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भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक – शिक्षकों के वेतन से वसूली

हाल के नोटबंदी के निर्णय के बाबत केंद्र सरकार ने दावा किथा था कि इससे भ्रष्टाचार रोकना संभव होगा। तब से मैं सोच रहा हूं कि जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के आचरण का अभिन्न अंग बन चुका हो तब उससे कैसे मुक्ति मिल सकती है। अवश्य ही उपयुक्त कानून के तहत भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, बशर्ते कि उसका भ्रष्ट कृत्य पकड़ में आ जाए। लेकिन उससे क्या व्यक्ति भ्रष्ट मानसिकता से मुक्त हो जाता है? अपनी भ्रष्ट लिप्सा की पूर्ति के लिए वह उपयुक्त अवसरों की तलाश जारी रखेगा ही ऐसा मेरा मत है। इस विषय पर मेरा चिंतन-मनन चल ही रहा था कि एक दिन संयोगवश मेरी भेंट एक महिला रिश्तेदार से हो गयी। उन्होंने जो कहा उससे मेरा इतना ज्ञानवर्धन तो हो ही गया कि जब भ्रष्टाचार के एक रूप पर रोक लगती है तो वह दूसरे रूप में अवतरित हो जाता है। समाज में जब तक असीमित लोभ-लालच वाले लोगों की सुलभता बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार को उपजाऊ भूमि की कमी नहीं रहेगी। पेश है महिला रिश्तेदार से वार्तालाप एक लघुकथा के रूप में।   

मैं कार्यवशात् उन महिला के शहर गया था। रिश्तेदार होने के नाते मैं मिलने के लिए उनसे घर पहुंच गया था। मैंने उनसे पूछा, “अब तो बच्चे बड़े हो गये होंगे। अपना समय-यापन कैसे करती हैं?”

उन्होंने कहा, “पिछले तीन-चार साल से मैं एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रही हूं। मैं काम के लिए घर से अधिक दूर जाने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए पास ही के एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली।”

“सरकारी है या निजी आपकी शिक्षण संस्था?” मैंने जानना चाहा।

उनका उत्तर था, “है तो निजी किंतु सरकारी अनुदान मिलता है विद्यालय को।”

“तब तो कई मामलों में सरकारी नियम-कानून लागू होते होंगे और तनख्वाह ठीक-ठाक मिलती होगी।”

“हां, कागजों में तो सब ठीक रहता है लेकिन हकीकत में नहीं।”

“क्या मतलब?” मैंने जिज्ञासा प्रकट की।

“देखिए तनख्वाह तो मुझे लगभग 25000 रुपया मिलती है और वह मेरे बैंक खाते में जमा भी हो जाती है। लेकिन मुझसे करीब आधी वसूल भी ली जाती है। … इस हाथ से दिया और उस हाथ से ले लिया।”

कुछ क्षणों के लिए मैं उनकी ओर जिज्ञासु दृष्टि से देखता रहा; फिर बोला, “मैं आपका कहना ठीक से समझ नहीं पाया। क्या ऐसा आपके ही साथ हो रहा है या …।”

वे बीच में बोल पड़ीं, “न, न; सभी के साथ यही है, क्या शिक्षक-शिक्षिका और क्या चपरासी। दरअसल हमारी प्रधानाध्यापिका के पति ही विद्यालय चलाते हैं और उन्हीं के परिवार के लोग प्रबंधन आदि में शामिल हैं। प्रबंधन कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाता है। इसलिए हम लोगों का वेतन बैंक खातों में पहुंच जाता है। प्रधानाध्यपिका हमसे कहती हैं कि खाते से लगभग आधा वेतन निकालकर उनके हाथ में सौंप दें। उनका कहना होता है कि विद्यालय के विकास-कार्यों के लिए धन जुटाना जरूरी है। यही तरीका उन्होंने अपना रखा है। कितना विकास के लिए है और कितना उनकी जेब के लिए यह बता पाना मुश्किल है।”

“आप लोग शिकायत नहीं करते?” मैंने पूछा।

“किससे शिकायत करें? किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकाल देंगी। हरएक की अपनी-अपनी विवशता है। इसलिए सभी चुप रहते हैं।”

इस विषय पर आगे कुछ पूछना निरर्थक था। मेरे लिए उनके अनुभव की जानकारी काफी थी यह समझने के लिए कि भ्रष्टाचारी तो अपना काम किसी न किसी रास्ते निकाल ही लेगा। जिसका अंतकरण ही उसे न रोके उसे कोई क्या रोकेगा। इसलिए देश में भ्रष्टाचार है और आगे भी बना रहेगा। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों में ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं (2)

बीते ग्रीष्मकाल के दौरान करीब डेड़ माह के लिए मैं कनाडा के लंदन शहर में था, अपने बहू-बेटे के पास। यह शहर अंग्रेजों के द्वारा कनाडा के पूर्वी इलाके में बसाया गया था, जब कनाडा उनका उपनिवेश हुआ करता था। शहर का नाम ब्रितानी महानगर लंडन (लंदन?) के नाम पर ही रखा गया और उस नदी का नाम भी टेम्स रखा गया जिसके किनारे यह शहर बसा है। टेम्स इंग्लैंड के लंडन में बहने वाली नदी का नाम है।

कनाडा उन विकसित देशों में से एक हैं जहां लगभग हर परिवार के पास कार रहती है। किसी-किसी परिवार में अधिक कारें भी हो सकती हैं जो उसकी हैसियत एवं आवश्यकता पर निर्भर करता है। मैंने तो सड़कों पर मरम्मत करने या साफ-सफाई करने वालों (श्रमिकों) को देखा है, जो अपनी कार अथवा उसके तुल्य बहु-उद्येशीय चौपहिया वाहन से आते हैं और उनको निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने के बाद अपने काम में जुट जाते हैं। अवश्य ही वहां यातायत की नागरिक सुविधाओं, जैसे नगरीय बस-प्रणाली, की व्यवस्था है और जरूरत के हिसाब से टैक्सी-सेवाएं भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन स्वयं की कार से आवागमन की तुलना में ये महंगी पड़ती हैं। इसलिए अपने पास कार हो तो किफ़ायत तथा सुविधा दोनों ही होती हैं।

अभी मेरे बहू-बेटे के पास कार नहीं है। दरअसल उन दोनों को कार चलानी आती भी नहीं है, यद्यपि वे वहां 4-5 साल से रह रहे हैं। आरंभ में वे जब वहां पढ़ रहे थे तो उन्हें कार की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। किंतु बाद में नौकरी-पेशे में आने के बाद बेटे ने प्रशिक्षकों से कार चलाना सीखा और उनकी देखरेख में कई-कई घंटे उसे चलाने का अभ्यास भी किया। प्रशिक्षक की फ़ीस एवं कार का किराया उसे महंगा पड़ता था। अपनी कार होती तो उसे प्रशिक्षण कुछ सस्ता पड़ता। अभी तक वह 50-60 हजार रुपये के तुल्य (डालर) धनराशि या उससे भी अधिक खर्च कर चुका होगा। उसने बताया कि वह तब तक कार नहीं खरीद सकता जब तक उसके पास वाहन-चालन का लाइसेंस न हो। उसकी जानकारी में यह वहां का नियम है। इस नियम के कुछ अपवाद अवश्य होंगे।

पिछली गरमियों में जब मैं उसके पास था तो उसने ड्राइविंग लाइसेंस (वाहन-चालन अनुज्ञापत्र/अनुमतिपत्र) पाने के लिए तत्संबंधित परीक्षा दी। जैसा कि सभी विकसित देशों की व्यवस्था है परीक्षा दो चरणों में होती है। पहले चरण में लिखित परीक्षा “ऑन-लाइन” संपन्न होती है, जिसमें वाहन-चालन से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देना होता है। यह चरण अपेक्षया सरल होता है। दूसरे चरण में परीक्षार्थी को वाहन चलाकर दिखाना होता है। करीब एक घंटे की इस परीक्षा में शहर की सड़कों, चौराहों, पार्किंग स्थलों आदि से होते हुए वाहन चलाने की योग्यता की जांच होती है। परीक्षार्थी को वाहन निर्दिष्ट स्थल पर खड़ा करने, उसे पीछे चलाकर निकालने, चौराहे पर “ट्रैफ़िक लाइट” के अनुसार रुकने, आदि का कार्य बिना गलती के संपन्न करना होता है।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि इन विकसित देशों में सड़कें “लेनों” में विभक्त रहती हैं और चालक को निर्धारित लेन के भीतर बने रहना होता है। लेन बदलने के लिए पीछे के वाहनों को पर्याप्त समय पहले “इंडिकेटर लाइट” से संकेत देना होता है। सड़्कों पर सफ़ेद, पीली, लाल लाइनें खिंची रहती हैं, कहीं ठोस (solid,  ————), तो कहीं खंडित (broken या  dashed,  —  —  —) और कहीं अन्य प्रकार की। इन सबके सुनिश्चित प्रयोजन होते हैं जिसकी जानकारी परीक्षार्थी को होना आवश्यक है, और उसे इन बातों को ध्यान में रखते हुए वाहन चलाना या रोकना होता है। वस्तुतः यातायात के सुस्पष्ट एवं कठोर नियम होते हैं, जिनके उल्लंघन पर परीक्षार्थी को लाइसेंस नहीं मिल सकता है। उन नियमों का यहां पर विवरण देना न संभव है और न वैसा करना मेरा उद्येश्य है।

वापस अपने बेटे की परीक्षा की बात पर। वाहन-चालन की परीक्षा का परिणाम उसके परीक्षक ने तत्काल सौंप दी। उसकी कमियों का उल्लेख करते हुए उसे अनुत्तीर्ण (फ़ेल) घोषित कर दिया। वह घर निराश होकर लौटा। पूछने पर उसने कहा, “परीक्षा में दो प्रकार के दोष देखे जाते हैं। पहले वे दोष जो गंभीर श्रेणी में गिने जाते हैं और उनके आधार पर परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थी को लाइसेंस के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दूसरे वे दोष या गलतियां जो स्वयं में गंभीर नहीं मानी जाती हैं लेकिन जिनसे बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी गलतियों के लिए 5-5, 10-10 के नकारात्मक (निगेटिव) अंक नियत होते हैं।”

बेटे ने मुझसे आगे कहा, “उसके परीक्षक ने उसे नकारात्मक 40 (यानी -40) अंक दिये। अगर नकारात्मक 30 अंक या उससे कम होते तो गलतियों को अजरअंदाज करते हुए मुझे लाइसेंस के लिए योग्य मान लिया जाता। चूंकि 40 (30 से अधिक) नकारात्मक अंक मिले इसलिए मैं अनुत्तीर्ण मान लिया गया।”

मैंने उससे पूछा,“किस प्रकार की चूक हुई थीं तुमसे?”

उसने परीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट दिखाई जिसमें कहां-कैसी गलती उसने की थी इसका क्रमबद्ध संक्षिप्त विवरण था। उसने एक उदाहरण से बात स्पष्ट की, “मुझे एक जगह कार पार्क करने के लिए कहा गया। मेरी कार का अगला हिस्सा पार्किंग के लिए खिंची गई सीमारेखा से 3-4 इंच आगे बढ़ गयी। यह होना नहीं चाहिए था। समझ लिजिए ऐसी ही 3-4 गलतियां हुई थीं।”

इस वाकये पर मुझे उस महिला का स्मरण हो आया जिससे मेरी पत्नी का परिचय हमारे इंग्लैंड प्रवास (1983-85) के दौरान हुआ था। वह विवाह के बाद अपने ब्रितानी नागरिकता वाले पति के पास पंजाब से आ गयी थीं। मेरी पत्नी की उनके साथ किंचित्‍ निकटता हो गयी थी। उस काल में उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस के तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिल सकी थी। हमारे भारत वापसी के बाद एक दिन उनका पत्र मिला कि चौथे प्रयास में उनको लाइसेंस मिल गया। वे बहुत खुश थीं।

कनाडा के उसी लंडन शहर में हमारा एक पूर्व-परिचित युवक भी अपने परिवार के साथ रहता है। उससे मेरे बेटे के पारिवारिक संबंध हैं। बेटे ने हमें यह बताया कि उसकी पत्नी भी लाइसेंस पाने में अपने पहले प्रयास में सफल नहीं हो पाई हैं।

जाहिर है कि कनाडा में (उसी प्रकार अन्य विकसित देशों में) ड्राइविंग लाइसेंस पाना आसान नहीं होता है। अपने देश में ड्राइविंग-लाइसेंस प्रदान करने के कोई सुस्थापित कायदे-कानून हैं कि नहीं मुझे नहीं मालूम। अगर होंगे तो केवल कागजों में होंगे क्योंकि व्यवहार में मुझे वे कभी दिखे नहीं।

मैंने स्कूटर-चालन का लाइसेंस अपने शहर वाराणसी में सन् 1981 में लिया था। तब वाहन-चालन संबंधी मेरा कोई परीक्षण नहीं हुआ था। दो-तीन सवाल पूछे गये और वहीं बैठे एक डाक्टर ने आंख-कान एवं शारीरिक रोगों के बारे में कुछ सवाल किए जिनका समुचित उत्तर मैंने दे दिए। उसने भी “ओके” कर दिया और दूसरे दिन मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद 2-3 बार नवीनीकरण कराया; वह भी बिना अधिक सवाल-जवाब के हो गया। अब तो मैंने स्कूटर चलाना ही छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जैसे उम्रदराज लोगों के लिए यहां की यातायात व्यवस्था में स्कूटर चलाना जोखिम का काम है।

मेरी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके मामले में वाहन-चालन का परीक्षण “ढंग-से” हुआ हो। जब मैंने लाइसेंस लिया था तब मुझे लगा था कि लाइसेंस तो लूले-लंगड़े, अंधे-बहरे भी ले सकते हैं। परिवहन कार्यालयों में ऐसे दलाल आपको मिल जायेंगे जो लाइसेंस का “प्रबंध” करने का धंधा करते हैं। घर बैठे आप लाइसेंस पा सकते हैं। सच पूछिये तो लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफ़िक हुआ करता था। “पैसा खर्च करो और लाइसेंस पाओ।” आज स्थिति कितनी बदली है मैं बता नहीं सकता। सुना है कि अब बहुत कुछ कंप्यूटरीकृत हो चुका है। और आवेदनकर्ता के हाथ की अंगुलियों की छाप ली जाती है। किंतु सही तरीके से वाहन-चालन की योग्यता का परीक्षण होता है या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है। मुझे आशंका है कि अभी भी लाइसेंस पैसे के लेनदेन से मिलता होगा बिना परीक्षण के।

विकसित देशों में नागरिकों के सुरक्षा सर्वोपरि होती है, इसलिए वे व्यवस्था की उस खामी को बर्दास्त नहीं करते जो सुरक्षा के लिए खतरा हो। सुरक्षा की इस भावना से संबंधित एक वाकये का जिक्र मैंने पहले की एक ब्लॉग-पोस्ट  में भी किया है।

हम भारतीय विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं, परंतु अपने तौर-तरीकों को बदलना नहीं चाहते हैं। याद रहे कि सफल लोकतंत्र में वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग से पहले जिम्मेदारी की भावना की जरूरत होती है, जो अपने देशवासियों में बहुत कम है। – योगेन्द्र जोशी

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नमस्ते से “गुड मॉर्निंग” तक की यात्रा

मुझे मौजूदा मोहल्ले में रहते हुए करीब 30 साल बीत चुके हैं। शुरुआती दो वर्षों के बाद से अपने निजी मकान में रह रहा हूं। मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। मैंने इन भाइयों के माता-पिता को देखा है। मैं उनकी पीढ़ी को पहली पीढ़ी संबोधित कर रहा हूं और तदनुसार उक्त भाइयों को दूसरी पीढ़ी के कहूंगा। अब वे माता-पिता इस संसार में नहीं रहे। सुना है कि इस मोहल्ले की भूमि कभी इनकी एवं इनके पट्टीदारों की हुआ करती थी। कालोनाइज़र को जमीन बेचने पर मिले पैसे का समुचित उपयोग ये लोग शायद नहीं कर पाये होंगे। इसलिए इनकी माली हालत सामान्य या उससे बदतर रही है ऐसा मेरा सोचना है। ये पांचों भाई मोहल्ले के पास ही लगने वाली फल-सब्जी-सट्टी में थोक अथवा फुटकर कारोबार करके परिवार का पालन-पोषण करते आये हैं।

अब दूसरी पीढ़ी के इन भाइयों की उम्र साठ के आसपास उसके कुछ ऊपर-नीचे होनी चाहिए ऐसा मेरा अनुमान है। इनमें से कोई साक्षर भी है कि नहीं मुझे ठीक से नहीं मालूम; मैंने कभी पूछा नहीं। कोई साक्षर होगा भी तो उसे मात्र अक्षरज्ञान से कुछ और अधिक ज्ञान नहीं होगा। आम तौर पर वे वाराणसी में प्रचलित भोजपुरी बोलते हैं, किंतु मेरे साथ सामान्य हिन्दी में ही बात करते हैं।

इसके आगे यह भी बता देता हूं कि इनमें से सभी की संतानें संख्या में 4 से 7 के बीच हैं। इस तीसरी पीढ़ी की प्रायः सभी संतानें राज्य-सरकारी/परिषदीय स्कूलों में पढ़ने अवश्य जाया करते थे,  किंतु कोई भी +2 स्तर पार नहीं कर सका। मेरा अनुमान है कि शायद कोई भी हाई-स्कूल उत्तीर्ण नहीं है। फिर भी वे (युवक न कि युवतियां) अच्छा कारोबार कर ले रही है। कइयों ने तो सब्जियों-फलों का पुस्तैनी धंधा छोड़कर नये धंधे भी अपना लिए हैं। अब माहौल काफी बदल चुका है। किसी के भी अधिकतम तीन बच्चे हैं। इस चौथी पीढ़ी के कुछ बच्चे निजी अंग्रेजी विद्यालयों में भी पढ़ रहे हैं।

उक्त विवरण देने के पीछे मेरा मकसद एक दृष्टांत प्रस्तुत करना है कि हमारे देशवासियों के दिलोदिमाग पर आधुनिकता और अंग्रेजी किस प्रकार राज कर रही है । उपर्युक्त खानदान की चार पीढ़ियों – परदादा-परदादी से लेकर आज के नये बच्चों की पीढ़ियों को मैं पिछले करीब तीस साल से देख रहा हूं। चौथी पीढ़ी आते-आते इन लोगों में स्पष्टतः दिखाई देने वाला सांस्कृतिक/भाषायी परिवर्तन मैंने अनुभव किया है। दूसरी पीढ़ी के सबसे बढ़े भाई की सबसे बढ़ी बहू आज भी पारंपरिक लिबास यानी सीधे पल्लू की साड़ी पहने हुए रहती है। लेकिन इन परिवारों की बाद में आईं बहुएं उल्टे पल्लू की साड़ियों में दिखाई देती हैं। दिलचस्प है कि वे हल्का-सा घूंघट अभी नहीं छोड़ पाईं हैं। सुनता हूं कि उनमें से कुछ हाईस्कूल पास भी हैं।

इन पांच भाइयों के बच्चे जब छोटे थे तब वे अपने-अपने माता-पिता को “माई-बाबू” या इसी प्रकार के संबोधन से पुकारते थे। परंतु बड़े हो जाने और अपने-अपने कामधंधों के दौरान समाज के अन्य वर्गों के संपर्क में आने के बाद उनमें से कुछ ने “मम्मी-पापा” का प्रयोग आरंभ कर दिया । अपने देश में अब गैर-रिश्तेदार या अजनबी आदमी को “अंकल” शब्द से पुकारना प्रायः पूरी तरह प्रचलन में आ चुका है, जिसमें संबोधित व्यक्ति की उम्र वक्ता से पर्याप्त अधिक होती है। अंकल संबोधन माता-पिता की उम्र वाले के लिए और  दादा-दादी की उम्र वाले के लिए भी प्रयुक्त होने लगा है।

तीसरी पीढ़ी के उक्त बच्चे मुझे आरंभ से ही अंकल कहते आये हैं। पहले उनका अभिवादन “नमस्ते” हुआ करता था, किंतु अब उनमें से दो-तीन ऐसे हैं जो “गुड मॉर्निंग” पर उतर आये हैं। मेरा प्रत्युत्तर उसी पुरानी शैली में “नमस्ते” रहता है। दुआ-सलाम की बात प्रायः प्रातः काल ही होती है। मैंने इस पर गौर नहीं किया कि वे दोपहर या संध्या पश्चात्‍ भी “गुड मॉर्निंग” ही कहते हैं या कुछ और। उनमें से एक टैक्सी चलाता है, उसे अवश्य अधिक जानकारी होगी।

चौथी पीढ़ी के जो बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं वे अंग्रेजी को लेकर कुछ अधिक ही उत्साहित हैं। वे किसी स्तरीय विद्यालय में नहीं पढ़ते, बल्कि उन्हीं विद्यालयों में से एक में पढ़ते हैं जो आजकल हर गली-कूचे-नुक्कड़ पर अंग्रेजी-माध्यम के नाम पर खुलते देखे जा सकते हैं। वे बच्चे हिन्दी की गिनतियां शायद ठीक-से नहीं जानते हैं। विद्यालय अंग्रेजी पर ही जोर डालते हैं, क्योंकि अंग्रेजी ही सुन्दर भविष्य की कुंजी है यह सभी का मानना है। उनमें से कुछ ने मेरे लिए “गुड मॉर्निंग” का अभिवादन अपना लिया है। बच्चों के जन्मदिन पर केक भी कटने लगे होंगे और “हैप्पी बर्थडे टु यू” का गायन भी होने लगा होगा। मोहल्ले की गली में उन बच्चों को इस गीत को गाते-गुनगुनाते हुए भी मैंने एक-दो बार देखा है।

तो यह है पहली पीढ़ी की निपट निरक्षरता से चौथी पीढ़ी की अंग्रेजी शिक्षा तक पहुंचने की यात्रा का विवरण। और साथ में संबोधन, अभिवादन, एवं पहनावे में आये परिवर्तन की कहानी। -योगेन्द्र जोशी

 

 

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नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि – विकसित देशों से कितना पीछे हैं हम (1)

अपना देश विकसित बनने की आकांक्षा लेकर चल रहा है। किन्तु इस बात को समझने की कोशिश देशवासी, विशेषतः देश के कर्णधार राजनेता, नहीं करते हैं कि विकसित देशों के नागरिक नियमों का पालन करते हैं। यह कहना अतिरंजित नहीं होगा कि नागरिक नियमों का पालन उनकी जीवन-पद्धति का हिस्सा बन चुका है। हो सकता है चार-पांच पीढ़ियों पहले उनकी स्थिति बहुत संतोषप्रद न रही हो, किंतु जब हर आने वाली पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी को बहुधा नियमों से बंधे देखती होगी तो वह स्वयं उसके अनुसार ढलती गयी होगी। मनुष्य को अपनी बाल्यावस्था में अपने परिवेश में जो देखने तथा अनुभव करने को मिलता है उसी के अनुसर उसकी सोच बनती है। मैंने अनुभव किया है कि विकसित देशों के नागरिक स्वयं अपने एवं उन लोगों, जिनके बीच वे रहते हैं, के हितों के प्रति काफी हद तक सचेत रहते हैं। मेरा काम कैसे बने केवल यह सोचकर चलना शायद उनकी सोच में नहीं रहता। ऐसा नहीं कि वहां कायदे-कानूनों का उल्लंघन कोई भी नहीं करता, किंतु वैसे लोग कमोबेश अपवाद के तौर पर पाये जाते हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि विकसित देशों में कायदे-कानूनों को तोड़ने वाले को बचाने के लिए नेता-वेता और आम आदमियों की भीड़ जमा नहीं होती है जैसा कि हमारे देश में अक्सर होता है।

मुझे विकसित देश का अनुभव कोई 30 वर्ष पहले तब हुआ था जब मैं उच्चाध्ययन एवं शोधकार्य के लिए विलायत गया हुआ था। तब अपने देश एवं उस देश की व्यवस्थाओं का अंतर मुझे साक्षात्‍ देखने का अवसर मिला था। किंतु अपने निर्धारित उद्येश्य की पूर्ति करने की व्यस्तता में मैंने उस समय वहां की नागरिक व्यवस्था की बारिकियों पर कोई चिंतन-मनन नहीं किया था। परंतु बीते ग्रीष्मकाल में एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ भारतीय पर्यटक की हैसियत से कनाडा में अपने बेटे-बहू के पास सात-आठ सप्ताह के प्रवास का जब मुझे अवसर मिला तो वहां की नागरिक व्यवस्था को समझने की कोशिश भी मैंने की थी।

सभी विकसित देशों में एक बात सामान्यतः देखने को मिलती है और वह है नागरिक सुरक्षा। ये बात मैंने कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन तथा इटली में अनुभव की है, और अन्य देशों के बारे में तत्संबंधित जानकारी परोक्षतः प्राप्त की है। नागरिक सुरक्षा से मतलब है किसी व्यक्ति के जानमाल की सुरक्षा, और उसमें भी ‘जान’ की सुरक्षा पहले फिर ‘माल’ की। जो लोग ऐसे कार्यों में लगे हों जिनमें जान खोने का जोखिम हो उनके लिए भी सुरक्षा के यथासंभव प्रयास किए जाते हैं।

सुरक्षा की उक्त नीति के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को जानबूझकर अपनी अथवा किसी अन्य व्यक्ति की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की छूट नहीं मिलती है। इस हेतु कड़े नियम हैं और आम तौर पर सभी नागरिक उन नियमों से वाकिफ रहते हैं और उनका सम्मान करते हैं। मैं समझता हूं ऐसा वे स्वेच्छया करते हैं। अवश्य ही कुछ इस भय से भी करते होंगे कि नियमों का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर दंडित होना पड़ेगा। विकसित देशों में नेताओं एवं उच्चाधिकारियों के परिजनों को भी नहीं बख़्शा जाता है।

अपने देश में ये सब कल्पना से परे है। सुरक्षा भगवान भरोसे रहती है और जब भी दुर्घटना होती है तो उससे कोई सीख नहीं ली जाती है; न आम नागरिक सीख लेता है और न ही शासकीय तंत्र।

अब मैं कनाडा के अपने प्रवास के दौरान अनुभव में आयी एक घटना का जिक्र करता हूं। मेरे बेटे-बहू एक 11-मंजिली इमारत की 10वीं मजिल में स्थित अपार्ट्मेंट में रहते हैं। इमारत में कुल करीब 100 अपार्ट्मेंट हैं। एक दिन रसोई के बिजली के “हॉट-प्लेट” (चूल्हा) पर रोटी सेंकने अथवा पापड़ भूनने में कुछ धुंआ उठने लगा। यों तो धुंआ कुछ हद तक चूल्हे के ऊपर लगे पंखे-चिमनी के माध्यम से बाहर निकल जाता है, किंतु अधिक मात्रा होने पर उसका कुछ हिस्सा कमरों में फैल जाता है। उस समय धुंए की मात्रा कुछ अधिक हो गयी थी। फलतः रसोई से सटे कमरे में “स्मोक-सेंसर” का अलार्म (चेतावनी ध्वनि) बज गया। घबराहट में चूल्हे एवं रोटी/पापड़ का काम बंद करके हम लोगों ने स्नानगृह का “एग्जास्ट फैन” चलाते हुए सभी दरवाजे-खिड़कियां खोल दीं ताकि धुंआ निकल जाये। उस समय बेटे को छोड़कर हम तीन – बहू, मेरी पत्नी और मैं – घर में थे।

बाद में जब बेटा घर आया तो उसको हमने घटना के बारे में बताया। तब उसने घर में लगे “अलार्म बटन” के बारे में बताया कि उसे दबाने पर अलार्म बंद हो जाता है। लेकिन “स्मोक-सेंसर” अपना कार्य करता रहता है। बहू को भी उस “बटन” की जानकारी नहीं थी। बेटे ने यह भी बताया कि यदि धुंए की स्थिति नहीं बदली तो पच्चीस-तीस सेंकंड बाद फिर अलार्म बजता है। लेकिन इस बार वह पूरी इमारत में तथा हर अपार्टमेंट में बजता है और परिसर के कार्यालय में भी बज उठता है। उसकी सूचना अग्निशमन-दल को भी तुरंत पहुंच जाती है।

बेटे ने यह भी बताया कि अपार्टमेंट के नियमानुसार उस “सामुदायिक” चेतावनी (अलार्म) के बाद हर व्यक्ति का दायित्व होता है वह तुरंत अपने कमरे/अपार्टमेंट से बाहर खुले में निकल आवे। यदि संयोग से बड़ी दुर्घटना न घटी और यह पाया जाये कि अमुक व्यक्ति अपार्टमेंट में ही रह गया था। तो उसे 500 कनाडाई डॉलर का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

“आपने अपना जीवन जोखिम में डालने का अपराध क्यों किया?” यह सवाल वहां पूछा जाता है। वस्तुतः यह वैसा ही अपराध है जैसा कि आत्महत्या करना। क्या अपने देश में ऐसा सोचा जा सकता है? यहां तो दुर्घटनाओं के पीछे जिसका हाथ हो उसे तक सजा नहीं मिलती! मामला अक्सर कोर्ट में चला जाता है और फिर वर्षों तक मामला चलता रहता है। तब तक बहुत कुछ बदल चुकता है और शायद ही कोई दंडित होता है! – योगेन्द्र जोशी

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आदमी जीता चला जाता है, आखिर क्यों ? – एक प्रश्न

मैं अपने घर से निकल कर सामने के मुख्य मार्ग पर प्रातःकाल सजने वाली सब्जी-विक्रताओं की दुकानों की ओर चल पड़ता हूं । ये दुकानें घर से बहुत दूर नहीं हैं, फिर भी मैं साग-सब्जी प्रतिदिन नहीं खरीदता, बल्कि एक बार में 2-3 दिनों के लिए खरीद लेता हूं ।

रास्ते में मुझे एक मिनीट्रक खड़ी दिखती है जिसका पिछला हिस्सा मेरे सामने है । उसका पिछला दाहिना चक्का सड़क के पक्के हिस्से में है तो दूसरा किनारे की कच्ची जमीन पर । किंचित दूर से मुझे उसके एक कोने पर एक वृद्ध महोदय खड़े दिखते हैं । आगे बढ़ते हुए मैं उनके निकट पहुंचता हूं और देखता हूं कि वे थोड़ा झुकते हुए जमीन पर पड़ी अपने सहारे की छड़ी उठाने का असफल प्रयास कर रहे हैं । उनके कपड़ों को देख मुझे नहीं लगता कि वे किसी खाते-पीते परिवार से होंगे । वे शायद वृद्धावस्था के चलते अशक्त हो चुके होंगे, अथवा यह भी संभव है कि वे शारीरिक अस्वस्थता के शिकार हों । मुझे लगता है कि उन्होंने छड़ी को ट्रक के सहारे खड़ा किया होगा, लेकिन वह सरककर जमीन पर गिर पड़ी होगी । अस्तु, मैं छड़ी उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं और आगे बढ़ जाता हूं ।

ट्रक के आगे पहुंचने पर मुझे लगता है कि उनका कोई और सामान भी शायद जमीन में पड़ा है । मैं मुड़कर देखता हूं कि सड़क पर उनके पैरों के निकट धूसर-सलेटी रंग का थैला पड़ा है जिसे वे उठाने का यत्न कर रहे हैं । मैं लौटकर उनके पास आता हूं और जमीन से थैला उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं । वे उसे कंधे पर लेने की कोशिश करते हैं । मैं उनकी मदद करता हूं किंतु थैला कंधे पर टिकता नही और हाथ पर कलाई तक सरक जाता है । मैं दो-एक बार प्रयास करता हूं परंतु सफलता नहीं मिलती है । अंत में झोले को कलाई के सहारे लटकाते हुए उसके उपरी हिस्से को मुट्ठी में पकड़े रहने की सलाह देता हूं । वे मुश्किल-से सुनाई दे सकने वाली धीमी आवाज में मुझे धन्यवाद देते हैं । और मैं आगे बढ़ जाता हूं ।

आगे बढ़ते हुए और वांछित सामग्री खरीदने के बाद लौटते हुए मैं एक वैचारिक द्वंद्व से घिर जाता हूं । मन में एक प्रश्न उठता है, ऐसा प्रश्न जो पहले भी कई बार मेरे मन में उठ चुका है । मैं हर बार उसका उत्तर खोजने की चेष्टा करता हूं, कभी खुद चिंतन-मनन की प्रक्रिया अपनाकर तो कभी चित-परिचितों से साथ विचार-मंथन करके । मेरा प्रश्न अपने स्थान पर आज भी यथावत है । प्रश्न है कि मनुष्य क्यों जीता चला जाता है ? क्यों कभी यह नहीं सोचता कि काफी हो चुका है, अब मुझे इस धरती को अपने संसाधनों के साथ दूसरों के लिए छोड़ देना है । मृत्यु को हम भयावह, घृणास्पद, सर्वथा त्याज्य इत्यादि नकारात्मक विशेषणों से क्यों जोड़ते हैं ? मैं उन लोगों के मामलों से परिचित हूं जो हताश-निराश हो चुकते हैं, जिन्हें यह लगने लगता है कि उनकी मनोकामनाएं पूरा नहीं हो सकती हैं, और उस स्थिति से फलीभूत जीवन की कटुता का सामना करने का साहस खो बैठते हैं और अपनी इहलीला समाप्त कर देते हैं । जीवन के प्रति उनका मोह समाप्त नहीं होता है अपितु वे वस्तुस्थिति झेलने की सामर्थ्य खो बैठते हैं । मैं दूसरी श्रेणी के उन लोगों की बात करना चाहता हूं जिनके सामने ऐसी समस्या न हो, फिर भी जो सोचते हों कि जीवन के प्रति कभी न समाप्य मोह क्यों हो ? हम कभी हंसते हुए लेकिन पूर्ण गंभीरता के साथ अपने निकटस्थों ये यह क्यों नहीं कह पाते हैं, “क्यों भई कब तक हमसे जीते रहने को कहोगे ? इतना कम है क्या ? बताओ, एक दिन हमने यह इच्छा नहीं व्यक्त करनी चाहिए कि अब चलना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कि कोई मुलाकाती कहे अब चलना चाहिए, काफी देर हो चुकी है ।”

मैं उपर्युल्लिखित शरीरतः अशक्त सज्जन के बारे में कह नहीं सकता कि उनकी पारिवारिक स्थिति कैसी है, आर्थिक दशा के क्या हाल हैं, जीवन को लेकर उनके मन में कोई विचार उठते भी हैं या नहीं, अगर मन में विचार आते हैं तो वे क्या रहते हैं, इत्यादि । परंतु मैं जब उन लोगों को देखता हूं जिनके जीवन में न कुछ करने को रह जाता है और न कुछ भोगने को तब सोचता हूं कि क्या अब भी जिजीविषा बनी रहनी चाहिए । जब जीवन अपनी अर्थवत्ता खो चुका हो तो उस व्यक्ति को मृत्यु के साक्षात्कार की इच्छा नहीं हो जानी चाहिए ? उससे जुड़े सुहृदों को भी मुक्ति की कामना नहीं करनी चाहिए क्या ? इस प्रकार के तमाम प्रश्न मन में आज तक अनुत्तरित रहे हैं और कदाचित आगे भी अनुत्तरित रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

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जहां चाह वहां राह : वे अंत में वाइस-चांसलर बन ही गये!

अपने देश में उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों का नियुक्तियां अभी तक ‘कॉलेजियम’ नाम की चयन समिति की संस्तुति के आधार पर होती आ रही थीं । इस समिति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उनके चार वरिष्टतम सहयोगी भाग लेते थे । पिछले कुछ समय से यह बहस छिड़ी हुई थी कि इस पद्धति में सही चयन अक्सर नहीं होते हैं और अपेक्षया बेहतर योग्यता वाले व्यक्तियों के छूट जाने की संभावना अधिक रहती है । मौजूदा शासन इस पद्धति को समाप्त करके उसके बदले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (नैशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमिशन) का गठन करने जा रही है, जिसमें शासन की ओर से भी कुछ सदस्य होंगे ।

कॉलेजियम पद्धति के विरुद्ध ये तर्क दिया जा रहा था कि इसमें समिति के सदस्य अपने मित्रों-परिचितों-संबंधियों के प्रति झुकाव रखते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपना लेते हों इस बात की संभावना रहती है । मैं इस पद्धति का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन यह विश्वास भी नहीं कर पाता कि नये आयोग के साथ ऐसी संभावना नहीं हो सकती । मैंने अपने अध्यापन-काल में यह अनुभव किया है कि विश्वविद्यालय जैसी संस्था में जहां चयन-प्रक्रिया प्रमुखतया साक्षात्कार पर आधारित रहती है ईमानदारी से कार्य होता हो ऐसा सामान्यतः नहीं होता । इन समितियों में प्रायः पांच या अधिक सदस्य रहते हैं, जिसके सदस्यगण आम तौर पर अभ्यर्थियों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जानते हैं अथवा उनकी सिफारिशें लिए रहते हैं । उनकी पूरी कोशिश रहती है कि जिनके प्रति वे झुकाव रखते हैं उनका चयन हो ।

वाइस-चासंलरों, जिन्हें कुछ संस्थाओं में कुलपति कहा जाता है तो अन्यत्र उपकुलपति, की नियुक्ति तो अधिक निष्ठा से होनी चाहिए, किंतु उसमें भी ‘अपनों’ को उपकृत करने की परंपरा रही है । इस अहम पद के लिए कदाचित सभी जगह केन्द्र अथवा राज्य सरकार प्रायः तीन सदस्यों की एक ‘खोज समिति’ (सर्च कमेटी) का गठन करती है, जिसके द्वारा संस्तुति-प्राप्त प्रत्याशियों में से किसी एक की नियुक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल (जो भी इस कार्य के लिए अधिकार-संपन्न हो) द्वारा की जाती है ।  मेरा उद्येश्य इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करना नहीं है । कॉलेजियम के गुणदोषों पर टीवी बहसों को देखते और तत्संबंधित लेखों को पढ़ते समय मुझे एक घटना याद आती रही कि किस प्रकार मेरे एक परिचित ने वाइस-चांसलर (वीसी) पद के लिए जी-जोड़ प्रयास किया और सफल भी हुए । उनकी नियुक्ति में संबंधित जनों ने पर्याप्त ईमानदारी बरती होगी ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जिस समाज में भ्रष्ट आचरण का मतलब केवल अवैध तरीके से धन कमाना लिया जाता हो, लेकिन जाति-धर्म आदि के आधार पर किसी के पक्ष में निर्णय लेना सामान्य परंपरा बन चुकी हो, परिचितों-मित्रों के भाई-भतीजों को अहमियत दी जाती हो, व्यक्ति के विवेकाधीन का अर्थ उसकी मनमर्जी माना जाता हो, सिफारिशें करना/मानना आम चलन में हो, उस समाज में कोई भी पद्धति अपनाई जाये सही कार्य होगा इस पर कम से कम मैं भरोसा नहीं कर पाता ।

अस्तु, मैं उन सज्जन के वीसी बनने की कहानी पर लौटता हूं । संबंधित व्यक्तियों/स्थानों को संदर्भ हेतु मैं काल्पनिक नामों से संबोधित कर रहा हूं । कोई दस-बारह वर्ष पुरानी घटना होगी जब मैं अपने दो सहशिक्षकों के साथ सांध्यकालीन चाय पीने हेतु विश्वविद्यालय (वि.वि.) परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर जा रहा था । मंदिर से किंचित दूरी पर ही उन सज्जन से भेंट हो गई जो रास्ते के दूसरी ओर से आ रहे थे । शिष्टाचार के नाते हम कुछ देर के लिए रुक गये और उनसे सामान्य बातचीत करने लगे । लगे हाथ हम में से किसी ने उन्हें छेड़ दिया, “अरे भई सक्सेना साहब, हमने सुना है कि आप जल्दी ही कौशाम्बी वि.वि. के वीसी बनने वाले हैं । कब जा रहे हैं अपने नये दायित्व पर ?”

“अरे यार क्या बताएं सब गड़बड़ हो गया । सब कुछ लगभग तय हो चुका था । चयन समिति में अपने भी परिचित थे, अतः अपना नाम तो आगे बढ़ा ही था । मैं पिछले कुछ समय से गर्वनर महोदय के पीए से भी मिलता आ रहा था । हाल ही में उन्होंने बताया भी था कि आप अपनी नियुक्ति हुई ही समझो, बस फाइनल सिग्नेचर होने की देरी है । मैं तो पूरी तरह आश्वस्त था, लेकिन क्या बताएं ! …” फिर मेरे सहयोगी की ओर मुखातिब होकर कहने लगे, “अरे, आपके वे प्रोफेसर शर्मा हैं न,  … आप तो उन्हें जानते ही हैं । पता नहीं वे कहां से टपक पड़े । बस, हमारा पत्ता काट दिया उन्होंने । धोखा खा गए ।”

हम लोगों ने चुटकी ली, “ये सब तो चलता रहता है । अभी खेल खत्म थोड़े ही हो गया है । कोशिशें जारी रखेंगे तो फिर मौका मिलेगा । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं ।”

इतना कहते हुए हमने उनसे विदाई ली और चल दिए मंदिर की ओर चाय पीने । अपनी मंजिल तो मंदिर के पास का टी-स्टाल था न कि प्रदेश का राजभवन ।

सक्सेना साहब के प्रयास चलते रहे और एक दिन खबर मिली कि वे राज्य के किसी अन्य वि.वि. के वीसी नियुक्त हो गये हैं । उनकी पहुंच ने अंततः उन्हें मंजिल तक पहुचा ही दिया । यह कोर्ई माने नहीं रखता कि बाद में उन पर लगे आरोपों की चर्चा भी प्रादेशिक अखबारों में छपी थीं । अहम बात तो यह है कि पूर्व-कुलपति रह चुकने का तमगा तो उन्हें मिल ही गया । ऐसे तमगों का भी अपना आनन्द होता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

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प्लास्टिक थैलियां इस्तेमाल न करने की बात और पहले आप पहले आप की चिरस्थायी नीति!

चंद रोज पहले की ही बात है । मैं अपने किराने-परचून की दुकान पर गया था घरेलू इस्तेमाल की दो-चार चीजें खरीदने के लिए । मैं अपने साथ सदा ही कपड़े का थैला ले जाया करता हूं उसमें सामान भरकर लाने के लिए । मेरा दुकानदार जानता है कि मैं पतले प्लास्टिक के थैलों के इस्तेमाल का धुर विरोधी हूं । जब कभी उसका सहायक प्लास्टिक के थैले में कोई चीज लाकर देने लगता है तो वह उसे टोक देता है, “देखते नहीं आप थैला लेकर आये हैं ? यह देखना भूल जाते हो कि कौन ग्राहक थैला लेकर आया है और कौन नहीं।”

मैं खुद भी उसके सहायक को अक्सर टोक देता हूं, अरे भई तपाक-से प्लास्टिक में सामान भर के मत थमा दिया करो । खुद भी कभी-कभार अपनी तरफ से ग्राहकों से कह दिया करो कि बाबूजी, थैला लेकर आते तो ज्यादा अच्छा होता । कोई तुम्हें मारने थोड़े ही आएगा । अगर कोई प्लास्टिक की मांग पर अड़ जाए तो दे दिया करो । लेकिन एक बार कह तो सकते हो न ।”

अपने शहर वाराणसी में प्लास्टिक की बहुत पतली थैलियों का दुकानदारी में बेरोक-टोक इस्तेमाल होता है । मेरी जानकारी में ऐसी थैलियों पर काननूी रोक है । लेकिन कानून बेचारा क्या करें ? उसके अपने हाथ-पांव तो होते नहीं कि खुद चलकर कानून के उल्लंघन को रोके । और प्रशासनिक तंत्र के पास काम का इतना बोझ रहता है कि वह हाथ पर हाथ रखकर सब कुछ होते हुए देखने में ही अपनी भलाई पाता है । अतः कानून तो बन जाते हैं, लेकिन उससे वस्तुस्थिति नहीं बदलती । जो अनर्थ लोग करने लगते हैं वह बदस्तूर चलता रहता है । हर कोई इस बात का इंतिजार करता है कि कानून डंडा लेकर दौड़ते हुए उसके पास आये और उसे रोके । कोई मुझे टोके इसका इंतिजार किए बिना ही मैं खुदबखुद कानून का पालन करूंगा ऐसी सोच ऊपर वाले ने उसे शायद दे ही नहीं रखी है ।

मेरे दुकानदार ने एक-दो बार अपने ग्राहकों को कपड़े की थैलियां बांटकर उनसे आग्रह किया था कि वे उन थैलियों को लेकर आएं । लेकिन जब लोगों ने कसम खा रखी हो कि जब तक उनका वश चलेगा वे कोई भला काम नहीं करेंगे, तो भला चीजें कहां सुधरने वाली । लिहाजा दुकानदार ने ही अपनी गलती सुधार ली । यों उसने मुझे बताया था कि प्लास्टिक का इस्तेमाल कुल मिलाकर उसे महंगा ही पड़ता है । लेकिन करे क्या ग्राहकों को नाखुश भी तो नहीं कर सकते !

उस दिन की घटना पर वापस लौटता हूं । मूल्य चुकता करके जब मैं अपना सामान साथ लाए कपड़े के झोले में संभाल रहा था तब दुकानदार का सहायक प्लास्टिक के एक बड़े-से थैले में अन्य ग्राहक का सामान भरकर ले आया । ग्राहक महोदय मेरे ही बगल में खड़े थे । अपरिचित होते हुए भी मैंने विनम्र भाव के साथ मुस्कराते हुए उनसे कहा, “झोला साथ लेकर अगर  आप भी सामान खरीद ले जाया करें तो अच्छा होगा । देखते ही होंगे कितना प्लास्टिक सड़कों-नालियों में पड़ा रहता है । अपने शहर में इसके निस्तारण का कोई प्रबंध तो है नहीं । अपनी तरफ से हम लोग इतना भी कर लें तो कुछ अंतर तो पड़ेगा ही ।”

मैं जब भी खरीद-फरोख्त करता हूं तो प्लास्टिक की थैली के लिए यथासंभव मना कर देता हूं । मेरी पत्नी एवं मैं आम तौर पर अपने साथ थैला आदि लेकर चलते हैं । कभी-कभार दुकानदार भी कपड़े के थैले में सामान भरके दे देता है । मैं अक्सर दुकानदार तथा अगल-बगल खड़े ग्राहकों को भी बिन मांगी सलाह दे बैठता हूं । ऐसी धृष्टता के साथ पेश आना मेरे स्वभाव का हिस्सा बन चुका है । और यही धृष्टता मैं इस बार भी कर बैठा । उक्त ग्राहक मेरी बात पर नाखुशी व्यक्त कर सकते थे, परंतु ऐसा हुआ नहीं । मेरी भावना को स्वीकार करते हुए बोले, “हां, आप ठीक कहते हैं, लेकिन झोला लेकर चलने की आदत ही नहीं बनी । दुकानदार प्लास्टिक के थैले में सामान दे देता है, तो उसी में सुविधा लगती है । दुकानदार ऐसे थैले देना बंद कर दे तो झोला साथ लाना शुरू हो जाए ।”

“लेकिन दुकानदार कहता है कि अनुरोध करने के बावजूद लोग अपने साथ थैला लाते ही नहीं । वे तो प्लास्टिक की थैली में ही सामान मांगते हैं । आप कहते हैं कि दुकानदार बंद करे ऐसी थैली देना, और दुकानदार कहता है कि ग्राहक मांगना बंद करें । पहले अंडा या मुर्गी वाला सवाल यहां खड़ा हो जाता है । इसलिए कुछ हो नहीं पाता ।” मैंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

वे बोले, “आप सही कह रहे हैं, मुझे कोशिश करनी चाहिए ।”

उनके इस कथन को सुनने के बाद मैंने उनसे विदाई ली और घर की राह चल पड़ा । – योगेन्द्र जोशी

 

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