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सिगरेट का शौक छोड़ना आसान नहीं

मैं आजकल चार-एक हफ्तों के प्रवास पर बेंगलूरु (बंगलौर) के ह्वाइट्फ़ील्ड इलाके में हूं जहां आइ-टी यानी इंफ़र्मेशन टेक्नॉलॉजी (सूचना तकनीकी) तथा अन्य प्रकार के अधिकांश कार्यालय हैं। मैं सुबह-शाम और कभी-कभी दोपहर में बाहर कार्यालयों के आसपास टहलने के लिए निकलता हूं। मुझे यह शहर उतना सुव्यवस्थित नहीं लगा जितने की मैंने कल्पना की थी। सड़कें साफ-सुथरी और यातायात सुव्यस्थित हो ऐसा मैंने नहीं पाया।

एक बात जिस पर मैंने गौर किया वह यह है कि इस शहर में सिगरेट पीने का काफी चलन है। मैं शहर के भीतरी और पुराने इलाकों के बारे में कह नहीं सकता, क्योंकि मेरा घूमना-फिरना तीन-चार किलोमीटर के सीमित दायरे में ही रहा है। ह्वाइटफ़ील्ड के इस इलाके में सड़क के किनारे चलते-फिरते या पान-सिगरेट के स्टॉल के पास सिगरेट पीते हुए कई लोग दिख जाते हैं। सिगरेट का शौक नवयुवतियों-महिलाओं में भी देखने को मिला है मुझे। यह बात भारतीय समाज के संदर्भ में काफी असामान्य कही जाएगी। मेरा मन होता रहा कि उन लोगों से उनकी इस आदत के बारे में दो-चार बातें पूछूं, किंतु किसी के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

कल मैंने हिम्मत जुटा ही ली। सड़क के किनारे चबूतरे की शक्ल की एक जगह पर दो युवतियां बैठी थीं सिगरेट के कश खींचती हुईं। उनके पास जाने से मैंने स्वयं को रोक लिया, क्योंकि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी इसका अनुमान लगाना कठिन था। लेकिन दो कदम आगे बढ़कर मुझे कुछ युवा दिख गये, उम्र से कदाचित तीस-चालीस साल के। तीन जने तो आपस में बतियाते हुए पान-सिगरेट खरीद रहे थे और दो कदम की दूरी पर अन्य व्यक्ति एक पेड़ के तने के सहारे अकेले खड़े होकर धूम्रपान का आनंद ले रहा था। मैं उसके पास गया और हिन्दी में बात करने लगा। उसके इशारे से मैं समझ गया कि वह हिन्दी में बात नहीं समझ पायेगा। तब मैंने अंग्रेजी में कहा, “आपसे माफी चाहूंगा; क्या मैं निजता (प्राइवेसी) से जुड़ा एक सवाल पूछ सकता हूं?”

“जी, पूछिए।” उसने जवाब दिया।

मैं सीधे अपने सवाल पर आया, “आप सिगरेट पीते हैं। क्या आप जानते हैं कि सार्वजनिक स्थल (पब्लिक प्लेस) में धूम्रपान कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है और संबंधित व्यक्ति पर जुर्माना लग सकता है?”

उस व्यक्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। बल्कि वह यह कहते हुए आगे बढ़ गया कि उसे ऑफिस की देरी हो रही है।

दूसरे दिन मैंने इस विषय पर फिर से कुछ ’ज्ञान’ प्राप्त करने का प्रयास किया। जहां मैं ठहरा था उसके प्रवेशद्वार के निकट ’फोरम मल्टिप्लेक्स’ नामक व्यापारिक संस्थान है। उसी के सामने सड़क के दूसरी ओर पटरी या फुटपाथ के किनारे चाय-काफी, पान-सिगरेट, आदि की छोटी-मोटी दुकानें सजी मिलती हैं जहां आसपास के कार्यालय-कर्मी दोपहर के अवकाश के समय चाय-पानी आदि के लिए आते हैं।

उसी पटरी पर घूमते-फिरते मैं एक स्थल पर रुक गया। पास ही युवक-युवती का एक जोड़ा मुझे दिख गया। वे नारियल पानी ख्ररीद रहे थे। जब तक दुकानदार नारियल-फल काटछांट कर तैयार करता, उस युवक ने एक सिगरेट लेकर सुलगा ली। उस युगल में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। हिम्मत करके मैं उनके निकट पहुंचा और युवक की ओर मुखातिब होकर मैंने अंग्रेजी में पूछा, आपसे एक निजी सवाल पूछना चहता हूं। अगर बुरा न मानें तो पूछूं?”

मैंने प्रथमतः अपना परिचय दिया कि मैं वाराणसी से आया पर्यटक हूं और कहा कि यहां सिगरेट पीने का काफी चलन है। मेरे वाराणसी कहने पर दोनों (युवक-युवती) एक साथ बोल पड़े, “तब तो आप हिन्दी बोलते होंगे?”

मेरे हांमी भरने पर युवक ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। युवती ने खुद को देहरादून (उत्तराखंड) की बताया। उस वार्तालाप में वैयक्तिक स्तर की कुछएक बातें हम लोगों के बीच भी हुईं। इस बीच नारियल पानी भी आ चुका था जिसे वे पीने लगे। उन्होंने मुझे भी पेश किया जिसे मैंने सधन्यवाद मना कर दिया। फिर मैं असल मुद्दे पर लौट आया और युवक से पूछने लगा, “आप सिगरेट पीते हैं। आपको मालूम है …”

मैं अपना सवाल पूरा कर पाता कि उसके पहले ही वह बोल पड़ा, “मालूम है कि यह ’हेल्थ’ (तन्दुरुस्ती ) के लिए नुकसानदेह है। लेकिन काम के बोझ तले तनाव से इससे कुछ राहत मिल जाती है। यों कहें कि अब आदत बन चुकी है।”

मैं बोल पड़ा, “मैं मुद्दे के दूसरे पहलू की बात करना चाहता हूं। वह यह है कि धूम्रपान कानूनी तौर पर सार्वजनिक स्थल पर वर्जित है और इस पर जुर्माना भरना पड़ सकता है।”

यह देख मुझे आश्चर्य हुआ कि वे दोनों संबंधित कानून से अनभिज्ञ थे। कुछ देर बाद लौटने का समय हो गया कहते हुए वे सड़क पार कर अपने संस्थान ’फोरम’ की ओर चल दिए। दस-पंद्रह मिनट की उस बातचीत के दौरान और पिछले दिन की घटना से यह तो मेरे समझ में आ ही गया कि जिन्हें धूम्रपान का शौक लग गया वे अपनी तन्दुरुस्ती के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। इसके अलावा उनमें से कुछ लोग संबंधित कानून से भी परिचित नहीं होते या वे उसकी परवाह नहीं करते। – योगेन्द्र जोशी

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दवा-विक्रेता की सदाशयता

मुझे अपनी यात्राओं के दौरान अथवा उस काल के प्रवास-स्थान पर अक्सर सदाशयी जन मिल जाते हैं। मेरी समस्याओं का वे समाधान सुझाने में सहायक सिद्ध होते हैं। अधिकांश अवसरों पर मुझे कोई असुविधा नहीं होती है। यदि कहीं कोई अड़चन आन पड़ती है तो वह अपने देश की दोषपूर्ण व्यवस्था के कारण होती है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष के कारण।

विगत अगस्त माह मैं बेंगलूरु शहर अपने बेटे-बहू-पोते के पास तीनएक सप्ताह के लिए गया था। वे लोग ह्वाइटफ़ील्ड नामक इलाके में रहते हैं। एक दिन मुझे गिरिनगर नामक स्थान जाना था। दरअसल गिरिनगर में “सम्भाषण-सन्देशः” नामक संस्कृत पत्रिका का कार्यालय है। मैं इस पत्रिका का लंबे अंतराल से ग्राहक-पाठक हूं। चूंकि मैं सितंबर माह से कुछ महीनों के लिए वाराणसी से बाहर रहने वाला था, अतः चाहता था कि केवल डाक से प्राप्य यह पत्रिका  व्यवस्थापकों द्वारा उस काल में मुझे न भेजी जाए। इस आशय से पत्रिका के गिरिनगर स्थित कार्यालय जाने का विचार मेरे मन में उठा।

गिरिनगर ह्वाइटफ़ील्ड से २०-२२ किलोमीटर दूर है। मुख्यतः कन्नड़-भाषी बेंगलूरु शहर मेरे लिए नितांत अनजाना शहर है। ह्वाइटफ़ील्ड शहर का अपेक्षया नया इलाका है जहां प्रमुखतया आईटी प्रौद्योगिकी एवं कॉर्पोरट औद्योगिकी के  कार्यालय स्थित हैं, जिनमें देश के लगभग सभी इलाकों के युवक-युवतियां कार्य करते हैं। फलतः उस इलाके में हिन्दी बोलने-समझने वालों की संख्या काफी है। लेकिन गिरिनगर पुराने बेंगलूरु में है, जहां हिन्दी नाममात्र ही बोली-समझी जाती है। इसलिए वहां जाने और संभाषण संदेश कार्यालय खोजना मेरे लिए कठिन होगा यह शंका मेरे मन में रही। अस्तु।

मैंने नगर-बस-सेवा के डे-पास (एक-दिवसीय अनुमति-पत्र) का उपयोग किया। बेंगलूरु में बस परिचालक हिन्दी समझ और कुछ हद तक बोल लेते हैं ऐसा मुझे वहां के प्रवास के दौरान अनुभव हुआ। अत: मुझे खास दिक्कत नहीं हुई। बस कंडक्टर ने गिरिनगर से ७-८ कि.मी. दूर कॉर्पोरेशन (नगर निगम कार्यालय) के पास मुझे यह कहते हुए उतरने की सलाह दी कि चूंकि गिरिनगर के लिए वहां बहुत कम बसें चलती हैं, अतः ऑटो-रिक्शा से जाना सुविधाजनक होगा।

मैंने ऑटो भाड़े पर लिया और उसके चालक ने गिरिनगर  के एक मुख्य मार्ग के किनारे फेज़ ८ पर मुझे पहुंचा दिया यह कहते हुए कि आसपास ही सभी फेज़-क्षेत्र हैं, किंतु फेज़ २ (मेरा गंतव्य) ठीक-ठीक कहां है बता पाना कठिन है। कदाचित में फेज़-व्यवस्था सुनियोजित नहीं थी। मैंने वहां दिख रहे लोगों एवं दुकानदारों से पूछा, किंतु ठीक-ठीक कोई बता नहीं पाया। इसी बीच मेरी नजर एक दवा-दुकान पर पड़ी और मैं उस दुकान पर पहुंचा। संयोग से दुकानदार महोदय कन्नड़-हिन्दी-अंग्रेजी त्रिभाषी निकले। उन्होंने मुझसे १०-१२ मिनट बातें कीं कि कहां से आए हैं और कहां जाना है।

वार्तालाप में उन्होंने कहा, “यह इलाका उडुपी ब्राह्मणों का है लेकिन मैं स्वयं जैनी हूं। मैंने संस्कृत पत्रिका के बारे में सुना तो है परंतु उसका कार्यालय कहां पर है यह मैं सोच नहीं पा रहा हूं।”

मैने कहा, “कार्यालय के पते में फेज़ २ दिया गया है। यह कहां हो सकता है यह बता दीजिए। मैं कार्यालय खोज लूंगा।”

कुछ क्षण सोचने के बाद उन सज्जन ने कहा, “मुझे ख्याल आ रहा है कि पत्रिका का कार्यालय राघवेन्द्र स्वामी मठ में है।” फिर हाथ के इशारे के साथ वे बोले, “आप इसी फुटपाथ पर चलते जाइए। आगे मुख्य मार्ग से जो सड़क दाहिनी तरफ़ निकलती है उसी पर एक ओर आपको वह मठ दिख जाएगा। कदाचित् वहीं वह कार्यालय मिलेगा। अन्यथा मठ के लोग अधिक जानकारी दे सकेंगे। अवश्य ही उन्हें मालूम होगा।”

मैंने दवा-विक्रेता को धन्यवाद देते विदा ली और आगे बढ़ गया। किंचित् दूरी चलने के बाद मुझे वह गली मिल गई जिस पर राघवेन्द्र स्वामी मठ बताया गया था। मैं दाहिने मुड़कर दो कदम चला ही था कि स्क्रूटर पर सवार दवा-विक्रेता महोदय अनायास मेरे बगल में आकर रुकते हुए बोले, “आइए, स्कूटर पर बैठिए मैं मठ पर छोड़ देता हूं।”

अप्रत्याशित अपने बगल उन्हें स्कूटर पर देखकर चौंकते हुए मैंने पूछा, “आप भला यहां क्योंकर पहुंच गए?”

वे बोले, “आप जगह खोजने में खामखाह परेशान होंगे, सो मैंने सोचा कि क्यों न मैं ही आपको वहां पहुंचा दूं।”

उनके इतना कहते-कहते हम मठ पर पहुंच गये। मुझे उतार कर वे अधिक कुछ बोले बिना तुरंत लौट गये।

मैं सोचने लगा क्या गजब की दुनिया है यह जहां अजनबी परेशान न होवे इस विचार से कभी-कभी कोई व्यक्ति मदद को दौड़ पड़ता है। ऐसा आम तौर पर होता नहीं, इसलिए कुछ अचरज तो होता ही है। – योगेन्द्र जोशी

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बच्चे दो मांगें मां से एकल स्मार्टफोन

हम डिजिटल तकनीकी के युग में जी रहे हैं। और इस युग की सबसे बड़ी खासियत है स्मार्टफोन नामक युक्ति की उपलब्धता। स्मार्टफोनों की कीमत शुरुआती दौर में इतनी अधिक हुआ करती थी कि उसे खरीदने से पहले आदमी दस बार सोचता था। लेकिन जल्दी ही उसके सस्ते लेकिन कारगर मॉडल बाज़ार में आ गए। अब स्थिति यह है कि कई जनों के हाथों में अक्सर एक नहीं दो-दो तीन-तीन स्मार्टफोन भी दिख जाते हैं। इतना ही नहीं, स्मार्टफोन का आकर्षण छोटे बच्चों तक पहुंच चुका है। समाज के मध्यवर्ग में यह भी देखने को मिल रहा है कि जैसे ही नवजात शिशु के हाथ की अंगुलियां कोई भी चीज पकड़ने की सामर्थ्य पा जाते है वह भी मोबाइल से बतौर खिलौना खेलने लगता है। और जब तक वह खड़ा होना सीख पाता है तब तक वह अपने काम के वीडिओ भी देखने लगता है। बच्चों में पनप रहे मोबाइल के प्रति यह लगाव मेरी दृष्टि में जोखिम भरा है। लेकिन कई लोग अपने बच्चे की “स्मार्ट्नेस” से गर्वान्वित अनुभव करते हैं और स्मार्टफोन से उसे दूर रखने की जरूरत नहीं समझते हैं। इस स्थल पर मैं स्मार्टफोन के लाभ-हानि की विवेचना करने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि उससे जुड़ा एक अनुभव साझा कर रहा हूं।

कुछ दिनों पूर्व मैं पंजाब के शहर लुधियाना से शताब्दी एक्सप्रेस नामक (चेयरकार) रेलगाड़ी द्वारा नई दिल्ली आ रहा था। मैं गाड़ी के डिब्बे में गलियारे से लगी हुई पहली पंक्ति की सीट पर बैठा था और उसी पंक्ति में गलियारे के दूसरी तरफ तीनों सीटों पर दो महिलाएं और दो बच्चे बैठे थे। छोटा ब्च्चा कोई ५ साल का रहा होगा और उससे बड़ी बच्ची, अनुमानतः उसकी बहिन, डेढ़-दो साल बड़ी रही होगी।

बच्चों की मां के पास एक स्मार्टफोन था। गाड़ी के प्रस्थान करने के थोड़ी देर बाद छोटे बच्चे ने अपना मनपसंद वीडियो देखने के लिए मां से स्मार्टफोन हथिया लिया। जब बड़ी बहिन ने देखा कि स्मार्टफोन पर भाई ने कब्जा जमा लिया है तो उसे लगा कि फोन के प्रयोग का अधिकार उसे भी मिलना चाहिए। थोड़ी देर तक उसकी नजर फोन पर चल रहे वीडियो पर बनी रही। उसके हावभावों से लग रहा था कि उसे वह वीडियो उबाऊ लग रहा है। अंततः अधीर होकर उसने बहलाते-फुसलाते हुए भाई से स्मार्टफोन छीन लिया और अपने मन का वीडियो चलाने के लिए उसके ऊपर उंगलिया फेरना शुरू कर दिया। इससे छोटे भाई का रोना-गाना आरंभ होना स्वाभाविक था। मां ने उससे स्मार्टफोन वापस लेकर भाई को सौंप दिया। अब रोने-चीखने की बारी बहिन की थी।

उस मां की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे दोनों को शांत करे। उसने स्मार्टफोन बच्चों से लेकर अपने पर्स में रख लिया। किंतु ऐसा करना कारगर नहीं रहा। दोनों ने रोना शुरू कर दिया। उसने स्मार्टफोन पर्स से निकालकर एक ऐसा वीडिओ खोजा जो दोनों बच्चों को बहला सके। दोनों ने मिलकर हाथ में फोन लिया और वीडियो देखते हुए शांत हो गए। तब कुछ समय के लिए शान्ति छा सकी।

बच्चों की चीख-पुकार सुनना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। आसपास के यात्रियों की नींद में या उनके पत्र-पत्रिका पढ़ने में उनके रोने-गाने से अवश्य ही खलल पड़ रहा होगा। लेकिन बच्चों की जिद के सामने भला कोई कर भी क्या सकता था? गतंव्य तक पहुंचने का इंतिजार सभी को ही था।

निःसंदेह बच्चों की उस हरकत को देखना कुछ हद तक दिलचस्प भी लग रहा था। मैं सोच रहा था कि स्मार्टफोन किस कदर बच्चों के आकर्षण की चीज बनता जा रहा है। मुझे तो यह सब भविष्य के खतरे की ओर संकेत करता हुआ-सा दिख रहा था। ये बच्चे आने वाले समय में क्या आत्मसंयमी हो सकेंगे? क्या वे एकाग्रचित्त हो पाने की कला सीख पाएंगे? क्या इन युक्तियों पर उपलब्ध होने वाले इलेक्ट्रॉनिक यानी कंप्यूटर खेलों से अपने को अलग रख पाएंगे? इस प्रकार के अनेक प्रश्न मेरे मन में उठने लगे। – योगेन्द्र जोशी

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मेरा शहर वाराणसी – अवयस्क गैरलाइसेंसशुदा ऑटोचालक

     लगभग साड़े-तीन साल पहले जब नरेन्द्र मोदीजी मेरे शहर वारणसी से सांसद चुने गए और तत्पश्चात्‍ प्रधनमंत्री बने तब नगरवासियों को उम्मीद बंधी कि शहर के हालात बदलेंगे, शहर दुर्व्यवस्था के रोग से मुक्त होगा, गंदगी से निजात मिलेगी, अव्यवस्थित यातायात का दौर समाप्त होगा, इत्यादि। और भी न जाने क्या-क्या उम्मीदें लोग पाल बैठे थे। साड़े-तीन साल के इस अंतराल के बाद यह निश्चित हो चुका है कि यहां कुछ भी बदलने वाला नहीं। जब योगी आदित्यनाथ ने राज्य की सत्ता संभाली तब एक बार फिर लगा कि पहले नहीं तो अब चीजें बदलेंगी, क्योंकि पहले प्रशासनिक तंत्र समाजवादी पार्टी के हाथ में था जिसका मोदीजी के प्रति विरोधात्मक रवैया रहा है। लेकिन योगीजी का राज भी कोई सुधार नहीं ला पाया है, और मुझे आगे भी उम्मीद नहीं है। कुछ लोग गंगाजी और वरुणा नदी के किनारों/घाटों तथा दो-चार पर्यटक स्थलों की साफ-सफाई और रंगरोगन की बात करते हुए कह सकते हैं कि कुछ तो हो रहा है। मेरा सवाल है कि शहर के अंदरूनी हिस्सों की व्यवस्था तो जस की तस या पहले से बदतर ही तो है।

     बीते रविवार के दिन घटित एक वाकये का जिक्र करता हूं। यह एक बानगी है जिससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हालात वाकई कितने गंभीर हैं। हमें (पत्नी एवं मैं) मुंबाई जाने के लिए प्रातः 10:25 बजे की रेलगाड़ी पकड़नी थी। हम करीब सवा घंटा पहले रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए। मैंने एक ऑटो-रिक्शा (संक्षेप में ऑटो) तय किया और हम घर से चल दिए। रास्ते में ऑटो वाले से मार्ग में जाम के हालातों पर चर्चा करने लगे, क्योंकि अपने इस शहर वाराणसी में प्रायः हर रोज हर मुख्य मार्ग पर जाम की स्थिति बनी रहती है। हम तो साल में मुश्किल से एक-दो बार शहर की तरफ निकलते हैं, इसलिए इस बारे में अपना अनुभव खास नहीं है। किंतु स्थानीय अखबार में एतद्विषयक समाचार पढ़ने को मिलते ही रहते हैं। ऑटो वाले ने हमें बताया कि उस दिन रविवार होने के कारण काफी राहत रहेगी और हम 20-25 मिनट में स्टेशन पहुंच जाएंगे। हमने पूछा, “और दिनों क्या हालत रहती है?”

     “और दिनों मैं ऑटो नहीं चलाता। केवल इतवार को ही ऑटो निकालता हूं।” उसका सीधा जवाब था।

“केवल इतवार? ऐसा क्यों? और दिनों करते क्या हो फिर?” हमने सवाल दागा।

“मैं फलां-फलां एजेंसी (हमें नाम याद नहीं) में सेक्योरिटी का काम करता हूं। इतवार को मेरी छुट्टी रहती है। इसलिए उस दिन ऑटो निकालता हूं, और तबियत से ऑटो दौड़ाता हूं। डेढ़-दो हजार रुपये की कमाई कर लेता हूं।”

उसके बारे में हमारी जिज्ञासा बढ़ गई। उससे पूछा, “यह ऑटो किसी और का है क्या? इसके कागज-पत्तर तो दुरुस्त हैं न?”

“ऑटो तो मेरा ही है। शौकिया खरीद लिया और मौके-बेमौके काम देता है। लेकिन केवल इतवार को ही चलाता हूं। हफ्ते के छः दिन तो सिक्योरिटी का ही काम करता हूं, क्योंकि उसमें आराम है। ज्यादा काम नहीं रहता। रात में तबियत से सोने को मिल जाता है।” जवाब मिला।

जिज्ञासावश हमने पूछ लिया, “ड्राइविंग लाइसेंस तो रखे हो न?”

“नहीं अभी लाइसेंस नहीं है। छः महीने बाद बनाऊंगा, जब मेरी उम्र 18 पूरी हो जाएगी।”

उसकी बात सुन हमारा माथा ठनका। पहले मालूम होता तो उसे भाड़े पर न लेते। लेकिन तब आधे रास्ते में उसे छोड़ना भी संभव नहीं लगा। हमने पूछा, “क्यों भई, बिना लाइसेंस के चलाना जोखिम भरा नहीं है? रास्ते में पुलिस वाले पकड़ सकते हैं!”

“जेब में दो-चार सौ रुपये तो पड़े ही रहते है। दो सौ रुपये हाथ में टिका देंगे। उन्हें वसूली करने से मतलब। कौन-सा वाहन सीज़ (थाने में जमा) करते हैं जो डर लगे।”

“फिर भी लाइसेंस हो तो पैसा नहीं देना पड़ेगा। और कानून भी तो मानना चाहिए।”

“बनारस में कानून कौन मानता है। जहां तक पुलिस वालों को देने का सवाल है, वह तो करना ही पड़ेगा। जब वसूली करनी होती है तब दुरुस्त कागज-पत्रों के होते हुए भी वसूली करते हैं।”

उसकी बातें सुन हम निरुत्तर हो गए। आगे बोलें भी तो क्या बोलें! आए दिन अखबारों में पढ़ते रहते हैं कि पुलिस वसूली करती है और कानून के कार्यान्वयन में कोई रुचि नहीं लेते है। उस ऑटो-रिक्शा वाले की बातें सुनकर लगा कि हालात वाकई खराब हैं।

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तिरुमल तिरुपति के दर्शन का असफल प्रयास और बंगाली मोशाय की चिंता

इधर कुछ दिनों से तथाकथित बाबा राम रहीम की चर्चा समाचार माध्यमों में छाई हुई है। संबंधित समाचारों और उनको लेकर टीवी चैनलों पर प्रस्तुत बहसों को सुनकर मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि क्यों और कैसे लोग इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के अंध-भक्त बन जाते हैं। इन तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं के तौर-तरीकों को देखने के बाद भी उनके मन में किसी प्रकार की शंका क्यों नहीं उठती? वे इनको भगवान तक का दर्जा कैसे दे बैठते हैं? किंचित् चिंतन करने पर मुझे लगने लगा कि आम आदमी वस्तुतः बहुत कायर होता है – कायर अज्ञात के प्रति, अज्ञात भविष्य के प्रति। अधिकांश मनुष्य अमूर्त शक्तियों में विश्वास करते हैं और उन्हें यह भय रहता है कि ऐसी शक्तियां यदि रुष्ट हो गयीं तो उनका अनिष्ट कर सकती हैं। जो व्यक्ति समस्याओं के दौर से गुजर रहा होता है वह उनके निदान एवं समाधान के लिए मंदिरों, पंडे-पुजारियों, ज्योतिषियों, और तथाकथित संतों-साधुओं-महात्माओं आदि के पास पहुंचता है। मूल में अज्ञात शक्तियों का भय होता है ऐसा मेरा सोचना है।

विचार करते-करते मुझे कोई चौदह-पंद्रह वर्ष पहले की एक घटना की याद आ गई। अक्टूबर का महीना था और नौ-दिवसीय शारदीय नवरात्र का पर्व चल रहा था। मेरा प्रायशः पूरा जीवन उत्तर भारत में ही बीता है और यहां के अनुभवों के आधार पर मेरा सोचना यही रहा है कि नवरात्र का समय देवी दुर्गा (या उनके विभिन्न अवतारों) के दर्शन-पूजन का समय होता है। अपनी इसी धारणा से वशीभूत होकर मैंने शारदीय नवरात्र का समय तिरुमल (तिरुमला?) तिरुपति देवस्थानम् के दर्शन के लिए चुना, यह सोचते हुए कि इस देवी-पर्व के समय वहां तीर्थयात्रियों की भीड़ नहीं होगी। मैं अपनी पत्नी के साथ रेलगाड़ी से तिरुपति शहर पहुंच गया और वहां से तिरुमल पहाड़ियों पर स्थित तिरुमल तिरुपति वेंकटेश (श्रीपति वैकुण्ठेश भगवान विष्णु) मंदिर परिसर भी पहुंच गया।

वहां पहुंचने पर हमारी यह गलतफहमी दूर हो गई कि शारदीय नवरात्र-काल में तिरुमल में यात्रियों की भीड़ कम होगी। दरअसल इसी समय वहां भव्य “ब्रह्मोत्सव” का आयोजन होता है। पूरा मंदिर परिसर सजा रहता है। रात भर देवमूर्तियों की सजी हुई झांकियां विशाल मंदिर परिसर में घुमाई जाती हैं। उन्हीं में से एक में तिरुपति वेंकटेश की प्रतिकृति भी रहती है जिसके दर्शन-पूजन के लिए भीड़ उमड़ी रहती है। पूरे नवरात्र रात-दिन चहल-पहल रहती है।

तिरुमल में दर्शन के लिए अलग-अलग मूल्यों के टिकटों की व्यवस्था रहती है और उसी के अनुसार दर्शनार्थियों को छोटी-बड़ी पंक्तियों में खड़ा होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मुफ्त दर्शन वाली पंक्ति भी लगती है, परंतु उसमें दर्शन पाने में काफी समय लगता है। हम लोगों ने टिकट पाने की कोशिश की। पता चला कि पूरे नवरात्र भर के लिए सामान्यतः उपलब्ध टिकट बिक चुके हैं। विशेष मूल्य के टिकट (हजार-दो-हजार या अधिक के टिकट शायद मिल जायें ऐसा कइयों ने सुझाया। उपलब्ध जानकारी भ्रमित करने वाली ही थी। रात एक-डेड़ बजे तक हम भाग-दौड़ करते रहे, एक कार्यालय से दूसरे तक दौड़ते रहे, बैंक की शाखा (रात में भी खुली हुई) के चक्कर लगाते रहे, लेकिन निराशा ही हाथ लगी।

दूसरे दिन मुफ्त दर्शन के लिए ५००-६०० मीटर लंबी पंक्ति में हम भी लग लिए। तिरुमल में दर्शन की व्यवस्था मुझे अजीब और असुविधाजनक लगी। मैं अधिक विस्तार से वर्णन नहीं कर रहा हूं किंतु इतना बता दूं वहां १५-२० बड़े-बड़े हॉल हैं जिनमें दर्शानार्थियों को प्रतीक्षारत रहने के लिए टिका दिया जाता है। दर्शन के लिए एक-एक कर हॉलों को खोला जाता है और लोग आगे बढ़ते हैं। ब्रह्मोत्सव के समय भीड़ इतनी होती है कि उनको कभी-कभी आगे किसी और हॉल में फिर-से टिका दिया जाता है। हम भी एक हॉल में इंतिजार करने लगे। मालूम पड़ा कि दर्शन रात्रि ११-१२ बजे होंगे। हम संतुष्ठ थे कि चलो दर्शन तो हो ही जायेंगे। बाद में जानकारी को पुख्ता करने के लिए एक स्वयंसेवक (वॉलंटिअर) से पूछा तो पता चला कि दर्शन के लिए ११-१२ बजे का वक्त उस रात का नहीं बल्कि अगली रात का है।

हमारा माथा ठनका। हमारे लौटने का आरक्षण अगले दिन ३-४ बजे का था। हमने दर्शन का विचार त्यागा और बाहर आने के लिए तैयार हुए। पर यह क्या! हॉल के प्रवेश-द्वार पर तो ताला लटका था। वहां ठीक-से हिन्दी या अंग्रेजी समझने वाला स्वयंसेवक नहीं मिला जो हमारी समस्या समझ सके। बड़ी मुश्किल से एक युवक मिला जिसने हमारे मदद की। हम बाहर निकले और राहत की सांस ली। दूसरे दिन रेलगाड़ी से लौट आए बिना दर्शन किए।

इस घटना का रोचक पक्ष है एक बंगाली महाशय की दुश्चिंता जो हमारे देखने में आई। जब हम टिकट के लिए भाग-दौड़ कर रहे थे तब हमारी उनसे मुलाकात हुई। वे सज्जन तीस-बत्तीस वर्ष के युवा थे और कलकत्ता से पत्नी और छोटे बच्चों के साथ दर्शनार्थ आये थे। हमारी तरह वे भी परेशान थे। जब कहीं भी कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने हमारे सामने अपनी चिंता साझा की, “अब कैसे दर्शन होंगे? हम यहां अधिक समय टिकने की स्थिति में नहीं। बिना दर्शन के लौटना अनिष्टकारी होगा। हमें मालूम ही नहीं था कि इस समय दर्शन पाना इतना मुश्किल होगा।”

देव-दर्शन की कोई संभावना नहीं यह बात हमारे लिए भी निराशाजनक थी। जिस उद्देश्य से घर से चले थे उसका पूरा न हो पाना अच्छा तो नहीं लग रहा था। फिर भी इस बात को एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग मानकर हम सहज थे। इसके विपरीत वे महाशय बेहद चिंतित थे किसी अनिष्ट की आशंका को लेकर। उनके चेहर पर दुश्चिंता के भाव स्पष्ट झलक रहे थे। उनका कहना था, “देव-दर्शन किए बिना लौटना अनिष्टकारी तो होगा ही। अब हम क्या करें?”

हमने उनको समझाया, “देखिए दर्शन नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें आपकी क्या गलती? परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि आपके लिए दर्शन संभव नहीं हो पा रहे हैं। क्या आप भगवान्‍ को इतना कमजोर समझते हैं कि एक साधारण मनुष्य़ की भांति वह भी बात-बात पर नाखुश हो जाएं? आपने मंदिर के दर्शन कर लिए, परिसर की झांकियों की भी झलक पा ली है। ये कम है क्या? यदि बहुत चिंता हो तो श्री व्यंकटेश से प्रार्थना करिए कि अगली बार दुबारा आने और दर्शन पाने का सुअवसर आपको प्रदान करें।”

मेरी बात उन्होंने गंभीरता से सुनी। मुझे लग रहा था कि उनको मेरी सलाह पसंद आ गई। उस रात हमने उनसे विदा ले ली। अगले दिन हम मुफ्त दर्शन पाने हेतु पंक्ति में लग लिए। उसके बाद क्या हुआ यह बता चुका हूं। उन चिंताग्रस्त महाशय से दुबारा भेंट नही हो सकी। उनकी दुश्चिंता यथावत्‍ बनी रही या नहीं मैं कह नहीं सकता। उस घटना से मुझे यह ज्ञान तो मिला ही कि सामान्य मनुष्य अनागत के बारे में सोच-सोचकर परेशान हो जाता है। वह अदृश्य शक्तियों में विश्वास ही नहीं करता बल्कि उनसे भय भी खाता है। वह सोचता है कि एक मनुष्य की भांति वे शक्तियां भी बात-बात पर रुष्ट हो सकती हैं और व्यक्ति का अहित कर सकती हैं। लेकिन वे शक्तियां क्या वास्तव में मनुष्य की तरह कमजोर होती हैं? मेरे मत में यह भ्रम मात्र है। – योगेन्द्र जोशी

 

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शक-शुबहा की गुंजाइश हो तो?

घटना तब की है जब बीती गर्मियों में बैष्णवदेवी दर्शन के पश्चात् बेगमपुरा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से हम जम्मू-तवी से वाराणसी लौट रहे थे। जम्मू-तवी में मेरी शायिका (बर्थ) के सामने एक मध्यवयस्क यात्री बैठे थे। उनके साथ एक युवा यात्री भी बैठा था। दोनों की बातचीत से लग रहा था कि वे दोनों एक ही सरकारी संस्था में सेवारत हैं और वह युवक उन मध्यवयस्क यात्री के कनिष्ठ कर्मी के तौर पर कार्यरत है। यह भी पता चल रहा था कि वरिष्ठ यात्री को अंबाला कैंट पर उतरना है। उसके बाद वह शायिका किसी अन्य यात्री के लिए आरक्षित थी। उस युवा यात्री को आरक्षण नहीं मिल पाया था।

अंबाला कैंट पर उस युवक के वरिष्ठ सहकर्मी उतर गये और उस शायिका पर अन्य यात्री काबिज़ हो गया। अब उस युवा को रात्रिविश्राम के लिए उपयुक्त स्थान की चिंता सताने लगी। उसके पास एक अदद सामान – लाल बैग – था जिसे उसने शायिका के नीचे एक कोने पर सुरक्षित रख दिया था। फिर उसने मेरी पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा, “आंटी, आप जरा मेरा बैग देख दीजियेगा (यानी उसकी सुरक्षा का ध्यान रखियेगा); मैं देखने जा रहा हूं कि कहीं सीट मिल पाती है क्या?”

हमने उसका अनुरोध मानते हुए पूछा, “आपको जाना कहां है?”

उसने कहा, “मुझे लखनऊ उतरना है। वहां से कानपुर अपने घर जाऊंगा।”

उस रेलमार्ग पर लखनऊ वाराणसी से करीब तीन सौ कि.मी. पहले पड़ता है और हमारी गाड़ी का वहां पहुंचने का समय प्रातःकाल लगभग आठ बजे था।

वह युवक रात भर गायब रहा। उसे शायद कहीं बर्थ नहीं मिली होगी, अन्यथा वह अपना सामान लेने आया होता। उसने येनकेन प्रकारेण किसी डिब्बे में रात बिताई होगी।

प्रातःकाल गाड़ी लखनऊ से पहले भी एक-दो स्टेशनों पर रुकी थी। ग्रीष्मकाल में तो लखनऊ के आसपास छ: बजते-बजते अच्छी-खासी रोशनी हो चुकती है। इसलिए मैं यह उम्मींद कर रहा था कि वह युवक मौका पाते ही हम लोगों के डिब्बे में आ जायेगा। मैं समझता था कि उसे हमारे ही डिब्बे में आकर लखनऊ स्टेशन का इंतिजार करना चाहिए। उसे अपने बैग की सुध तो रखनी ही चाहिए।

मैं आश्वस्त होना चाहता था कि उस बैग में कुछ संदिग्ध सामग्री तो नहीं है। वह युवक और उसका वरिष्ठ सहकर्मी जम्मू से आ रहे थे इसलिए मेरे मन में यह शंका उठ रही थी कि वह व्यक्ति किसी अप्रिय घटना को अंजाम देने के विचार से तो बैग नहीं छोड़ गया। मैंने अपनी पत्नी से अपनी शंका साझा की। उनका कहना था, “ऐसा कुछ नहीं होगा; वह आता ही होगा। देख नहीं रहे थे कि वे दोनों जने (वह युवक और उसका वरिष्ठ साथी जो अंबाला कैंट पर उतरा था) अपनी संस्था की जुड़ी कितनी बातें कर रहे थे? उनकी हिन्दी भी सामान्य थी। इसलिए ऐसा कुछ नहीं होगा। वह लड़का आता ही होगा।”

मैंने पत्नी के समक्ष अपना तर्क रखा, “देखो, अतिवादी-आतंकवादी भी अपनी पहचान और अपने इरादे छिपाने के लिए ऐसा नाटक खेल सकते हैं। वे भी सामान्य सहयात्री दिखने की कोशिश कर सकते हैं। कौन जाने जो बातें वे कर रहे थे वे सच थीं या झूठ। मैं उस बैग के बारे में आश्वस्त नहीं हूं। अवश्य ही रात भर मैं ऐसी कोई कल्पना नहीं कर रहा था। लेकिन लखनऊ आने वाला है और उसका अता-पता नहीं है। उसे अपने बैग की चिंता तो होनी ही चाहिए थी।”

मैंने अपना संदेह गाड़ी में मौजूद सुरक्षाकर्मियों के समक्ष रखने का विचार किया। मैं अपने डिब्बे के परिचारक (अटेंडेंट) के पास पहुंचा और उससे सुरक्षाकर्मितों के बारे पूछा। उसने बताया, “गाड़ी में कोई सुरक्षाकर्मी नहीं रहते हैं। जम्मू से आते समय अंबाला कैंट तक वे मौजूद रहते हैं। उसके बाद गाड़ी में कोई नहीं रहता।”

उससे मैंने किसी सक्षम अधिकारी का फोन नं. मांगा जो उसके पास नहीं था। मेरा विश्वास था कि आजकल सभी प्रमुख गाड़ियों में सुरक्षा की समुचित व्यवस्था रहती है। ऐसा विश्वास करना मेरी मूर्खता थी।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। मैंने आसपास बैठे सहयात्रियों के सामने अपनी शंका व्यक्त की। उम्मीद के अनुरूप ही उनकी प्रतिक्रिया “ठीक है, क्यों परेशान हो रहे हैं? कुछ नहीं होगा। वह आ जाएगा।” वाली थी।

मैं शंकाग्रस्त था लेकिन क्या करूं यह समझ नहीं पा रहा था। अंततः लखनऊ का चारबाग स्टेशन भी आ गया। अन्य यात्रियों की भांति मैं भी प्रातःकालीन चाय-काफी के लिए स्टेशन पर उतरा और निकट की चाय-काफी-जलपान की दुकान की ओर तेजी से बढ़ा। मुझे काफी के दो कप पाने में चार-छः मिनट तो लग ही गए होंगे।

काफी के दो कप हाथ में लिए जब मैं अपने डिब्बे के पास पहुंचा तो देखा कि वह युवक कंधे पर बैग लटकाए हुए मेरी ओर ही आ रहा है। पास पहुंचने पर उसने मुझे धन्यवाद दिया और जब तक मैं प्रत्युत्तर में उसे दो-चार शब्द कहता, उससे पहले ही वह तेजी से आगे बढ़ गया। – योगेन्द्र जोशी

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सवाल “भारत” के वजूद का

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस समय भी मैं जिज्ञासु दृष्टि से सभी को देख रहा हूं।

मेरी नजर बगल की कुर्सी पर बैठे आठ-दश-वर्षीय एक बच्चे पर पड़ती है। वह भी एक स्मार्टफोन के साथ खेल रहा है, शायद अपने मित्रों के संदेश किसी “सोशल मीडिया” (सामाजिक संपर्क माध्यम?) पर देख रहा है। उसकी उंगलियां सधे अंदाज में फोन के पर्दे पर चलती हैं। मेरे पास भी स्मार्टफोन है पर उसका प्रयोग मैं वैसी प्रवीणता से नहीं कर पाता जैसी इन आधुनिक बच्चों में देखता हूं। मैं उस बच्चे से पूछना चाहता हूं वह क्या कर रहा है, क्या-क्या कर सकता है, इत्यादि। असमंजस में हूं कि पूछूं या नहीं। बड़ों की भांति बच्चे भी संवेदनशील हो सकते हैं। उस बच्चे की निजता में हस्तक्षेप करूं क्या? करूं तो किस बहाने? आज के युग में निजत्व बहुत माने रखने लगा है।

अंततः मैं उसकी एकाग्रता में खलल डाल ही लेता हूं और पूछता हूं, “क्या आप बताना चाहेंगे कि आप अभी क्या कर रहे हैं?”

आम तौर पर मैं बच्चों को आप कहकर नहीं पुकारता, लेकिन इस समय अनायास ही उसके प्रति औपचारिक हो रहा हूं। वह कहता है, “मैं व्हट्सऐप पर दोस्तों के साथ मैसेजेज़ शेयर कर रहा हूं। उसके पहले मैंने उनको यहां की फोटोज़ भेजीं।”

“अच्छा! फोन पर “गेम” भी खेलते होंगे? और भी बहुत-सी चीजें कर लेते होंगे?” मैं फिर पूछता हूं। मैं गेम कहने के बजाय खेल कहना पसंद करता हूं। लेकिन इस समय गेम शब्द ही मेरे मुख से निकलता है। मध्यम वर्ग के आजकल के बच्चे हिन्दी के शब्द बोलते ही कहां हैं?

वह जवाब देता है, “हां-हां, क्यों नहीं! गेम भी खेलता हूं। ई-मेल पढ़ सकता हूं। फोन रिचार्ज कर सकता हूं। ट्रेन-रेज़र्वेशन कर सकता हूं।”

“क्या आप गूगल-मैप के बारे में भी जानते हैं? अपने फोन पर उसे भी देख सकते हैं क्या?” मैं कुछ और जानना चाहता हूं।

वह भी मेरी बातों में दिलचस्पी लेता है। कदाचित् स्मार्टफोन की अपनी जानकारी से मुझे प्रभावित करना चाहता है। ऐसा करना मनुष्यों के स्वभाव में होता ही है और बहुत-से बच्चों में भी यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। मैं पूछता हूं, “क्या गूगल मैप के सहारे मुझे दिखा सकते हैं कि आप अभी किस जगह पर हैं।”

वह फोन के पर्दे पर जादुई अंदाज में अपना हाथ फेरता है और मुझे वैवाहिक स्थल तथा संबंधित शहर की स्थिति दिखा देता है। मैं फिर पूछता हूं, “क्या मैप में जापान कहां है इसे भी यह बता सकते हैं?”

वह उसी करिस्माई अंदाज से मैप में जापानी द्वीप-समूह की स्थिति दिखाता है और मुझसे कहता है, “आप क्या जापान के शहरों की लोकेशन भी जानना चाहेंगे?”

“नहीं, इतना काफी है। …” कहते हुए मैं प्रशंसात्मक शब्द बोलता हूं, “वाह, आपका फोन ही स्मार्ट नहीं, आप भी स्मार्ट हैं। … अच्छा, अब जरा भारत कहां है यह भी मैप में दिखा दें।”

दो-एक क्षणों तक उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। फिर अपने दिमाग पर जोर डालते हुए बोलता है, “आपका मतलब इंडिया से है क्या? मेरी टीचर ने एक बार बताया था कि इंडिया को भारत भी कहते हैं। लेकिन मुझे थोड़ा कंफ़्यूज़न है। …”

मैं हामी भरता हूं। उसके फोन के पर्दे पर इंडिया नजर आने लगता है।

“चलिए, इतना काफ़ी है। आपको इतनी देर डिस्टर्ब किया। अब आप अपना व्हट्सऐप वाले काम पर लौट चलिए।” कहते हुए मैं पास में काफी-प्यालों की ट्रे लिए घूम रहे व्यक्ति को इशारा करता हूं। वह पास आता है और मैं एक प्याली काफी ले लेता हूं।

सोचने लगता हूं कि क्या “भारत” का वजूद खत्म हो जायेगा? मेरा इशारा भारत देश की ओर नहीं है। मेरा मतलब तो “भारत” शब्द से है जिसे हमारे पुरखे उस भूभाग के संबोधन के तौर पर प्रयोग में लेते रहे हैं जिसे अब लोग इंडिया कहते हैं। क्या देश का “भारत” संबोधन आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिचित हो जायेगा?

शायद हां! – योगेन्द्र जोशी

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