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भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक – शिक्षकों के वेतन से वसूली

हाल के नोटबंदी के निर्णय के बाबत केंद्र सरकार ने दावा किथा था कि इससे भ्रष्टाचार रोकना संभव होगा। तब से मैं सोच रहा हूं कि जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के आचरण का अभिन्न अंग बन चुका हो तब उससे कैसे मुक्ति मिल सकती है। अवश्य ही उपयुक्त कानून के तहत भ्रष्ट व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है, बशर्ते कि उसका भ्रष्ट कृत्य पकड़ में आ जाए। लेकिन उससे क्या व्यक्ति भ्रष्ट मानसिकता से मुक्त हो जाता है? अपनी भ्रष्ट लिप्सा की पूर्ति के लिए वह उपयुक्त अवसरों की तलाश जारी रखेगा ही ऐसा मेरा मत है। इस विषय पर मेरा चिंतन-मनन चल ही रहा था कि एक दिन संयोगवश मेरी भेंट एक महिला रिश्तेदार से हो गयी। उन्होंने जो कहा उससे मेरा इतना ज्ञानवर्धन तो हो ही गया कि जब भ्रष्टाचार के एक रूप पर रोक लगती है तो वह दूसरे रूप में अवतरित हो जाता है। समाज में जब तक असीमित लोभ-लालच वाले लोगों की सुलभता बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार को उपजाऊ भूमि की कमी नहीं रहेगी। पेश है महिला रिश्तेदार से वार्तालाप एक लघुकथा के रूप में।   

मैं कार्यवशात् उन महिला के शहर गया था। रिश्तेदार होने के नाते मैं मिलने के लिए उनसे घर पहुंच गया था। मैंने उनसे पूछा, “अब तो बच्चे बड़े हो गये होंगे। अपना समय-यापन कैसे करती हैं?”

उन्होंने कहा, “पिछले तीन-चार साल से मैं एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ा रही हूं। मैं काम के लिए घर से अधिक दूर जाने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए पास ही के एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी कर ली।”

“सरकारी है या निजी आपकी शिक्षण संस्था?” मैंने जानना चाहा।

उनका उत्तर था, “है तो निजी किंतु सरकारी अनुदान मिलता है विद्यालय को।”

“तब तो कई मामलों में सरकारी नियम-कानून लागू होते होंगे और तनख्वाह ठीक-ठाक मिलती होगी।”

“हां, कागजों में तो सब ठीक रहता है लेकिन हकीकत में नहीं।”

“क्या मतलब?” मैंने जिज्ञासा प्रकट की।

“देखिए तनख्वाह तो मुझे लगभग 25000 रुपया मिलती है और वह मेरे बैंक खाते में जमा भी हो जाती है। लेकिन मुझसे करीब आधी वसूल भी ली जाती है। … इस हाथ से दिया और उस हाथ से ले लिया।”

कुछ क्षणों के लिए मैं उनकी ओर जिज्ञासु दृष्टि से देखता रहा; फिर बोला, “मैं आपका कहना ठीक से समझ नहीं पाया। क्या ऐसा आपके ही साथ हो रहा है या …।”

वे बीच में बोल पड़ीं, “न, न; सभी के साथ यही है, क्या शिक्षक-शिक्षिका और क्या चपरासी। दरअसल हमारी प्रधानाध्यापिका के पति ही विद्यालय चलाते हैं और उन्हीं के परिवार के लोग प्रबंधन आदि में शामिल हैं। प्रबंधन कागजों में सब कुछ साफ-सुथरा दिखाता है। इसलिए हम लोगों का वेतन बैंक खातों में पहुंच जाता है। प्रधानाध्यपिका हमसे कहती हैं कि खाते से लगभग आधा वेतन निकालकर उनके हाथ में सौंप दें। उनका कहना होता है कि विद्यालय के विकास-कार्यों के लिए धन जुटाना जरूरी है। यही तरीका उन्होंने अपना रखा है। कितना विकास के लिए है और कितना उनकी जेब के लिए यह बता पाना मुश्किल है।”

“आप लोग शिकायत नहीं करते?” मैंने पूछा।

“किससे शिकायत करें? किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकाल देंगी। हरएक की अपनी-अपनी विवशता है। इसलिए सभी चुप रहते हैं।”

इस विषय पर आगे कुछ पूछना निरर्थक था। मेरे लिए उनके अनुभव की जानकारी काफी थी यह समझने के लिए कि भ्रष्टाचारी तो अपना काम किसी न किसी रास्ते निकाल ही लेगा। जिसका अंतकरण ही उसे न रोके उसे कोई क्या रोकेगा। इसलिए देश में भ्रष्टाचार है और आगे भी बना रहेगा। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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नमस्ते से “गुड मॉर्निंग” तक की यात्रा

मुझे मौजूदा मोहल्ले में रहते हुए करीब 30 साल बीत चुके हैं। शुरुआती दो वर्षों के बाद से अपने निजी मकान में रह रहा हूं। मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। मैंने इन भाइयों के माता-पिता को देखा है। मैं उनकी पीढ़ी को पहली पीढ़ी संबोधित कर रहा हूं और तदनुसार उक्त भाइयों को दूसरी पीढ़ी के कहूंगा। अब वे माता-पिता इस संसार में नहीं रहे। सुना है कि इस मोहल्ले की भूमि कभी इनकी एवं इनके पट्टीदारों की हुआ करती थी। कालोनाइज़र को जमीन बेचने पर मिले पैसे का समुचित उपयोग ये लोग शायद नहीं कर पाये होंगे। इसलिए इनकी माली हालत सामान्य या उससे बदतर रही है ऐसा मेरा सोचना है। ये पांचों भाई मोहल्ले के पास ही लगने वाली फल-सब्जी-सट्टी में थोक अथवा फुटकर कारोबार करके परिवार का पालन-पोषण करते आये हैं।

अब दूसरी पीढ़ी के इन भाइयों की उम्र साठ के आसपास उसके कुछ ऊपर-नीचे होनी चाहिए ऐसा मेरा अनुमान है। इनमें से कोई साक्षर भी है कि नहीं मुझे ठीक से नहीं मालूम; मैंने कभी पूछा नहीं। कोई साक्षर होगा भी तो उसे मात्र अक्षरज्ञान से कुछ और अधिक ज्ञान नहीं होगा। आम तौर पर वे वाराणसी में प्रचलित भोजपुरी बोलते हैं, किंतु मेरे साथ सामान्य हिन्दी में ही बात करते हैं।

इसके आगे यह भी बता देता हूं कि इनमें से सभी की संतानें संख्या में 4 से 7 के बीच हैं। इस तीसरी पीढ़ी की प्रायः सभी संतानें राज्य-सरकारी/परिषदीय स्कूलों में पढ़ने अवश्य जाया करते थे,  किंतु कोई भी +2 स्तर पार नहीं कर सका। मेरा अनुमान है कि शायद कोई भी हाई-स्कूल उत्तीर्ण नहीं है। फिर भी वे (युवक न कि युवतियां) अच्छा कारोबार कर ले रही है। कइयों ने तो सब्जियों-फलों का पुस्तैनी धंधा छोड़कर नये धंधे भी अपना लिए हैं। अब माहौल काफी बदल चुका है। किसी के भी अधिकतम तीन बच्चे हैं। इस चौथी पीढ़ी के कुछ बच्चे निजी अंग्रेजी विद्यालयों में भी पढ़ रहे हैं।

उक्त विवरण देने के पीछे मेरा मकसद एक दृष्टांत प्रस्तुत करना है कि हमारे देशवासियों के दिलोदिमाग पर आधुनिकता और अंग्रेजी किस प्रकार राज कर रही है । उपर्युक्त खानदान की चार पीढ़ियों – परदादा-परदादी से लेकर आज के नये बच्चों की पीढ़ियों को मैं पिछले करीब तीस साल से देख रहा हूं। चौथी पीढ़ी आते-आते इन लोगों में स्पष्टतः दिखाई देने वाला सांस्कृतिक/भाषायी परिवर्तन मैंने अनुभव किया है। दूसरी पीढ़ी के सबसे बढ़े भाई की सबसे बढ़ी बहू आज भी पारंपरिक लिबास यानी सीधे पल्लू की साड़ी पहने हुए रहती है। लेकिन इन परिवारों की बाद में आईं बहुएं उल्टे पल्लू की साड़ियों में दिखाई देती हैं। दिलचस्प है कि वे हल्का-सा घूंघट अभी नहीं छोड़ पाईं हैं। सुनता हूं कि उनमें से कुछ हाईस्कूल पास भी हैं।

इन पांच भाइयों के बच्चे जब छोटे थे तब वे अपने-अपने माता-पिता को “माई-बाबू” या इसी प्रकार के संबोधन से पुकारते थे। परंतु बड़े हो जाने और अपने-अपने कामधंधों के दौरान समाज के अन्य वर्गों के संपर्क में आने के बाद उनमें से कुछ ने “मम्मी-पापा” का प्रयोग आरंभ कर दिया । अपने देश में अब गैर-रिश्तेदार या अजनबी आदमी को “अंकल” शब्द से पुकारना प्रायः पूरी तरह प्रचलन में आ चुका है, जिसमें संबोधित व्यक्ति की उम्र वक्ता से पर्याप्त अधिक होती है। अंकल संबोधन माता-पिता की उम्र वाले के लिए और  दादा-दादी की उम्र वाले के लिए भी प्रयुक्त होने लगा है।

तीसरी पीढ़ी के उक्त बच्चे मुझे आरंभ से ही अंकल कहते आये हैं। पहले उनका अभिवादन “नमस्ते” हुआ करता था, किंतु अब उनमें से दो-तीन ऐसे हैं जो “गुड मॉर्निंग” पर उतर आये हैं। मेरा प्रत्युत्तर उसी पुरानी शैली में “नमस्ते” रहता है। दुआ-सलाम की बात प्रायः प्रातः काल ही होती है। मैंने इस पर गौर नहीं किया कि वे दोपहर या संध्या पश्चात्‍ भी “गुड मॉर्निंग” ही कहते हैं या कुछ और। उनमें से एक टैक्सी चलाता है, उसे अवश्य अधिक जानकारी होगी।

चौथी पीढ़ी के जो बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं वे अंग्रेजी को लेकर कुछ अधिक ही उत्साहित हैं। वे किसी स्तरीय विद्यालय में नहीं पढ़ते, बल्कि उन्हीं विद्यालयों में से एक में पढ़ते हैं जो आजकल हर गली-कूचे-नुक्कड़ पर अंग्रेजी-माध्यम के नाम पर खुलते देखे जा सकते हैं। वे बच्चे हिन्दी की गिनतियां शायद ठीक-से नहीं जानते हैं। विद्यालय अंग्रेजी पर ही जोर डालते हैं, क्योंकि अंग्रेजी ही सुन्दर भविष्य की कुंजी है यह सभी का मानना है। उनमें से कुछ ने मेरे लिए “गुड मॉर्निंग” का अभिवादन अपना लिया है। बच्चों के जन्मदिन पर केक भी कटने लगे होंगे और “हैप्पी बर्थडे टु यू” का गायन भी होने लगा होगा। मोहल्ले की गली में उन बच्चों को इस गीत को गाते-गुनगुनाते हुए भी मैंने एक-दो बार देखा है।

तो यह है पहली पीढ़ी की निपट निरक्षरता से चौथी पीढ़ी की अंग्रेजी शिक्षा तक पहुंचने की यात्रा का विवरण। और साथ में संबोधन, अभिवादन, एवं पहनावे में आये परिवर्तन की कहानी। -योगेन्द्र जोशी

 

 

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नोटबंदी के बाद लाला को मिला मुफ़्त का पैसा

टिप्पणी: यह लघुकथा साहित्य शिल्पी नामक ई-पत्रिका में छ्प चुकी है (दिनांक 2016-11-29)| आम तौर पर मैं अपने अनुभवों को लघुकथा के रूप में ढ़ालकर इस चिट्ठे पर पेश करता हूं, लेकिन यह पूर्णतः काल्पनिक है, सामयिक घटना पर आधारित।

मैं घर के पास की दुकान से घर के लिए रोजमर्रा का जरूरी सामान लेकर आ रहा था। सामने से मुरारीलाल साइकिल से आते दिख गया। मैं रुक गया। जैसे ही वह नजदीक पहुंचा मैंने उसे रोकने के लिए आवाज दी, “अरे ओ लाला!”

उसने अपनी दायीं ओर नजर घुमाई और मुझे देखकर साइकिल रोकते हुए पास आ गया। मैंने टोका, “अरे लाला, इतनी तेजी से कहां से आ रहे हो? जरा आजू-बाजू भी देख लिया करो। कभी-कभी हमारे जैसे परिचित, यार-दोस्त, राह में बतियाने के लिए खड़े मिल जाते हैं।”

उसने जवाब दिया, “बैंक से आ रहा हूं। हजार-पांचसौ के कुछ नोट जमा करने थे। बहुत भीड़ थी, तीन-चार घंटे लग गये। सुबह का घर से निकला हूं, बिना चाय-नास्ते के, इसलिए पहुंचने की जल्दी थी।”

“चाय-नास्ते के बिना दम निकला जा रहा हो तो चलो मेरे साथ; मैं चाय पिलाता हूं। दो कदम की दूरी पर ही तो मेरा घर है।” मैंने कहा।

वह साथ हो लिया। मैंने चुटकी ली, “बड़े छिपे रुस्तम निकले, भई। हम तो तुम्हें कंगाल समझते थे। तुम तो घर में नोटों की गड्ढी छिपाए पड़े हो यह आज पता चला। पुराने नोट बंद क्या हुए कि लोगों के घरों से जमा नोट निकलने लगे।”

“नहीं यार, अपनी किस्मत कहां जो घर में नोट जमा हों”

“तो फिर कहीं डांका डाले थे क्या? या कहीं कूड़े में मिल गये थे?”

“नहीं भई। बस किसी ने दान में दे दिए समझो।”

“पहेली मत बुझाओ; साफ-साफ बताओ कहां से पा गए नोट?”

“बताता हूं … बताता हूं क्या हुआ। तुम तो मेरे चचेरे भाई, जीवनलाल जी को जानते ही हो। वैसे तो वे उधार में भी पैसा देने से किसी न किसी बहाने बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन कल शाम एक लाख के पुराने नोट लेकर पहुंच गये घर पर और बोले, ‘मुरारी मेरा एक काम करो। ये पैसा लो और अपने बैंक खाते में जमा कर लो। डेड़-दो साल बाद आधा मुझे दे देना और आधा तुम रख लेना।’ मैंने उनकी बात मान ली। गरीब को पचास हजार रुपये मिल रहे हों तो इससे अच्छा क्या हो सकता है।” उसने मुझे समझाया।

अब तक हम घर पर पहुंच चुके थे। घर में दाखिल होते हुए मैंने श्रीमती जी को आवाज दी और मुरारीलाल को चाय-वाय पिलाने का अनुरोध किया। फिर मुरारी की तरफ़ मुखातिब होते हुए कहा, “आज तक तुम्हारे खाते में तनख्वाह के अलावा कभी एक धेला भी जमा नहीं हुआ होगा। इस बार उसमें अनायास एक लाख की रकम जमा हो गयी। बदकिस्मती से अगर कोई राजस्व अधिकारी पूछ बैठे कि यह रकम कहां से आई तब क्या स्पष्टीकरण देना होगा इसे भी सोच लेना।”

मुरारीलाल का चेहरा देख मुझे लगा कि वह गंभीर सोच में पड़ गया है।  – योगेन्द्र जोशी

 

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जांच अधिकारी

वह पुलिस महकमे से प्रतिनियुक्ति पर आया एक सीबीआई अधिकारी था । अपने कार्य के प्रति समर्पित निष्ठावान कर्मठ अधिकारी था वह । मुश्किल से डेड़-दो साल हुए होंगे उसे नयी संस्था में आए हुए । वह चाहता था कि जिस जांच में उसे लगाया गया हो उसे पूरा करने का उसे अवसर मिले । वह समझ नहीं पा रहा था कि इस अल्पकाल में ही विभाग के भीतर उसके दो तबादले क्यों हो गये । उच्चाधिकारी से पूछने पर दोनों बार यही जवाब मिला कि उसकी जरूरत दूसरी जगह महसूस की जा रही है । यह उसकी योग्यता का प्रमाण था या कुछ और यह उसके लिए समझ से परे था । अस्तु, आदेश मानना उसका कर्तव्य था, अतः वह आधा-अधूरा कार्य छोड़ दूसरी जांच में मनोयोग से जुट जाता । अब वह रसूखदार और चर्चित किसी राजनेता की  आपराधिक संलिप्तता की जांच में जुटा था । उसे दाल में बहुत कुछ काला दिख रहा था और वह आशान्वतित था कि जांच के सार्थक परिणाम शीघ्र ही उसके हाथ लगेंगे । किंतु आज उसके उच्चाधिकारी ने जो कहा उससे उसे मानसिक कष्ट के साथ निराशा हो गयी ।

शाम को वह घर पहुंचा और सोफ़े के कोने पर हत्थे के सहारे बैठ गया । आम दिनों की तरह वह हाथमुंह धोकर तरोताजा होने वाशबेसिन या बाथरूम नहीं गया । थोड़ी देर में पत्नी उसके लिए हल्के नाश्ते के साथ चाय बना के ले आई । उसका मुरझाया चेहरा देख पत्नी ने पूछा, “काम के बोझ से तुम थके-हारे तो अक्सर दिखते हो, लेकिन आज तुम्हारे चेहरे पर परेशानी के भाव उभर रहे हैं । तबियत तो ठीक है न ? कोई खास बात तो नहीं हो गयी आफ़िस में ?”

पत्नी उसकी बगल में आकर बैठ गई । वह कुछ क्षणों तक शांत रहा । फिर प्रश्न भरी निगाह से देख रही पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए बोला, “हां कुछ ऐसा ही हो गया आफिस में ।” और पुनः शांत होकर सुनी आंखों से छत की ओर ताकने लगा । पत्नी असमंजस में थी कि कुछ आगे पूछे या उसे अपनी बाहों में भरकर उसके उद्वेग को किंचित दूर करे ।

“लो, चाय पी लो, ठंडी हो रही होगी ।” कहते हुए पत्नी ने उसके हाथ में चाय का प्याला पकड़ाया । उसने चाय की दो-चार चुस्कियां जब ले लीं तो पत्नी की हिम्मत थोड़ी बढ़ी कि आगे कुछ पूछे । “बताओ कुछ हुआ क्य़ा आफिस में ? मैं आफ़िस की समस्या का हल नहीं दे सकती, किंतु मुझे बताके तुम अपना मन हल्का तो कर ही सकते हो न !”

चाय की चुस्कियों और पत्नी के सान्निध्य ने अब तक उसके मन का बोझ कुछ कम कर दिया था । उसने कहना शुरू किया, “आज मेरे बॉस ने मुझे बुलाया और मुझसे कहा कि मैं जांच का काम धीमी गति से करूं । जल्दी से जल्दी परिणाम पाने की कोशिश मैं न करूं और मामले को कुछ हद तक लटकाये रहूं । मैं उनकी बात मानना नहीं चाहता था । मेरा सोचना है कि ऐसा करना मेरे व्यवसाय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता है और न ही दायित्वों के निर्वाह में ढीला रवैया मुझे व्यक्तिगत तौर पर स्वीकार्य है । मैंने अपना पक्ष रखते हुए उनसे जानना चाहा कि वे ऐसी सलाह क्यों दे रहे हैं । पहले तो वे टालते रहे फिर बोले कि ऐसा अलिखित निर्देश ऊपर से आया है । ऊपर का मतलब मंत्री के स्तर से है यह मैं समझ गया । फिर वे कहने लगे, ‘मुझे मालूम है कि यह बात तुम्हें पसंद नहीं । मुझे भी यह सब पसंद नहीं, परंतु अनुभव ने मुझे सिखा दिया है कि यहां ऐसा कुछ चलता रहता है । चुनाव नजदीक हैं उस समय यह मुद्दा सत्तापक्ष के काम आ सकता है यह मेरा अनुमान है । राजनेताओं के मामले ऐसे ही लटकाए रखे जाते हैं । न चाहते हुए भी हमें बहुत कुछ करना पड़ता है ।’ उसके बाद मैंने अधिक बात नहीं की और मैं अपने कार्यालय लौट आया । तुम्हें मालूम है ऐसी स्थिति में मुझे तकलीफ़ होती है ।”

“हां, मुझे मालूम है । इतना तो तुम्हें समझती ही हूं । मुझे भी बहुत-सी बातें ठीक नहीं लगती हैं, पर कर भी क्या सकते हैं ? बहुत-से मौकों पर समझौते करने पड़ते है । परिवार के भीतर, मित्र-परिचितों के स्तर पर, राह चलते अजनबियों के बीच, बताओ हम कहां-कहां समझौते नहीं करते ? इतना दुःखी न होओ । … चलो टीवी चलाती हूं, आज की खबरें सुनो ।”  पत्नी ने अपने तरीके से उसे आश्वस्त करने का प्रयास किया । वह टीवी ऑन करने उठी तो उसने उसका हाथ खींचकर वापस अपने साथ बिठा लिया ।

“फ़र्क है । सामाजिक जीवन में हमारे समझौते हमारी व्यक्तिगत लाभहानि की कीमत पर होते हैं, हम अपनी सुख-सुविधा या वैचारिक प्रतिबद्धता दांव पर लगाते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन में समझौतों का मतलब है देशहित की अनदेखी करना, अपने दायित्व को न निभाना जिनके लिए देश से आर्थिक लाभ ले रहे होते हैं । इस फ़र्क को समझो ।” उसने अपनी धारणा स्पष्ट की ।

उसने आगे कहना आरंभ किया, “इससे तो अच्छा है अपने राज्य में रहकर ही काम करना ।  जब शासन में बैठे लोग किसी से काम नहीं लेना चाहते हैं तो उसे ऐसी जगह भेज दिया जाता है जहां बंधा-बंधाया काम (रूटीन वर्क) करना काफ़ी होता है । तब इस बात की ग्लानि नहीं होती है कि मैं अपना दायित्व नहीं निभा रहा हूं । लेकिन इस महकमे में तो किसी न किसी जांच से जुड़ना ही होता है और तमाम दबाव झेलने होते हैं ।”

उस रात उसे काफ़ी देर तक नींद नहीं आई । वह सोचने लगा कि जिस संस्था में किसी न किसी बहाने दायित्व निभाने से रोका जाये वहां टिके रहना चाहिए अथवा नहीं ।

दूसरे दिन रोज की भांति वह वह कार्यालय के लिए तैयार हुआ । पत्नी ने प्रातःकालीन नाश्ता कराया और दोपहर के भोजन के लिए लंचबाक्स थमाते हुए बोली, “अगर शाम को जल्दी लौट सको तो कुछ देर के लिए कहीं घूमने निकल चलेंगे ।” वह चुप रहा, कोई जवाब नहीं दिया ।

घर से निकलते-निकलते वह पत्नी से बोला, “मेरी प्रतिनियुक्ति निरस्त करके मुझे अपने मूल राज्य वापस भेज दिया जाए इस आशय का निवेदन मैं आज कार्यालय को सोंप दूंगा ।” – योगेन्द्र जोशी

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अलविदा, अवाच् मित्रो !

Huron Woods Pathway

आज मैं करीब डेड़ माह के लंडन प्रवास के बाद स्वदेश लौट रहा हूं । यह इंग्लैंड का सुविख्यात शहर लंडन नहीं है, यह तो है उसी नाम से कनाडा के पूर्वी प्रांत ओंटारियो में बसा हुआ एक छोटा-सा शहर, जिसकी आबादी पांच लाख से भी कम आंकी जाती है । शहर विस्तृत भूभाग में विरलतया बसा है, पेड़-पौधों से पटा, भीड़भाड़ से मुक्त शहर ।

अभी प्रातःकाल है और चंद घंटों के बाद मेरी हवाई उड़ान शुरू होनी है । रोज की भांति मैं आज भी टहलने निकल पड़ता हूं अपने अस्थाई आवास के सामने फैले ‘ह्यूरान वुड्ज’ (ह्यूरान उपवन) के अंदरूनी भाग में बने मार्ग पर । यह मार्ग है पैदल टहलने तथा शौकिया साइकिल-चालन के लिए । इस मार्ग के दोनों ओर हरे-भरे पेड़-पौधे तथा झाड़ियां हैं और बगल में बीस-तीस फुट की दूरी पर बहती है टेम्स नदी । अंगरेजों ने अपने बसाए इस शहर को लंडन नाम तो दिया ही साथ में इस नदी को भी टेम्स नाम से संबोधित किया, भले ही इंग्लैंड की टेम्स नदी की तुलना में यह बहुत छोटी है ।

इस मार्ग पर प्रायः रोज ही प्रातः या सायं अथवा दोनों वक्त मेरे टहलने की दैनिक चर्या होती रही है । किंतु आज का टहलना कुछ विशेष है – अपने लंडन प्रवास के अंतिम दिन का टहलना । संध्याकाल होते-होते तो मैं इस देश को छोड़ चुका होऊंगा । यह टहलना इसलिए भी विशेष है कि आज मुझे इस अवाच् (वाणीरहित) उपवन से, इसके पेड़-पौधों से, टेम्स नदी से विदा लेनी है । इस अल्पकालिक प्रवास के दौरान इन सब से मेरा एक प्रकार का लगाव हो चुका है । समय के बीते अंतराल में मुझे लगा है कि मैं इनके साथ घनिष्टतया जुड़ चुका हूं । भीड़भाड़ एवं कोलाहल से दूर, कभी-कभार इक्का-दुक्का लोगों के अगल-बगल से गुजर जाने के अलावा यहां कोई मानवीय हलचल नहीं रही है । इस स्थिति में मुझे अनुभव होता रहा कि मेरी इन पेड़-पौधों से, पक्षियों से, नदी से, मित्रता हो गई है; ये मुझे जानने लगे हैं, मेरे मनोभावों को ये भी महसूस करने लगे हैं, और ये स्वयं मुझे मूक संदेश देते आ रहे हैं ।

अपने इन मानवेतर अवाच् मित्रों के सान्निध्य से मैं आज वंचित होने जा रहा हूं । इनसे विदा लेते मुझे अच्छा नहीं लग रहा है । आज का मेरा टहलना अन्य दिनों की भांति नहीं हो रहा है । अपनी स्वाभाविक तीव्र गति से मैं आज नहीं टहल रहा हूं । मैं बीच-बीच में ठहर जाता हूं । कभी किसी विशाल वृक्ष के शिखर की ओर दृष्टि डालता हूं तो कभी किसी पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । कभी किसी चहकती चिड़िया को पेड़ों की शाखाओं के बीच ढूढ़ने का प्रयास करता हूं । वह मुझे दिखती नहीं, बस उसका चहकना भर सुन पाता हूं । मैं टेम्स नदी के किनारे चला जाता हूं । नदी पर तैरती बत्तखों का एक झुंड मेरी ओर बढ़ता है, मुझसे दाना-चारा पाने की उम्मीद के साथ । आज मेरी जेब में उनके खाने योग्य कुछ भी नहीं । मैं माफी मांगता हूं और अस्फुट शब्दों में ‘अलविदा’ कहते हुए मन ही मन हाथ हिलाते हुए लौट आता हूं । लगता हैं कि बत्तखें पंख फड़फड़ाकर मुझे शुभयात्रा का संदेश दे रही हैं ।

उस मार्ग पर बीच-बीच में रुकते हुए मैं अपने इन मित्रों के साथ मूक वार्तालाप करता हूं । मैं एक पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । मेरे होंठ कांपते हैं; लगता है मैं उन फूलों से कहना चाहता हूं, “तुम बहुत सुन्दर हो; मैं रोज तुम्हें और तुम्हारे साथी फूलों को प्रतिदिन निहारता आया हूं; पर आज इस पल के बाद नहीं देख पाऊंगा, क्योंकि मैं जा रहा हूं तुम सब से दूर, बहुत दूर । पता नहीं कभी दुबारा यहां आना हो भी पाएगा कि नहीं ।” मंद-मंद प्रवाहित हो रही वायु के साथ हिलते हुए उन फूलों का मूक प्रत्युत्तर लगता है मैं सुन पा रहा हूं, “आना-जाना तो लगा ही रहता है, मित्र । हम ही को देखो, हमारी काया यानी यह पौधा पूर्व में यहां नहीं थी और आगामी शीत ऋतु के हिमपात होते-होते यह अपना अस्तित्व खो देगी । उसके बाद के बसंत काल में हमारी वह अगली पीढ़ी यहां पर होगी जिसे हम बीज रूप में छोड़ जाएंगे । आवागमन तो प्रकृति का नियम है, कभी काया का स्थान परिवर्तन होता है तो कभी जीवात्मा का । रूको नहीं आगे बढ़ो हमारी शुभकामनाओं के साथ ।”

मैं आगे बढ़ जाता हूं । कुछ कदमों की दूरी पर मुझे हिसालू (रैस्पबेरी या रासबेरी) की झाड़ी दिखती है । मैं उसके पास ठहरता हूं । देखता हूं कि उसके कुछ फल सूख चुके हैं या झड़ चुके हैं । कुछ पककर गहरे कत्थई रंग धारण कर चुके हैं तो कुछ अभी कच्चे है । मुझे लगता है कि वह झाड़ी कह रही है, “इन फलों को मेरी ओर से भेंट मानकर ग्रहण कर लो । तुम नहीं तो कोई और इन्हें स्वीकारेगा, या ये अंत में भूमिशायी हो जाऐंगे और कालांतर में पंचतत्व में विलीन हो जाऐंगे ।” मैं हिसालू के चार-छः फलों को चुनकर मुख में डाल लेता हूं और उस झाड़ी को धन्यवाद देते हुए अपने कदम आगे बढ़ाता हूं ।

मुझे उस मार्ग के ओर कम घने एक पेड़ पर गौरैया सदृश एक चिड़िया चीं-चीं की ध्वनि करते हुए एक शाखा से दूसरी, दूसरी से तीसरी, आदि के क्रम से फुदकती दिखाई देती है । बीच-बीच में वह पत्तों के मध्य ओझल भी हो रही है । मुझे लगता है वह मुझसे कह रही हैं, “मुझे देखो मैं एक स्थान पर नहीं ठहरती, इधर-उधर फुदकती रहती हूं । जो स्थावर है उसी के लिए स्थिरता नियत है; जंगम के लिए प्रकृति ने चलते ही रहने का नियम बनाया है । तुम्हारे मुख के भावों से मैं समझ चुकी हूं कि तुम आज जा रहे हो । अवश्य ही जावो और स्मरण करो ऐतरेय ब्राह्मण गंथ के ‘चरैवेति चरैवेति’ के संदेश को । इस उपवन की शुभकामना के साथ हमसे विदा ले लो ।”

मैं पैदल मार्ग के उस छोर पर पहुंचता हूं जहां वह मेरे अस्थायी आवास के निकट के मुख्यमार्ग से जुड़ता है । उस मुख्यमार्ग पर कदम रखने के पहले मैं पीछे मुड़कर अपने हाथ ऊपर की ओर उठाता हूं । उस उपवन के अपने अवाच्‍मित्रों की ओर अंतिम बार देखता हूं और मन ही मन कहता हूं, “मित्रो, तुम सबके सुखद सान्निध्य की स्मृति के साथ मैं विदा लेता हूं । अलविदा !” – योगेन्द्र जोशी

(चित्र में प्रदर्शित रासबेरी के रसीले फल को हमारे कुमाऊं, उत्तराखंड, में हिसालू कहा जाता है ।)

 

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अटैचियों को जंजीर से बांधकर सुरक्षित रखने का असमंजस

 

रेलगाड़ी से यात्रा करते समय बहुत-से यात्रियों के सामने यह समस्या प्रायः आ खड़ी होती है कि रात के समय अटैचियों-बैगों को कैसे सुरक्षित रखा जाये । उत्तर भारत में यह समस्या बहुत आम है, खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में । जब कोई  यात्री रात में गहरी निद्रा में सोया रहता है, तो उसे यह डर बना रहता है कि चोर-उचक्के डिब्बे में घुसकर उसके सामान पर चुपचाप हाथ साफ कर सकते हैं । सामान सुरक्षित रहे इस प्रयोजन के लिए अक्सर सिकड़ी (जंजीर) का प्रयोग किया जाता है । सामान को शायिका (बर्थ) के नीचे लगे छल्ले से सिकड़ी के सहारे बांध दिया जाता है । मैं स्वयं इसी विधि से सामान सुरक्षित रखता हूं; भरोसा नहीं रहता है न कि सामान सुरक्षित रहेगा !

करीब तीन साल पहले मैं पत्नी के साथ पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) पर्यटक के तौर पर गया । हमें हैदराबाद होकर जाना था । वहां से हम पूर्वनिर्धारित आरक्षण के अनुसार रात्रिकालीन रेलगाड़ी द्वारा चेन्नै के लिए रवाना हुए । नौ बजे के बाद हमारा सोने का उपक्रम आरंभ हुआ । सोने से पहले सदा की तरह सोचा कि अपने अटैची-बैग को शायिका के नीचे सिकड़ी से बांधकर सुरक्षित कर लिया जाए । साथ लाए गए बैग से हमने सिकड़ी भी निकाल ली । लेकिन तब हमें असमंजस का एहसास होने लगा । दरअसल डिब्बे में चढ़े हुए या चढ़ रहे अन्य यात्रियों को हम  देख रहे थे कि वे अपना-अपना सामान शायिकाओं के नीचे सरकाते हुए निश्चिंत होकर अपनी-अपनी शायिका पर सोने जा चुके हैं या जा रहे हैं । कोई ऐसा यात्री नजर नहीं आया जिसने सिकड़ी से सामान बांधा हो ।

मैंने पत्नी से कहा, “यहां कोई भी अपने सामान के लिए चिंतित नहीं दिखता । उन लागों को देखते हुए सिकड़ी से सामान बांधने का ख्याल मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा है । तुम्हारा क्या सोचना है ?”

वे बोलीं, “हां, सामान चेन करने में अजीब-सा तो मुझे भी लग रहा है । ऐसा लगता है कि यहां सामान सुरक्षित रखने के लिए सिकड़ी वाला तरीका कोई नहीं अपनाता है । ऐसे में कोई देखेगा तो मन ही मन हंसेगा ।”

“तब चेन करने का ख्याल ही छोड़ दिया जाये । उसमें कोई जोखिम नहीं लगता ।” मैंने प्रत्युत्तर में कहा ।

उन्होंने हामी भरी और अटैची-बैग को हमने शायिका के नीचे यूं ही छोड़ दिया । अगली सुबह हम सकुशल चेन्नै पहुंच गए ।

बहुत-सी बातें हैं जिनके सापेक्ष मैंने दक्षिण भारत को उत्तर भारत से बेहतर पाया है । उत्तर भारतीयों को उनसे कुछ सीखना चाहिए । इस कथन पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, किंतु हकीकत तो हकीकत ही होती है । – योगेन्द्र जोशी

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दारोगा की धुनाई

चंद रोज पहले टीवी के किसी चैनल पर पंजाब राज्य के पुलिस बल से जुड़ा एक समाचार देखने-सुनने को मिला । चैनल पर दिखाए गये वीडियो क्लिप में पुलिस के दो-तीन जवान एक युवक को बेरहमी से पीटते नजर आ रहे थे । उस आम युवक – जाहिर है कि वह कोई “खास श्रेणी” का रसूखदार व्यक्ति नहीं था – की गलती यह थी कि वह अपने किसी मित्र की उन पुलिसवालों के साथ हो रही बहस की वीडियो क्लिप मोबाइल पर रिकार्ड कर रहा था । पुलिस के जवानों की नजर जब उस पर पड़ी तो उन्हें उसकी हरकत किसी “अपराध” से कम नहीं लगी । उन्होंने उसका मोबाइल छीनकर वीडियो रिकाडिंग मिटा दी और “कानून की मर्यादा बनाए रखने” तथा सबक सिखाने के लिए उसकी पिटाई भी कर दी । वे मोबाइल अपने साथ ले गए कि नहीं यह मुझे स्पष्ट नहीं हो सका । उनको शायद यह पता नहीं रहा होगा कि पास के एक दुकान का सीसीटीवी कैमरा घटना की रिकार्डिंग कर रहा है ।

उसी दिन पुलिस बल से जुड़ी दूसरी घटना के समाचार की भी जानकारी मिली । महाराष्ट्र राज्य से संबंधित उस समाचार के अनुसार तीन पुलिस वाले अर्धरात्रि के समय मिठाई की उस समय बंद एक दुकान में घुस गये ताला तोड़कर । और “संवेदनशीलता का परिचय देते हुए” उन्होंने वहां सो रहे कर्मचारियों की तबियत से मरम्मत की । समाचार में बताया गया कि वे दुकान के किसी कर्मचारी से खफा थे ।

इन दो समाचारों ने मुझे लगभग उसी समय की एक स्थानीय घटना की याद दिला दी । मैं घर के पास की सब्जीसट्टी पर सब्जियां और फल खरीदने गया था । वहां एक पेड़ के नीचे एक सब्जी विक्रेता जमीन पर सब्जियों की ढेरियां लगाकर बेच रहा था । मैं खरीदफरोख्त करने लगा । इसी दौरान ठेले पर भूरे जटाधारी नारियल (पुष्ट लेकिन पानी वाले) बेच रहा एक आदमी उसके पास पहुंचा और बोला, “कल खूब धुनाई हुई उसकी ।”

सब्जी वाला उस घटना से पहले से ही वाकिफ रहा होगा जिसके संदंर्भ में उक्त बात कही होगी । उस नारियल वाले से मैं भी यदाकदा नारियल खरीदा करता हूं और उस नजर से देखें तो वह एक प्रकार से मेरा भी परिचित था, सीमित अर्थ में ही सही । मुझे घटना के बारे में जिज्ञासा हुई, अतः मैंने उससे पूछा, “क्यों, क्या हुआ, किसकी धुनाई हो गई ?”

“अरे कुछ नहीं … । आजकल एक दारोगा इस सड़क पर गस्त लगाता है । उसी की धुनाई कर दी कुछ लड़कों ने ।”  उसने जवाब दिया ।

“आखिर मामला क्या था, क्या बात हो गई थी ।” मैंने पूछा ।

“दो-तीन रोज पहले उसने बी.एच.यू. (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) में पढ़ने वाले एक लड़के को किसी बहाने पीट दिया और उसका मोबाइल भी छीन लिया । वह लड़का जब बाद में बी.एच.यू. गया और उसने अपने दोस्तों को घटना के बारे में बताया तो उन्होंने तय किया कि दारोगा को सबक सिखाया जाए । तय हुआ कि वह लड़का उसी इलाके में जाए और देखे कि उससे फिर से सामना हो जाए । तब वह दोस्तों को खबर कर दे । कल 25-30 की संख्या में जुटकर वे लोग अपनी योजना में सफल हो गये । उन्होंने दारोगा की पिटाई कर दी ।”

“लेकिन अखबार में तो इस बारे में कोई खबर नहीं आई ।” मैंने घटना के प्रति शंका जताई ।

“अखबार में हर बारदात के बारे में थोड़े ही छपता है । कोई बहुत बड़ी घटना तो थी नहीं । ऐसी बातें तो शहर में अक्सर होती ही रहती हैं । किसी ने शिकायत भी नहीं की होगी । लड़के क्योंकर शिकायत करते ? और दारोगा भी सोचता होगा कि मामले में कहीं वही न फंस जाए ।”

मैंने घटना की सत्यता के बारे कुछ लोगों से जानना चाहा । किसी ने कहा कि ऐसी कोई जानकारी उसे नहीं है तो किसी और ने कहा कि उसने भी ऐसी घटना के बारे में सुना । अन्य किसी ने कहा कि ऐसी छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं । पुलिस का रवैया अधिकांशतः अच्छा नहीं रहता यह बात लोग अवश्य मानते दिखे ।

परतंत्र भारत में पुलिस व्यवस्था अंगरेजों ने अपने हित साधने के लिए स्थापित की थी । अतः पुलिस जनों में तब आम लोगों के प्रति सेवाभाव न रहा हो तो बात समझ में आती है । लेकिन स्वतंत्र भारत में दो से अधिक पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी पुलिस-बल उसी ढर्रे पर चल रहा हो तो अपने को तकलीफ तो होती ही है । समाचार माध्यमों में उनके अवैधानिक कारनामों तथा लापरवाही की खबरें छपती रहती हैं।  उनकी मानसिकता कभी बदलेगी क्या ? इस सवाल का जवाब मेरा मन नहीं में ही देता है । – योगेन्द्र जोशी

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