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अंग्रेजी छोड़ेंगे नहीं, आम आदमी समझे या न समझे परवाह नहीं

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच एक युवक उस पटल पर आया। वह अपने मोबाइल पर बैंक द्वारा भेजे गए एक संदेश का मतलब जानना चाहता था। काउंटर के पारदर्शी शीशे के दूसरी तरफ़ बैठे बैंक-कर्मी को संदेश दिखाते हुए उसने पूछा, “जरा देखिए तो मेरे फोन पर यह क्या मैसेज आया है।

अपने अन्य कार्य में व्यस्त बैंक-कर्मी ने कहा, “आप खुद पढ़िए न और मुझे भी सुना दीजिए

युवक ने कहा, “मेरे समझ में नहीं आ रहा है। आप देख दीजिए न

बैंक-कर्मी ने कहा, “ठीक है, पढ़िए क्या लिखा है।

युवक क्षण भर हिचकिचाया और फिर बोला, “दरअसल मैसेज अंग्रेजी में है और इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं मैं।

मैं उस युवक की समस्या समझ गया। बैंक-कर्मी अपने हाथ में आया काम निपटा ले यह सोचकर मैंने उस युवक से कहा, “लाइए अपना मैसेज मुझे दिखाइए।

संदेश सामान्य प्रकार का था, बैंक एटीएम से निकाले गए पैसे के बारे में जानकारी। मैंने युवक को समझाया, “आपने एटीएम से पैसा निकाला था क्या?

उसका जवाब हां में था। आगे मैंने उसको बताया, “ऐसी जानकारी बैंक अपने ग्राहकों को भेजते रहते हैं ताकि वे देख सकें कि किसी और ने तो लेनदेन की धोखाधड़ी तो नहीं की है। ऐसे संदेशों को सावधानी से देख लेना चाहिए ताकि कुछ गड़बड़ होने पर बैंक को सूचित किया जा सके।

उसकी समझ में बात आ गई और वह बैंक शाखा से बाहर चला गया।

मैं सोचने लगा क्या अजीव विडंबना है कि आज भी इस देश में अंग्रेजी और केवल अंग्रेजी का राज चल रहा है। हिन्दी को राजभाषा की “उपाधि” दे तो दी गई, किंतु उसे व्यवहार में लेना सरकारी संस्थानों ने अभी तक नहीं सीखा है। अन्य भारतीय भाषाओं का तो नंबर ही नहीं आने का।

मुश्किल से 15-16% देशवासी होंगे जो अंग्रेजी ठीक से समझ पाते हों। अपने-अपने कार्यालयों के कार्यों की अंग्रेजी उनको समझ में आ जाती होगी, क्योंकि वह एक स्थापित ढर्रे की भाषा होती है। लेकिन उसके परे दूसरे कार्य-क्षेत्रों की अलग प्रकार की भाषा उनको अच्छी तरह समझ में आती होगी इसमें मुझे शंका है। अस्तु।

बैंक जैसी संस्थाओं को तो हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में भी ग्राहकों को संदेश देना ही चाहिए ताकि अंग्रेजी के संदेशों को समझने के लिए दूसरों के पास किसी को न जाना पड़े। वे क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल का दावा तो करते हैं, लेकिन अंकीय (डिजिटल) माध्यम से संदेश-प्रेषण में अभी बहुत पीछे हैं।

ऐसी घटनाओं को देखने पर मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के दिन (1960 के आसपास) याद आते हैं जब त्वरित संदेश के लिए “तार” (टेलीग्राम) भेजे जाते थे, जो केवल अंग्रेजी में अंकित रहते थे। तब साक्षरता वैसे ही कम थी और तिस पर अंग्रेजी जानने वाले तो विरले ही होते थे, जिनके पास दूर-दूर से लोग आते थे तार का मज़मून समझने के लिए। – योगेन्द्र जोशी

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इंडियामाता की जय (स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर)

देशवासियों को पंद्रह अगस्त, स्वतंत्रता दिवस, की शुभकामनाएं

 

इस स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्रपति महोदय ने अपने हिन्दी में दिए सम्बोधन में कई बार “न्यू इंडिया” का जिक्र किया। वे “नये भारत” की बात कर सकते थे जो उन्होंने नहीं किया। “भारत(वर्ष)” यहां के बाशिंदों ने अपने देश को दिया हुआ प्राचीन नाम है, जो रामायण-महाभारत काल से प्रचलन में रहा है। किंतु अब इसको भुलाकर विदेशियों द्वारा दिए गये अपेक्षया नये नाम “इंडिया” का प्रयोग देशवासी कर रहे हैं। क्या यह भारत के, नहीं-नहीं इंडिया के, अंग्रेजीकरण की प्रक्रिया का फल है? जब देश का नाम इंडिया हो ही चुका तो “इंडियामाता की जय” क्यों न कहा जाए? इसी को केंद्र में रखकर लिखित एक लघुकथा।

 

पांच वर्षीय रग्घू (राघव) ने इस वर्ष पहली बार विद्यालय में कदम रखा था। उसने कक्षा चार में पढ़ रहे अपने बड़े भाई के साथ विद्यालय आना-जाना शुरू किया था। “के.जी.” स्तर की शिक्षा उसने घर पर ही पाई थी अपने मां से।

उस दिन पंद्रह अगस्त अर्थात्‍ देश का स्वतंत्रता दिवस था। रग्घू के विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस का राष्ट्रीय पर्व पारंपरिक तरीके से मनाया गया। वह विद्यालय में आयोजित कार्यकमों को लेकर उत्साहित था। आयोजन के दौरान उसकी प्रधानाध्यापिका ने ध्वजोत्तोलन के पश्चात्‍ बच्चों को देश की स्वतंत्रता के महत्व और देशवासियों के कर्तब्यों को समझाते हुए संबोधित किया था। संबोधन के अंत में बच्चों से “भारतमाता की जय” का उच्च स्वर में जयघोष करने को कहा गया। रग्घू के लिए आयोजन देखना नितांत नया अनुभव था, यद्यपि वह न तो संबोधन को समझ पा रहा था और न ही उस जयघोष को। अंत में विद्यालय में बंटी मिठाई खाते हुए वह बड़े भाई के साथ घर लौट आया।

घर पहुंचने पर मां ने रग्घू से विद्यालय में बीते उस दिन के अनुभवों के बारे में पूछा। उसने क्या देखा इसका उसने अपनी सीमित भाषाई सामर्थ्य के अनुसार चित्रण कर दिया। फिर मां के समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट की, “अम्मा, स्कूल में हमारी प्रिंसिपल ने हम सभी से जोर से ’भारत माता की जय’ बोलने को कहा। ऐसा क्यों कहा होगा? और इसका मतलब क्या था?”

मां ने उसे देश, उसके नाम और उसकी स्वतंत्रता के मतलब समझाते हुए स्वतंत्रता दिवस के महत्व के बारे में बताया। ऐसे अवसरों पर हम देश का गुणगान करते हैं, उसकी ’जय हो’ कहकर पूजते हैं, वह कभी किसी से न हारे यह कहते हैं, इत्यादि कहते हुए कई तरीके से उस जयघोष के मतलब समझाए। जैसे कोई मां अपने बच्चे को पालती है उसी प्रकार यह देश हम सब को पालती है। खाने-पीने को भोजन, रहने को जगह और घूमने-फिरने की छूट यह सब हमें देश से ही मिलता है। इसीलिए हम इसे माता कहते हैं। हम दुनिया में सब जगह नहीं जा सकते क्योंकि वे हमारे देश के हिस्से नहीं होते हैं। मां ने इस प्रकार से बहुत कुछ उसे बताने का प्रयास किया।

रग्घू गंभीरता से मां की बात सुन रहा था। अभी वह बौद्धिक तौर पर इतना सक्षम नहीं था कि सभी बातों का निहितार्थ समझ सके। फिर भी वह महसूस कर रहा था कि उसका अपना एक देश है जिसे `भारत’ कहते हैं। उसे याद नहीं आ रहा था कि कभी उसने भारत नाम सुना हो। मां से उसने पूछा, “मैं टीवी पर क्रिकेट और दूसरे खेलों के प्रोग्राम देखता हूं। तुम्हारे साथ बैठकर न्यूज भी सुनता हूं। पर भारत कभी सुना हो याद नहीं आ रहा है।”

मां बोलीं, “भारत को इंडिया भी कहते हैं। तुमने टीवी पर कई मौकों पर लोगों के मुख से इंडिया सुना होगा, जैसे ’इंडिया की टीम’, ’इंडिया जीत गई’ आदि। तुम तो अमूल का ‘अमूल दूध पीता है इंडिया’ अक्सर गाते हो; याद है न?”

“हां अम्मा, टीवी पर तो इंडिया कई बार सुना है। खेलकूद के प्रोग्रामों में, न्यूज़ में, और ‘ऐड्ज़’ (विज्ञापनों) में। मेरे समझ में नहीं आ रहा है कि जब देश का नाम इंडिया है तो उसे भारत भी कहने की जरूरत क्या है? और क्यों नहीं ‘इंडियामाता की जय’ कहते हैं?” रग्घू ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की।

इस बार मां को सवालों का ठीक-ठीक जवाब नही सूझ रहा था। – योगेन्द्र जोशी

 

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