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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों से कितना पीछे हैं हम (1)

अपना देश विकसित बनने की आकांक्षा लेकर चल रहा है। किन्तु इस बात को समझने की कोशिश देशवासी, विशेषतः देश के कर्णधार राजनेता, नहीं करते हैं कि विकसित देशों के नागरिक नियमों का पालन करते हैं। यह कहना अतिरंजित नहीं होगा कि नागरिक नियमों का पालन उनकी जीवन-पद्धति का हिस्सा बन चुका है। हो सकता है चार-पांच पीढ़ियों पहले उनकी स्थिति बहुत संतोषप्रद न रही हो, किंतु जब हर आने वाली पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी को बहुधा नियमों से बंधे देखती होगी तो वह स्वयं उसके अनुसार ढलती गयी होगी। मनुष्य को अपनी बाल्यावस्था में अपने परिवेश में जो देखने तथा अनुभव करने को मिलता है उसी के अनुसर उसकी सोच बनती है। मैंने अनुभव किया है कि विकसित देशों के नागरिक स्वयं अपने एवं उन लोगों, जिनके बीच वे रहते हैं, के हितों के प्रति काफी हद तक सचेत रहते हैं। मेरा काम कैसे बने केवल यह सोचकर चलना शायद उनकी सोच में नहीं रहता। ऐसा नहीं कि वहां कायदे-कानूनों का उल्लंघन कोई भी नहीं करता, किंतु वैसे लोग कमोबेश अपवाद के तौर पर पाये जाते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि विकसित देशों में कायदे-कानूनों को तोड़ने वाले को बचाने के लिए नेता-वेता और आम आदमियों की भीड़ जमा नहीं होती है जैसा कि हमारे देश में अक्सर होता है।

मुझे विकसित देश का अनुभव कोई 30 वर्ष पहले तब हुआ था जब मैं उच्चाध्ययन एवं शोधकार्य के लिए विलायत गया हुआ था। तब अपने देश एवं उस देश की व्यवस्थाओं का अंतर मुझे साक्षात्‍ देखने का अवसर मिला था। किंतु अपने निर्धारित उद्येश्य की पूर्ति करने की व्यस्तता में मैंने उस समय वहां की नागरिक व्यवस्था की बारिकियों पर कोई चिंतन-मनन नहीं किया था। परंतु बीते ग्रीष्मकाल में एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ भारतीय पर्यटक की हैसियत से कनाडा में अपने बेटे-बहू के पास सात-आठ सप्ताह के प्रवास का जब मुझे अवसर मिला तो वहां की नागरिक व्यवस्था को समझने की कोशिश भी मैंने की थी।

सभी विकसित देशों में एक बात सामान्यतः देखने को मिलती है और वह है नागरिक सुरक्षा। ये बात मैंने कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन तथा इटली में अनुभव की है, और अन्य देशों के बारे में तत्संबंधित जानकारी परोक्षतः प्राप्त की है। नागरिक सुरक्षा से मतलब है किसी व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा, और उसमें भी ‘जान’ की सुरक्षा पहले फिर ‘माल’ की। जो लोग ऐसे कार्यों में लगे हों जिनमें जान खोने का जोखिम हो उनके लिए भी सुरक्षा के यथासंभव प्रयास किए जाते हैं।

सुरक्षा की उक्त नीति के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर अपनी अथवा किसी अन्य व्यक्ति की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं मिलती है। इस हेतु कड़े नियम हैं और आम तौर पर सभी नागरिक उन नियमों से वाकिफ रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मैं समझता हूं ऐसा वे स्वेच्छया करते हैं। अवश्य ही कुछ इस भय से भी करते होंगे कि नियमों का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। विकसित देशों में नेताओं एवं उच्चाधिकारियों के परिजनों को भी नहीं बख़्शा जाता है।

अपने देश में ये सब कल्पना से परे है। सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है और जब भी दुर्घटना होती है तो उससे कोई सीख नहीं ली जाती है; न आम नागरिक सीख लेता है और न ही शासकीय तंत्र।

अब मैं कनाडा के अपने प्रवास के दौरान अनुभव में आयी एक घटना का जिक्र करता हूं। मेरे बेटे-बहू एक 11-मंजिली इमारत की 10वीं मजिल में स्थित अपार्ट्मेंट में रहते हैं। इमारत में कुल करीब 100 अपार्ट्मेंट हैं। एक दिन रसोई के बिजली के “हॉट-प्लेट” (चूल्हा) पर रोटी सेंकने अथवा पापड़ भूनने में कुछ धुंआ उठने लगा। यों तो धुंआ कुछ हद तक चूल्हे के ऊपर लगे पंखे-चिमनी के माध्यम से बाहर निकल जाता है, किंतु अधिक मात्रा होने पर उसका कुछ हिस्सा कमरों में फैल जाता है। उस समय धुंए की मात्रा कुछ अधिक हो गयी थी। फलतः रसोई से सटे कमरे में “स्मोक-सेंसर” का अलार्म (चेतावनी ध्वनि) बज गया। घबराहट में चूल्हे एवं रोटी/पापड़ का काम बंद करके हम लोगों ने स्नानगृह का “एग्जास्ट फैन” चलाते हुए सभी दरवाजे-खिड़कियां खोल दीं ताकि धुंआ निकल जाये। उस समय बेटे को छोड़कर हम तीन – बहू, मेरी पत्नी और मैं – घर में थे।

बाद में जब बेटा घर आया तो उसको हमने घटना के बारे में बताया। तब उसने घर में लगे “अलार्म बटन” के बारे में बताया कि उसे दबाने पर अलार्म बंद हो जाता है। लेकिन “स्मोक-सेंसर” अपना कार्य करता रहता है। बहू को भी उस “बटन” की जानकारी नहीं थी। बेटे ने यह भी बताया कि यदि धुंए की स्थिति नहीं बदली तो पच्चीस-तीस सेंकंड बाद फिर अलार्म बजता है। लेकिन इस बार वह पूरी इमारत में तथा हर अपार्टमेंट में बजता है और परिसर के कार्यालय में भी बज उठता है। उसकी सूचना अग्निशमन-दल को भी तुरंत पहुंच जाती है।

बेटे ने यह भी बताया कि अपार्टमेंट के नियमानुसार उस “सामुदायिक” चेतावनी (अलार्म) के बाद हर व्यक्ति का दायित्व होता है वह तुरंत अपने कमरे/अपार्टमेंट से बाहर खुले में निकल आवे। यदि संयोग से बड़ी दुर्घटना न घटी और यह पाया जाये कि अमुक व्यक्ति अपार्टमेंट में ही रह गया था। तो उसे 500 कनाडाई डॉलर का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

“आपने अपना जीवन जोखिम में डालने का अपराध क्यों किया?” यह सवाल वहां पूछा जाता है। वस्तुतः यह वैसा ही अपराध है जैसा कि आत्महत्या करना। क्या अपने देश में ऐसा सोचा जा सकता है? यहां तो दुर्घटनाओं के पीछे जिसका हाथ हो उसे तक सजा नहीं मिलती! मामला अक्सर कोर्ट में चला जाता है और फिर वर्षों तक मामला चलता रहता है। तब तक बहुत कुछ बदल चुकता है और शायद ही कोई दंडित होता है! – योगेन्द्र जोशी

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असेम्बली बिल्डिंग और डाइनामाइट और …

बीते अगस्त माह के प्रथम सप्ताह मैं सपत्नीक दिल्ली में था । उन दिनों दिल्ली में पर्याप्त वर्षा हो रही थी, लिहाजा वहां की सड़कों के निचले हिस्सों में भारी जलजमाव की स्थिति पैदा हो रही थी । जलजमाव के कारण सड़कों पर यातायात जाम की समस्या तो थी ही, साथ में कुछ जगहों पर वाहनों के पानी में फंस जाने की भी नौबत आ रही थी । यों बरसात के मौसम में इस प्रकार की समस्याएं अपने देश के अधिकांश बड़े शहरों में देखने को मिल जाती हैं ।

दो या तीन तारीख की बात होगी, जब हमें दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में अवस्थित घंटाघर इलाके से पूर्वी छोर पर नौइडा से सटे मयूरबिहार जाना था । इन जगहों के बीच कोई बीस-पच्चीस किलोमीटर की दूरी होगी । लोगबाग आम दिनों यह दूरी बस या आटोरिक्शा से तय करते हैं । हमने भी आटोरिक्शे से जाने का विचार किया, लेकिन दुर्भाग्य से कोई भी इस लंबी दूरी के लिए तैयार नहीं हुआ । सबको यही डर था कि कहीं फंस गये तो घर वापस लौटना भी मुश्किल हो जाएगा । कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहता था । हार मानकर हमने टैक्सी वाले से संपर्क साधा और उसी से चल पड़े । आटो की तुलना में करीब ढाई गुना किराया देना पड़ा । करते भी क्या, जाना जरूरी जो था । साथ में अटैची-बैग होने के कारण बस-सेवा लेने की भी हिम्मत नहीं थी ।

बताई गयी दूरी को तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लग गया । समय बिताने के लिए हमने टैक्सी वाले से ही गपशप शुरू कर दी । हमने दिल्ली की सड़कों, जलजमाव और ट्रैफिक जाम को ही बातचीत का विषय चुना । उसने विस्तार से तकलीफदेह हालातों की जानकारी दी । अपना असंतोष व्यक्त करते-करते वह कहने लगा, “यह सब आज के राजनेताओं की करतूत है जी । सभी भ्रष्टाचार के नाले में डुबकी लगा रहे हैं, उन्हें अपना घर भरने और भाई-भतीजों, यार-दोस्तों को लाभ पहुंचाने से मतलब । खुद ईमानदार होते तो सरकारी आफिसरों पर भी अंकुश रखते । राजनेता-अधिकारी दोनों ही लूट मचाए हैं । इसीलिए न सड़कें टिक पाती हैं, और न ही उनमें जमा पानी की कारगर निकासी हो पाती है । राजनैतिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती हैं जरूर, लेकिन हैं सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे ।”

मैंने उससे सहमति जताते हुए कहा, “बात तो आप सही कह रहे हैं । इन लोगों को देश की चिंता नहीं; इनकी असली चिंता तो सत्ता हथियाने और उसका भरपूर फायदा उठाने की है । पूरे देश में कमोबेश यही हाल है । इस देश का भगवान ही मालिक है !!”

“एक बात कहूं सा’ब ?”

“जरूर कहिए; आखिर रास्ता जो तय करना है । चुपचाप बैठे रहने से बेहतर है बातचीत चलती रहे ।”

“इधर दिल्ली में एक नयी असेम्बली बिल्डिंग बनने की खबर है … ”

“अच्छा है, एक और मौका मिलेगा धांधली करने का । बिल्डिंग बनेगी तो बनते-बनते गिर भी पड़ेगी ।” मैंने चुटकी ली ।

“वह तो है ही । लेकिन कोई भरोसा नहीं इन लोगों का । हो सकता है मजबूत ही बनवा लें । आखिर उसमें इन्हीं लोगों की बिरादरी बैठेगी न; कोई गरीब जनता के लिए थोड़े ही बनेगी कि जो कमजोर बनने देंगे ।” उसका जवाब था ।

“हां, ये बात भी सही है ।”

“मैं सोचता हूं, सा’ब, कि कोई उस बिल्डिंग के नीचे नींव में डाइनामाइट फिट कर देता । जिस दिन इनॉग्युरेशन (उद्‌घाटन) होता और ढेरों राजनेता उसमें बैठे रहते, उसे उड़ा दिया जाता । अपने आप मरते सब स्सा…”

उसकी बातें सुनकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि बदले में मैं क्या बोलूं । इतना मुझे जरूर लग रहा था कि उसके मन में आज के राजनेताओं के प्रति नफरत भरी हुई है । उसकी इस बात पर हम चुप ही रहे । वह अपनी बातें कहते रहा ।

आज राजनेताओं की साख किस कदर गिर चुकी है और लोग उनके प्रति कितना रुष्ट हैं, मुझे इन बातों का अंदाजा उस आदमी की बातों से लग रहा था । – योगेन्द्र जोशी

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सरकारी नौकरी? न, नहीं करनी!

बात कोई दो दशक पहले की है । तब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री (स्व. राजीव गांधी) ने कंप्यूटरों और सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देने की नीति अपनायी थी । फलतः उच्च शिक्षा संस्थानों में तद्विषयक अध्यापन के लिए नये-नये विभाग खोले जाने लगे और देश में डेस्क-टॉप श्रेणी के कंप्यूटरों का बहुतायत में निर्माण कार्य भी आरंभ हो गया, अथवा कुछएक का आयात किया जाने लगा । अध्यापन के लिए कंप्यूटर विज्ञान में डिग्रीधारकों की कमी भौतिकी (फिजिक्स) या गणित जैसे विषयों के अध्यापकों की मदद लेकर पूरी की जाने लगी । उन दिनों मुझ भौतिकी के अध्यापक को भी अपने विश्वविद्यालय (काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी) के नये स्थापित हुए कंप्यूटर विज्ञान विभाग की स्नातक कक्षाओं में अध्यापन का दायित्व सोंपा गया था । मुझे सैद्धांतिक प्रश्नपत्रों के साथ-साथ प्रयोगशाला में भी कार्य करना पड़ा था । तब का एक वाकया मुझे याद है ।

उस दौर में कंप्यूटर विभाग की प्रयोगशाला के लिए डी.सी.एम कंपनी के द्वारा निर्मित आठ-दस माइक्रोकंप्यूटर खरीदे गये थे । आज के डेस्क-टॉपों की तुलना में वे कहीं भी नहीं ठहर सकते थे । लेकिन तब माइक्रोप्रॉसेसर आधारित कंप्यूटरों का विकास शैशवावस्था में था । उनके दाम पैंतालीस-पचास हजार रुपये के लगभग और मेमॉरी (स्मृति) मुश्किल से एक मेगाबाइट और हार्डडिस्क दस-बीस मेगाबाइट; जी हां मेगाबाइट, गिगाबाइट नहीं । कंप्यूटरों के रखरखाव के लिए संबंधित कंप्यूटर कंपनी (डी.सी.एम) को ही ठेके पर जिम्मेदारी सोंपी गयी थी, अतिरिक्त मूल्य चुकाकर ।

कंपनी ने एक युवा ‘फील्ड इंजीनियर’ नियुक्त किया था, जिसके जिम्मे इलाहाबाद में रहते हुए उस क्षेत्र के सभी संस्थानों के कंप्यूटरों के रखरखाव का कार्य था । उसके पिता आयकर विभाग में आयुक्त-उपायुक्त स्तर के अधिकारी थे और इलाहाबाद में तैनात थे । वह उन्हीं के साथ रहता था और नियमित अंतराल पर अथवा सूचित किये जाने पर हमारे विभाग में भी आता था । फलतः हम लोगों की परस्पर मुलाकातें होती रहती थीं । फुरसत के क्षणों में हम लोग थोड़ी बहुत गपशप में मशगूल भी हो जाया करते थे ।

एक बार बातचीत के दौरान उसने मुझे बताया कि उसके पिता उससे नाखुश रहते हैं । मेरे कारण पूछने पर उसने कहा, “वे आयकर विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी हैं और चाहते हैं कि मैं भी उनकी तरह एक सरकारी अधिकारी बनूं, खास तौर पर एक आई.ए.एस. अधिकारी । वे सदा इस बात पर जोर देते रहे कि मैं संबंधित प्रतियोगिता परीक्षा में बैठूं । मेरे मना करने पर वे कहते कि मैं एक बार प्रयास तो करूं, उसे पास तो करूं, भले ही अंत में उस नौकरी को न स्वीकारूं । मैं हर बार मना कर देता । चूंकि मैं उनकी इच्छानुसार नहीं चल रहा था, अतः वे नाखुश रहने लगे ।”

“पर ये तो बतायें कि आपको सरकारी नौकरी, वह भी आई.ए.एस. की नौकरी, से परहेज क्यों था कि उसके लिए प्रयास भी करने को तैयार नहीं थे । इस बात से डरते थे क्या कि प्रतियोगिता में असफल हो जायेंगे ?” मैंने तब पूछा ।

“नहीं डरने की कोई बात नहीं थी । सफल-असफल होना तो जीवन में लगा ही रहता है । दरअसल मेरा कहना था कि जिस राह मुझे जाना नहीं उसके बारे में क्योंकर किसी से पूछूं ? मतलब यह कि मैं सरकारी नौकरी करना नहीं चाहता था । खामखाह मेहनत करना और चुन लिए जाने पर नौकरी छोड़ देना मेरी नजर में मूर्खता होती ।”

“बताया नहीं आपने कि सरकारी नौकरी से आपको परहेज क्यों था ?”

“दो कारण थे । पहला यह कि मैंने मेहनत करके आई.आई.टी., कानपुर से बी.टेक किया । मुझे कंप्यूटरों के साथ काम करना अच्छा लगता है । मैंने जो तकनीकी ज्ञान तथा दक्षता अर्जित किये हैं उनका उपयोग आई.ए.एस. जैसी सरकारी नौकरी में भला क्या हो सकता था ? मेरी यह योग्यता धरी की धरी न रह जाती क्या ? इसके अलावा यह बात भी माने रखती थी कि मैंने उनके सरकारी विभाग के कामकाज को देख रखा है । वहां काम सुस्ती तथा लापरवाही से होता है । कइयों के पास तो खास काम ही नहीं होता । मैं नहीं समझता कि मैं ऐसे माहौल के साथ सामंजस्य बिठा पाता । अपनी काबिलियत लोगों को दिखाने भर के लिए प्रतियोगिता परीक्षा में बैठना क्या जायज समझा जा सकता है ? सोचिये ।”

मुझे उसका उत्तर ठीक लगा । हर व्यक्ति की अपनी अभिरुचियां होती हैं । अवश्य ही सरकारी नौकरी के अपने फायदे होते हैं, अधिकारियों के रुतवे होते हैं, पद से जुड़े तरह-तरह के विशेष लाभ उन्हें प्राप्य रहते हैं, आदि । फिर भी एक कमी वहां प्रायः सदैव देखने को मिलती है, और वह है कार्यसंस्कृति तथा योग्यतानुरूप कार्य करने के अवसरों का अभाव । कुछ लोगों को यह अभाव खलता है । वह इंजीनियर ऐसे जनों में से एक था । – योगेन्द्र

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घाटा नहीं नौकरी से निलंबन में

सालों पहले की घटना है यह । तब मैं अपने परिवार के साथ किराये के मकान में रहता था । मेरे मकान-मालिक एक सरकारी मुलाजिम हुआ करते थे । वे राज्य सरकार के किस महकमे में कार्यरत थे यह मुझे पता नहीं, मैंने कभी उनसे पूछा भी नहीं । पर उनकी बातों से मुझे इतना पता है कि वे बुनकरों से सरोकार रखने वाले विभाग में कार्यरत थे । उनका ओहदा बहुत साधारण था पर वे जिस पद पर थे उसमें अच्छी-खासी आमदनी जरूर हो जाती थी । यह सब उन्हीं के मुख से सुनी हुई बातों के बल पर मैं कह रहा हूं । जोश में आकर वे कभी-कभी खुदबखुद बता देते थे कि कितना-कितना पैसा उन्होंने कहां-कहां से कमाया ।

बाद में मैं किसी और मुहल्ले में अपना मकान बनवाकर रहने लगा । फलतः अपने उन पूर्व मकान-मालिक से मेरा संपर्क टूट गया । फिर भी दो-चार माह में कभी उनसे मेरी मुलाकात हो जाती थी ।

एक बार लंबे अर्से क बाद उनसे मेरी भेंट हुयी तो कुशल-क्षेम की चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि वे कुछ हफ्तों से निलंबित चल रहे हैं । जैसा मुझे मालूम है निलंबन के नियमों के तहत निलंबन-काल में किसी व्यक्ति को अपनी सुविधा के अनुसार, जैसे चाहा वैसे, समय बिताने की छूट नहीं होती है । उसको अपना समय कार्यालय में वैसे ही बिताना होता है जैसे सामान्य नौकरी के दौरान । कार्यालय में उसे निठल्ले बैठना होता है, क्योंकि उस काल में उस व्यक्ति से कार्य नहीं लिया जाता है । लेकिन व्यवहार में इस नियम का पालन किसी भी सरकारी विभाग में नहीं होता और निलंबित व्यक्ति आम तौर पर उन दिनों घर पर बैठ जाता है । निलंबित हो जाने पर कई लोग अपने खाली समय का लाभ भी उठाने से नहीं चूकते । मेरे उन मकान-मालिक ने अपने निलंबन-काल का बुद्धिमत्तापूर्वक उपयोग किया और कुछ कार्य उस बीच कर डाले । मुझे नहीं याद कि उन्होंने उस दौरान कौन-कौन सं कार्य संपन्न किये । एक कार्य का जिक्र उन्होंने अवश्य किया था, और वह था गेहूं पीसने की चक्की का । इससे उनकी आमदनी में कुछ जुड़ जाता था । खैर यहां पर इसके बारे में कुछ अधिक कहने का मेरा इरादा नहीं ।

फिर महीनों बाद उनसे मेरी भेंट शहर के लंका नाम के इलाके में हो गयी । तब मेरी पत्नी भी मेरे साथ थीं । वे उस समय पास के श्री संकटमोचक हनुमान मंदिर से दर्शन-पूर्जन करके आ रहे थे । उनके हाथ में प्रसाद में चढ़ाये गये बेसन के लड्डूओं का डिब्बा था । शिष्टाचार के नाते संपन्न हुए शुरुआती दुआ-सलाम के बाद उन्होंने प्रसाद का डिब्बा खोलकर हमारी ओर बढ़ाया और बोले, “लीजिए भाईसाहब-भाभीजी, संकटमोचन का प्रसाद ग्रहण करें ।” हम दोनों ने एक लड्डू लेकर आधा-आधा स्वीकार किया और उनके हाल-चाल जानना चाहा । बड़े प्रसन्न-हृदय उन्होंने शुभ समाचार सुनाया, “आपको एक खुशखबरी सुनाऊं ? … आपको तो याद ही होगा कि मेरा निलंबन चल रहा था । बस दो-तीन रोज हुए हैं कि मैं नौकरी पर बहाल हो गया हूं । आज शनिबार है न, सो प्रसाद चढ़ाने आ गया । और संयोग से आपके भी दर्शन हो गये ।”

“बड़ी खुशी की बात है यह । इस दौरान आप खामखाह ही परेशान हुए होंगे । चलिये समस्या से छुट्टी मिली ।” अपने चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान बिखेरते हुए मैंने टिप्पणी की ।

वे बोले, “अरे परेशानी क्या थी, मैंने तो चक्की का अच्छा कारोबार इस बीच शुरु कर लिया था । निलंबन भी ज्यादा दिन नहीं चलेगा यह मालूम ही था । और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मुझे प्रभु संकटमोचन पर पूरा भरोसा जो था कि वे अपनी नैया जरूर पार लगायेंगे ।”

कुछ अन्य औपचारिक बातों के बाद हमने उनसे बिदा ली । रास्ते में मैं यही सोचने लगा कि जब भ्रष्टाचारी को भगवान् भी बचाने को तैयार हों तो सरकारी महकमों को क्या दोष दिया जाये ।- योगेन्द्र

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