “यह सब आज के राजनेताओं की करतूत है जी । सभी भ्रष्टाचार के नाले में डुबकी लगा रहे हैं, उन्हें अपना घर भरने और भाई-भतीजों, यार-दोस्तों को लाभ पहुंचाने से मतलब । खुद ईमानदार होते तो सरकारी आफिसरों पर भी अंकुश रखते । राजनेता-अधिकारी दोनों ही लूट मचाए हैं । इसीलिए न सड़कें टिक पाती हैं, और न ही उनमें जमा पानी की कारगर निकासी हो पाती है । राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती हैं जरूर, लेकिन हैं सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे ।”

मैंने उससे सहमति जताते हुए कहा, “बात तो आप सही कह रहे हैं । इन लोगों को देश की चिंता नहीं; इनकी असली चिंता तो सत्ता हथियाने और उसका भरपूर फायदा उठाने की है । पूरे देश में कमोबेश यही हाल है । इस देश का भगवान ही मालिक है !!”

“एक बात कहूं सा’ब ?”

“जरूर कहिए; आखिर रास्ता जो तय करना है । चुपचाप बैठे रहने से बेहतर है बातचीत चलती रहे ।”

“इधर दिल्ली में एक नयी असेम्बली बिल्डिंग बनने की खबर है … ”

“अच्छा है, एक और मौका मिलेगा धांधली करने का । बिल्डिंग बनेगी तो बनते-बनते गिर भी पड़ेगी ।” मैंने चुटकी ली ।

“वह तो है ही । लेकिन कोई भरोसा नहीं इन लोगों का । हो सकता है मजबूत ही बनवा लें । आखिर उसमें इन्हीं लोगों की बिरादरी बैठेगी न; कोई गरीब जनता के लिए थोड़े ही बनेगी कि जो कमजोर बनने देंगे ।” उसका जवाब था ।

“हां, ये बात भी सही है ।”

“मैं सोचता हूं, सा’ब, कि कोई उस बिल्डिंग के नीचे नींव में डाइनामाइट फिट कर देता । जिस दिन इनॉग्युरेशन (उद्‌घाटन) होता और ढेरों राजनेता उसमें बैठे रहते, उसे उड़ा दिया जाता । अपने आप मरते सब स्सा…”

उसकी बातें सुनकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि बदले में मैं क्या बोलूं । इतना मुझे जरूर लग रहा था कि उसके मन में आज के राजनेताओं के प्रति नफरत भरी हुई है । उसकी इस बात पर हम चुप ही रहे । वह अपनी बातें कहते रहा ।

आज राजनेताओं की साख किस कदर गिर चुकी है और लोग उनके प्रति कितना रुष्ट हैं, मुझे इन बातों का अंदाजा उस आदमी की बातों से लग रहा था । – योगेन्द्र जोशी

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