Category Archives: हिंदी साहित्य

साफ-सफाई की ध्वस्त नागरिक व्यवस्था

 

 

 

 

 

 

 

 

दैनिक जागरण समाचार-पत्र के २१ अगस्त के अंक में वाराणसी की ध्वस्त सफाई व्यवस्था की कुछ तस्वीरें छपी हैं जिनमें से एक यहां प्रस्तुत है। तस्वीरों के पृष्ठ का लिंक पेश कर रहा हूं:

https://epaper.jagran.com/epaper/21-aug-2019-45-varanasi-city-edition-varanasi-city-page-10.html#

      इन तस्वीरों को देख मेरा मन हुआ कि कचरा निबटारे की अपनी निजी व्यवस्था का और साथ ही घर-घर कूड़ा-उठान से जुड़े अनुभव का जिक्र कर डालूं।

वाराणसी में कूड़े-कचरे के निपटारे की कोई कारगर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। लोग सड़क के किनारे रखे गए बड़े-बड़े कूड़ेदानों अथवा खुले में कूड़ा-कचरा डाल देते थे। नगर-निगम की गाड़ी बीच-बीच में आकर उसे उठा लेती थी। 8-10 वर्ष पूर्व घरों से कूड़ा-उठान की नयी योजना आरंभ की गई थी। मेरे मुहल्ले में इस कार्य का जिम्मा “ए-टु-ज़ेड” नाम की संस्था को मिली थी। संस्था को हर घर से 50 रुपये बतौर शुल्क के इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी गयी थी। इस योजना में एक समस्या थी। लोग पैसा देने में टालमटोल करते थे।इसी दौरान कार्यदायी संस्था का नगर निगम के साथ विवाद भी पैदा हो गया और उसने कार्य करना बंद कर दिया। तब मैंने कच्चे (गीले) कचरे को सड़ाकर खाद बनाने का रास्ता अपनाया। इस हेतु मैंने अहाते के एक स्थान पर अपने हाथों से ईंट-सीमेंट आदि से एक “कचरा-दान” बना लिया जिसकी तस्वीर यहां प्रस्तुत है।

 

 

 

 

 

 

सूखे के लिए सड़क वाली व्यवस्था ही रहने दी, जो यथावत बनी रही। दरअसल घर-घर से बटोरे गये कूड़े-कचरे को सफाईकर्मी भी सड़क पर ही डालते हैं, जहां से उसे नगर-निगम की कूड़ागाड़ी उठाती है। कूड़ा-कचरा निस्तारण पर पहले भी मैंने अपने ब्लॉग (12 दिसम्बर 2015)  पर लेख लिखा है।

कुछ महिनों के बाद “ए-टु-ज़ेड” कंपनी फिर से काम पर लौट आई। इस संस्था के क्षेत्रीय पर्यवेक्षक ने मुझे आश्वस्त किया कि कार्य सुचारु चलेगा। डेड़-दो वर्ष तक कार्य चलता रहा। एक दिन संस्था का नगर निगम के साथ फिर से मतभेद पैदा हो गये और उसने स्थाई तौर पर शहर से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। मैं वापस अपनी निजी व्यवस्था पर लौट आया।

फिर कुछ महीनों के बाद “कियाना सेर्विसेज़ एंड सॉलुशन्ज़” नामक एक नयी संस्था ने कूड़े-कचरे के निस्तारण की जिम्मेदारी ले ली। घरों से कूड़ा-उठान फिर आरंभ हो गया। मैंने उस संस्था की सेवाएं लेना शुरू कर दिया। जो सफाईकर्मी हमारी गली से कूड़ा उठाता था उसका रवैया संतोषप्रद नहीं रहा।  रविवार तो उसे अवकाश मिलता ही था, लेकिन वह अन्य साप्ताहिक दिनों पर भी किसी न किसी बहाने अक्सर गायब हो जाता था। दिक्कत तब होने लगी जब वह  कभी-कभी लगातार चार-छ: दिनों तक गायब हो जाता था। खीजकर मैंने संस्था की सेवा लेना बंद कर दी।

दो-तीन सप्ताह बाद संस्था का स्थानीय पर्यवेक्षक शुल्क (पहले की तरह 50 रुपया प्रतिमाह) वसूलने आया तो मैंने उससे कहा, “इस गली का सफाईकर्मी अपने काम में अनियमितता बरतता है। किसी वाजिब कारण से यदि वह 4-4 6-6 दिनों अनुपस्थित रहे बात सनझ में आती है, लेकिन तब उस अंतराल के लिए अन्य कर्मी को यहां का कार्य सोंपा जाना चाहिए। अगर ऐसा न हो तो फिर आपकी सेवा लेना बेकार है।”

पर्यवेक्षक ने उत्तर दिया, “आपको अब शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। हम समुचित व्यवस्था करेंगे। आपको मौजूदा व्यवस्था में सहयोग देना चाहिए। आप ही लोग ऐसे मना करेंगे तो व्यवस्था कैसे चल सकेगी? इसलिए हमारी सेवा लेना बंद मत करें।”

मैंने उसकी बात मान ली। स्वयं मेरा मानना था शहर में कूड़ा-निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए और नागरिकों ने अपने स्तर पर उसमें सहयोग देना चाहिए। सफाईकर्मी तो वही रहा फिर भी कूड़ा उठाने का कार्य सुचारु चलने लगा। वह कभी-कभार 1 या 2 दिन के लिए गायब हो जाता था, जिसकी हम अनदेखी कर देते थे। आवश्यकता होने पर विकल्पतः अन्य कर्मी भी आ जाया करता था। लेकिन यह सब अधिक समय तक नहीं चल पाया।

बीती होली के दूसरे दिन वह आया और घर से “त्योहारी” मांग ले गया। फिर 8-9 दिनों तक गायब रहने के बाद लौटा। अनुपस्थिति पर हमने नाखुशी जताई तो उसने उल्टे हमसे ही रूखेपन से सवाल किया, “आप बाहर नहीं जाते क्या कभी?”

तब हमने उसे कूड़ा उठाने से मना कर दिया। वह चला गया और हम फिर से अपनी व्यव्स्था पर लौट आए।

मैंने संस्था के स्थानीय कार्यालय को फोन किया, “मुहल्ले की मेरे गली में जिस सफाई-कर्मी की ड्यूटी लगी थी वह हफ्ता-दस-दिन गायब रहा। अब हमने उसे मना कर दिया है। यदि इस गली में मौजूदा सफाईकर्मी ही कार्य करेगा तो उसे कूड़ा नहीं सोंपेंगे।”

मुझे प्रत्युत्तर मिला, “हमारा पर्यवेक्षक आपके से मिलेगा और आपकी समस्या को हल करेगा।”

तब से न पर्यवेक्षक आया और न ही कोई और। हमारी तरफ से जो देय शुल्क था उसे वसूलने भी कोई नहीं आया। हाल यह हैं कि गली में 8-10 मकान हैं। उनमें से 3-4 मकान से ही कूड़ा उठता है; शेष ने अपनी व्यवस्था कर रखी है। बनारस स्मार्टसिटी शायद ऐसे ही बनेगा!

जो होना चाहिए वह होता नहीं। बस जिन्दगी यों ही चलती है। – योगेन्द्र जोशी

 

Advertisements

1 टिप्पणी

Filed under administration, प्रशासन, भ्रष्टाचार, शासन, समाज, हिंदी साहित्य, corruption, government, Hindi literature, society

वे छोटी-छोटी बातें जिनके बारे में सोचते नहीं लोग

मेरे गृह-परिसर के प्रवेशद्वार पर आकर एक गाय अक्सर लेट जाती थी। अपने शहर वाराणसी में छुट्टा कुत्ते-गाय-सांड़ सड़कों पर इधर-उधर घूमते ही रहते हैं। इतना ही नहीं बंदरों का आतंक भी झेलना पड़ता है। ऐसी ही एक छुट्टा गाय कुछ दिन पहले मुहल्ले की मेरी गली में भूले भटके आ टपकी, और उसने आराम फरमाने के लिए मेरे घर के प्रवेशद्वार को चुन लिया। उसके कारण आने-जाने में असुविधा तो होती ही थी, अलावा उसके वह गोबर-मूत्र की गंदगी भी उस स्थल पर फैला जाती थी। हर रोज घर की खिड़की से बीच-बीच में प्रवेशद्वार की ओर नजर डालना और उसे हटाना हमारा रोज का नियम-सा बन गया। कुछ दिन तक यह सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन उसने अपना ठिकाना बदल दिया। उसने मोहल्ले की दूसरी गली को चुन लिया।

उसके ‘स्थाई’ तौर पर चले जाने के बाद एक सवाल मेरे मन में उठा कि क्या गाय ने यह सोचा होगा कि अमुक जगह छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि यहां से उसे बार-बार भगा दिया जाता है? उसने क्या यह सोचा होगा कि मेरी वजह से इन लोगों को परेशानी होती है, इसलिए मुझे कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिए? या कुछ और उसके दिमाग में आया होगा? अथवा घटना की वारंवारता से प्रेरित हो उसकी नैसर्गिक सहज वृत्ति ने उसका व्यवहार बदल दिया? पशुओं के प्रशिक्षण में इसी वारंवारता का ही तो महत्व होता है। आम धारणा यही है कि कोई भी पशु सोच-समझकर खास तरीके से व्यवहार नहीं करता, बल्कि वह वारंवारता से वैसा करने के लिए प्रकृतितः ढल जाता है।

क्या पशुओं में सोचने-समझने की क्षमता बिल्कुल नहीं होती है? वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जंगलों में रहने वाला गोरिल्ला दरिया पार करते समय उसकी गहराई का अनुमान लगाने के लिए पेड़ की टहनी का इस्तेमाल करता है। वह अलग-अलग जगहों पर टहनी डुबोकर पता लगाता है कि किस स्थल पर दरिया अधिक छिछला है। इसी प्रकार कड़े खोल वाले गिरीदार (खाद्य बीज वाले) फलों को तोड़ने के लिए पत्थर का प्रयोग करते हुए चिंपाजियों को देखा गया है। प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों में वयस्क चिंपाजियों की औसत बुद्धि 2-3 वर्ष के सामान्य बच्चे के बराबर पाई गई है। कौवों पर किए गये अध्ययन भी रोचक पाए गये हैं। ऐसा लगता है कि अत्यल्प मात्रा में ही सही सोचने-समझने जैसी कुछ क्षमता मानवेतर उन्नत पशु-पक्षियों में भी होती है।

 मनुष्यों का एकसमान तरीके से न सोच-समझ पाने की क्षमता का अनुभव मैं लंबे अरसे से करते आ रहा हूं। अर्थात्‍ कुछ लोग वस्तुस्थिति की बारीकी से निरीक्षण करने में समर्थ और उस सामर्थ्य के इस्तेमाल के आदी होते हैं। लेकिन सब इतने सचेत नहीं होते। कदाचित् पशुओं में भी इसी प्रकार का भेद होता होगा ऐसा मेरा मानना है। एक ही प्रजाति के सभी पशु समान प्रशिक्षण के बावजूद एकसमान क्षमता हासिल नहीं करते हैं।

     मनुष्य को बुद्धिमान प्राणी कहा जाता है। कहने को तो वह सोच-समझ सकता है, निर्णय ले सकता है और निर्णय का कार्यान्वयन कर सकता है। पर क्या सभी मनुष्य विभिन्न मुद्दों पर विचार करने की पर्याप्त सामर्थ्य रखते हैं? विचार करने का भाव भी क्या सबके मन में उठता है? मुझे लगता है कि वह भी बहुधा एक पशु या निम्न-स्तर के रोबोट की भांति प्रचलित ढर्रे पर चलता है, आगे-पीछे सोचे बिना और विकल्पों पर विचार किए बिना। मैं अपना मंतव्य एक दृष्टांत से स्पष्ट करता हूं।

     मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते हैं। हाल ही में वे बतौर किराएदार आए हैं। वे घर से बाहर निकलते समय मुख्य द्वार की अर्गला (सिटकनी) बंद करके ताला चढ़ा जाते हैं। ऐसा करते समय वे अर्गला की बेलनाकार छड़ दायें-बांये घुमा-घुमाकर सरकाते हैं। चिकनाहट न होने एवं किंचित जंग लगे होने के कारण छड़ आसानी से नहीं सरक पाती है। फलतः उसकी चूं-चां की कर्कश ध्वनि पड़ोस में हमारे कानों तक पहुंचती है। अवश्य ही उन सज्जन को भी मेहनत करनी पड़ती होगी। हमें वह आवाज खलती है, लेकिन अभी तक परिचय न हो पाने तथा एक प्रकार की हिचक की वजह से हम उन्हें यह सुझाव नहीं दे पाए हैं कि उस पर मोबाइल या ‘ग्रीज’ का लेपन कर लें, ताकि उस पर चिकनाहट आ जाए। सरसों या नारियाल आदि के तेल से भी वे काम चला सकते हैं

    मेरी समस्या उस कर्कश ध्वनि तक सीमित नहीं है। वह आवाज मुझे खलती जरूर है, लेकिन मेरे लिए उससे भी अधिक अहमियत इन सवालों का है कि वह आवाज खुद पड़ोसी सज्जन को क्यों नहीं खलती होगी? और यह भी कि उस पर चिकनाई चढ़ाकर अर्गला बंद करना सरल हो जाएगा यह विचार उनको क्यों नहीं आता होगा? कोई घटना एक-दो बार हो तो उसकी अनदेखी हो सकती है, लेकिन जिसका सामना रोज करना पड़े उस पर तनिक विचार तो होना ही चाहिए न? मुझे लगता है कि कई बातें लोगों के दिमाग में स्वयमेव नहीं आती हैं। यह मानव समाज से जुड़ा एक रोचक तथ्य है। इसे में “विचारशून्यता” कहता हूं।

     मैंने आरंभ में गाय का जो उदाहरण दिया वह अपनी इसी धारणा को व्यक्त करने के लिए है। निःसंदेह मैं स्वयं भी इस तुलना को अतिरंजनायुक्त (अतिशयता वाला) कहूंगा, लेकिन ऐसा अपनी इस बात पर जोर डालने के लिए कर रहा हूं कि सामान्य जीवन में बहुत-से कार्य होते हैं जिनके संदर्भ में “मैं इसे करूं या न?”; “अगर करूं तो कैसे?”; “क्या कोई विकल्प बेहतर होगा?”; “मेरे कार्य से निकटवर्ती लोग प्रभावित तो नहीं होंगे?” जैसे तमाम सवाल मनुष्य होने के नाते हमारे मस्तिष्क में उठने चाहिए। परंतु ऐसा अकसर नहीं होता। मैं उस स्थिति में सोचने लगता हूं कि हमारा व्यवहार पशुओं से एकदम भिन्न सदैव नहीं होता है।

     विचारशून्यता के अनेक उदाहरण रोजमर्रा की जिंदगी में देखने को मिल जाते हैं, जैसे अपना वाहन दूसरे के मकान के प्रवेश द्वार पर खड़ा कर देना, वाहन से चलते हुए पान की पीक पिच्चकर थूक देना, खाते-खाते केले का छिलका सड़क पर फेंक देना, सार्वजनिक पानी-टोंटी से लापरवाही से पानी बहने देना, सड़क पर दुधारू गाय-भेंस बांध के रखना। मेरे शहर वाराणसी में ऐसी बातें आम हैं। – योगेन्द्र जोशी

 

टिप्पणी करे

Filed under कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, समाज, हिंदी साहित्य, Hindi literature, human behaviour, Short Stories, society

अंग्रेजी छोड़ेंगे नहीं, आम आदमी समझे या न समझे परवाह नहीं

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच एक युवक उस पटल पर आया। वह अपने मोबाइल पर बैंक द्वारा भेजे गए एक संदेश का मतलब जानना चाहता था। काउंटर के पारदर्शी शीशे के दूसरी तरफ़ बैठे बैंक-कर्मी को संदेश दिखाते हुए उसने पूछा, “जरा देखिए तो मेरे फोन पर यह क्या मैसेज आया है।

अपने अन्य कार्य में व्यस्त बैंक-कर्मी ने कहा, “आप खुद पढ़िए न और मुझे भी सुना दीजिए

युवक ने कहा, “मेरे समझ में नहीं आ रहा है। आप देख दीजिए न

बैंक-कर्मी ने कहा, “ठीक है, पढ़िए क्या लिखा है।

युवक क्षण भर हिचकिचाया और फिर बोला, “दरअसल मैसेज अंग्रेजी में है और इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं मैं।

मैं उस युवक की समस्या समझ गया। बैंक-कर्मी अपने हाथ में आया काम निपटा ले यह सोचकर मैंने उस युवक से कहा, “लाइए अपना मैसेज मुझे दिखाइए।

संदेश सामान्य प्रकार का था, बैंक एटीएम से निकाले गए पैसे के बारे में जानकारी। मैंने युवक को समझाया, “आपने एटीएम से पैसा निकाला था क्या?

उसका जवाब हां में था। आगे मैंने उसको बताया, “ऐसी जानकारी बैंक अपने ग्राहकों को भेजते रहते हैं ताकि वे देख सकें कि किसी और ने तो लेनदेन की धोखाधड़ी तो नहीं की है। ऐसे संदेशों को सावधानी से देख लेना चाहिए ताकि कुछ गड़बड़ होने पर बैंक को सूचित किया जा सके।

उसकी समझ में बात आ गई और वह बैंक शाखा से बाहर चला गया।

मैं सोचने लगा क्या अजीव विडंबना है कि आज भी इस देश में अंग्रेजी और केवल अंग्रेजी का राज चल रहा है। हिन्दी को राजभाषा की “उपाधि” दे तो दी गई, किंतु उसे व्यवहार में लेना सरकारी संस्थानों ने अभी तक नहीं सीखा है। अन्य भारतीय भाषाओं का तो नंबर ही नहीं आने का।

मुश्किल से 15-16% देशवासी होंगे जो अंग्रेजी ठीक से समझ पाते हों। अपने-अपने कार्यालयों के कार्यों की अंग्रेजी उनको समझ में आ जाती होगी, क्योंकि वह एक स्थापित ढर्रे की भाषा होती है। लेकिन उसके परे दूसरे कार्य-क्षेत्रों की अलग प्रकार की भाषा उनको अच्छी तरह समझ में आती होगी इसमें मुझे शंका है। अस्तु।

बैंक जैसी संस्थाओं को तो हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में भी ग्राहकों को संदेश देना ही चाहिए ताकि अंग्रेजी के संदेशों को समझने के लिए दूसरों के पास किसी को न जाना पड़े। वे क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल का दावा तो करते हैं, लेकिन अंकीय (डिजिटल) माध्यम से संदेश-प्रेषण में अभी बहुत पीछे हैं।

ऐसी घटनाओं को देखने पर मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के दिन (1960 के आसपास) याद आते हैं जब त्वरित संदेश के लिए “तार” (टेलीग्राम) भेजे जाते थे, जो केवल अंग्रेजी में अंकित रहते थे। तब साक्षरता वैसे ही कम थी और तिस पर अंग्रेजी जानने वाले तो विरले ही होते थे, जिनके पास दूर-दूर से लोग आते थे तार का मज़मून समझने के लिए। – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under अंग्रेजी, कहानी, बैंकिंग, भारत, लघुकथा, हिंदी साहित्य, हिन्दी, Banking, Hindi literature, India, Short Stories, Story, Uncategorized

बच्चे दो मांगें मां से एकल स्मार्टफोन

हम डिजिटल तकनीकी के युग में जी रहे हैं। और इस युग की सबसे बड़ी खासियत है स्मार्टफोन नामक युक्ति की उपलब्धता। स्मार्टफोनों की कीमत शुरुआती दौर में इतनी अधिक हुआ करती थी कि उसे खरीदने से पहले आदमी दस बार सोचता था। लेकिन जल्दी ही उसके सस्ते लेकिन कारगर मॉडल बाज़ार में आ गए। अब स्थिति यह है कि कई जनों के हाथों में अक्सर एक नहीं दो-दो तीन-तीन स्मार्टफोन भी दिख जाते हैं। इतना ही नहीं, स्मार्टफोन का आकर्षण छोटे बच्चों तक पहुंच चुका है। समाज के मध्यवर्ग में यह भी देखने को मिल रहा है कि जैसे ही नवजात शिशु के हाथ की अंगुलियां कोई भी चीज पकड़ने की सामर्थ्य पा जाते है वह भी मोबाइल से बतौर खिलौना खेलने लगता है। और जब तक वह खड़ा होना सीख पाता है तब तक वह अपने काम के वीडिओ भी देखने लगता है। बच्चों में पनप रहे मोबाइल के प्रति यह लगाव मेरी दृष्टि में जोखिम भरा है। लेकिन कई लोग अपने बच्चे की “स्मार्ट्नेस” से गर्वान्वित अनुभव करते हैं और स्मार्टफोन से उसे दूर रखने की जरूरत नहीं समझते हैं। इस स्थल पर मैं स्मार्टफोन के लाभ-हानि की विवेचना करने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि उससे जुड़ा एक अनुभव साझा कर रहा हूं।

कुछ दिनों पूर्व मैं पंजाब के शहर लुधियाना से शताब्दी एक्सप्रेस नामक (चेयरकार) रेलगाड़ी द्वारा नई दिल्ली आ रहा था। मैं गाड़ी के डिब्बे में गलियारे से लगी हुई पहली पंक्ति की सीट पर बैठा था और उसी पंक्ति में गलियारे के दूसरी तरफ तीनों सीटों पर दो महिलाएं और दो बच्चे बैठे थे। छोटा ब्च्चा कोई ५ साल का रहा होगा और उससे बड़ी बच्ची, अनुमानतः उसकी बहिन, डेढ़-दो साल बड़ी रही होगी।

बच्चों की मां के पास एक स्मार्टफोन था। गाड़ी के प्रस्थान करने के थोड़ी देर बाद छोटे बच्चे ने अपना मनपसंद वीडियो देखने के लिए मां से स्मार्टफोन हथिया लिया। जब बड़ी बहिन ने देखा कि स्मार्टफोन पर भाई ने कब्जा जमा लिया है तो उसे लगा कि फोन के प्रयोग का अधिकार उसे भी मिलना चाहिए। थोड़ी देर तक उसकी नजर फोन पर चल रहे वीडियो पर बनी रही। उसके हावभावों से लग रहा था कि उसे वह वीडियो उबाऊ लग रहा है। अंततः अधीर होकर उसने बहलाते-फुसलाते हुए भाई से स्मार्टफोन छीन लिया और अपने मन का वीडियो चलाने के लिए उसके ऊपर उंगलिया फेरना शुरू कर दिया। इससे छोटे भाई का रोना-गाना आरंभ होना स्वाभाविक था। मां ने उससे स्मार्टफोन वापस लेकर भाई को सौंप दिया। अब रोने-चीखने की बारी बहिन की थी।

उस मां की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे दोनों को शांत करे। उसने स्मार्टफोन बच्चों से लेकर अपने पर्स में रख लिया। किंतु ऐसा करना कारगर नहीं रहा। दोनों ने रोना शुरू कर दिया। उसने स्मार्टफोन पर्स से निकालकर एक ऐसा वीडिओ खोजा जो दोनों बच्चों को बहला सके। दोनों ने मिलकर हाथ में फोन लिया और वीडियो देखते हुए शांत हो गए। तब कुछ समय के लिए शान्ति छा सकी।

बच्चों की चीख-पुकार सुनना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। आसपास के यात्रियों की नींद में या उनके पत्र-पत्रिका पढ़ने में उनके रोने-गाने से अवश्य ही खलल पड़ रहा होगा। लेकिन बच्चों की जिद के सामने भला कोई कर भी क्या सकता था? गतंव्य तक पहुंचने का इंतिजार सभी को ही था।

निःसंदेह बच्चों की उस हरकत को देखना कुछ हद तक दिलचस्प भी लग रहा था। मैं सोच रहा था कि स्मार्टफोन किस कदर बच्चों के आकर्षण की चीज बनता जा रहा है। मुझे तो यह सब भविष्य के खतरे की ओर संकेत करता हुआ-सा दिख रहा था। ये बच्चे आने वाले समय में क्या आत्मसंयमी हो सकेंगे? क्या वे एकाग्रचित्त हो पाने की कला सीख पाएंगे? क्या इन युक्तियों पर उपलब्ध होने वाले इलेक्ट्रॉनिक यानी कंप्यूटर खेलों से अपने को अलग रख पाएंगे? इस प्रकार के अनेक प्रश्न मेरे मन में उठने लगे। – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, experience, Hindi literature, Short Stories, Story

वह जिसकी आप चर्चा करते नहीं

क्या आपने कभी ऐसे व्यक्ति को देखा है जो सार्वजनिक मंच से यह कहे कि भ्रष्टाचार इतनी खराब चीज नहीं है कि उससे परहेज किया जाए? मैंने ऐसे किसी व्यक्ति को न कभी देखा है और न ही उसके बारे में सुना है। मेरा अपना ख्याल है कि यदि लोगों के बीच में से यादृच्छिक तरीके से किसी को चुन लिया जाए और उसे मंच से भ्रष्टाचार पर कुछ शब्द बोलने को कहा जाए तो वह भ्रष्टाचार की हिमायत नहीं करेगा, बल्कि उसके विरुद्ध ही बोलेगा। (यादृछिक = अंग्रेजी में रैंडम, यानी चुनने की कोई निर्धारित शर्त के बिना जिसे आंख मूंदके चुनना कहा जाएगा।) मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति भी सार्वजनिक तौर पर भ्रष्टाचार का विरोध ही करेगा। मेरा अनुमान है कि भारतीय समाज में भ्रष्टाचार का विरोध अधिकांशतः एक दिखावा होता है, उससे वास्तविक परहेज होता नहीं। मन ही मन सभी समझते होंगे कि परहेज करने लगेंगे तो जियेगे कैसे! बहुत से मौकों पर भ्रष्टाचार होते हुए भी लोगों को दिखता नहीं।

     मैं अपने एक हालिया अनुभव की चर्चा करता हूं। डेढ़-दो सप्ताह पूर्व मेरे गेट पर एक युवक पहुंचा। उसने बताया कि वह शहर (वाराणसी) के जलापूर्ति विभाग ‘जलकल’ से आया है और भवन-स्वामियों से मकान संख्या, उसके मूल्यांकन (टैक्स), पानी-टैक्स आदि की जानकारी इकट्ठा कर रहा है। उस जानकारी का प्रयोग भवनों पर वॉटर-मीटर लगाने में किया जाना था। यों तो यह जानकारी जलकल विभाग के पास होनी ही चाहिए, क्योंकि उसी के आधार पर तो जलापूर्ति की जाती है। किंतु सरकारी विभागों की कार्य-शैली ऐसी ही बेतुकी होती है कि अपने अभिलेखों को खंगालने के बजाय वे उपभोक्ता से पूछने लगते हैं। दिलचस्प बात यह है कि मीटर पहले से ही लगे हैं, परंतु उनकी रीडिंग होती नहीं। मेरे अपने मकान पर मीटर 25-26 वर्ष पहले लगा था। अब तक तो वह काम करना भी बंद कर चुका होगा। बता दूं कि वाराणसी में अभी तक जलापूर्ति “अन्मीटर्ड” है। लोग पानी की अंधाधुंध बरबादी करते हैं। सर्वजनिक स्थानों पर तो अक्सर पानी फालतू बहते दिख जाता है। “मीटर्ड” जलापूर्ति होने पर पानी की बरबादी शायद रुक सके, क्योंकि तब लोगों को खरचे गए पानी के अनुपात में कीमत चुकानी पड़ेगी।

हां तो मैं उस युवक की बात पर लौटता हूं। हमारा (घर का) नियम है हम गेट पर आए किसी भी आगंतुक का स्वागत चाय-पानी की पेशकश के साथ करते हैं। तदनुसार हमने उसको गेट के अंदर बुलाकर कुर्सी पर बिठाकर संबंधित कागजात दिखाए। साथ ही उनको मीठे के साथ ठंडा पानी पीने को दिया, जिसे उसने सहज रूप से स्वीकार कर लिया। इस दौरान उससे कुछ औपचारिक और कुछ अनौपचारिक बातें भी कर लीं।

वार्तालाप में उसने बताया, “मैं जलकल का कर्मचारी नहीं हूं, बल्कि उस क्षेत्र के जेई (जूनिअर एंजीनियर) द्वारा इस काम में लगाया गया हूं। … आप देख ही रहे हैं, इस समय काफी गर्मी पड़ रही है। ऐसे में जेई सा’ब कहां फील्ड में उतरने वाले। इसलिए उन्होंने यह काम मुझे सौंप दिया हैं।”

     मैं समझ गया कि माजरा क्या है। मुझे मालूम है कि कुछ सरकारी कर्मचारी मौका मिलने पर अपना कार्य दूसरों से करवाते हैं और बदले में कुछ पैसा उन्हें थमा देते हैं। इसे मैं नौकरी ‘सबलेट करना’ कहता हूं। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में ऐसा कभी-कभार देखने को मिल जाता है। कुछ अध्यापक विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं और अपने बदले बेरोजगार युवक/युवतियों को पढ़ाने भेज देते हैं ऐसा मेरे सुनने में आता है। ऐसा ही एक वाकया मुझे याद आता है। विश्वविद्यालय के मेरे विभाग में एक सफाई कर्मचारी आंखों से कमजोर हो चला था। अतः वह अपने बदले किसी और को विभाग में भेजता था। ऐसे अपवाद विश्वविद्याल्य में शायद एक-दो ही रहे होंगे।

     यह अप्रत्यक्ष भ्रष्टाचार का एक रोचक उदाहरण है। किसी सरकारी मुलाजिम द्वारा अपना काम स्वयं न करन सर्वथा अनुचित है। उस व्यक्ति का ऐसा आचरण और साथ में बेरोजगार का शोषण आम तौर पर किसी को कहां पता चलता है?

उस युवक से अधिक बात करने का मेरा मन नहीं हुआ। क्या पता वह अपनी बेरोजगारी का दुखड़ा सुनाने लगता, जिसे सुनना अच्छा न लगता। मेरे पास किसी की बेरोजगारी का कोई इलाज तो है नहीं।

     मुझे लगता है कि भ्रष्ट आचरण हम भारतीयों के चरित्र का अभिन्न अंग बन चुका है। मैं सोचता हूं किसी को भी अपने अनुचित आचरण को लेकर कभी आत्मग्लानि नहीं होती होगी। धर्मकर्म और पापपुण्य की बातें करने वाले समाज में आचरण संबधी विरोधास मैं कई मौकों पर देखता आ रहा हूं। – योगेन्द्र जोशी

 

 

टिप्पणी करे

Filed under administration, किस्सा, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, corruption, Hindi literature, Short Stories

दूसरों को स्वर्ग का रास्ता दिखाने का ठेका?

मेरे पड़ोस में एक युवक रहता है। अधिक पढ़ा-लिखा नहीं। मैंने उससे कभी पूछा भी नहीं कितने तक पढ़े हो। अवश्य ही १०+२ से अधिक नहीं, या शायद उतना भी नहीं। एससी-एसटी वर्ग का होने के बावजूद आरक्षण का लाभ वह नहीं ले सका है। पिछले कुछ वर्षों से टैस्की चलाने का काम कर रहा है। जब भी सड़क पर मिल जाता है तो उसके हालचाल पूछ लेता हूं।

आज प्रातः वाहन साफ करते हुए उसे मैंने देखा। रुककर पूछा कि उसका आज का क्या कार्यक्रम है। उसने बताया, “आजकल केरला से फ़ादर लोग आए हुए हैं। उन्हीं को अलग-अलग गांवों में घुमाफिरा रहा हूं।”

‘फ़ादर! यानी इसाई धर्म के पादरी या धर्मोपदेशक!

मेरे इस सवाल पर कि गांव-गांव घूमने का उनका मकसद क्या रहता है, उसने जवाब दिया, “वे लोग इसाई धर्म का प्रचार करने आए हुए हैं। उनके स्थानीय कार्यकर्ता लोगों की भीड़ इकट्ठा करते हैं और ये फ़ादर लोग उनको उपदेश देते हैं कि आओ प्रभु ईसू की शरण में आओ। वे आपका उद्धार करेंगे।”

“उनकी बातें सुनकर मेरा मन हुआ कि मैं भी कुछ कहूं।” उसने कहा।

“ऐसी क्या बात हुई उन लोगों से तुम्हारी?”

दरअसल वे बोल रहे थे, “क्या रखा है इस धरती के सुख-चैन में। प्रभु की शरण में आने पर स्वर्ग उपलब्ध होगा जहां सुख ही सुख होगा।”

“तब मैंने कहा सर, आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं वह कभी का गुजर चुका है। आज सभी लोग रोजी-रोटी के इंतिजाम में लगे हैं। उनकी चिंता इसी धरती पर पेट भरने की है। अब देखिए न कि जिन गांवों में आप घूम रहे हैं वहां के किसान फसल काटने-संभालने में लगे हैं। उनको आपकी बात सुनने-समझने का मौका भला कहां?”

“हां भई, आपकी बात तो कुछ हद तक सही है। फिर भी हमारी कोशिश रहती है कि उन्हें ‘रास्ता’ दिखाएं।”

“क्यों आप रास्ता दिखाना चाहते हैं? उनको अपना रास्ता खुद खोजने दीजिए।”

उस युवक ने मुझसे कहा, “दरअसल उनके पास मेरे सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं था।”

कम शिक्षित होने के बावजूद उस युवक की बातों में दम था ऐसा मुझे लगा। वस्तुतः टैक्सी चलाते हुए वह तमाम प्रकार के लोगों के संपर्क में आता है। कभी पर्यटकों से वास्ता पड़ता है तो कभी तीर्थयात्रियों से, और कभी विश्वविद्यालय में सेमिनार-कॉन्फ़रन्स के प्रतिभागियों से, इत्यादि। उनसे बातें करके वह काफी कुछ सीखता रहता है।

मैं इस प्रश्न पर विचार करने लगा कि इस धरती पर जो है वह तो सभी को दिखता है। स्वर्ग जैसी कोई चीज होती भी है क्या? किसी ने उसे देखा है? उस अज्ञात स्वर्ग की अधिक अहमियत है या इस धरती की जिसके सहारे हम सब जी रहे हैं? सोचिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

2 टिप्पणियाँ

Filed under कहानी, मजहब, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Religion

वोट? किसी को भी नहीं !

मेरे पड़ोसी शंकरलालजी संध्याकाल घर पर आ धमके। आम तौर पर उनसे घर के बाहर सड़क पर ही मुलाकात हो जाती है और तभी कुशलक्षेम की दो-चार बातों का आदान-प्रदान हो जाया करता है। लेकिन आज वे घर पर ही पहुंच गए। मैंने अनुमान लगाया कि आज चुनाव में मतदान का दिन था, इसलिए चुनाव संबंधी जिज्ञासा लेकर आए होंगे। किसको वोट दिया, कौन जीतेगा, सरकार किसकी बनेगी, आदि की जिज्ञासा आम तौर पर सभी नागरिकों को रहती है, किंतु शंकरलालजी विशेष रूप से उत्सुक रहते हैं। पड़ोसियों-मित्रों से बातचीत के लिए चुनावी मौसम में यही उनका प्रिय विषय रहता है।

घर के अंदर दाखिल होते ही उच्च स्वर में बोल पड़े, “भाई साहब, किसको वोट देकर आए? किस पार्टी को जिता रहे हैं?”

मैंने कहा, “किसी को नहीं।”

उलाहना के अंदाज में वे बोले, “किसी को नहीं? यह तो गलत बात है। वोट डालना तो सभी नागरिकों का कर्तव्य है।”

“ऐसा नहीं हैं। … वोट डालने तो मैं भी गया, परंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में वोट नहीं डाला। दरअसल मैं ‘नोटा’ का पक्षधर हूं और उसी के अनुसार मैंने नोटा बटन दबाया।”

“नोटा दबाने से क्या फायदा? यह तो अपना वोट बरबाद करना हुआ।”

“नोटा से क्या लाभ-हानि है यह तो लंबी बहस का विषय है। नोटा का विकल्प यों ही नहीं उपलब्ध हुआ है। उसके लिए कुछ उत्साही जनों ने लंबी लड़ाई लड़ी है। … अस्तु, अभी मैं उसकी बहस में पड़ना नहीं चाहता। केवल इतना कहना चाहूंगा कि मेरी नज़र में कोई भी राजनैतिक दल वोट पाने के योग्य नहीं है। लोकतंत्र-लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने भर से क्या विश्वसनीय और फलदायी लोकतंत्र आ जाता है? मेरा तो सभी दलों से मोहभंग हो चुका है। तब किसे वोट दूं? अपने मतदान के अधिकार को छोड़ना भी नहीं चाहता; सो नोटा का प्रयोग करके अपना फर्ज निभा लिया।”

“राजनैतिक दलों से इतनी नाराजगी? सरकारें बनें इसके लिए वोट तो देना ही पड़ेगा न? सभी लोग नोटा दबाने लगेंगे तो सरकारें कैसे बनेंगी?”

मैंने उनको तसल्ली देते हुए जवाब दिया, “अरे भाई, सरकारें बनने की चिंता मत करिए। हर प्रत्याशी के समर्थक तो होते ही हैं वोट डालने के लिए। जिसको एक वोट भी अधिक मिल जाए वह जीतेगा ही, भले ही मतदान पांच-दस प्रतिशत ही क्यों न हो। असल समस्या वह नहीं है। समस्या है लोकतंत्र की गुणत्ता की। समस्या है राजनेताओं के आचरण की। समस्या है दलों और उनके सदस्यों के सिद्धांतों की।”

“मैं समझ नहीं पाया कि आप कहना क्या चाहते हैं?”

मैंने उन्हें संक्षेप में समझाने की कोशिश की, “देश के लोकतंत्र को दशकों तक देखने के बाद मेरी धारणा बन चुकी है कि जिन नेताओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था का ‘ठेका’ ले रखा है वे स्वयं लोकतांत्रिक नही हैं अपने कार्य-व्यापार में। सब जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद सबसे पहले अपने हितों को साधने की कोशिश करते पाये जाते हैं। देश के लिए कायदे-कानून बनाने वाले खुद ही उनका उल्लंघन करते हैं और उल्लंघन करने वाले अपने समर्थकों-चहेतों के बचाव में उतर पड़ते हैं। कितने राजनैतिक दल हैं जिनमें आंतरिक लोकतंत्र है? दल का मुखिया ताउम्र मुखिया बना रहता है या अपने पारिवारिक किसी सदस्य को कमान ऐसे सोंपता है जैसे वारिसों को धन-संपदा सोंपी जाती है। दल के अन्य नेता बंधुआ मजदूरों की तरह मुखिया की हां में हां मिलाते हैं। इतना ही नहीं, सभी दलों में कोई एक-तिहाई से एक-चौथाई नेता आपराधिक पृष्टभूमि के बताए जाते हैं। क्या आम जनता के बीच इसी अनुपात में आपराधिक वृत्ति के लोग मिलते हैं? हरगिज नहीं। तब क्या यह कहना गलत होगा कि देश की राजनीति आपराधिक सोच वालों की शरण्स्थली बन चुकी है? जो बात मुझे सबसे अधिक खलती है वह है इन दलों का समाज को बांटो और राज करो की अलोकतांत्रिक नीति। कोई दलितों की बात करता है तो कोई पिछ्ड़ों की, कोई यादवों की तो कोई जाटों की, कोई हिंदुओं की तो कोई मुस्लिमों की, कोई मराठाओं की तो कोई गैर-मराठाओं की। है कोई जो भारत और भारतीय नागरिकों की बात करता हो? है कोई उन समस्याओं की बात करने वाला जिनका सभी देशवासियों से सरोकार है? जरा ऐसे सवालों पर गहराई से विचार करें तो मेरी बात समझ में आ जाएगी। दिलचस्प है लोग एक तरफ जनप्रतिनिधियों की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं को वोट देने दौड़े चले आते हैं। चुनाव का बहिष्कार क्यों नहीं करते वे? नोटा बटन क्यों नहीं दबाते वे?”

शंकरलालजी के पास मेरे सवालों का समुचित उत्तर नहीं था। इसलिए उन्होंने बातचीत का विषय बदल देना ही ठीक समझा। – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी करे

Filed under कहानी, निर्वाचन, राजनिति, लघुकथा, शासन, हिंदी साहित्य, Election, Hindi literature, Short Stories, society, Story