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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

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जांच अधिकारी

वह पुलिस महकमे से प्रतिनियुक्ति पर आया एक सीबीआई अधिकारी था । अपने कार्य के प्रति समर्पित निष्ठावान कर्मठ अधिकारी था वह । मुश्किल से डेड़-दो साल हुए होंगे उसे नयी संस्था में आए हुए । वह चाहता था कि जिस जांच में उसे लगाया गया हो उसे पूरा करने का उसे अवसर मिले । वह समझ नहीं पा रहा था कि इस अल्पकाल में ही विभाग के भीतर उसके दो तबादले क्यों हो गये । उच्चाधिकारी से पूछने पर दोनों बार यही जवाब मिला कि उसकी जरूरत दूसरी जगह महसूस की जा रही है । यह उसकी योग्यता का प्रमाण था या कुछ और यह उसके लिए समझ से परे था । अस्तु, आदेश मानना उसका कर्तव्य था, अतः वह आधा-अधूरा कार्य छोड़ दूसरी जांच में मनोयोग से जुट जाता । अब वह रसूखदार और चर्चित किसी राजनेता की  आपराधिक संलिप्तता की जांच में जुटा था । उसे दाल में बहुत कुछ काला दिख रहा था और वह आशान्वतित था कि जांच के सार्थक परिणाम शीघ्र ही उसके हाथ लगेंगे । किंतु आज उसके उच्चाधिकारी ने जो कहा उससे उसे मानसिक कष्ट के साथ निराशा हो गयी ।

शाम को वह घर पहुंचा और सोफ़े के कोने पर हत्थे के सहारे बैठ गया । आम दिनों की तरह वह हाथमुंह धोकर तरोताजा होने वाशबेसिन या बाथरूम नहीं गया । थोड़ी देर में पत्नी उसके लिए हल्के नाश्ते के साथ चाय बना के ले आई । उसका मुरझाया चेहरा देख पत्नी ने पूछा, “काम के बोझ से तुम थके-हारे तो अक्सर दिखते हो, लेकिन आज तुम्हारे चेहरे पर परेशानी के भाव उभर रहे हैं । तबियत तो ठीक है न ? कोई खास बात तो नहीं हो गयी आफ़िस में ?”

पत्नी उसकी बगल में आकर बैठ गई । वह कुछ क्षणों तक शांत रहा । फिर प्रश्न भरी निगाह से देख रही पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए बोला, “हां कुछ ऐसा ही हो गया आफिस में ।” और पुनः शांत होकर सुनी आंखों से छत की ओर ताकने लगा । पत्नी असमंजस में थी कि कुछ आगे पूछे या उसे अपनी बाहों में भरकर उसके उद्वेग को किंचित दूर करे ।

“लो, चाय पी लो, ठंडी हो रही होगी ।” कहते हुए पत्नी ने उसके हाथ में चाय का प्याला पकड़ाया । उसने चाय की दो-चार चुस्कियां जब ले लीं तो पत्नी की हिम्मत थोड़ी बढ़ी कि आगे कुछ पूछे । “बताओ कुछ हुआ क्य़ा आफिस में ? मैं आफ़िस की समस्या का हल नहीं दे सकती, किंतु मुझे बताके तुम अपना मन हल्का तो कर ही सकते हो न !”

चाय की चुस्कियों और पत्नी के सान्निध्य ने अब तक उसके मन का बोझ कुछ कम कर दिया था । उसने कहना शुरू किया, “आज मेरे बॉस ने मुझे बुलाया और मुझसे कहा कि मैं जांच का काम धीमी गति से करूं । जल्दी से जल्दी परिणाम पाने की कोशिश मैं न करूं और मामले को कुछ हद तक लटकाये रहूं । मैं उनकी बात मानना नहीं चाहता था । मेरा सोचना है कि ऐसा करना मेरे व्यवसाय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता है और न ही दायित्वों के निर्वाह में ढीला रवैया मुझे व्यक्तिगत तौर पर स्वीकार्य है । मैंने अपना पक्ष रखते हुए उनसे जानना चाहा कि वे ऐसी सलाह क्यों दे रहे हैं । पहले तो वे टालते रहे फिर बोले कि ऐसा अलिखित निर्देश ऊपर से आया है । ऊपर का मतलब मंत्री के स्तर से है यह मैं समझ गया । फिर वे कहने लगे, ‘मुझे मालूम है कि यह बात तुम्हें पसंद नहीं । मुझे भी यह सब पसंद नहीं, परंतु अनुभव ने मुझे सिखा दिया है कि यहां ऐसा कुछ चलता रहता है । चुनाव नजदीक हैं उस समय यह मुद्दा सत्तापक्ष के काम आ सकता है यह मेरा अनुमान है । राजनेताओं के मामले ऐसे ही लटकाए रखे जाते हैं । न चाहते हुए भी हमें बहुत कुछ करना पड़ता है ।’ उसके बाद मैंने अधिक बात नहीं की और मैं अपने कार्यालय लौट आया । तुम्हें मालूम है ऐसी स्थिति में मुझे तकलीफ़ होती है ।”

“हां, मुझे मालूम है । इतना तो तुम्हें समझती ही हूं । मुझे भी बहुत-सी बातें ठीक नहीं लगती हैं, पर कर भी क्या सकते हैं ? बहुत-से मौकों पर समझौते करने पड़ते है । परिवार के भीतर, मित्र-परिचितों के स्तर पर, राह चलते अजनबियों के बीच, बताओ हम कहां-कहां समझौते नहीं करते ? इतना दुःखी न होओ । … चलो टीवी चलाती हूं, आज की खबरें सुनो ।”  पत्नी ने अपने तरीके से उसे आश्वस्त करने का प्रयास किया । वह टीवी ऑन करने उठी तो उसने उसका हाथ खींचकर वापस अपने साथ बिठा लिया ।

“फ़र्क है । सामाजिक जीवन में हमारे समझौते हमारी व्यक्तिगत लाभहानि की कीमत पर होते हैं, हम अपनी सुख-सुविधा या वैचारिक प्रतिबद्धता दांव पर लगाते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन में समझौतों का मतलब है देशहित की अनदेखी करना, अपने दायित्व को न निभाना जिनके लिए देश से आर्थिक लाभ ले रहे होते हैं । इस फ़र्क को समझो ।” उसने अपनी धारणा स्पष्ट की ।

उसने आगे कहना आरंभ किया, “इससे तो अच्छा है अपने राज्य में रहकर ही काम करना ।  जब शासन में बैठे लोग किसी से काम नहीं लेना चाहते हैं तो उसे ऐसी जगह भेज दिया जाता है जहां बंधा-बंधाया काम (रूटीन वर्क) करना काफ़ी होता है । तब इस बात की ग्लानि नहीं होती है कि मैं अपना दायित्व नहीं निभा रहा हूं । लेकिन इस महकमे में तो किसी न किसी जांच से जुड़ना ही होता है और तमाम दबाव झेलने होते हैं ।”

उस रात उसे काफ़ी देर तक नींद नहीं आई । वह सोचने लगा कि जिस संस्था में किसी न किसी बहाने दायित्व निभाने से रोका जाये वहां टिके रहना चाहिए अथवा नहीं ।

दूसरे दिन रोज की भांति वह वह कार्यालय के लिए तैयार हुआ । पत्नी ने प्रातःकालीन नाश्ता कराया और दोपहर के भोजन के लिए लंचबाक्स थमाते हुए बोली, “अगर शाम को जल्दी लौट सको तो कुछ देर के लिए कहीं घूमने निकल चलेंगे ।” वह चुप रहा, कोई जवाब नहीं दिया ।

घर से निकलते-निकलते वह पत्नी से बोला, “मेरी प्रतिनियुक्ति निरस्त करके मुझे अपने मूल राज्य वापस भेज दिया जाए इस आशय का निवेदन मैं आज कार्यालय को सोंप दूंगा ।” – योगेन्द्र जोशी

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“हे भगवन्, अगला जनम मोहे अमरीका में दीजो ।”

सोमबार, 15 अक्टूबर, का दिन है और अभी संध्याकाल का समय है । मैं घर के पास की दवा की दुकान पर पहुंचा हूं । परिचित होने के नाते दवा-विक्रेता से दो-चार मिनट बतियाते हुए काउंटर के एक तरफ खड़ा रहता हूं । तभी एक युवक तेजी से दुकान पर पहुंचता है । दवाविक्रेता से वांछित दवा मांगते हुए वह समाचार देता है, “जानते हो, गोदौलिया और उसके आसपास कर्फ्यू लग गया है ।”

दवाविक्रेता पूछता है, “क्यों ? क्या हो गया वहां ?”

युवक बताता है, “मालूम नहीं है क्या ? आज साधु-संतों  ने प्रतिकार दिवस मनाने का कार्यक्रम रखा था । गोदौलिया क्षेत्र में उनका विरोध-प्रदर्शन चल रहा था । जुलूस लेकर शहर के अन्य जगहों पर पहुंचने का इरादा रहा होगा प्रदर्शनकारियों का । पुलिस ने उनको आगे बढ़ने से रोकना चाहा । बस, क्या था, भगदड़ मच गयी । उपद्रवी लोगों को मौका मिल गया और उतर गये आगजनी और लूटपाट पर ।”

“अभी एक-दो घंटा हो रहा होगा घटना हुए । यहां गोदौलिया से दूर हम लोगों को तुरंत खबर कहां लगती है, वह भी दुकानदारी की व्यस्तता के समय । शहर की ओर से कोई आ रहा हो तो उसी के मुख से सुनने को मिलता है ।” दुकानदार घटना के बारे में अनभिज्ञता जताता है ।

अन्य नगरवासियों की भांति मुझे भी तथाकथित साधु-संतों के प्रतिकार दिवस की पृष्ठभूमि का अंदाजा है । बीते 22 सितंबर को ये साधु-संन्यासी इस मांग को लेकर आंदोलन पर उतर आए थे कि उन्हें गंगाजी में ही मूर्ति-विसर्जन की इजाजत दी जाए । कुछ दिनों पहले गणेशोत्सव मनाया गया था । उस समय गणेश-प्रतिमाओं को गंगाजी में विसर्जित करने पर रोक लगाई गयी थी । गंगाजी में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के मद्देनजर प्रशासन ने उसके जल में मूर्ति-विसर्जन को प्रतिबंधित कर रखा है । आस्था के नाम पर इन साधु-संन्यासियों को वैकल्पिक व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है । शायद उस समय की कुछ प्रतिमाएं अभी विसर्जित होनी हैं । चंद रोज बाद दशहरा-पूजा पर देवी-प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित होंगी, तब उनके विसर्जन की भी समस्या होगी । उस 22 सितंबर को इन लोगों के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था और पुलिस ने भीड़ नियंत्रित करने का वही पुराना तरीका अपनाया था । साधु-संतों पर लाठियां बरसीं थीं और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे । आज की प्रतिकार रैली उस दिन की लाठीचार्ज की घटना के प्रति विरोध दर्ज करने के उद्येश्य से आयोजित थी । प्रायः हर ऐसे मौके पर बात अंत में बिगड़ ही जाती है । मतलब कि इस बार फिर से लाठीचार्ज हुआ ।

मैं उस अपरिचित युवक की ओर मुखातिब होकर पूछता हूं । “भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने लाठियां भांजी होंगी । बेचारी पुलिस करे भी क्या ! भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उसके पास सदा लाठी का ही तो एकमात्र सहारा होता है । और जनता है कि ढेलेबाजी से जवाब देना वह भी नहीं भूलती है ।”

मेरी बात पर सहमत होते हुए युवक कहता है, “पता नहीं इस देश को क्या हो गया है । जब देखो जहां देखो कुछ न कुछ अनिष्ट घटित होता दिख जाएगा । कहीं गोमांस को लेकर लोग आपस में लड़ रहे हैं । कहीं सड़क पर मामूली विवाद पर लोगों का कत्ल हो जा रहा है । कहीं किसी युवती या बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है । कही पुलिस अपनी हिरासत में ही आरोपी को मार डालती है । कभी बात-बात पर रेलगाड़ियां रोक दी जाती हैं, तो कभी सड़क पर वाहनों को आग लगा दी जाती है, और कभी बाजार में लूटपाट शुरू हो जाती है । यह सब उस देश में हो रहा है जहां के लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति और धर्मनिष्ठा का ढिंडोरा पीटने से नहीं अघाते हैं ।”

“अपनी बात में इतना और जोड़ लीजिए कि जनता की सेवा का ढोंग रचने वाले हमारे राजनेताओं ने तो संयत और शिष्ट भाषा न बोलने की कसम खा रखी है । दो-चार दिन में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं । अपने चुनाव अभियान में नेतागण कैसी भाषा बोल रहे हैं ? वे अपने विपक्षियों के विरुद्ध गाली-गलौज की भाषा में आरोप-प्रत्यारोप में जुटे हैं । लोकतंत्र में शालीनता होनी चाहिए कि नहीं ? समाज के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण पेश करते देखा है आपने कभी उनको ?” मैं भी दो शब्द उसकी बातों में जोड़ देता हूं ।

“यही सब देखकर तो मन खिन्न हो जाता है, अंकलजी । समझ में नहीं आता है कि देश के हालात कभी बेहतर भी होंगे ।” उसने मेरी ओर देखकर कहता है । वह मेरी उम्र देखते हुए मुझे ‘अंकलजी’ कहकर संबोधित करता है । पिछले कुछएक दशकों से उम्रदराज आदमियों को अंकल शब्द से पुकारने की परिपाटी समाज में चल चुकी है ।

उसकी खिन्नता मुझे वास्तविक लगती है । मैं खुद भी देश के हालात को निराशाप्रद पाता हूं । मैं उसके कहता हूं, “यह देश सुधरने वाला नहीं है । मैं पचास-एक सालों से देश के हालातों को देखते आ रहा हूं । अवश्य ही देश भौतिक उपलब्धियों के नजरिये से आगे बढ़ा है; लोगों की संपन्नता बढ़ी है, सुख-सुविधा और ऐशो-आराम के साधन बढ़े हैं । लेकिन सामाजिक स्तर पर गिरावट आती गई है । ईमानदारी घटी है, संवेदनशीलता में कमी आई है, आपसी विश्वास पहले जैसा नहीं रहा, लोभ-लालच बहुत बढ़ गया है, असहिष्णुता बढ़ी है, लोग अधिक हिंसक हो चले हैं, और भी बहुत कुछ मेरे देखने में आया है । क्या-क्या बताऊं ?”

“अंकलजी, कभी-कभी मेरा मन होता है कि भगवान से प्रार्थना करूं, ‘हे भगवान, अगले जनम में मुझे अमेरिका में पैदा करना ।’” कहते हुए वह युवक अपनी दवा उठाकर चल देता है । – योगेन्द्र जोशी

 

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आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई

आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई ।
इस नगरी की रीत निराली शासन को नहि देत दिखाई ।।

प्रशंसा के ये शब्द मैंने अपनी विश्वप्रसिद्ध नगरी वाराणसी (वाराणसी) के लिए लिखे हैं । वाराणसी कुछ लोगों के लिए तीर्थस्थली है तो औरों के लिए यह दर्शनीय पर्यटन स्थल है । जहां हिंदू धर्मावलंबी गंगास्नान एवं भोलेबाबा विश्वनाथ के दर्शन करके पुण्यलाभ पाते हैं, वहीं बौद्ध मतावलंबी भगवान् बुद्ध की उपदेशस्थली सारनाथ के दर्शन पाकर स्वयं को कृतार्थ मानते हैं । पर्यटकों के लिए सारनाथ के श्रीलंकाई, चीनी, तिब्बती एवं जापानी आदि मंदिर महत्त्व रखते हैं । उनके लिए उत्तरवाहिनी गंगा के पश्चिमी किनारे के 4-5 किलोमीटर तक विस्तार पाये परस्पर जुड़े घाटों का दृश्य भी आकर्षण का केंद्र रहता है । प्रातःकाल उगते सूर्य की किरणों से नहाए इन घाटों की झलक पाना उनके लिए सौभाग्य की बात होती है । रामनगर का किला, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल परिसर, और भारत सरकार का रेल इंजन कारखाना भी दर्शनीय स्थल माने जाते हैं । पूरे नगर में यत्रतत्र स्थापित छोटे-बड़े मंदिरों का आकर्षण अपनी जगह पर है ।

जिसने वाराणसी न देखा हो वह जीवन में एक बार इस नगरी का भी दर्शन कर ले ऐसा निवेदन मैं उनसे अवश्य करना चाहूंगा । मेरे निवेदन के कारण सर्वथा भिन्न हैं । मैं तो उनसे कहूंगा कि 18-20 लाख की आबादी वाला पूरी तरह दुर्व्यवस्थित नगर कैसा होता है यह बात इस नगरी के दर्शन से ही समझ में आता है । मेरा मानना है कि मनुष्य को केवल सौन्दर्य के ही दर्शन नहीं करना चाहिए, उसे जीवन की कटु कुरूपता का भी साक्षात्कार करना चाहिए । और उस कार्य के लिए वाराणसी से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता । जितने भी शहर मैंने आज तक देखे हैं उनमें सर्वाधिक दुर्व्यवस्थित मैंने वाराणसी को ही पाया ।

उक्त बातें मैं वाराणसी के बारे में विशद चर्चा के उद्येश्य से नहीं कर रहा हूं । मैं तो ये बातें यहां की दुर्व्यवस्था और उसके कारण-स्वरूप प्रशासनिक भ्रष्टाचार के अपने अनुभव को समझाने के लिए बतौर पृष्ठभूमि के पेश कर रहा हूं । वाकया 5-7 साल पहले का होगा जैसा मुझे याद आता है । उस समय मेरे घर के पास से गुजरने वाले मुख्य मार्ग पर सीवर-पाइप डालने का कार्य चल रहा था । सड़क के एक तरफ गहरे खुदाई करके 6-8 फिट व्यास की सीमेंट-कांक्रीट की पाइपें जमीन में डाली जा रही थीं । बनारस शहर की अति-उन्मुक्त जीवनशैली के अनुकूल सड़क पर चलने वाले काम को ‘फ्री-स्टाइल’ तरीके से अंजाम दिया जाता है । खुदाई में निकली मिट्टी के ढेर को गढ़े के किसी भी तरफ बेतरतीब तरीके से जमा कर दिया जाता है । ठेकेदार और सरकारी अधिकारियों को राहगीर और वाहन कैसे उस मार्ग से गुजरेंगे इस बात की चिंता नहीं रहती है । अधिकारी तो शायद ही कभी कार्यस्थल पर आते होंगे । सरकारी परंपरा के अनुरूप सब कार्य कागज पर ठीक से चल रहा होता है । जमीनी हकीकत से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता । यह अपने देश की शासकीय खूबी है ।

हां तो मैं कह रहा था कि सड़क के एक ओर गहरे खोदकर पाइपें डाली जा रही थीं । इस दौरान टहलते हुए एक दिन मैं उस सड़क पर जा रहा था । कुछ दूर पहुंचने पर देखता हूं कि सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था । दर असल बीती बरसात के समय सड़क उखड़ चुकी थी और उसमें जगह-जगह गड्ढे बन चुके थे । इसलिए रोड़ी-तारकोल का मिश्रण सड़क पर बिछाया जा रहा था । मैं देखकर आ रहा था कि कुछ दूर पर पाइपें डाली जा रही थीं और जान रहा था कि उस स्थान पर भी दो-चार दिन में खुदाई होगी । मेरे दिमाग में सवाल घूमने लगा कि तब इस मरम्मत कार्य का तुक भला क्या है । मैंने रुककर एक श्रमिक से जिज्ञासावश पूछा, “क्यों भई, कोई अधिकारी भी है यहां जो इस काम को करवा रहा हो ?”

दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए वह बोला, “वो देखिए, हमारे जेई (जूनियर इंजीनियर) साहब वहां खड़े हैं ।”

आगे बढ़कर मैं उस सज्जन के पास पहुंचा और बोला, “भाई साहब, आप मरम्मत का कार्य यहां पर करवा रहे हैं । क्या आप देख नहीं रहे हैं कि पीछे से खुदाई करके पाइप डालने का कार्य भी चल रहा है । ऐसे में इस मरम्मत का क्या औचित्य है भला ?”

“आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन … ।” ऐसा कहते हुए एक-दो क्षण को रुक गये ।

अपनी बात पूरी करने से पहले उन्होंने मेरा परिचय जानना चाहा । मैंने अपने बारे में समुचित जानकारी देते हुए फिर पूछा, “लेकिन आप ये काम इस समय करवा क्यों रहे हैं ?”

उनका जवाब था, “ऐसे ही आर्डर मिले हैं । अगला महीना मार्च का है न ? इसलिए सड़क के लिए मिले बजट का पैसा खर्च करना है ।”

मैं उनके उत्तर से अवाक् था । उनसे फिर पूछा “परंतु आपने अपने उच्चाधिकारियों को बताया नहीं कि इस समय पाइप डालने का काम भी चल रहा है ।”

उनका उत्तर निराशा पैदा करने वाला था । मेरे परिचय से वे आश्वस्त थे कि मैं कोई ‘खतरनाक’ व्यक्ति नहीं हूं । अतः मुझ पर भरोसा करते हुए वे बोले, “सा’ब, मेरी कुछ भी सलाह देने की हिम्मत कहां है ? आप जानते ही होंगे कि इस प्रकार के ठेकों के कार्य माफिया तंत्र को मिलते हैं । उनसे पंगा लेकर अपने और अपने परिवार की जान जोखिम में डालने की हिम्मत मुझ जैसे अदने कर्मचारी की कैसे हो सकती है । कुछ कहने का मतलब उनके गुस्से का शिकार होना ।”

मुझे लगा कि वह व्यक्ति झूठ नहीं बोल रहा था । सरकारी ठेके आपराधिक छबि के लोगों को मिलते हैं यह तो समाचारपत्रों में मैं पढ़ता ही आ रहा था । अतः मुझे लगा कि वह जेई सच ही कह रहा होगा ।

मेरे पास अधिक कुछ कहने को नहीं था । चुपचाप आगे बढ़ गया । – योगेन्द्र जोशी


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न सुधरने को कृतसंकल्प समाज की कहानीः बिजली लाइनमैन की अकाल मृत्यु

वाकया पिछले सप्ताह का है । मैं अपने नजदीकी रिश्तेदार के परिवार में आयोजित कन्या-विवाह में सम्मिलित होने हल्द्वानी पहुंचा । हल्द्वानी देश के अपेक्षया छोटे राज्य उत्तराखंड का व्यापारिक महत्त्व का शहर है । उत्तराखंड में बिजली व्यवस्था पहले बेहतर हुआ करती थी, परंतु अब स्थिति पहले जैसी अच्छी नहीं है । हर दिन एक-दो घंटे की बिजली कटौती होती ही है, जो अधिक नहीं खलती है । चूंकि उक्त वैवाहिक कार्यक्रम की व्यवस्था रिश्तेदार के घर से कुछ दूर तदुद्येश्य बने स्थल पर की गयी थी और घर पर मुझ सरीखे चार-छः मेहमानों को ही ठहरना था, अतः बिजली जनरेटर जैसी व्यवस्था नहीं की गयी थी । यह उम्मीद की गयी थी दो-एक घंटे की कटौती हो भी जाए तो इंवर्टर से ही काम चल जाएगा । आजकल तो यह आम बात हो चुकी है कि अधिकतर मेहमान शादी-व्याह के अवसर पर उपस्थित होने के लिए मुश्किल से समय निकाल पाते हैं । बारात के चंद घंटे पहले मौजूदगी दर्ज करना और उसके बाद यथाशीघ्र लौट जाना आम चलन बन चुके हैं । इस तथ्य के मद्देनजर मेहमानों की दो-तीन दिनों की आवभगत की विशेष व्यवस्था की जरूरत अब कम ही रह गयी है । मतलब यह है कि उस घर पर जनरेटर का इंतजाम नहीं किया गया था ।

संयोग कभी भी पहले से इत्तिला देकर नहीं आते हैं । उक्त अवसर पर कार्यक्रम के ठीक पहले दिन रात्रि प्रथम प्रहर दुर्योग से बिजली चली गयी । पता चला कि ट्रांसफॉर्मर पर घटित हुयी गंभीर गड़बड़ी के कारण पूरा मोहल्ला अंधकार में डूब गया । बिजली कर्मचारियों ने विवशता दिखाई कि वे उस गड़बड़ी को दूसरे दिन पूर्वाह्न प्रथम प्रहर से पहले ठीक नहीं कर सकेंगे । खैर किसी तरह रात बीती और तत्पश्चात् प्रातःकाल बिजली आपूर्ति की बहाली की प्रतीक्षा होने लगी । मरम्मत के लिए कर्मचारी पहुंचे और कार्य होने लगा । लेकिन यह क्या हुआ ! दुर्घटना घटी और काम पर लगा लाइनमैन बिजली खंभे की चोटी से धड़ाम से नीचे गिर पड़ा । उसे बिजली का झटका लगा था और गिरने पर अविलंब उसकी मौत हो गयी । मरम्मत का काम रुक गया । कर्मचारी के शव की पोस्टमॉर्टम आदि की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शवदाह किया गया । सभी संबंधित कर्मचारी शाम तक उसी अफरातफरी में लगे रहे । अस्तु, सायंकाल तक फिर से मरम्मत-कार्य आरंभ हुआ और देर रात तक बिजली आपूर्ति बहाल हो गयी ।

यह घटना कोई नयी नहीं हैं । इस प्रकार की दुर्घटनाएं आये दिन अपने देश में होती रहती हैं । जब कभी ऐसी दुर्घटना की बातें मुझे पढ़ने-सुनने को मिलती हैं तो मेरा मन बेचैन हो उठता है । उपर्युक्त घटना से मैं कुछ हद तक अवश्य प्रभावित हुआ था, आखिर बिजली न मिल पाने का कष्ट तो मुझे भी हुआ । फिर भी वह सब मुझे सह्य लगता है । किंतु जो बात मुझे अत्यंत विचलित कर डालती है वह यह सवाल है कि ऐसी घटनाएं होती क्यों हैं ? मेरे जेहन में उठने वाला सवाल यह है कि अपने को विकसित देशों की कतार में खड़ा करने और विश्व की महाशक्तियों में स्थान पाने का ख्वाब देखने वाले देश में ऐसी दुर्घटनाएं आये दिन क्यों होती हैं ? चंद्रमा पर चंद्रयान उतारने में सफल और कभी अपने पैर चंद्रभूमि पर रखने का ख्वाहिशमंद देश इस धरती पर रोजमर्रा की जिंदगी में क्यों बुरी तरह असफल है ? क्यों नहीं एक कुशल व्यवस्था अपना सके हैं देशवासी ?

दशकों के अपने अनुभव के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भारतीय समाज विचारशून्य, कर्तव्यों के प्रति लापरवाह, डंडाधारी सामने न हो तो कानूनों का उल्लंघन करने वाला, संवेदनाहीन, तथा निहायत स्वार्थी है । मेरा ऐसा कहना प्रायः सभी को बुरा लगेगा, और वे यहां तक कह बैठेंगे कि ऐसे व्यक्ति को देश से बाहर कर देना चाहिए । लेकिन यह कोई नहीं सोचेगा कि संत कबीर की इस उक्ति
“निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय ।
बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाव ॥”
का महत्त्व क्या है ? किसी में भी यह धैर्य नहीं होगा कि तनिक शांत होकर विचार करे कि मेरी बातों में कितनी सच्चाई है । मैं संदेह का लाभ (अंग्रेजी में बेनेफिट ऑफ डाउट) देना बुद्धिमत्ता नहीं समझता । हम कह देते हैं कि अधिसंख्य भारतीयों में ये दोष नहीं होते । किसी के दोष को देखने का मौका कभी न आया हो तो यह निष्कर्ष मत निकालिए कि उसमें ऐसे दोष नहीं हैं । हम आम तौर पर सरकारी कर्मचारियों में ही इस प्रकार की कमियां देखते हैं, क्योंकि उनकी कार्यप्रणाली का सामना हमें रोजमर्रा की जिंदगी में करना पड़ता है । तब हम कह बैठते हैं कि वे काम नहीं करते, लापरवाही बरतते हैं, टालमटोल की नीति अपनाते हैं, इत्यादि-इत्यादि । परंतु ये अवगुण अधिक व्यापक हैं ।

अपनी उक्त धारणा के कारणों की चर्चा करने से पूर्व मैं उपरिकथित घटना संबंधी लापरवाही दो-चार शब्दों में बता दूं । जब लाइनमैन मरम्मत का कार्य कर रहा था तो बिजली सबस्टेशन से वहां की आपूर्ति क्या बंद नहीं की जानी चाहिए थी ? मोबाइल फोनों के इस जमाने में संपर्क साधकर समुचित कदम उठाने की बात तो संबंधित पक्ष परस्पर कह ही सकते थे । ऐसा क्यों नहीं हुआ ? अखबारों में इस प्रकार की खबरें आए दिन छपती रहती हैं । कोई भी सबक क्यों नहीं सीखता ? संभव है कि बिजली के झटके से दुर्घटना न घटी हो, बल्कि किसी अन्य कारण से विद्युत्कर्मी का संतुलन बिगड़ गया हो और वह गिर गया हो । लेकिन तब भी सवाल यह उठता है कि ऐसे मौकों पर सुरक्षा के समुचित कदम क्यों नहीं उठाये जाते हैं ? पूरे महकमे में एक भी व्यक्ति क्यों नहीं ऐसा होता है जो इस प्रकार के सवालों के प्रति अन्यों को जागरूक करे ? अधिकारी क्योंकर ऐसी वारदातों के प्रति उदासीन बने रहते हैं ? किसी प्रकार गाड़ी चल रही है क्या इसी से उन्हें संतोष कर लेना चाहिए ? क्या कार्य निष्पादन की विधि की गुणवत्ता का कोई महत्त्व नहीं ?

मेरा यह कथन कि भारतीय समाज विचारशून्य, कर्तव्यों के प्रति लापरवाह, इत्यादि है निराधार नहीं है । तमाम ऐसी खबरें मीडिया में छपती है जो बताती हैं कि सड़क पर मैनहोल खुले हों तो हफ्तों खुले ही रहते हैं । सड़क पर गड्ढा खोदा गया हो तो उसे चारों ओर से घेरा नहीं जाता है, और कार्य समाप्ति पर उसे ठीक से पाटा नहीं जाता है । वाहन चालक जहां मर्जी वहां वाहन खड़ा कर देते हैं; दूसरों की असुविधा से उन्हें कोई सरोकार नहीं । मैं अपना माथा पकड़कर बैठ जाता हूं जब सुनता हूं कि सड़क पर खड़े वाहन से कार-बाइक टकरा गये । या सुनता हूं कि लोहे की सरियों से लदे ट्रॉली की सरियों से किसी का शरीर छिद गया । बारातों के आवागमन में पूरी सड़क घेरकर नाचना लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है । विवाह के अवसर पर जश्न के तौर पर लोग बंदूक से गोली चलाते हैं, भले ही उससे किसी की मौत हो जाए । इस प्रकार की एक नहीं अनेक घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं । लोगों की मति कहां चली जाती है ऐसे मौकों पर ?

लोगों की कर्तव्यपरायणता इसी से आंकी जा सकती है कि आये दिन सड़कें धंसती हैं, निर्माणाधीन भवन ध्वस्त होते हैं, जमीन के अंदर की पानी की पाइपें फट जाती हैं । बोर-वेल के गहरे गड्ढों में बच्चे गिर पड़ते हैं । भवनों-गोदामों में आग लग जाती है । सरकारी गोदामों में अनाज सड़ने लगता है । अस्पतालों में मरीजों को उल्टी-सीधी दवाएं खिला दी जाती हैं, और आवारा कुत्ते नवजात शिशुओं को उठा ले जाते हैंरेलगाड़ियां पटरी से उतर जाती हैं, या आपस में भिड़ जाती हैं । भला क्या-क्या गिनाया जाए ? इन सब मौकों पर किसी के चेहरे पर शर्मोहया तथा आत्मग्लानि के भाव देखने को नहीं मिलते हैं । घटनाओं के प्रति कोई व्यक्ति जिम्मेदार नहीं पाया जाता है । भगवान् की यही मर्जी थी की भावना के साथ देश की गाड़ी यथावत् चलती रहती है, और लोग विकसित राष्ट्र कहलाने का सपना देखने में मशगूल हो जाते हैं ।

मुझे यही लगता है कि इस देश के नागरिक कभी न सुधरने का संकल्प लिए बैठे हैं, अन्यथा विशुद्ध लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाएं कभी की बंद हो चुकी होतीं । निजी संस्थाओं में डंडा चलने या खुला दरवाजा दिखा दिये जाने का भय रहता है, अतः वहां के कर्मचारी कार्य करते हैं । लेकिन सरकारी कर्मचारी ? कोई परवाह नहीं, कोई कर्तव्यनिष्ठा नहीं, कोई संवेदनशीलता नहीं, सामुदायिक हितों से सरोकार नहीं । यदि कर्तव्यनिष्ठा व्यापक स्तर पर होती तो इस देश में इतना भ्रष्टाचार न होता, पुलिस वालों से डर न लगता, सरकारी शिक्षा की दुर्दशा न होती, न्याय पाने में समय न लगता, राजनीति में जातीयता या धार्मिकता माने न रखते, दबंगई से काम निकालने की बातें होतीं, मिलावटी खाद्य सामग्री न बिकती, नकली दूध-घी का कारोबार न चल रहा होता, और लोगों को कानून का भय रहता । पर यह सब बखूबी हो रहा है, क्योंकि प्रशासन लापरवाही बरतता है ।

कुल मिलाकर यही कहा जाना चाहिए कि देशवासी न सुधरने का संकल्प लिए बैठे हैं । इस कथन के लिए क्षमाप्रार्थी हूं । – योगेन्द्र जोशी

(लगे हाथ एक जानकारी देता चलूं कि बिजली के उच्च तनाव या वोल्टेज (हाई टेंशन, 11 हजार वोल्ट और उससे अधिक) प्रसारण तारों के नीचे भवन निर्माण नियमानुसार प्रतिबंधित होता है । इसी प्रकार ऐसे तारों को सड़कों के ऊपर उनके समांतर बिछाना भी वर्जित है । ये तार सड़कों को एक बाजू से दूसरे बाजू पार कर सकते हैं, किंतु तब उनके नीचे तारों की एक जाली अवश्य लगी होनी चाहिए । हर विद्युद् विभाग इन बातों को जानता अवश्य है, परंतु उस पर अमल शायद ही कभी करता है । आगे दिए चित्रों को देखिए कि जहां मैं गया था वहां के एक भवन तथा सड़क के ऊपर हाई टेंशन तार कैसे फैलाए गये हैं । मेरा अनुमान है कि इन तारों पर 33 या 66 हजार वोल्ट की बिजली दौड़ रही है ।)


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