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नोटबंदी के बाद लाला को मिला मुफ़्त का पैसा

टिप्पणी: यह लघुकथा साहित्य शिल्पी नामक ई-पत्रिका में छ्प चुकी है (दिनांक 2016-11-29)| आम तौर पर मैं अपने अनुभवों को लघुकथा के रूप में ढ़ालकर इस चिट्ठे पर पेश करता हूं, लेकिन यह पूर्णतः काल्पनिक है, सामयिक घटना पर आधारित।

मैं घर के पास की दुकान से घर के लिए रोजमर्रा का जरूरी सामान लेकर आ रहा था। सामने से मुरारीलाल साइकिल से आते दिख गया। मैं रुक गया। जैसे ही वह नजदीक पहुंचा मैंने उसे रोकने के लिए आवाज दी, “अरे ओ लाला!”

उसने अपनी दायीं ओर नजर घुमाई और मुझे देखकर साइकिल रोकते हुए पास आ गया। मैंने टोका, “अरे लाला, इतनी तेजी से कहां से आ रहे हो? जरा आजू-बाजू भी देख लिया करो। कभी-कभी हमारे जैसे परिचित, यार-दोस्त, राह में बतियाने के लिए खड़े मिल जाते हैं।”

उसने जवाब दिया, “बैंक से आ रहा हूं। हजार-पांचसौ के कुछ नोट जमा करने थे। बहुत भीड़ थी, तीन-चार घंटे लग गये। सुबह का घर से निकला हूं, बिना चाय-नास्ते के, इसलिए पहुंचने की जल्दी थी।”

“चाय-नास्ते के बिना दम निकला जा रहा हो तो चलो मेरे साथ; मैं चाय पिलाता हूं। दो कदम की दूरी पर ही तो मेरा घर है।” मैंने कहा।

वह साथ हो लिया। मैंने चुटकी ली, “बड़े छिपे रुस्तम निकले, भई। हम तो तुम्हें कंगाल समझते थे। तुम तो घर में नोटों की गड्ढी छिपाए पड़े हो यह आज पता चला। पुराने नोट बंद क्या हुए कि लोगों के घरों से जमा नोट निकलने लगे।”

“नहीं यार, अपनी किस्मत कहां जो घर में नोट जमा हों”

“तो फिर कहीं डांका डाले थे क्या? या कहीं कूड़े में मिल गये थे?”

“नहीं भई। बस किसी ने दान में दे दिए समझो।”

“पहेली मत बुझाओ; साफ-साफ बताओ कहां से पा गए नोट?”

“बताता हूं … बताता हूं क्या हुआ। तुम तो मेरे चचेरे भाई, जीवनलाल जी को जानते ही हो। वैसे तो वे उधार में भी पैसा देने से किसी न किसी बहाने बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन कल शाम एक लाख के पुराने नोट लेकर पहुंच गये घर पर और बोले, ‘मुरारी मेरा एक काम करो। ये पैसा लो और अपने बैंक खाते में जमा कर लो। डेड़-दो साल बाद आधा मुझे दे देना और आधा तुम रख लेना।’ मैंने उनकी बात मान ली। गरीब को पचास हजार रुपये मिल रहे हों तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।” उसने मुझे समझाया।

अब तक हम घर पर पहुंच चुके थे। घर में दाखिल होते हुए मैंने श्रीमती जी को आवाज दी और मुरारीलाल को चाय-वाय पिलाने का अनुरोध किया। फिर मुरारी की तरफ़ मुखातिब होते हुए कहा, “आज तक तुम्हारे खाते में तनख्वाह के अलावा कभी एक धेला भी जमा नहीं हुआ होगा। इस बार उसमें अनायास एक लाख की रकम जमा हो गयी। बदकिस्मती से अगर कोई राजस्व अधिकारी पूछ बैठे कि यह रकम कहां से आई तब क्या स्पष्टीकरण देना होगा इसे भी सोच लेना।”

मुरारीलाल का चेहरा देख मुझे लगा कि वह गंभीर सोच में पड़ गया है।  – योगेन्द्र जोशी

 

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नकद-बगैर पैसे का लेनदेन (कैसलेस मनी ट्रांजैक्शन) – निजी अनुभव

मौजूदा केंद्र सरकार के द्वारा 500 एवं 1000 के नोटों पर पाबंदी के बाद लोगों के बीच अफ़रातफ़री-सी मची है। अवश्य ही अनेक जनों को पैसे के लेनदेन में दिक्कतें आ रही हैं और बैंकों से वे नये नोट पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इस नोटबंदी से पैदा हो रही दिक्कतों के फलस्वरूप नकदी बगैर लेनदेन की चर्चा भी जोरशोर से उठ रही है। जानकार लोग बता रहे हैं की देश की जनता को यथासंभव बिना नकदी के लेनदेन के तरीके को अपनाना चाहिए। इससे नकद पैसे की जरूरत को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। इस मुद्दे को लेकर यहां पर बताना चाहता हूं कि किस प्रकार मैं स्वयं नकद बगैर लेनदेन करता आ रहा हूं।

बैंक चेक से लेनदेन मैं लंबे समय से करता आ रहा हूं। बैंकों के कंप्यूटरीकरण और इंटरनेट के प्रयोग से पहले नकद अथवा चेक (अथवा उसके तुल्य बैंक ड्राफ़्ट आदि) से ही भुगतान किया जा सकता था। बैंक शाखाओं के इंटेरनेट से जुड़ने के वाद लेनदेन के तरीके के विकल्प भी ग्राहकों को मिल गये।

बैंकों के इंटरनेट से जुड़ने से पहले मैंने चेक से अधिक से अधिक लेनदेन करना शुरु कर दिया था। जहां कहीं चेक स्वीकार्य नहीं होते थे वहां मैं मजबूरन नकद पैसे देता था। मेरी कोशिश होती थी कि 2-4 हजार से अधिक की राशि का भुगतान चेक से कर सकूं। ऐसी स्थिति बाजार से घरगृहस्थी के सामानों, जैसे टीवी, फ़्रिज, स्कूटर आदि, खरीदने में उत्पन्न होती थी। मैंने पाया कि दुकानदार चेक स्वीकारने में आनाकानी करते हैं। उन्हें यह शंका बनी रहती थी कि चेक का भुगतान ही न हो पाये और उसके लिए ग्राहक से पैसा वसूलना गंभीर समस्या बन जाए। चेक का बिना भुगतान लौट आना चेक-दाता का अपराध माना जाता है और चेक का मामला अक्सर अदालत तक पहुंच जाता है। दुकानदारों का चेक न लेने का यह एक गंभीर कारण होता था और वह आज भी है। ऐसा होना ग्राहकों के प्रति अविश्वास पैदा करता है। मैं दुकानदारों की विवशता को समझता हू। अतः चेक से लेनदेन के लिए मैंने विश्वसनीयता का एक तरीका अपनाया। मैं दुकानदार को अपना समुचित परिचय देने के बाद चेक थमा देता था और कहता था, “आप मेरे चेक को भुना लीजियेगा और जब आपको पैसा मिल जाए तो मुझे सूचित कर दीजिएगा या सामान भेज दीजिएगा।”

मेरे उपर्युक्त आश्वासन पर दुकानदार चेक स्वीकार लेते थे। कई बार वे मुझ पर विश्वास करते हुए वांछित सामान भी उसी समय दे देते थे।

जब इंटरनेट बैंकिंग की शुरुआत हुई तो मेरे पास नये विकल्प भी खुल गये। मुझे याद आता है कि इस दिशा में सबसे पहले आइसीआइसीआइ (ICICI) बैंक आगे बढ़ा। बाद में भारतीय स्टेट बैंक में भी यह सुविधा प्राप्त हो गई। मैंने सबसे पहले एटीएम-सह-डेबिट (ATM-cum-DEBIT) कार्ड का प्रयोग करना आरंभ किया। मेरा पैसे के लिए बैंक जाना प्रायः बंद ही हो गया। मैं जेब में बहुत कम कैश लेकर चलने लगा, यात्राओं में भी। जहां आवश्यकता हुई नजदीक के एटीम-स्थल पर पहुंचकर आवश्यक नकद निकाल लेता था।

जब इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा मुझे उपलब्ध हुई तो पैसे का लेनदेन मेरे लिए और सरल हो गया। कई सरकारी तथा गैरसरकारी संस्थाओं ने इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से भुगतान लेना शुरु कर दिया और उसके साथ ही मैंने भी उसी तरीके से भुगतान आरंभ कर दिया। आरंभ में रेलवे आरक्षण के लिए नजदीकी आरक्षण केंद्र पर जाना पड़ता था, लेकिन नयी सुविधा के साथ मेरे लिए घर से ही यह कार्य संपन्न करना संभव हो गया। इस तरीके से आरक्षण करना मुझे सस्ता भी पड़ता है क्योंकि आरक्षण केंद्र जाना और लाइन में लगना अधिक महंगा साबित होता है।

अब तो मेरा लगभग सब लेनदेन इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से होता है है, चाहे टाटास्काइ का भुगतान हो या मोबाइल-रिचार्ज का भुगतान। पिछले कुछ सालों में मेरे नगर वाराणसी के जलकर एवं बिजली बिलों का भुगतान भी इस माध्यम से होने लगा है।

मैं आज भी मोबाइल फोन के “ऐप” का प्रयोग उपर्युक्त लेनेदेन के लिए नहीं करता। इसके दो कारण हैं। पहला कंप्यूटर पर काम करने का मैं आदी हो चुका हूं, उसमें टाइप करना और पढ़ना मेरे जैसे उम्रदराज व्यक्ति के लिए सुविधाजनक होता है। दूसरा इसे अधिक सुरक्षित पाता हूं, विशेषकर इसलिए कि बैंक की वेबसाईट के साथ संपर्क करने पर मोबाइल पर भी समुचित संदेश मिलता है।

मैं सोचता हू कि ई–वैलेट जैसे आधुनिकतम माध्यमों का प्रयोग करना भी मैं आरंभ कर दूं।

मुझे आश्चर्य होता है जब पढ़ेलिखे और जिम्मेदार पदों पर कार्यरत लोग भी इंटारनेट बैंकिंग जैसी सुविधा का प्रयोग करने से घबड़ाते हैं। मेरे एक पूर्व सहयोगी – वे एवं मैं अब विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त – इंटरनेट का इस्तेमाल वर्षों से कर रहे हैं, लेकिन आज भी पैसे के लेनदेन के लिए उसे प्रयोग में लेने को तैयार नहीं हैं। अन्य कनिष्ठ सहयोगी के हाल भी यही हैं। मुझे और भी लोग मिल चुके हैं जो ई-बैंकिंग को असुरक्षित मानते हैं। संभव है निकट भविष्य में स्थिति तेजी से बदल जाये। – योगेन्द्र जोशी

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