Category Archives: लघुकथा

शृंग्वेरपुर की मेरी यात्रा साइकिल से

जो लोग श्रीराम कथा से सुपरिचित हों उनके लिए शृंग्वेरपुर कदाचित् अपरिचित नाम नहीं होगा। यह वह स्थान है जहां पर श्रीराम को केवटराज (नाविकों के मुखिया) ने श्रीगंगा पार कराई थी। इस स्थान का जिक्र वाल्मीकिकृत रामायण एवं तुलसीदासरचित रामचरित मानस, दोनों ग्रंथों, में मिलता है। कहते हैं कि जब भगवान् श्रीराम ने केवटराज से गंगाजी पार कराने का निवेदन किया तो केवटराज ने प्रथमतः उनके चरण धोने की अनुमति की मांग की। केवट की इच्छा का सम्मान रखते हुए श्रीराम ने उनकी मांग मान ली।

[ध्यान रहे कि अधिकांश लोग शृंग्वेरपुर को श्रृंग्वेरपुर लिखते हैं जो सही नहीं है।]

शृंग्वेरपुर गंगाजी के तट पर बसा है। प्रयागराज (इलाहाबाद) से करीब ३५ किलोमीटर दूर (सड़क मार्ग से) नदी के प्रवाह के विपरीत दिशा में है। अर्थात् गंगाजी शृंग्वेरपुर से होते हुए प्रयागराज पहुंचती है जहां उनका संगम यमुनाजी से होता है।

आज से लगभग ५० वर्ष पहले (१९७०-७१) मैं साइकिल से वहां गया था। उस समय मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधछात्र था। शृंग्वेरपुर का नाम तो मैंने सुना ही था। एक दिन बैठे-बैठे विचार आया कि क्यों न वहां चला जाये साइकिल से। ऐसे असामान्य कार्य अकेले करना मुझे सदा से पसंद रहा है। अकेले का विशेष लाभ यह रहता है कि आप पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। जहां मन हुए आराम फरमा लिया, चाय-पानी की दुकान पर रुक लिये, सड़क के किनारे पेड़-पौधों, खेत-खलियानों को देखने को रुक लिये, आदि-आदि। साइकिल से इतनी दूर जाने-आने का यह मेरा पहला अनुभव था।

उस यात्रा और शृंग्वेरपुर में एक-डेड़ घंटे ठहरने के अनुभव की याद अब धूमिल हो चुकी है। इतना अवश्य याद है उस स्थान पर जहां में पहुंचा था वीरानगी-सी थी। दूर-दूर तक कोई खास हरियाली नहीं थी। कहीँ-कहीं पर झाड़ियां या छोटे कद के पेड़ दिख रहे थे। शायद फरवरी-मार्च का समय रहा होगा। वह स्थान गंगाजी के प्रवाह की दिशा के सापेक्ष नदी का बांया किनारा था जो कुछ हद तक चट्टानी ऊंचा टीला था।

बीते पचास वर्षों के अंतराल में वहां क्या कुछ बदलाव आ गया होगा इस बात का अनुमान मैं नहीं लगा सकता था, लेकिन आधुनिक गूगल मैप से पता चलता है कि शृंग्वेरपुर में बहुत परिवर्तन हो चुका है। अनेक मंदिर स्थापित हो चुके हैं, कई सड़कें बन चुकी हैं, तब की वीरानगी शायद समाप्त हो चुकी है, और गंगाजी ने इस किनारे को छोड़ दूसरे किनारे के निकट अपना पाट खिसका लिया है।

वहां पर पुराने भवनों के खंडहर देखने को मिले थे मुझे। वे खंडहर प्राचीन काल के रहे होंगे उनमें पतले, अपेक्षया बेडौल ईंटें प्रयुक्त थीं। मैं गूगल मैप की प्रति प्रस्तुत कर रहा हूं। जिसमें तीन स्थलों को १, २, ३, अंकों से इंगित किया है। इसमें अंक ३ खंडहरों का स्थान दर्शाता है।

 

 

 

 

 

 

 

अंक १ वहां का श्मशानघाट का सकेत है। मैं जब वहां पर था तो संयोग से एक शव वहां पहुंचा। जिस तरीके से शवदाह हुआ उससे मुझे लगा कि वहां इंधन की लकड़ी की उपलब्धता अच्छी नहीं रही होगी। मैंने किसी से पूछा भी नहीं। अंतिम संस्कार में शामिल जनों ने लकड़ी के दो-चार टुकड़े इस्तेमाल करते हुए वरायनाम मुखाग्नि दी। फिर शव को बांस के एक डंडे के सहारे दायें-बांये बालू भरे दो मटकियां के साथ बांध दीं और नाव से ले जाकर बीच गंगा में प्रवाहित कर दिया। शव तो प्रवाहित होता नहीं होगा, बल्कि वह नदी की तलहटी में स्थायित्व पाता होगा। मछलियां, कछुए एवं अन्य जलीय जीवजंतु शव का मांस भक्षण कर देते होंगे।

किंतु संयोग से शव का बंधन कभी-कभार टूट जाता होगा और वह ऊपर उतरा जाता होगा। मुझे उस स्थान पर ऐसा नजारा देखने को मिला था। चित्र में अंक २ एक कोटर को इंगित करता है। उस स्थल पर किनारे की जमीन चट्टानी थी जिसके कारण गंगाजी का प्रवाह अटक रहा था। चित्र में अंक २ एवं ३ के बीच की भूमि ऐसी संरचना लिए हुए थी। दोनों तरफ जमीन नीची थी। उक्त कोटर पर मैंने एक शव उतराया हुआ देखा था जिसे दो-तीन कुत्ते किनारे खींचना चाहते थे लेकिन वह उनकी पहुंच में नहीं था। कदाचित् वहां पर पानी गहरा रहा होगा।

अपने ठहराव के उस डेड़-एक घंटे में मैंने शवदाह, कोटर पर फंसा शव, तथा खंडहरों को देखा।

उस स्थान पर जल पर उतराते शव की मुझे आज भी याद आ जाती है जब कभी मैं गंगाजी के तट पर जाता हूं; जब इलाहाबाद में तब और अब जब वाराणसी में रह हूं तब भी। मुझे गंगाजल से आचमन करने में उस याद के कारण परेशानी होती है।

उस काल में वहां आसपास चायपानी की भी कोई दुकान नहीं थी कि मैं दो-चार घूंट चाय ही पी लेता। रास्ते के लिए कुछ भोज्य-पदार्थ मैंने रखे थे जिन्हें मैने मार्ग में कहीं रेस्तरां-ढाबा पर खाया-पिया होगा। तो यह रहा शृंग्वेरपुर का मेरे पांच दशकों पूर्व का अनुभव। -योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

“ ‘बिच्छू’ से तैयार होगा कपड़ा, देगा रोजगार”

बीते एक पखवाडे पहले दैनिक जागरण समाचार-पत्र  के मुखपृष्ठ पर उक्त वक्यांश बतौर शीर्षक देख मेरे मन में जिज्ञासा उपजी कि बिच्छू से कैसे कपड़ा तैयार होगा भला। दरअसल समाचार-पत्र के मुखपृष्ठ पर केवल संक्षेप में उस समाचार का जिक्र होता है जिसका विस्तृत ब्योरा बाद के किसी पृष्ठ पर रहता है। उक्त मामले की अधिक जानकारी पृ.९ पर है यह मैंने देखा और फिर जागरण के समाचार पृष्ठवार पढ़ना आरंभ किया। मन में रह-रह के उक्त सवाल भी उठता रहा। समाचार पढ़ते हुए सोच भी रहा था कि बिच्छू के मामले में रेशम के कीड़े की भांति ‘कोकून’ तो बनता नहीं जिससे रेशम-धागा पाया जाता है। न ही वह मकड़ी की तरह कोई जाल बुनती है जिससे धागा मिल सकता हो। खैर, अंत में पृ. ९ पर पहुंचा और यह देख चौंका और तसल्ली भी हुई कि कपड़े ‘बिच्छू घास’ से बनेंगे न कि बिच्छू से।

समाचारपत्र में बिच्छू घास की बात पढ़कर मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हम बच्चों को कभी-कभी बिच्छू घास का दंश झेलना पड़ता था। बता दूं कि मेरा जन्म उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में हुआ था जहां मेरे जीवन के शुरुआती १२-१३ वर्ष बीते थे। हमारे गांव के पैदल रास्तों के किनारे उगी झाड़ियों के साथ यह घास भी कहीं-कहीं उगी रहती थी। जब बच्चे २-४ साल या और बड़े  हो जाते लेकिन अनुभवहीन रहते तब कभी न कभी इस घास के शारीरिक संपर्क में आ जाते। त्वचा के संबंधित स्थान पर तेज जलन, चरचराहट, एवं दर्द की मिश्रित अनुभूति होती है। बिच्छू का डंक कैसा होता है इसका ज्ञान मुझे नहीं। अपने गांव में मैंने कभी बिच्छू देखा हो ऐसा याद नहीं आता। शायद बिच्छू का डंक़ कुछ वैसा ही होता होगा जैसा इस घास को छू लेने पर।

स्थानीय बोली में इस घास को सिसूण या सियूंण कहा जाता है। कुछ अन्य क्षेत्रों के बाशिंदे शायद कनाली भी कहते हैं। इंटरनेट पर जुटाई जानकारी से पता चला कि इस घास में रोगनिवारण के गुण भी मौजूद हैं। किंतु मैंने कभी बुजुर्गों के मुख से इसकी चिकित्सकीय उपयोगिता की बात नहीं सुनी थी। उस काल के अनुभवों को ५५-६० साल बीत चुके हैं। फिर भी एक बात मुझे याद आती है जिसके बारे में सुनिश्चित नहीं हूं। पैर में मोच आने पर हल्की मुरझाई इस घास से झाडने से आराम मिलता था। एक और बात याद है कि इस घास के कोपलों, पत्तियों एवं मुलायम डंठलों वाले हिस्सों के धूप में मुरझा चुकने के बाद सूखा साग बनाने के काम में भी लिया जाता था।

इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि इस घास की डंठल तथा पत्तियों की (खास तौर पर उल्टी) सतह पर महीन रोवों के रूप मे सख्त कांटे होते हैं। शरीर की त्वचा के संपर्क में आते ही ये उसमें चुभ जाते हैं और ये कांटे त्वचा में एक रसायन छोड़ते हैं। त्वचा के उस स्थान पर तेज जलन, चरचराहट, एवं दर्द की मिश्रित अनुभूति होती है। इस घास को अंग्रेजी में स्टिंगिंग घास (stinging-nettle एवं वैज्ञानिक नाम urtica dioica) कहा जाता है। (देखें विकीपीडिया)

जैसा आरंभ में कहा है बिच्छू घास से कपड़ा बनेगा, परंतु कैसे यह मुझे पता नहीं चल पाया। कदाचित इसके तने की रेशेदार छाल से यह संभव हो जैसा भांग के पौधे की छाल से होता है। यह भांग वही है जिससे गांजा तथा चरस जैसा नशा मिलता है। देखे विकीपीडिया 

 भांग उत्तराखंड के कुमाऊ अंचल में काफी लोकप्रिय है नशे के लिए ही नहीं बल्कि भोज्य पदार्थ के रूप में। भांग के दाने (बीज) स्वादिष्ट एवं पौष्टिक होते हैं और इनमें नशा नहीं होता। इसी भांग के पौधे के सीधे तने से मिलने वाले बेहद मजबूत रेशे से थैले, बोरे, चादरें बनाई जाती हैं, जैसे जूट से। कदाचित बिच्छू घास से सीधे तने की छाल का भी ऐसा ही प्रयोग हो सकता है। -योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

कोरोना महाप्रकोप का सकारात्मक प्रभाव

इस समय पूरा विश्व कोरोना-जनित महामारी की चपेट में है। कोरोना नामक विषाणु चीन के वुहान शहर से निकलकर सर्वत्र फैल चुका है। खुद चीन में यह कहां से आया यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। कहा जाता है कि वुहान में चमगादड़ों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों का मांस बिकता है और विषाणु वहां के चमगादड़-मांस से लोगों के बीच फैला। कुछ लोगों का कहना है कि वुहान की एक विषाणु प्रयोगशाला में ही कोरोना का जन्म हुआ और किसी चूक से यह बाहर नगरवासियों में फैल गया। एक मत यह भी है कि आर्थिक तौर पर दुनिया को पंगु करने के लिए चीन ने इसे ईजाद किया और दुनिया में फैलने दिया। ऐसे अनेक मत व्यक्त किए जा सकते हैं। वास्तविकता क्या है यह अभी कोई नहीं जानता। बस इतना सच है कि इस विषाणु ने दुनिया की बहुत बड़ी आबादी को रोगग्रस्त कर दिया है और लाखों को काल के गाल में पहुंचा दिया है।

कोरोना के महाप्रकोप को रोकने का कोई कारगर उपाय किसी के पास नहीं है। न ही रोगग्रस्त लोगों के लिए कोई प्रभावी इलाज अभी तक मिल सका है। ऐसी स्थिति में कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए दुनिया की विभिन्न सरकारों ने “लॉकडाउन” का सहारा लिया है। यह ऐसा शब्द है जिसका इतना व्यापक प्रयोग पहले कभी सुना नहीं गया था। लॉकडाउन ने खुद अपने किस्म की समस्याएं पैदा कर दी हैं। पूरी सामाजिक व्यवस्था अस्तव्यस्त हो गयी है। आर्थिक क्रियाकलाप रुक गये हैं और अधिकांश लोग अपने-अपने घरों में कैद हो गये। सबसे विकट समस्या उन लोगों के सामने है जो घर-परिवार से दूर जहां थे वहीं फंस के रह गये हैं।

अपने देश में लॉकडाउन से कोरोना के प्रसार पर संतोषप्रद नियंत्रण मिल सका तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि तथा राहत की चीज होगी। लॉकडाउन की जो कीमत चुकानी पड़ रही है उसे स्वीकार कर लिया जाएगा, विवशता में ही सही। फिर भी यह तो कहना ही पड़ेगा कि कोरोना ने लॉकडाउन की आवश्यकता को जन्म दिया और लॉकडाउन ने लोगों की जिंदगी को अप्रत्याशित कष्ट में धकेल दिया।

लेकिन इस लॉकडाउन के कुछएक सकारत्मक पहलू भी देखने को मिल रहे हैं। जो लोग घरों में अधिक टिक नहीं सकते थे, उन्होंने घर में टिकना और परिवारी जनों के साथ समय बिताना सीख लिया। लोगों में एक प्रकार की उपकारिता की भावना भी जागृत हुई है। पुलिसबल का व्यवहार काफी कुछ बदला नजर आने लगा है। अधिकांश जन कोरोना से लड़ाई के प्रति योगदान देने को प्रेरित भी हो रहे हैं। ये सब संतोष की बातें है। आगे के सामय में ये बातें कुछ हद तक स्थायित्व भी पा सकती हैं।

इस कोरोना-संक्रमण काल में कुछ लोग बहुत-से वे कार्य कर रहे हैं जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा। इसी क्रम में मुझे अपने एक मित्र की दैनिक चर्या में विवशता-जनित परिवर्तन के बारे में सुनने को मिला। इस समय मैं स्वयं अपने घर से दूर अन्य शहर में अटका हुआ हूं। मैंने कई बार उनसे फोन पर बात करने और हालचाल पूछने का प्रयास किया। लेकिन संपर्क साधने में सफल नहीं हुआ। अन्य मित्रों एवं परिचितों से उनकी कुशलक्षेम की जानकारी मुझे मिल गई। मुझे पता चला कि वे चाय-नाश्ता और भोजन-सामग्री बनाना सीख रहे हैं। यह समाचार मेरे लिए रोचक एवं अविश्वनीय था। क्यों, बताता हूं।

मेरे मित्र महोदय उम्र में सत्तर-प्लस हैं। सेवानिवृत्त हैं और अकेले रहते हैं। परिवार में कोई और उनके साथ नहीं रहता। इसलिए उन्होंने लगभग सभी दैनिक कार्यों के लिए परिचारक-परिचारिकाओं  यानी घरेलू सहायक का सहयोग लिया है। ये सहायक सुबह-शाम का नाश्ता, दोपहर-रात्रि का भोजन, घर का झाड़ू-पोछा, लत्ते-कपड़ों की धुलाई, आदि लगभग सभी कार्य करते हैं। निर्धारित समय पर आते हैं, अपने-अपने हिस्से का कार्य निपटाते हैं, और लौट जाते हैं। इसलिए मित्र महोदय को कोई काम नहीं करना पड़्ता है। यह सिलसिला पिछले कई वर्षों से चला आ रहा है। अभी तक उनके कार्य सुचारु रूप से चल रहे थे।

लेकिन इस बार लॉकडाउन ने उनके सामने गंभीर समस्या पैदा कर दी है। चूंकि लोगों को यथासंभव घर तक सीमित रहना है, और केवल जरूरी कामों के लिए बाहर निकलने की छूट मिल पा रही है मगर वह अधिक देर के लिए नहीं। इसलिए उनके घरेलू सहायकों का आना-जाना बंद हो गया। चाय कौन बनाए, भोजन कैसे बनेगा, झाड़ू भी लग पायेगा क्या, गंदे कपड़ों का क्या होगा, आदि प्रश्न उनके सामने उठ खड़े हो गये। ऐसे मौकों पर आदमी अपनी झल्लाहट या गुस्सा किसी न किसी पर उतारना तो चाहेगा ही। सामने कोई हो तो उसी को दो-चार बातें सुना दे लेकिन उनके घर में कोई और हो तब न? जिसने इस लॉकडाउन का निर्णय लिया उसी पर उन्होंने कल्पना में गुस्सा उतार दिया। कर भी क्या सकते हैं?

पिछले कई वर्षों से वे घरेलू सहायकों पर ही निर्भर रहे इसलिए चाय बनाना भी अब बेहद मुश्किल का काम लग रहा था। करते क्या? शनैः-शनैः चाय-नाश्ता-भोजन बनाना शुरू कर दिया, जैसा भी बन पड़ा। पिछली बार परिचितों-मित्रों से इतना तो मुझे खबर मिली। झाड़ू-पोछा करना और कपड़े धोना अभी शुरू हुआ कि नहीं पता नहीं चला। ये दोनों कुछ दिन टल सकते हैं लेकिन भोजन-पानी नहीं। मोबाइल फोन पर मुझे उत्तर मिलता नहीं। सोचता हूं सब ठीक ही चल रहा होगा। – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under कहानी, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories, Story

सिगरेट का शौक छोड़ना आसान नहीं

मैं आजकल चार-एक हफ्तों के प्रवास पर बेंगलूरु (बंगलौर) के ह्वाइट्फ़ील्ड इलाके में हूं जहां आइ-टी यानी इंफ़र्मेशन टेक्नॉलॉजी (सूचना तकनीकी) तथा अन्य प्रकार के अधिकांश कार्यालय हैं। मैं सुबह-शाम और कभी-कभी दोपहर में बाहर कार्यालयों के आसपास टहलने के लिए निकलता हूं। मुझे यह शहर उतना सुव्यवस्थित नहीं लगा जितने की मैंने कल्पना की थी। सड़कें साफ-सुथरी और यातायात सुव्यस्थित हो ऐसा मैंने नहीं पाया।

एक बात जिस पर मैंने गौर किया वह यह है कि इस शहर में सिगरेट पीने का काफी चलन है। मैं शहर के भीतरी और पुराने इलाकों के बारे में कह नहीं सकता, क्योंकि मेरा घूमना-फिरना तीन-चार किलोमीटर के सीमित दायरे में ही रहा है। ह्वाइटफ़ील्ड के इस इलाके में सड़क के किनारे चलते-फिरते या पान-सिगरेट के स्टॉल के पास सिगरेट पीते हुए कई लोग दिख जाते हैं। सिगरेट का शौक नवयुवतियों-महिलाओं में भी देखने को मिला है मुझे। यह बात भारतीय समाज के संदर्भ में काफी असामान्य कही जाएगी। मेरा मन होता रहा कि उन लोगों से उनकी इस आदत के बारे में दो-चार बातें पूछूं, किंतु किसी के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

कल मैंने हिम्मत जुटा ही ली। सड़क के किनारे चबूतरे की शक्ल की एक जगह पर दो युवतियां बैठी थीं सिगरेट के कश खींचती हुईं। उनके पास जाने से मैंने स्वयं को रोक लिया, क्योंकि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी इसका अनुमान लगाना कठिन था। लेकिन दो कदम आगे बढ़कर मुझे कुछ युवा दिख गये, उम्र से कदाचित तीस-चालीस साल के। तीन जने तो आपस में बतियाते हुए पान-सिगरेट खरीद रहे थे और दो कदम की दूरी पर अन्य व्यक्ति एक पेड़ के तने के सहारे अकेले खड़े होकर धूम्रपान का आनंद ले रहा था। मैं उसके पास गया और हिन्दी में बात करने लगा। उसके इशारे से मैं समझ गया कि वह हिन्दी में बात नहीं समझ पायेगा। तब मैंने अंग्रेजी में कहा, “आपसे माफी चाहूंगा; क्या मैं निजता (प्राइवेसी) से जुड़ा एक सवाल पूछ सकता हूं?”

“जी, पूछिए।” उसने जवाब दिया।

मैं सीधे अपने सवाल पर आया, “आप सिगरेट पीते हैं। क्या आप जानते हैं कि सार्वजनिक स्थल (पब्लिक प्लेस) में धूम्रपान कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है और संबंधित व्यक्ति पर जुर्माना लग सकता है?”

उस व्यक्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। बल्कि वह यह कहते हुए आगे बढ़ गया कि उसे ऑफिस की देरी हो रही है।

दूसरे दिन मैंने इस विषय पर फिर से कुछ ’ज्ञान’ प्राप्त करने का प्रयास किया। जहां मैं ठहरा था उसके प्रवेशद्वार के निकट ’फोरम मल्टिप्लेक्स’ नामक व्यापारिक संस्थान है। उसी के सामने सड़क के दूसरी ओर पटरी या फुटपाथ के किनारे चाय-काफी, पान-सिगरेट, आदि की छोटी-मोटी दुकानें सजी मिलती हैं जहां आसपास के कार्यालय-कर्मी दोपहर के अवकाश के समय चाय-पानी आदि के लिए आते हैं।

उसी पटरी पर घूमते-फिरते मैं एक स्थल पर रुक गया। पास ही युवक-युवती का एक जोड़ा मुझे दिख गया। वे नारियल पानी ख्ररीद रहे थे। जब तक दुकानदार नारियल-फल काटछांट कर तैयार करता, उस युवक ने एक सिगरेट लेकर सुलगा ली। उस युगल में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। हिम्मत करके मैं उनके निकट पहुंचा और युवक की ओर मुखातिब होकर मैंने अंग्रेजी में पूछा, आपसे एक निजी सवाल पूछना चहता हूं। अगर बुरा न मानें तो पूछूं?”

मैंने प्रथमतः अपना परिचय दिया कि मैं वाराणसी से आया पर्यटक हूं और कहा कि यहां सिगरेट पीने का काफी चलन है। मेरे वाराणसी कहने पर दोनों (युवक-युवती) एक साथ बोल पड़े, “तब तो आप हिन्दी बोलते होंगे?”

मेरे हांमी भरने पर युवक ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। युवती ने खुद को देहरादून (उत्तराखंड) की बताया। उस वार्तालाप में वैयक्तिक स्तर की कुछएक बातें हम लोगों के बीच भी हुईं। इस बीच नारियल पानी भी आ चुका था जिसे वे पीने लगे। उन्होंने मुझे भी पेश किया जिसे मैंने सधन्यवाद मना कर दिया। फिर मैं असल मुद्दे पर लौट आया और युवक से पूछने लगा, “आप सिगरेट पीते हैं। आपको मालूम है …”

मैं अपना सवाल पूरा कर पाता कि उसके पहले ही वह बोल पड़ा, “मालूम है कि यह ’हेल्थ’ (तन्दुरुस्ती ) के लिए नुकसानदेह है। लेकिन काम के बोझ तले तनाव से इससे कुछ राहत मिल जाती है। यों कहें कि अब आदत बन चुकी है।”

मैं बोल पड़ा, “मैं मुद्दे के दूसरे पहलू की बात करना चाहता हूं। वह यह है कि धूम्रपान कानूनी तौर पर सार्वजनिक स्थल पर वर्जित है और इस पर जुर्माना भरना पड़ सकता है।”

यह देख मुझे आश्चर्य हुआ कि वे दोनों संबंधित कानून से अनभिज्ञ थे। कुछ देर बाद लौटने का समय हो गया कहते हुए वे सड़क पार कर अपने संस्थान ’फोरम’ की ओर चल दिए। दस-पंद्रह मिनट की उस बातचीत के दौरान और पिछले दिन की घटना से यह तो मेरे समझ में आ ही गया कि जिन्हें धूम्रपान का शौक लग गया वे अपनी तन्दुरुस्ती के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। इसके अलावा उनमें से कुछ लोग संबंधित कानून से भी परिचित नहीं होते या वे उसकी परवाह नहीं करते। – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, human behaviour, Short Stories

दवा-विक्रेता की सदाशयता

मुझे अपनी यात्राओं के दौरान अथवा उस काल के प्रवास-स्थान पर अक्सर सदाशयी जन मिल जाते हैं। मेरी समस्याओं का वे समाधान सुझाने में सहायक सिद्ध होते हैं। अधिकांश अवसरों पर मुझे कोई असुविधा नहीं होती है। यदि कहीं कोई अड़चन आन पड़ती है तो वह अपने देश की दोषपूर्ण व्यवस्था के कारण होती है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष के कारण।

विगत अगस्त माह मैं बेंगलूरु शहर अपने बेटे-बहू-पोते के पास तीनएक सप्ताह के लिए गया था। वे लोग ह्वाइटफ़ील्ड नामक इलाके में रहते हैं। एक दिन मुझे गिरिनगर नामक स्थान जाना था। दरअसल गिरिनगर में “सम्भाषण-सन्देशः” नामक संस्कृत पत्रिका का कार्यालय है। मैं इस पत्रिका का लंबे अंतराल से ग्राहक-पाठक हूं। चूंकि मैं सितंबर माह से कुछ महीनों के लिए वाराणसी से बाहर रहने वाला था, अतः चाहता था कि केवल डाक से प्राप्य यह पत्रिका  व्यवस्थापकों द्वारा उस काल में मुझे न भेजी जाए। इस आशय से पत्रिका के गिरिनगर स्थित कार्यालय जाने का विचार मेरे मन में उठा।

गिरिनगर ह्वाइटफ़ील्ड से २०-२२ किलोमीटर दूर है। मुख्यतः कन्नड़-भाषी बेंगलूरु शहर मेरे लिए नितांत अनजाना शहर है। ह्वाइटफ़ील्ड शहर का अपेक्षया नया इलाका है जहां प्रमुखतया आईटी प्रौद्योगिकी एवं कॉर्पोरट औद्योगिकी के  कार्यालय स्थित हैं, जिनमें देश के लगभग सभी इलाकों के युवक-युवतियां कार्य करते हैं। फलतः उस इलाके में हिन्दी बोलने-समझने वालों की संख्या काफी है। लेकिन गिरिनगर पुराने बेंगलूरु में है, जहां हिन्दी नाममात्र ही बोली-समझी जाती है। इसलिए वहां जाने और संभाषण संदेश कार्यालय खोजना मेरे लिए कठिन होगा यह शंका मेरे मन में रही। अस्तु।

मैंने नगर-बस-सेवा के डे-पास (एक-दिवसीय अनुमति-पत्र) का उपयोग किया। बेंगलूरु में बस परिचालक हिन्दी समझ और कुछ हद तक बोल लेते हैं ऐसा मुझे वहां के प्रवास के दौरान अनुभव हुआ। अत: मुझे खास दिक्कत नहीं हुई। बस कंडक्टर ने गिरिनगर से ७-८ कि.मी. दूर कॉर्पोरेशन (नगर निगम कार्यालय) के पास मुझे यह कहते हुए उतरने की सलाह दी कि चूंकि गिरिनगर के लिए वहां बहुत कम बसें चलती हैं, अतः ऑटो-रिक्शा से जाना सुविधाजनक होगा।

मैंने ऑटो भाड़े पर लिया और उसके चालक ने गिरिनगर  के एक मुख्य मार्ग के किनारे फेज़ ८ पर मुझे पहुंचा दिया यह कहते हुए कि आसपास ही सभी फेज़-क्षेत्र हैं, किंतु फेज़ २ (मेरा गंतव्य) ठीक-ठीक कहां है बता पाना कठिन है। कदाचित में फेज़-व्यवस्था सुनियोजित नहीं थी। मैंने वहां दिख रहे लोगों एवं दुकानदारों से पूछा, किंतु ठीक-ठीक कोई बता नहीं पाया। इसी बीच मेरी नजर एक दवा-दुकान पर पड़ी और मैं उस दुकान पर पहुंचा। संयोग से दुकानदार महोदय कन्नड़-हिन्दी-अंग्रेजी त्रिभाषी निकले। उन्होंने मुझसे १०-१२ मिनट बातें कीं कि कहां से आए हैं और कहां जाना है।

वार्तालाप में उन्होंने कहा, “यह इलाका उडुपी ब्राह्मणों का है लेकिन मैं स्वयं जैनी हूं। मैंने संस्कृत पत्रिका के बारे में सुना तो है परंतु उसका कार्यालय कहां पर है यह मैं सोच नहीं पा रहा हूं।”

मैने कहा, “कार्यालय के पते में फेज़ २ दिया गया है। यह कहां हो सकता है यह बता दीजिए। मैं कार्यालय खोज लूंगा।”

कुछ क्षण सोचने के बाद उन सज्जन ने कहा, “मुझे ख्याल आ रहा है कि पत्रिका का कार्यालय राघवेन्द्र स्वामी मठ में है।” फिर हाथ के इशारे के साथ वे बोले, “आप इसी फुटपाथ पर चलते जाइए। आगे मुख्य मार्ग से जो सड़क दाहिनी तरफ़ निकलती है उसी पर एक ओर आपको वह मठ दिख जाएगा। कदाचित् वहीं वह कार्यालय मिलेगा। अन्यथा मठ के लोग अधिक जानकारी दे सकेंगे। अवश्य ही उन्हें मालूम होगा।”

मैंने दवा-विक्रेता को धन्यवाद देते विदा ली और आगे बढ़ गया। किंचित् दूरी चलने के बाद मुझे वह गली मिल गई जिस पर राघवेन्द्र स्वामी मठ बताया गया था। मैं दाहिने मुड़कर दो कदम चला ही था कि स्क्रूटर पर सवार दवा-विक्रेता महोदय अनायास मेरे बगल में आकर रुकते हुए बोले, “आइए, स्कूटर पर बैठिए मैं मठ पर छोड़ देता हूं।”

अप्रत्याशित अपने बगल उन्हें स्कूटर पर देखकर चौंकते हुए मैंने पूछा, “आप भला यहां क्योंकर पहुंच गए?”

वे बोले, “आप जगह खोजने में खामखाह परेशान होंगे, सो मैंने सोचा कि क्यों न मैं ही आपको वहां पहुंचा दूं।”

उनके इतना कहते-कहते हम मठ पर पहुंच गये। मुझे उतार कर वे अधिक कुछ बोले बिना तुरंत लौट गये।

मैं सोचने लगा क्या गजब की दुनिया है यह जहां अजनबी परेशान न होवे इस विचार से कभी-कभी कोई व्यक्ति मदद को दौड़ पड़ता है। ऐसा आम तौर पर होता नहीं, इसलिए कुछ अचरज तो होता ही है। – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under आपबीती, कहानी, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories, society, Story

वे छोटी-छोटी बातें जिनके बारे में सोचते नहीं लोग

मेरे गृह-परिसर के प्रवेशद्वार पर आकर एक गाय अक्सर लेट जाती थी। अपने शहर वाराणसी में छुट्टा कुत्ते-गाय-सांड़ सड़कों पर इधर-उधर घूमते ही रहते हैं। इतना ही नहीं बंदरों का आतंक भी झेलना पड़ता है। ऐसी ही एक छुट्टा गाय कुछ दिन पहले मुहल्ले की मेरी गली में भूले भटके आ टपकी, और उसने आराम फरमाने के लिए मेरे घर के प्रवेशद्वार को चुन लिया। उसके कारण आने-जाने में असुविधा तो होती ही थी, अलावा उसके वह गोबर-मूत्र की गंदगी भी उस स्थल पर फैला जाती थी। हर रोज घर की खिड़की से बीच-बीच में प्रवेशद्वार की ओर नजर डालना और उसे हटाना हमारा रोज का नियम-सा बन गया। कुछ दिन तक यह सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन उसने अपना ठिकाना बदल दिया। उसने मोहल्ले की दूसरी गली को चुन लिया।

उसके ‘स्थाई’ तौर पर चले जाने के बाद एक सवाल मेरे मन में उठा कि क्या गाय ने यह सोचा होगा कि अमुक जगह छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि यहां से उसे बार-बार भगा दिया जाता है? उसने क्या यह सोचा होगा कि मेरी वजह से इन लोगों को परेशानी होती है, इसलिए मुझे कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिए? या कुछ और उसके दिमाग में आया होगा? अथवा घटना की वारंवारता से प्रेरित हो उसकी नैसर्गिक सहज वृत्ति ने उसका व्यवहार बदल दिया? पशुओं के प्रशिक्षण में इसी वारंवारता का ही तो महत्व होता है। आम धारणा यही है कि कोई भी पशु सोच-समझकर खास तरीके से व्यवहार नहीं करता, बल्कि वह वारंवारता से वैसा करने के लिए प्रकृतितः ढल जाता है।

क्या पशुओं में सोचने-समझने की क्षमता बिल्कुल नहीं होती है? वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जंगलों में रहने वाला गोरिल्ला दरिया पार करते समय उसकी गहराई का अनुमान लगाने के लिए पेड़ की टहनी का इस्तेमाल करता है। वह अलग-अलग जगहों पर टहनी डुबोकर पता लगाता है कि किस स्थल पर दरिया अधिक छिछला है। इसी प्रकार कड़े खोल वाले गिरीदार (खाद्य बीज वाले) फलों को तोड़ने के लिए पत्थर का प्रयोग करते हुए चिंपाजियों को देखा गया है। प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों में वयस्क चिंपाजियों की औसत बुद्धि 2-3 वर्ष के सामान्य बच्चे के बराबर पाई गई है। कौवों पर किए गये अध्ययन भी रोचक पाए गये हैं। ऐसा लगता है कि अत्यल्प मात्रा में ही सही सोचने-समझने जैसी कुछ क्षमता मानवेतर उन्नत पशु-पक्षियों में भी होती है।

 मनुष्यों का एकसमान तरीके से न सोच-समझ पाने की क्षमता का अनुभव मैं लंबे अरसे से करते आ रहा हूं। अर्थात्‍ कुछ लोग वस्तुस्थिति की बारीकी से निरीक्षण करने में समर्थ और उस सामर्थ्य के इस्तेमाल के आदी होते हैं। लेकिन सब इतने सचेत नहीं होते। कदाचित् पशुओं में भी इसी प्रकार का भेद होता होगा ऐसा मेरा मानना है। एक ही प्रजाति के सभी पशु समान प्रशिक्षण के बावजूद एकसमान क्षमता हासिल नहीं करते हैं।

     मनुष्य को बुद्धिमान प्राणी कहा जाता है। कहने को तो वह सोच-समझ सकता है, निर्णय ले सकता है और निर्णय का कार्यान्वयन कर सकता है। पर क्या सभी मनुष्य विभिन्न मुद्दों पर विचार करने की पर्याप्त सामर्थ्य रखते हैं? विचार करने का भाव भी क्या सबके मन में उठता है? मुझे लगता है कि वह भी बहुधा एक पशु या निम्न-स्तर के रोबोट की भांति प्रचलित ढर्रे पर चलता है, आगे-पीछे सोचे बिना और विकल्पों पर विचार किए बिना। मैं अपना मंतव्य एक दृष्टांत से स्पष्ट करता हूं।

     मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते हैं। हाल ही में वे बतौर किराएदार आए हैं। वे घर से बाहर निकलते समय मुख्य द्वार की अर्गला (सिटकनी) बंद करके ताला चढ़ा जाते हैं। ऐसा करते समय वे अर्गला की बेलनाकार छड़ दायें-बांये घुमा-घुमाकर सरकाते हैं। चिकनाहट न होने एवं किंचित जंग लगे होने के कारण छड़ आसानी से नहीं सरक पाती है। फलतः उसकी चूं-चां की कर्कश ध्वनि पड़ोस में हमारे कानों तक पहुंचती है। अवश्य ही उन सज्जन को भी मेहनत करनी पड़ती होगी। हमें वह आवाज खलती है, लेकिन अभी तक परिचय न हो पाने तथा एक प्रकार की हिचक की वजह से हम उन्हें यह सुझाव नहीं दे पाए हैं कि उस पर मोबाइल या ‘ग्रीज’ का लेपन कर लें, ताकि उस पर चिकनाहट आ जाए। सरसों या नारियाल आदि के तेल से भी वे काम चला सकते हैं

    मेरी समस्या उस कर्कश ध्वनि तक सीमित नहीं है। वह आवाज मुझे खलती जरूर है, लेकिन मेरे लिए उससे भी अधिक अहमियत इन सवालों का है कि वह आवाज खुद पड़ोसी सज्जन को क्यों नहीं खलती होगी? और यह भी कि उस पर चिकनाई चढ़ाकर अर्गला बंद करना सरल हो जाएगा यह विचार उनको क्यों नहीं आता होगा? कोई घटना एक-दो बार हो तो उसकी अनदेखी हो सकती है, लेकिन जिसका सामना रोज करना पड़े उस पर तनिक विचार तो होना ही चाहिए न? मुझे लगता है कि कई बातें लोगों के दिमाग में स्वयमेव नहीं आती हैं। यह मानव समाज से जुड़ा एक रोचक तथ्य है। इसे में “विचारशून्यता” कहता हूं।

     मैंने आरंभ में गाय का जो उदाहरण दिया वह अपनी इसी धारणा को व्यक्त करने के लिए है। निःसंदेह मैं स्वयं भी इस तुलना को अतिरंजनायुक्त (अतिशयता वाला) कहूंगा, लेकिन ऐसा अपनी इस बात पर जोर डालने के लिए कर रहा हूं कि सामान्य जीवन में बहुत-से कार्य होते हैं जिनके संदर्भ में “मैं इसे करूं या न?”; “अगर करूं तो कैसे?”; “क्या कोई विकल्प बेहतर होगा?”; “मेरे कार्य से निकटवर्ती लोग प्रभावित तो नहीं होंगे?” जैसे तमाम सवाल मनुष्य होने के नाते हमारे मस्तिष्क में उठने चाहिए। परंतु ऐसा अकसर नहीं होता। मैं उस स्थिति में सोचने लगता हूं कि हमारा व्यवहार पशुओं से एकदम भिन्न सदैव नहीं होता है।

     विचारशून्यता के अनेक उदाहरण रोजमर्रा की जिंदगी में देखने को मिल जाते हैं, जैसे अपना वाहन दूसरे के मकान के प्रवेश द्वार पर खड़ा कर देना, वाहन से चलते हुए पान की पीक पिच्चकर थूक देना, खाते-खाते केले का छिलका सड़क पर फेंक देना, सार्वजनिक पानी-टोंटी से लापरवाही से पानी बहने देना, सड़क पर दुधारू गाय-भेंस बांध के रखना। मेरे शहर वाराणसी में ऐसी बातें आम हैं। – योगेन्द्र जोशी

 

1 टिप्पणी

Filed under कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, Hindi literature, human behaviour, Short Stories, society

अंग्रेजी छोड़ेंगे नहीं, आम आदमी समझे या न समझे परवाह नहीं

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच एक युवक उस पटल पर आया। वह अपने मोबाइल पर बैंक द्वारा भेजे गए एक संदेश का मतलब जानना चाहता था। काउंटर के पारदर्शी शीशे के दूसरी तरफ़ बैठे बैंक-कर्मी को संदेश दिखाते हुए उसने पूछा, “जरा देखिए तो मेरे फोन पर यह क्या मैसेज आया है।

अपने अन्य कार्य में व्यस्त बैंक-कर्मी ने कहा, “आप खुद पढ़िए न और मुझे भी सुना दीजिए

युवक ने कहा, “मेरे समझ में नहीं आ रहा है। आप देख दीजिए न

बैंक-कर्मी ने कहा, “ठीक है, पढ़िए क्या लिखा है।

युवक क्षण भर हिचकिचाया और फिर बोला, “दरअसल मैसेज अंग्रेजी में है और इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं मैं।

मैं उस युवक की समस्या समझ गया। बैंक-कर्मी अपने हाथ में आया काम निपटा ले यह सोचकर मैंने उस युवक से कहा, “लाइए अपना मैसेज मुझे दिखाइए।

संदेश सामान्य प्रकार का था, बैंक एटीएम से निकाले गए पैसे के बारे में जानकारी। मैंने युवक को समझाया, “आपने एटीएम से पैसा निकाला था क्या?

उसका जवाब हां में था। आगे मैंने उसको बताया, “ऐसी जानकारी बैंक अपने ग्राहकों को भेजते रहते हैं ताकि वे देख सकें कि किसी और ने तो लेनदेन की धोखाधड़ी तो नहीं की है। ऐसे संदेशों को सावधानी से देख लेना चाहिए ताकि कुछ गड़बड़ होने पर बैंक को सूचित किया जा सके।

उसकी समझ में बात आ गई और वह बैंक शाखा से बाहर चला गया।

मैं सोचने लगा क्या अजीव विडंबना है कि आज भी इस देश में अंग्रेजी और केवल अंग्रेजी का राज चल रहा है। हिन्दी को राजभाषा की “उपाधि” दे तो दी गई, किंतु उसे व्यवहार में लेना सरकारी संस्थानों ने अभी तक नहीं सीखा है। अन्य भारतीय भाषाओं का तो नंबर ही नहीं आने का।

मुश्किल से 15-16% देशवासी होंगे जो अंग्रेजी ठीक से समझ पाते हों। अपने-अपने कार्यालयों के कार्यों की अंग्रेजी उनको समझ में आ जाती होगी, क्योंकि वह एक स्थापित ढर्रे की भाषा होती है। लेकिन उसके परे दूसरे कार्य-क्षेत्रों की अलग प्रकार की भाषा उनको अच्छी तरह समझ में आती होगी इसमें मुझे शंका है। अस्तु।

बैंक जैसी संस्थाओं को तो हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में भी ग्राहकों को संदेश देना ही चाहिए ताकि अंग्रेजी के संदेशों को समझने के लिए दूसरों के पास किसी को न जाना पड़े। वे क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल का दावा तो करते हैं, लेकिन अंकीय (डिजिटल) माध्यम से संदेश-प्रेषण में अभी बहुत पीछे हैं।

ऐसी घटनाओं को देखने पर मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के दिन (1960 के आसपास) याद आते हैं जब त्वरित संदेश के लिए “तार” (टेलीग्राम) भेजे जाते थे, जो केवल अंग्रेजी में अंकित रहते थे। तब साक्षरता वैसे ही कम थी और तिस पर अंग्रेजी जानने वाले तो विरले ही होते थे, जिनके पास दूर-दूर से लोग आते थे तार का मज़मून समझने के लिए। – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under अंग्रेजी, कहानी, बैंकिंग, भारत, लघुकथा, हिंदी साहित्य, हिन्दी, Banking, Hindi literature, India, Short Stories, Story, Uncategorized

बच्चे दो मांगें मां से एकल स्मार्टफोन

हम डिजिटल तकनीकी के युग में जी रहे हैं। और इस युग की सबसे बड़ी खासियत है स्मार्टफोन नामक युक्ति की उपलब्धता। स्मार्टफोनों की कीमत शुरुआती दौर में इतनी अधिक हुआ करती थी कि उसे खरीदने से पहले आदमी दस बार सोचता था। लेकिन जल्दी ही उसके सस्ते लेकिन कारगर मॉडल बाज़ार में आ गए। अब स्थिति यह है कि कई जनों के हाथों में अक्सर एक नहीं दो-दो तीन-तीन स्मार्टफोन भी दिख जाते हैं। इतना ही नहीं, स्मार्टफोन का आकर्षण छोटे बच्चों तक पहुंच चुका है। समाज के मध्यवर्ग में यह भी देखने को मिल रहा है कि जैसे ही नवजात शिशु के हाथ की अंगुलियां कोई भी चीज पकड़ने की सामर्थ्य पा जाते है वह भी मोबाइल से बतौर खिलौना खेलने लगता है। और जब तक वह खड़ा होना सीख पाता है तब तक वह अपने काम के वीडिओ भी देखने लगता है। बच्चों में पनप रहे मोबाइल के प्रति यह लगाव मेरी दृष्टि में जोखिम भरा है। लेकिन कई लोग अपने बच्चे की “स्मार्ट्नेस” से गर्वान्वित अनुभव करते हैं और स्मार्टफोन से उसे दूर रखने की जरूरत नहीं समझते हैं। इस स्थल पर मैं स्मार्टफोन के लाभ-हानि की विवेचना करने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि उससे जुड़ा एक अनुभव साझा कर रहा हूं।

कुछ दिनों पूर्व मैं पंजाब के शहर लुधियाना से शताब्दी एक्सप्रेस नामक (चेयरकार) रेलगाड़ी द्वारा नई दिल्ली आ रहा था। मैं गाड़ी के डिब्बे में गलियारे से लगी हुई पहली पंक्ति की सीट पर बैठा था और उसी पंक्ति में गलियारे के दूसरी तरफ तीनों सीटों पर दो महिलाएं और दो बच्चे बैठे थे। छोटा ब्च्चा कोई ५ साल का रहा होगा और उससे बड़ी बच्ची, अनुमानतः उसकी बहिन, डेढ़-दो साल बड़ी रही होगी।

बच्चों की मां के पास एक स्मार्टफोन था। गाड़ी के प्रस्थान करने के थोड़ी देर बाद छोटे बच्चे ने अपना मनपसंद वीडियो देखने के लिए मां से स्मार्टफोन हथिया लिया। जब बड़ी बहिन ने देखा कि स्मार्टफोन पर भाई ने कब्जा जमा लिया है तो उसे लगा कि फोन के प्रयोग का अधिकार उसे भी मिलना चाहिए। थोड़ी देर तक उसकी नजर फोन पर चल रहे वीडियो पर बनी रही। उसके हावभावों से लग रहा था कि उसे वह वीडियो उबाऊ लग रहा है। अंततः अधीर होकर उसने बहलाते-फुसलाते हुए भाई से स्मार्टफोन छीन लिया और अपने मन का वीडियो चलाने के लिए उसके ऊपर उंगलिया फेरना शुरू कर दिया। इससे छोटे भाई का रोना-गाना आरंभ होना स्वाभाविक था। मां ने उससे स्मार्टफोन वापस लेकर भाई को सौंप दिया। अब रोने-चीखने की बारी बहिन की थी।

उस मां की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे दोनों को शांत करे। उसने स्मार्टफोन बच्चों से लेकर अपने पर्स में रख लिया। किंतु ऐसा करना कारगर नहीं रहा। दोनों ने रोना शुरू कर दिया। उसने स्मार्टफोन पर्स से निकालकर एक ऐसा वीडिओ खोजा जो दोनों बच्चों को बहला सके। दोनों ने मिलकर हाथ में फोन लिया और वीडियो देखते हुए शांत हो गए। तब कुछ समय के लिए शान्ति छा सकी।

बच्चों की चीख-पुकार सुनना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। आसपास के यात्रियों की नींद में या उनके पत्र-पत्रिका पढ़ने में उनके रोने-गाने से अवश्य ही खलल पड़ रहा होगा। लेकिन बच्चों की जिद के सामने भला कोई कर भी क्या सकता था? गतंव्य तक पहुंचने का इंतिजार सभी को ही था।

निःसंदेह बच्चों की उस हरकत को देखना कुछ हद तक दिलचस्प भी लग रहा था। मैं सोच रहा था कि स्मार्टफोन किस कदर बच्चों के आकर्षण की चीज बनता जा रहा है। मुझे तो यह सब भविष्य के खतरे की ओर संकेत करता हुआ-सा दिख रहा था। ये बच्चे आने वाले समय में क्या आत्मसंयमी हो सकेंगे? क्या वे एकाग्रचित्त हो पाने की कला सीख पाएंगे? क्या इन युक्तियों पर उपलब्ध होने वाले इलेक्ट्रॉनिक यानी कंप्यूटर खेलों से अपने को अलग रख पाएंगे? इस प्रकार के अनेक प्रश्न मेरे मन में उठने लगे। – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories, Story

वह जिसकी आप चर्चा करते नहीं

क्या आपने कभी ऐसे व्यक्ति को देखा है जो सार्वजनिक मंच से यह कहे कि भ्रष्टाचार इतनी खराब चीज नहीं है कि उससे परहेज किया जाए? मैंने ऐसे किसी व्यक्ति को न कभी देखा है और न ही उसके बारे में सुना है। मेरा अपना ख्याल है कि यदि लोगों के बीच में से यादृच्छिक तरीके से किसी को चुन लिया जाए और उसे मंच से भ्रष्टाचार पर कुछ शब्द बोलने को कहा जाए तो वह भ्रष्टाचार की हिमायत नहीं करेगा, बल्कि उसके विरुद्ध ही बोलेगा। (यादृछिक = अंग्रेजी में रैंडम, यानी चुनने की कोई निर्धारित शर्त के बिना जिसे आंख मूंदके चुनना कहा जाएगा।) मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति भी सार्वजनिक तौर पर भ्रष्टाचार का विरोध ही करेगा। मेरा अनुमान है कि भारतीय समाज में भ्रष्टाचार का विरोध अधिकांशतः एक दिखावा होता है, उससे वास्तविक परहेज होता नहीं। मन ही मन सभी समझते होंगे कि परहेज करने लगेंगे तो जियेगे कैसे! बहुत से मौकों पर भ्रष्टाचार होते हुए भी लोगों को दिखता नहीं।

     मैं अपने एक हालिया अनुभव की चर्चा करता हूं। डेढ़-दो सप्ताह पूर्व मेरे गेट पर एक युवक पहुंचा। उसने बताया कि वह शहर (वाराणसी) के जलापूर्ति विभाग ‘जलकल’ से आया है और भवन-स्वामियों से मकान संख्या, उसके मूल्यांकन (टैक्स), पानी-टैक्स आदि की जानकारी इकट्ठा कर रहा है। उस जानकारी का प्रयोग भवनों पर वॉटर-मीटर लगाने में किया जाना था। यों तो यह जानकारी जलकल विभाग के पास होनी ही चाहिए, क्योंकि उसी के आधार पर तो जलापूर्ति की जाती है। किंतु सरकारी विभागों की कार्य-शैली ऐसी ही बेतुकी होती है कि अपने अभिलेखों को खंगालने के बजाय वे उपभोक्ता से पूछने लगते हैं। दिलचस्प बात यह है कि मीटर पहले से ही लगे हैं, परंतु उनकी रीडिंग होती नहीं। मेरे अपने मकान पर मीटर 25-26 वर्ष पहले लगा था। अब तक तो वह काम करना भी बंद कर चुका होगा। बता दूं कि वाराणसी में अभी तक जलापूर्ति “अन्मीटर्ड” है। लोग पानी की अंधाधुंध बरबादी करते हैं। सर्वजनिक स्थानों पर तो अक्सर पानी फालतू बहते दिख जाता है। “मीटर्ड” जलापूर्ति होने पर पानी की बरबादी शायद रुक सके, क्योंकि तब लोगों को खरचे गए पानी के अनुपात में कीमत चुकानी पड़ेगी।

हां तो मैं उस युवक की बात पर लौटता हूं। हमारा (घर का) नियम है हम गेट पर आए किसी भी आगंतुक का स्वागत चाय-पानी की पेशकश के साथ करते हैं। तदनुसार हमने उसको गेट के अंदर बुलाकर कुर्सी पर बिठाकर संबंधित कागजात दिखाए। साथ ही उनको मीठे के साथ ठंडा पानी पीने को दिया, जिसे उसने सहज रूप से स्वीकार कर लिया। इस दौरान उससे कुछ औपचारिक और कुछ अनौपचारिक बातें भी कर लीं।

वार्तालाप में उसने बताया, “मैं जलकल का कर्मचारी नहीं हूं, बल्कि उस क्षेत्र के जेई (जूनिअर एंजीनियर) द्वारा इस काम में लगाया गया हूं। … आप देख ही रहे हैं, इस समय काफी गर्मी पड़ रही है। ऐसे में जेई सा’ब कहां फील्ड में उतरने वाले। इसलिए उन्होंने यह काम मुझे सौंप दिया हैं।”

     मैं समझ गया कि माजरा क्या है। मुझे मालूम है कि कुछ सरकारी कर्मचारी मौका मिलने पर अपना कार्य दूसरों से करवाते हैं और बदले में कुछ पैसा उन्हें थमा देते हैं। इसे मैं नौकरी ‘सबलेट करना’ कहता हूं। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में ऐसा कभी-कभार देखने को मिल जाता है। कुछ अध्यापक विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं और अपने बदले बेरोजगार युवक/युवतियों को पढ़ाने भेज देते हैं ऐसा मेरे सुनने में आता है। ऐसा ही एक वाकया मुझे याद आता है। विश्वविद्यालय के मेरे विभाग में एक सफाई कर्मचारी आंखों से कमजोर हो चला था। अतः वह अपने बदले किसी और को विभाग में भेजता था। ऐसे अपवाद विश्वविद्याल्य में शायद एक-दो ही रहे होंगे।

     यह अप्रत्यक्ष भ्रष्टाचार का एक रोचक उदाहरण है। किसी सरकारी मुलाजिम द्वारा अपना काम स्वयं न करन सर्वथा अनुचित है। उस व्यक्ति का ऐसा आचरण और साथ में बेरोजगार का शोषण आम तौर पर किसी को कहां पता चलता है?

उस युवक से अधिक बात करने का मेरा मन नहीं हुआ। क्या पता वह अपनी बेरोजगारी का दुखड़ा सुनाने लगता, जिसे सुनना अच्छा न लगता। मेरे पास किसी की बेरोजगारी का कोई इलाज तो है नहीं।

     मुझे लगता है कि भ्रष्ट आचरण हम भारतीयों के चरित्र का अभिन्न अंग बन चुका है। मैं सोचता हूं किसी को भी अपने अनुचित आचरण को लेकर कभी आत्मग्लानि नहीं होती होगी। धर्मकर्म और पापपुण्य की बातें करने वाले समाज में आचरण संबधी विरोधास मैं कई मौकों पर देखता आ रहा हूं। – योगेन्द्र जोशी

 

 

टिप्पणी करे

Filed under administration, किस्सा, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, corruption, Hindi literature, Short Stories

दूसरों को स्वर्ग का रास्ता दिखाने का ठेका?

मेरे पड़ोस में एक युवक रहता है। अधिक पढ़ा-लिखा नहीं। मैंने उससे कभी पूछा भी नहीं कितने तक पढ़े हो। अवश्य ही १०+२ से अधिक नहीं, या शायद उतना भी नहीं। एससी-एसटी वर्ग का होने के बावजूद आरक्षण का लाभ वह नहीं ले सका है। पिछले कुछ वर्षों से टैस्की चलाने का काम कर रहा है। जब भी सड़क पर मिल जाता है तो उसके हालचाल पूछ लेता हूं।

आज प्रातः वाहन साफ करते हुए उसे मैंने देखा। रुककर पूछा कि उसका आज का क्या कार्यक्रम है। उसने बताया, “आजकल केरला से फ़ादर लोग आए हुए हैं। उन्हीं को अलग-अलग गांवों में घुमाफिरा रहा हूं।”

‘फ़ादर! यानी इसाई धर्म के पादरी या धर्मोपदेशक!

मेरे इस सवाल पर कि गांव-गांव घूमने का उनका मकसद क्या रहता है, उसने जवाब दिया, “वे लोग इसाई धर्म का प्रचार करने आए हुए हैं। उनके स्थानीय कार्यकर्ता लोगों की भीड़ इकट्ठा करते हैं और ये फ़ादर लोग उनको उपदेश देते हैं कि आओ प्रभु ईसू की शरण में आओ। वे आपका उद्धार करेंगे।”

“उनकी बातें सुनकर मेरा मन हुआ कि मैं भी कुछ कहूं।” उसने कहा।

“ऐसी क्या बात हुई उन लोगों से तुम्हारी?”

दरअसल वे बोल रहे थे, “क्या रखा है इस धरती के सुख-चैन में। प्रभु की शरण में आने पर स्वर्ग उपलब्ध होगा जहां सुख ही सुख होगा।”

“तब मैंने कहा सर, आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं वह कभी का गुजर चुका है। आज सभी लोग रोजी-रोटी के इंतिजाम में लगे हैं। उनकी चिंता इसी धरती पर पेट भरने की है। अब देखिए न कि जिन गांवों में आप घूम रहे हैं वहां के किसान फसल काटने-संभालने में लगे हैं। उनको आपकी बात सुनने-समझने का मौका भला कहां?”

“हां भई, आपकी बात तो कुछ हद तक सही है। फिर भी हमारी कोशिश रहती है कि उन्हें ‘रास्ता’ दिखाएं।”

“क्यों आप रास्ता दिखाना चाहते हैं? उनको अपना रास्ता खुद खोजने दीजिए।”

उस युवक ने मुझसे कहा, “दरअसल उनके पास मेरे सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं था।”

कम शिक्षित होने के बावजूद उस युवक की बातों में दम था ऐसा मुझे लगा। वस्तुतः टैक्सी चलाते हुए वह तमाम प्रकार के लोगों के संपर्क में आता है। कभी पर्यटकों से वास्ता पड़ता है तो कभी तीर्थयात्रियों से, और कभी विश्वविद्यालय में सेमिनार-कॉन्फ़रन्स के प्रतिभागियों से, इत्यादि। उनसे बातें करके वह काफी कुछ सीखता रहता है।

मैं इस प्रश्न पर विचार करने लगा कि इस धरती पर जो है वह तो सभी को दिखता है। स्वर्ग जैसी कोई चीज होती भी है क्या? किसी ने उसे देखा है? उस अज्ञात स्वर्ग की अधिक अहमियत है या इस धरती की जिसके सहारे हम सब जी रहे हैं? सोचिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

2 टिप्पणियाँ

Filed under कहानी, मजहब, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Religion