Category Archives: हिन्दी

अंग्रेजी छोड़ेंगे नहीं, आम आदमी समझे या न समझे परवाह नहीं

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच एक युवक उस पटल पर आया। वह अपने मोबाइल पर बैंक द्वारा भेजे गए एक संदेश का मतलब जानना चाहता था। काउंटर के पारदर्शी शीशे के दूसरी तरफ़ बैठे बैंक-कर्मी को संदेश दिखाते हुए उसने पूछा, “जरा देखिए तो मेरे फोन पर यह क्या मैसेज आया है।

अपने अन्य कार्य में व्यस्त बैंक-कर्मी ने कहा, “आप खुद पढ़िए न और मुझे भी सुना दीजिए

युवक ने कहा, “मेरे समझ में नहीं आ रहा है। आप देख दीजिए न

बैंक-कर्मी ने कहा, “ठीक है, पढ़िए क्या लिखा है।

युवक क्षण भर हिचकिचाया और फिर बोला, “दरअसल मैसेज अंग्रेजी में है और इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं मैं।

मैं उस युवक की समस्या समझ गया। बैंक-कर्मी अपने हाथ में आया काम निपटा ले यह सोचकर मैंने उस युवक से कहा, “लाइए अपना मैसेज मुझे दिखाइए।

संदेश सामान्य प्रकार का था, बैंक एटीएम से निकाले गए पैसे के बारे में जानकारी। मैंने युवक को समझाया, “आपने एटीएम से पैसा निकाला था क्या?

उसका जवाब हां में था। आगे मैंने उसको बताया, “ऐसी जानकारी बैंक अपने ग्राहकों को भेजते रहते हैं ताकि वे देख सकें कि किसी और ने तो लेनदेन की धोखाधड़ी तो नहीं की है। ऐसे संदेशों को सावधानी से देख लेना चाहिए ताकि कुछ गड़बड़ होने पर बैंक को सूचित किया जा सके।

उसकी समझ में बात आ गई और वह बैंक शाखा से बाहर चला गया।

मैं सोचने लगा क्या अजीव विडंबना है कि आज भी इस देश में अंग्रेजी और केवल अंग्रेजी का राज चल रहा है। हिन्दी को राजभाषा की “उपाधि” दे तो दी गई, किंतु उसे व्यवहार में लेना सरकारी संस्थानों ने अभी तक नहीं सीखा है। अन्य भारतीय भाषाओं का तो नंबर ही नहीं आने का।

मुश्किल से 15-16% देशवासी होंगे जो अंग्रेजी ठीक से समझ पाते हों। अपने-अपने कार्यालयों के कार्यों की अंग्रेजी उनको समझ में आ जाती होगी, क्योंकि वह एक स्थापित ढर्रे की भाषा होती है। लेकिन उसके परे दूसरे कार्य-क्षेत्रों की अलग प्रकार की भाषा उनको अच्छी तरह समझ में आती होगी इसमें मुझे शंका है। अस्तु।

बैंक जैसी संस्थाओं को तो हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में भी ग्राहकों को संदेश देना ही चाहिए ताकि अंग्रेजी के संदेशों को समझने के लिए दूसरों के पास किसी को न जाना पड़े। वे क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल का दावा तो करते हैं, लेकिन अंकीय (डिजिटल) माध्यम से संदेश-प्रेषण में अभी बहुत पीछे हैं।

ऐसी घटनाओं को देखने पर मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के दिन (1960 के आसपास) याद आते हैं जब त्वरित संदेश के लिए “तार” (टेलीग्राम) भेजे जाते थे, जो केवल अंग्रेजी में अंकित रहते थे। तब साक्षरता वैसे ही कम थी और तिस पर अंग्रेजी जानने वाले तो विरले ही होते थे, जिनके पास दूर-दूर से लोग आते थे तार का मज़मून समझने के लिए। – योगेन्द्र जोशी

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चालीस साल पहले हुआ था हिन्दी से जुड़ा एक अनुभव मद्रास (चेन्नै) में

मोदी सरकार ने हाल में राजभाषा हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया है । इस नई सरकार के “हिन्दी प्रेम”के प्रति कई राजनेताओं ने विरोधात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है । प्रखर विरोध तमिलनाडु के दोनों प्रमुख दलों के शीर्षस्थ नेताओं की ओर से देखने को मिला है । अन्य राज्यों के नेताओं ने नाखुशी तो व्यक्त कर दी, लेकिन उनका विरोध जबर्दस्त नही कहा जा सकता है । वस्तुतः तमिल राजनीति हिन्दी विरोध पर टिकी है । वहां के नेतागण इसे अपनी तमिल अस्मिता से जोड़ते हैं । संविधान सभा में जब हिन्दी को राजभाषा बनाने की बात की जा रही थी तब भी यह विरोध था और आज भी है । दक्षिण भारत की अपनी हालिया यात्राओं में मैंने अनुभव किया है कि हिन्दी के प्रति उनके रवैये में बदलाव आता जा रहा है ।

हिन्दी विरोध की बात पर मुझे 1973 में संपन्न दक्षिण भारत की अपनी यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब मैं अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में नया-नया प्रविष्ट हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । तब बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । किसी अन्य शहर से चेन्नै-बेंगलूरु का आरक्षण रेलवे विभाग तार (टेलीग्राम) द्वारा किया करता था जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । लेकिन आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में होती भी नहीं थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । (प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर सोते हुए रातें गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है ।) कुछ ही देर में वहीं मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रह सकते हैं और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । पाश्चात्य समाजों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन से यह खासियत अब गायब होने लगी है ।

उन सज्जन को जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर तो हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।”

उनको जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में अंगरेजी में बताया तो वे हिंदी में बात करने लगे । मैंने उनसे कहा, “मुझे लगता है कि इधर हिन्दी चलती नहीं, फिर भी आप अच्छी-खासी हिन्दी बोल ले रहे हैं । बताइए कहां से आ रहे हैं और किधर जा रहे हैं ।

उनका उत्तर था, “मैं केरला का रहने वाला हूं और कुछ देर बाद अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकलूंगा । दरअसल मुझे कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से नहीं बात कर सकते ।”

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनसे कहा, “मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उस विरोध का अनुभव भी कर रहा हूं । ऐसा विरोध तो केरला में भी होगा न ?”

“नहीं, ऐसा नहीं है । केरला के लोग व्यावहारिक हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं । आपने केरला की नर्सों को उत्तर भारत के अस्पतालों में भी देखा होगा । केरला के लोग जानते हैं हिन्दी से परहेज उनके हक में नहीं है ।”उनका उत्तर था ।

और कुछ समय बाद वे अपनी रेलगाड़ी पकड़ने चल दिए । इस दौरान उनसे अन्य कितनी तथा कैसी बातें हुई होंगी इसे आज ठीक-से बता पाना संभव नहीं । पर इतना जरूर कह सकता हूं कि ऊपर कही गईं बातें वार्तालाप का सारांश प्रस्तुत करती हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

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हिंदी के जहाज से उतर, अंग्रेजी की नाव पर जा बैठ

अपने लोग कभी-कभी इस बात पर गर्वान्वित-से दिखते हैं कि अपनी भाषा हिंदी – ‘इंडिया दैट इज भारत’ की राजभाषा – विश्व की दूसरी-तीसरी सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है । यह बात शायद सही हो, लेकिन यह तो सच है ही कि यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में सर्वाधिक तिरस्कृत है । कोई भी ‘हिंदीभाषी’ व्यक्ति जो अंग्रेजी पढ़ने-लिखने से परिचित हो चुका हो इसे आम जनों के साथ बोलचाल के लिए मजबूरन प्रयोग में लेता है, अन्यथा उसकी प्राथमिकता तो अंग्रेजी ही रहती है, जो देशवासियों की नजर में श्रेष्ठ एवं उपयोगी भाषा ही नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार एवं द्योतक भी है । आप अंग्रेजी जानते हुए भी हिंदी ही प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेते हों इसकी उम्मीद आम तौर पर नहीं की जा सकती है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही है । मैं ऐसे ही एक ताजे अनुभव की बात करता हूं ।

दो-तीन दिन पूर्व मैं सपत्नीक दो-तीन सप्ताह के नई दिल्ली प्रवास के बाद वापस अपने शहर वाराणसी आ रहा था । मुरादाबाद होकर चलने वाली काशी-विश्वनाथ नाम की गाड़ी के आरक्षित डिब्बे में हमारे बर्थों (शायिकाओं) के पास खिड़की से सटी बर्थ एक युवती के नाम थी । वह युवती गाजियाबाद के किसी तकनीकी संस्थान में अध्ययन कर रही है यह बात बाद में दो-तीन अन्य युवा यात्रिकों, जो स्वयं भी तकनीकी विषयों के छात्र थे, के साथ उसके वार्तालाप से मुझे ज्ञात हो गयी । मतलब यह है कि उनके छात्र होने का अनुमान मैंने उनकी आपसी बातचीत के आधार पर लगाया था ।

हमारे उस डिब्बे में मुरादाबाद स्टेशन पर एक सज्जन भी सवार हुए । उनकी बर्थ हम लोगों के ही अगल-बगल थी । साथी यात्रिकों से उनकी बातों से स्पष्ट हो गया था कि वे बीएचयू (पूर्व में मेरा कार्यस्थल) में अध्यापक हैं और मेरठ में आयोजित एक वैज्ञानिक गोष्ठी में भाग लेकर वाराणसी लौट रहे हैं ।

रेलगाड़ी के मुरादाबाद स्टेशन से आगे बढ़ने के कुछ मिनटों बाद उन अपेक्षया नवागन्तुक यात्री ने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि वह क्या करती है और कहां जा रही है । केवल उसी छात्रा में उनकी दिलचस्पी क्यों जगी थी यह मैं समझ नहीं सका । खैर, जैसा कि उम्मीद की जाती है उन दोनों के बीच की आरंभिक बातचीत सामान्य हिंदी में ही हुई । किंतु जैसे ही उन सज्जन को यह अहसास हुआ कि वह युवती तकनीकी विषय की छात्रा है, और तदनुसार अंग्रेजी भाषा के प्रयोग से सुपरिचित है, तो वे हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आये । उन दोनों के बीच चंद मिनटों की बाद की वार्ता अंग्रेजी में ही संपन्न हुई । मुझे याद आता है कि उन्होंने अपनी निकटता दर्शाने के लिए छात्रा को कुछ ‘स्नैक्स’ भी अर्पित किए जिन्हें उसने विनम्र भाव के साथ अस्वीकार कर दिया था ।

मैं उस वार्तालाप में भागीदार नहीं था और अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने कुछ यूं उलट-पलट रहा था कि गोया मैं उस वार्तालाप से अनजान, था या उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी । किंतु बाहरी तौर पर अनभिज्ञ-सा बना मैं वस्तुतः पूरे वाकये पर गौर कर रहा था । मेरे लिए उनकी बातचीत के असली विषय की कोई अहमियत नहीं थी । उस समय जो बात मेरी दृष्टि में अहम थी और जो मुझे खटक रही थी वह थी उनका हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आना । दोनों हिंदी जानते थे, और मुझे पक्का विश्वास है कि दोनों की मातृभाषा – भले ही कहने भर को ही मातृभाषा हो – हिंदी ही रही होगी ।

उस समय मैं सोचने लगा कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी रहती है जिसके कारण एक हिंदीभाषी अन्य हिंदीभाषी के साथ भी हिंदी में बात करने से कतराता है, और तुरंत ही अंग्रेजी को वरीयता देते हुए उसमें बतियाने लगता है । कोई व्यक्ति अन्य भाषाभाषियों के साथ भी पहले हिंदी में प्रयास करे और काम न चलने पर ही अंग्रेजी का प्रयोग करे तो यह बात मेरे समझ में आती है । किंतु अपने देश में हाल उल्टे ही लगते हैं । यहां तो अजनबियों के साथ अंग्रेजी में बात करना अंग्रेजी पढ़े-लिखे अनेकों लोगों की प्राथमिकता रहती है । क्या इस मानसिकता से हम भारतीय कभी मुक्त हो पाएंगे यह प्रश्न मेरे मन में शेष यात्रा के दौरान उठता रहा ।

और अपने घर पहुंचने पर मैंने जब खुद की अनुपस्थिति में इकट्ठी हुई डाक पर नजर डाली तो उसमें एक निमंत्रण-पत्र मिला, जिसका विषय था हमारे एक पड़ोसी की पोती का जन्मदिन, जो इस बीच मनाया जा चुका था । निमंत्रण-पत्र था ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले एक पड़ोसी परिवार का, जिससे जुड़े लोगों के लिए – मुझे पूरा विश्वास है – अंग्रेजी आज भी कमोबेश अनजान भाषा होगी । नवजात बच्ची के दादा से पहले की पीढ़ियां अनपढ़ या अल्पशिक्षित रही होंगी ऐसा सोचता हूं मैं । अवश्य ही अब ‘फॉरेन’ अनुभव वाले बच्ची के कंप्यूटर इंजीनियर ‘पापा’ को अब हिंदी से परहेज और अंग्रेजी से लगाव हो गया होगा ।

उपर्युल्लिखित अनुभव मेरे लिए नये नहीं हैं । हिंदी से जुड़े ऐसे अनुभव मुझे आए दिन होते रहते हैं, और हर बार हिंदी को लेकर हिंदीभाषियों में व्याप्त कुंठा मेरे चिंतन का विषय बन जाता है । मुझे लगता है हिंदी एक जहाज की तरह है जिसमें जहां-तहां सुराख हो गये हों, जिनसे रिसता हुआ पानी उसे डुबाए जा रहा हो । लेकिन उस भाषा के प्रति लगाव रखने वाले और उसे बचाए रखने को समर्पित अभिमानी कुछ गिने-चुने देशवासी उस पानी को उलीच कर हटाने और जहाज को बचाने की जुगत में लगे हैं । डुबाने को तत्पर रिसाव और उससे लड़ रही ताकतें परस्पर संघर्षरत हैं । वस्तुस्थिति की गंभीरता को भांपते हुए ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो हिंदी के उस जहाज को छोड़ अंग्रेजी की नाव पर चढ़कर सुरक्षित हो चुकने का सुख पा रहे हैं । वर्तमान परिस्थिति में वही बुद्धिमान समझा जा रहा है जो हिंदी का जहाज छोड़ झट-से अंग्रेजी-नाव की ओर लपक रहा हो ।  योगेन्द्र जोशी

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पोते की अंग्रेजी से खुश दादाजी

देश की राजधानी दिल्ली में अपने अल्पकालिक प्रवास के बाद मेरे एक मित्र घर लौट आये । एक दिन संयोग से राह चलते जब मेरी भेंट उनसे हुयी तो कुशलक्षेम की औपचारिक बातों के पश्चात् उन्होंने हर्ष और चिंता के मिले-जुले भाव के साथ मुझे बताना आरंभ किया कि प्राथमिक पाठशाला में पढ़ रहा उनका पोता स्कूली पढ़ाई में अव्वल चल रहा है । उन्होंने इतना और जोड़ा कि वह इंग्लिश अच्छी बोल तथा लिख लेता है, किंतु हिन्दी में उसकी प्रगति अच्छी नहीं चल रही है । वह हिन्दी शब्दों का ठीक-ठीक उच्चारण नहीं कर पाता है और देवनागरी में लिखने में उसे कठिनाई होती है । उनकी समस्या के मूल में वह प्रतिष्ठित और खर्चीली शिक्षण संस्था थी जिस में बच्चों को हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अनदेखी करते हुए अंग्रेजी में पारंगत करने की हर संभव कोशिश की जाती है । देश में अनेकों ऐसी शिक्षण संस्थाएं हैं जहां बच्चों को प्रकारांतर से भारतीय भाषाओं के ‘घटियापन’ तथा ‘अनुपयोगिता’ का संदेश दिया जाता है ।

पोते की अंग्रेजी को लेकर वे काफी उत्साहित और उसके अच्छे व्यावसायिक भविष्य के प्रति आशान्वित थे । लेकिन हिन्दी को लेकर उन्हें कुछ चिंता भी सता रह थी यह उनकी आवाज और माथे की लकीरों में झलक रहा था । उन्हें आश्वस्त करते हुए मैंने कहा “यह तो बहुत अच्छी बात है । पोता अंग्रेजी का एक्सपर्ट हो जाये तो समस्या की बात ही क्या है ? बड़ा हो जाने पर आम बोलचाल के लिए कामचलाऊ हिन्दी तो यूं ही सीख जायेगा । भला हिन्दी की जरूरत कहां है, और हिंग्लिश तो वह बखूबी बोल ही लेगा । हिन्दी लिखने की जरूरत उसे होगी नहीं, तब देवनागरी में न भी लिख सके तो क्या फर्क पड़ेगा ?”

“आपका कहना सही है । अंग्रेजी के बिना तो अब देश-दुनिया में काम चलता नहीं । आखिर इंटरनैशनल भाषा जो है । फिर भी कहीं-कहीं हिन्दी की जरूरत पड़ ही जाती है । और असल बात तो यह है कि आगे की उच्चतर कक्षाओं के हिन्दी पेपर भी तो उसे पास करने होंगे । तब रिजल्ट गड़बड़ा सकता है । इसलिए सोचते हैं कि कुछ हिन्दी सीख लेता तो ठीक रहता ।” वे प्रत्युत्तर में बोले ।

अपने देश में अपनी मूल भाषाओं की दशा और उन पर अंग्रेजी के वर्चस्व पर हम दोनों के बीच कुछ देर तक विचार-विमर्ष चलता रहा । बाद में मैंने उनसे जिज्ञासावश पूछ डाला कि अंग्रेजी इंटरनैशनल भाषा है इस कथन का वह क्या अर्थ लगाते हैं । उनका उत्तर सुनना मेरे लिए दिलचस्प था । साथ ही मुझे उनकी अज्ञानता पर हैरानी भी हो रही थी । उनका कहना था कि दुनिया के हर कोने में तो अंग्रेजी चल रही है । वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन, व्यावसायिक क्रियाकलाप तथा प्रशासन इत्यादि सभी कुछ तो सर्वत्र अंग्रेजी में होने लगा है । उनका सोचना था कि बिना अंग्रेजी के अब किसी भी देश की प्रगति संभव नहीं और उसके बिना कोई व्यक्ति आगे बढ़ भी नहीं सकता ।

अंग्रेजी की ‘अंतरराष्ट्रीयता’ को लेकर उनके मन में व्याप्त भ्रम को मैंने तोड़ने की कोशिश की और कहा, “यह कहना शायद ठीक होगा कि विश्व के प्रमुख देशों में अंग्रेजी एक अतिरिक्त भाषा के रूप में स्वीकारी जा रही है । परंतु वहां के लोगों को यह मान्य नहीं कि अंग्रेजी उनकी भाषाओं को विस्थापित कर उन्हें दोयम दर्जे का बना डाले, जैसा कि अपने यहां है । वहां के लोग अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कार्यों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग भले ही करें, अपने घरेलू कामकाज में अपनी ही भाषाएं प्रयोग में लेते हैं और उनका सम्मान करते हैं । चाहे डाक्टरी नुस्खा हो, या उपभोक्ता वस्तुओं के बाबत जानकारी, या सरकारी कामकाज, सर्वत्र उनकी अपनी भाषाएं काम देती हैं ।”

मैंने खड़े-खड़े ही उनको एक छोटा-सा भाषण पिला दिया । मेरी बातें सुनकर वे बोले, “आप कह रहे हैं तो मान लेते हैं । लेकिन अपने यहां तो अंग्रेजी ही चलेगी न ?” और आगे बढ़ गये । मैं सोचने लगा कि क्या कभी अपने लोग अंग्रेजी के भ्रमजाल से बाहर निकल सकेंगे ? – योगेन्द्र

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हिंदी, अंग्रेजी और फ़्रांसीसी: पेरिस का अनुभव

आज से करीब ढाई दशक पहले की एक घटना की मुझे सदा याद आती है । उन दिनों में इंग्लैंड में उच्चाध्ययन के लिए गया हुआ था । मेरे साथ मेरा परिवार भी था जिसमें तीन-चार साल के दो बच्चे तथा पत्नी शामिल थे ।

एक बार ग्रीष्मकाल में हमने पेरिस देखने का कार्यक्रम बनाया । इस हेतु हमने पर्यटन संचालित करने वाली एक संस्था के छोटे जहाज (फेरी) की सेवा ली । हमारा जहाज रात्रि द्वितीय प्रहर इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी तट पर अवस्थित पोर्ट्समथ शहर से रवाना हुआ और अगले सबेरे तड़के फ्रांस के कैलल्स पहुंचा । वहां से करीब तीन घंटे की बस-यात्रा द्वारा हम पेरिस पहुंच गये, जहां पर्यटन संचालक ने हमें दिन भर घूमने-फिरने के लिए छोड़ दिया । संध्याकाल सूर्यास्त के समय हमारी वापसी यात्रा नियत की गयी थी । पेरिस में हमने मुख्य-मुख्य पर्यटक स्थलों का दर्शन किया जिनमें प्रमुख था विश्वप्रसिद्ध ‘एफिल टावर’ देखना और नगर की ‘सेन’ नदी पर नौकाभ्रमण करना ।

उस दिन दोपहर के समय एफिल टावर के नजदीक किसी पार्क में हम लोगों ने थोड़ी देर आराम किया, क्योंकि हम सभी, खासकर बच्चे, काफी थक चुके थे । वहीं हमने दोपहर का भोजन किया जो हम अपने साथ ले आये थे । कुछ देर घूमने-फिरने के बाद हम पार्क से निकल मुख्य मार्ग पर आने लगे । पार्क के प्रवेशद्वार पर मिले एक फ्रांसीसी नौजवान से हमने कुछ जानकारी लेनी चाही । जैसा अभी तक चलता आ रहा था, हमने अपना सवाल अंग्रेजी में उससे पूछा । उसने फ्रांसीसी में कुछ उत्तर दिया जो हमारी समझ से परे था । हमने उसे बताने की कोशिश की कि उसकी बात हम समझ नहीं सके और वह कृपया अंग्रेजी में जवाब दे दे । उसने फ्रांसीसी में फिर कुछ कहा । हमने अंग्रेजी में धन्यवाद दिया और पार्क से बाहर आ गये ।

मुख्य मार्ग पर फिर एक व्यक्ति से हमने वांछित जानकारी लेनी चाही । इस व्यक्ति का भी व्यवहार संयत और शिष्ट था, किंतु उसका भी उत्तर फ्रांसीसी में ही था । हमने इस बात का संकेत देना चाहा कि हम भारतीय पर्यटक हैं और फ्रांसीसी न जानने के कारण अंग्रेजी में उत्तर चाहते हैं । इस बार भी हमें निराशा ही हुयी ।

बाद में हमारी समस्या का हल एक रेस्तरां में मिल सका जहां बैठकर हमने कुछ खाया-पिया । वहीं एक कर्मचारी से हमने वांछित जानकारी प्राप्त की । क्षमायाचना के साथ हमने उससे पूछा, “माफ कीजियेगा, आपके पेरिस में लोग अंग्रेजी नहीं जानते क्या ? मैं सोचता था कि यहां अंग्रेजी का अच्छा-खासा चलन होगा ।”

रेस्तरां के उस कर्मचारी ने मुस्कराते हुए (अंग्रेजी में) जवाब दिया, “नहीं, ऐसी बात नहीं है । यहां अंग्रेजी जानने वाले ढेरों मिल जायेंगे । हां, ऐसे कम लोग होंगे जिन्हें बढ़िया अंग्रेजी आती हो । पर काम लायक अंग्रेजीज्ञान तो कमोबेश बहुतों को होगा । … क्यों कोई खास बात है क्या ?”

“दरअसल आपसे पहले हमने अन्य दो लोगों से बात की थी । वे दोनों व्यवहार से संभ्रांत लग रहे थे, किंतु हमें वांछित जानकारी नहीं दे पाये । हमें लगा कि कदाचित् उन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती है । संयोग ही कुछ ऐसा बन पड़ा होगा ।”

उस व्यक्ति ने हमें समझाते हुए कहा, “आपका अनुमान शायद गलत हो । इसकी गुंजाइश कम ही है कि उन्हें अंग्रेजी न आती हो । फिर भी अंग्रेजी में उत्तर न देने के उनके कारण हैं । हम फ्रांसीसियों को अंग्रेजी स्वीकार्य नहीं है । आपस में हम न अंग्रेजी बोलते हैं और न ही किसी को बोलने की छूट देते हैं । मैं भी अंग्रेजी का प्रयोग यथसंभव नहीं करता । परंतु इस रेस्तरां में विदेशी पर्यटक आते रहते हैं जिनकी मदद के लिए मैं अंग्रेजी बोलता हूं । अंग्रेजी ही नहीं, मैं तो कामचलाऊ जर्मन तथा इतालवी भाषा भी बोलता हूं । यह हमारी व्यावसायिक विवशता है । अन्यथा अपनी भाषा या फिर संभव हो तो सामने खड़े मुसाफिर की भाषा का चुनाव हमारी नीति है ।”

जीवन में वह पहला क्षण था जब मुझे लगा कि हम भारतीयों के मन में भी उन लोगों की तरह अपनी देसी भाषाओं के प्रति आदर भाव होना ही चाहिए ।

इस ब्लाग पर मैं अपने रोजमर्रा के अनुभवों पर आधारित किस्से प्रस्तुत करने जा रहा हूं और यह मेरी पहली प्रविष्ठि है । आज चौदह सितंबर, हिन्दी दिवस, है । मैंने सोचा कि क्यों न शुरुआत पेरिस के उस भाषायी अनुभव से ही की जाये । — योगेन्द्र

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